ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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01.श्रावक धर्म प्रश्नोत्तरी

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श्रावक धर्म

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प्रश्न—१ धर्म का लक्षण बताइये ?
उत्तर—समस्त जीवों पर दया करना इसी का नाम धर्म है।

प्रश्न २—धर्म के दो भेद कौन से हैं ?
उत्तर—गृहस्थ धर्म (एकदेश रूप) और मुनिधर्म (सर्वदेश रूप) से यह दो प्रकार का है।

प्रश्न ३—क्या धर्म के दस भेद भी हैं ? अगर हाँ, तो उनके नाम बताइये ?
उत्तर—धर्म के दस भेद भी हैं जो इस प्रकार हैं—उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आिंकचञ्य और उत्तम ब्रह्मचर्य।

प्रश्न ४—उत्कृष्ट धर्म कौन सा है ?
उत्तर—मोह से उत्पन्न विकल्पों से रहित और वचन से निरूपित न होने वाले शुद्ध तथा आनन्दमय आत्मा की परिणति का नाम उत्कृष्ट धर्म है।

प्रश्न ५—दया धर्म की क्या परिभाषा है ?
उत्तर—जो उत्तम व्रतों के समूह में मुख्य, सच्चे सुख और श्रेष्ठ सम्पदाओं को उत्पन्न करने वाली धर्मरूपी वृक्ष की जड़ है और मोक्ष रूपी महल के अग्रभाग में चढ़ने के लिए सीढ़ी के समान है वही दया है।

प्रश्न ६—क्या दया बिना धर्म ठहर सकता है ?
उत्तर—नहीं, जिस प्रकार जड़ के बिना वृक्ष नहीं टिक सकता है उसी प्रकार दया बिना धर्म नहीं ठहर सकता है।

प्रश्न ७—तीन लोक की सम्पदा से भी अधिक प्यारा क्या है ?
उत्तर—तीन लोक की सम्पदा से भी अधिक प्राणियों को अपने प्राण प्यारे हैं।

प्रश्न ८—सबसे बड़ा दान क्या है ?
उत्तर—जीवनदान सबसे बड़ा दान है।

प्रश्न ९—दान के कितने भेद हैं ?
उत्तर—दान के चार भेद हैं—आहारदान, औषधिदान, शास्त्रदान और अभयदान।

प्रश्न १०—इन चारों दानों में उत्कृष्ट दान कौन सा है ?
उत्तर—इन सबमें उत्कृष्ट दान अभयदान है।

प्रश्न ११—इसका पालन कैसे सम्भव है ?
उत्तर—अभयदान तब ही पल सकता है जब किसी जीव के प्राण न दुखाए जावें, इस दान के आकांक्षी मनुष्य को जीव की हिंसा नहीं करनी चाहिए।

प्रश्न १२—क्या कोई अव्रती मनुष्य यदि दया से सहित है तो उसे उत्तम फल मिलेगा अथवा व्रत सहित तपस्वी दया रहित हो तो उसे उत्तम फल मिलेगा ?
उत्तर—अव्रती होकर भी यदि उस मनुष्य का चित्त दयायुक्त है तो वह दया स्वर्ग तथा मोक्षरूप कल्याण को देने वाली है और यदि व्रती मनुष्य में दया नहीं है तो वह तपस्वी, दानी और ध्यानी होकर भी पाप का संचय करेगा।

प्रश्न १३—मोक्ष का उत्कृष्ट कारण क्या है ?
उत्तर—सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र रूपी रत्नत्रय धर्म ही मोक्ष का कारण है।

प्रश्न १४—गृहस्थ धर्म का लक्षण बताइये ?
उत्तर—श्रद्धा, तुष्टि आदि गुणों से युक्त भक्तिपूर्वक उत्तम पात्रों को दान आदि देना गृहस्थ धर्म है।

