ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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01. णमोकार महामंत्र की महिमा

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णमोकार महामंत्र की महिमा

रचयित्री—प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका चन्दनामती
तर्ज—अरे जग जा रे चेतन...........

अरे देखो रे! महिमा मंत्र की,
णमोकार की महिमा निराली है।।अरे...।।टेक.।।
एक कहानी सुन लो भाई, जैन रामायण में है आई।
अरे पशु भी बन गया देव रे,
णमोकार की महिमा निराली है।।१।।

नगर महापुर में इक श्रेष्ठी, धर्म में उनकी बहुत रुची थी।
वे पद्मरुचि चले घूमने,
णमोकार की महिमा निराली है।।२।।

बूढ़ा बैल दिखा इक उनको, मरणासन्न देखकर उसको।
अरे मंत्र सुनाया कान में,
णमोकार की महिमा निराली है।।३।।

बैल ने मंत्र सुना शान्ती से, निकले प्राण तभी उस तन से।
उसी नगरी में बना युवराज वह,
णमोकार की महिमा निराली है।।४।।

राजा छत्रच्छाय की रानी, उनके पुत्र की सुनो कहानी।
हुए वृषभध्वज युवराज वे,
णमोकार की महिमा निराली है।।५।।

एक बार युवराज नगर में, घूम रहे थे उसी जगह पे।
हुआ पूर्वजनम का ज्ञान रे,
णमोकार की महिमा निराली है।।६।।

जान लिया मैं बैल था पहले, वहाँ बहुत दु:ख पाये मैंने।
महामंत्र सुना था अंत में,
णमोकार की महिमा निराली है।।७।।

सोचा उसने कैसे खोजूँ, बदला उपकारी का चुका दूँ।
मिला जिससे नरभव आज रे,
णमोकार की महिमा निराली है।।८।।

उसने वहीं मंदिर बनवाया, सोच के उसमें चित्र बनाया।
उस चित्र में बैल व सेठ थे,
णमोकार की महिमा निराली है।।९।।

कोतवाल इक वहाँ बिठाया, उसको चित्र का सार बताया।
कोई ध्यान से देखे तो बुलवाना,
णमोकार की महिमा निराली है।।१०।।

इक दिन पद्मरुची वहाँ आये, चित्र देख मन में हरषाये।
इसे किसने बनाया बोल पड़े,
णमोकार की महिमा निराली है।।११।।

बैल को मंत्र सुनाया था मैंने, किन्तु हमें देखा न किसी ने।
फिर कैसे बना यह चित्र है,
णमोकार की महिमा निराली है।।१२।।

कोतवाल सब देख रहा है, सेठ के भाव को समझ रहा है।
गया बतलाने फिर महल में,
णमोकार की महिमा निराली है।।१३।।

राजकुमार तुरत ही आये, उपकारी से मिल हरषाये।
उनके पद किया प्रणाम रे,
णमोकार की महिमा निराली है।।१४।।

बैल का जीव ही मैं हूँ भाई, आपने ही नरगति दिलवाई।
उपकार करूँ क्या आपका,
णमोकार की महिमा निराली है।।१५।।

दोनों मित्र बने आपस में, श्रावक व्रत धारण किया मन में।
तब बैल बना सुग्रीव रे,
णमोकार की महिमा निराली है।।१६।।

पद्मरुची फिर राम बन गये, मित्र से उनके काम बन गये।
फिर मुक्त हुए संसार से,
णमोकार की महिमा निराली है।।१७।।

कहे ‘चन्दनामति’ तुम सबसे, कथा पढ़ो यह रामायण से।
भव दुख से हो उद्धार रे,
णमोकार की महिमा निराली है।।१८।।