प्रश्न १५—गृहस्थाश्रम विद्वानों द्वारा किस प्रकार पूज्य है ?
उत्तर—जिस गृहस्थाश्रम में जिनेन्द्र भगवान की पूजा उपासना की जाती है, निग्र्रंथ गुरुओं की भक्ति—सेवा की जाती है, धर्मात्मा पुरुषों का परस्पर में स्नेह का बर्ताव रहता है, मुनि आदि उत्तम पात्रों को दान दिया जाता है, दुखी—दरिद्री को करुणा से दान दिया जाता है, निरन्तर जीवादि तत्त्वों का अभ्यास होता है, अपने व्रतों में प्रीति होती है और निर्मल सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होती है वही गृहस्थाश्रम विद्वानों द्वारा पूज्य है।

प्रश्न १६—श्रावक की ग्यारह प्रतिमाएं कौन सी हैं ?
उत्तर—श्रावक की ग्यारह प्रतिमाएं हैं—(१) दर्शन प्रतिमा, (२) व्रत प्रतिमा, (३) सामायिक प्रतिमा, (४) प्रोषधोपवास प्रतिमा, (५) सचित्त त्याग प्रतिमा, (६) रात्रिभुक्तित्याग प्रतिमा, (७) ब्रह्मचर्य प्रतिमा, (८) आरम्भ त्याग प्रतिमा, (९) परिग्रह त्याग प्रतिमा, (१०) अनुमति त्याग प्रतिमा, (११) उद्दिष्ट त्याग प्रतिमा।

प्रश्न १७—दर्शन प्रतिमा किसे कहते हैं ?
उत्तर—जीवादि पदार्थों में शंकादि दोष रहित श्रद्धान रूप सम्यग्दर्शन का जिसमें धारण होवे वह दर्शन प्रतिमा है।

प्रश्न १८—व्रत प्रतिमा का लक्षण बताओ ?
उत्तरअहिंसादि पाँच अणुव्रत, दिग्व्रतादि तीन गुणव्रत और देशावकाशिक आदि चार शिक्षाव्रत, इन १२ व्रतों को धारण करना व्रत प्रतिमा है।

प्रश्न १९—सामायिक प्रतिमा क्या है ?
उत्तर—तीनों कालों में समता धारण करना सामायिक प्रतिमा है।

प्रश्न २०—प्रोषध प्रतिमा क्या है ?
उत्तर—अष्टमी आदि चारों पर्वों में आरम्भ रहित उपवास करना चौथी प्रोषध प्रतिमा है।

प्रश्न २१—सचित्त त्याग प्रतिमा किसे कहते हैं ?
उत्तर—जिस प्रतिमा में सचित्त वस्तुओं का उपभोग न किया जाए उसको सचित्त त्याग नामक पांचवीं प्रतिमा कहते हैं।

प्रश्न २२—रात्रिभुक्ति त्याग प्रतिमा का लक्षण क्या है ?
उत्तर—जिस प्रतिमा के धारण करने में रात्रिभोजन का सर्वथा निषेध किया गया है उसको रात्रिभुक्ति त्याग प्रतिमा कहते हैं।

प्रश्न २३—ब्रह्मचर्य प्रतिमा का अर्थ बताइए ?
उत्तर—जिस प्रतिमा के धारण करने से आजन्म स्वस्त्री तथा परस्त्री दोनों का त्याग करना पड़ता है वह ब्रह्मचर्य नामक सातवीं प्रतिमा है।

प्रश्न २४—आरम्भ त्याग प्रतिमा किसे कहते हैं ?
उत्तरकिसी प्रकार धनादि का उपार्जन न करना आरम्भ त्याग नामक आठवीं प्रतिमा है।

प्रश्न २५—परिग्रह त्याग प्रतिमा किसे कहते हैं ?
उत्तर—जिस प्रतिमा के धारण करते समय धन—धान्य, दासी—दासादि का त्याग किया जाता है वह नवमी परिग्रह त्याग नामक प्रतिमा है।

प्रश्न २६—अनुमति त्याग प्रतिमा क्या है ?
उत्तर—घर के कामों में और व्यापार इत्यादि की अनुमति न देना अनुमति त्याग नामक दशवीं प्रतिमा है।

प्रश्न २७—उद्दिष्ट त्याग प्रतिमा का लक्षण बताइए ?
उत्तर—जहां पर अपने उद्देश्य से भोजन न तैयार किया गया हो ऐसे गृहस्थों के घर में मौन सहित भिक्षापूर्वक आहार करना उद्दिष्ट त्याग प्रतिमा है।

प्रश्न २८—सप्त व्यसनों के नाम बताओ ?
उत्तर—(१) जुआ खेलना, (२) मांस खाना, (३) मदिरा पीना, (४) वेश्या के साथ उपभोग करना, (५) शिकार खेलना, (६) चोरी करना, (७) परस्त्री सेवन करना ये सात व्यसनों के नाम हैं।

प्रश्न २९—यह व्यसन ग्राह्य हैं अथवा त्याज्य ?
उत्तर—यह सर्वथा त्याज्य हैं, व्यसन का अर्थ ही बुरी आदत है।

प्रश्न ३०—जुआ व्यसन का अर्थ समझाइए ?
उत्तर—जो समस्त अपर्कीित और आपत्तियों का घर है और चोरी आदि बचे हुए व्यसनों का स्वामी है, जिसके सम्बन्ध से निरन्तर पाप की उत्पत्ति होती है और जो नरकादि खोटी गतियों में ले जाने वाला है उसे जुआ व्यसन कहते हैं।

प्रश्न ३१—सभी व्यसनों में मुख्य व्यसन क्या है ?
उत्तर—जुआ खेलना सभी व्यसनों में मुख्य व्यसन है।

प्रश्न ३२—मांस खाने से क्या हानि है ?
उत्तर—जो मनुष्यों को प्रबल घृणा उत्पन्न करने वाला है, जिसकी उत्पत्ति दीन प्राणियों के मारने पर होती है, जो अपवित्र है, नाना प्रकार के दृष्टिगोचर जीवों का स्थान है, जिसकी समस्त सज्जन पुरुष निन्दा करते हैं तथा न हाथ से छू सकते हैं, न ही आंखों से देख सकते हैं ऐसे सर्वथा अपावन मांस को जो खाता है उसे दुर्गति की प्राप्ति होती है तथा अत्यधिक पाप का संचय होता है।

प्रश्न ३३—मदिरा अर्थात् शराब पीने से क्या फल मिलता है ?
उत्तर—यह मदिरा इस जन्म में समस्त पीने वाले प्राणियों के धर्म को मूल से खोने वाली है तथा परलोक में नाना प्रकार के नरक के दु:खों को देने वाली है।

प्रश्न ३४—मदिरा पीने से क्या हानि है ?
उत्तर—मदिरा पीने से स्वास्थ्य व धन की हानि के साथ—साथ वे खोटी चेष्टाएँ करते हैं और उनको किसी प्रकार हित का मार्ग नहीं सूझता है।

प्रश्न ३५—आचार्यों ने वेश्या को किसकी उपमा दी है ?
उत्तर—नरक की।

प्रश्न ३६—वेश्यासेवन से क्या हानि है ?
उत्तर—वेश्यासेवन से धन तथा प्रतिष्ठा दोनों किनारा कर जाते हैं तथा इहलोक और परलोक दोनों बिगड़ जाते हैं।

प्रश्न ३७—शिकार व्यसन का अर्थ क्या है ?
उत्तर—निरपराधी पशु—पक्षियों को मारकर उनका भक्षण करना शिकार कहलाता है।

प्रश्न ३८—शिकार करने से क्या हानि है ?
उत्तर—शिकार के प्रेमी दुष्ट पुरुषों को इस लोक में तथा परलोक में नाना प्रकार के विरुद्ध कार्यों का सामना करना पड़ता है अर्थात् इस लोक में तो वे दुष्ट पुरुष रोग—शोक आदि दुखों का अनुभव करते हैं तथा परलोक में उनको नरक जाना पड़ता है।

प्रश्न ३९—किसी निरपराधी को मारने का क्या फल मिलता है ?
उत्तर—जो प्राणी इस जन्म में एक बार भी दूसरे प्राणी को मारता है वह दूसरे जन्म में उन मरे हुए प्राणी से अनन्त बार मारा जाता है तथा जो मनुष्य इस जन्म में एक बार भी दूसरे प्राणी को ठगता है वह दूसरे जन्म में अनन्त बार उसी पूर्वभव में ठगे हुए प्राणी से ठगाया जाता है।

प्रश्न ४०—चोरी करने से क्या हानि है ?
उत्तर—चोरी करने से इस लोक में निन्दा व अपमान सहना पड़ता है और परलोक में नरकादि में जाना पड़ता है।

प्रश्न ४१—परस्त्री सेवन से क्या—क्या हानि है ?
उत्तर—जो मनुष्य परस्त्री का सेवन करने वाले हैं उनको इसी लोक में जो िंचता, व्याकुलता, भय, द्वेष, बुद्धि का भ्रष्टपना, शरीर का दाह, भूख, प्यास, रोग, जन्म—मरण आदिक दुख होते हैं तथा परलोक में नरक जाना पड़ता है जहां पर उनको परस्त्री की जगह लोहे की पुतली से आलिंगन करना पड़ता है।

प्रश्न ४२—जुआ व्यसन में कौन प्रसिद्ध हुआ ?
उत्तर—जुए से युधिष्ठिर नामक राजा राज्य से भ्रष्ट हुए और उन्हें नाना प्रकार के दुख उठाने पड़े।

प्रश्न ४३—मांस भक्षण में किसकी प्रसिद्धि हुई ?
उत्तर—मांस भक्षण से बक नाम का राजा राज्य से भ्रष्ट हुआ और नर्क में गया ?

प्रश्न ४४—मद्यपान से किसे हानि हुई ?
उत्तर—मद्य पीने से यदुवंशी राजा के पुत्र नष्ट हुए।

प्रश्न ४५—वेश्यागमन में किसका नाम आता है ?
उत्तर—वेश्यागमन के सेवन से चारुदत्त सेठ दरिद्रावस्था को प्राप्त हुए और उन्हें नाना प्रकार के दुखों का सामना करना पड़ा।

प्रश्न ४६—शिकार व्यसन में कौन प्रसिद्ध हुआ ?
उत्तरशिकार की लोलुपता से ब्रह्मदत्त नाम का राजा राज्य से भ्रष्ट हुआ तथा उसे नरक जाना पड़ा।

प्रश्न ४७—चोरी व्यसन में कौन प्रसिद्ध हुआ ?
उत्तर—चोरी व्यसन से सत्यघोष नामक पुरोहित गोबर खाना, सर्वधन हरण होना आदि नाना प्रकार के दु:खों को सहनकर अंत में मल्ल की मुष्टि से मारा गया और नरक गया।

प्रश्न ४८—परस्त्री सेवन में कौन प्रसिद्ध हुआ ?
उत्तर—परस्त्री सेवन से रावण को अनेक दुख भोगने पड़े तथा वह मरकर नरक गया।

प्रश्न ४९—इन व्यसनों से क्या हानि है ?
उत्तर—ये समस्त व्यसन दुर्गति को ले जाने वाले हैं तथा स्वर्ग, मोक्ष के प्रतिबंधक हैं, समस्त व्रतों के नाश करने वाले हैं तथा प्राणियों के परम शत्रु हैं। यह प्रारम्भ में मधुर होने पर भी अंत में कटुक हैं इसलिए इनसे स्वप्न में भी हित की आशा नहीं होती है।