ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर २०१६- रविवार से सीधा प्रसारण चल रहा है | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

01. प्रस्तावना पढ़ें !

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प्रस्तावना पढ़ें !

-ब्र. कु. इन्दु जैन (संघस्थ)
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वर्तमान चौबीसी के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव को दिव्य केवलज्ञान की प्राप्ति के पश्चात् ॐ कारमयी भाषारूप खिरी उनकी दिव्यध्वनि से जिस द्वादशांगरूप श्रुत का अवतार हुआ, वही २४ तीर्थंकरों की क्रम परम्परा में अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर से आज से लगभग २५६६ वर्ष पूर्व श्रावण कृष्णा प्रतिपदा के दिन प्रथम देशनारूप से प्राप्त हुई, तभी गौतम स्वामी ने द्वादशांग की रचना की। यद्यपि यह द्वादशांग श्रुत विदेहक्षेत्र की अपेक्षा अनादि-अनंत है तथापि भरत-ऐरावत क्षेत्र में चतुर्थकाल में तीर्थंकरों से अवतरित होने से सादि-सान्त भी है। श्री गौतम स्वामी से प्राप्त वह श्रुतज्ञान क्रम से सकल श्रुतधारी, श्रुतकेवली पुन: एकादशांग पूर्वधारी महामुनियों को प्राप्त होकर आचार्य परम्परा से श्री धरसेनाचार्य को प्राप्त हुआ, जिन्होंने अंग-पूर्व के ज्ञान को अविच्छिन्न रखने हेतु अपना ज्ञान भी पुष्पदंत-भूतबलि ऐसे दो योग्य शिष्यों को प्रदान किया और उन्होंने षट्खण्डागम ग्रंथ को सूत्ररूप में लिपिबद्ध किया। इस षट्खण्डागम ग्रंथराज के छह खण्डों में से प्रारंभ के पाँच खण्डों पर श्री वीरसेनाचार्य ने धवला टीका लिखी तथा महाबंध ग्रंथराज पर ‘‘महाधवला’’ टीका प्रसिद्ध है। धवला टीका समन्वित इन पाँच खण्डों का हिन्दी अनुवाद सहित प्रकाशन १६ ग्रंथों में छप चुका है और उसी को आधार बनाकर, टीका के कुछ सार ग्रंथों को ग्रहण कर तथा अन्य ग्रंथों का आधार लेकर परमपूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने ‘‘सिद्धान्तचिंतामणि’’ नामक संस्कृत टीका की रचना की है।

षट्खण्डागम के प्रथम खण्ड में सत्प्ररूपणा आदि आठ अनुयोग द्वार एवं नव चूलिका का कथन है जिसमें से ५ ग्रंथों में आठ अनुयोग द्वार पूर्ण हो चुके हैं, अब इस छठे ग्रंथ में नव चूलिकाओं का वर्णन है जिसमें कुल ५१५ सूत्र हैं। इस छठे ग्रंथ में दो महाधिकार विभक्त किए गये हैं, उनमें से प्रथम महाधिकार में आठ चूलिकाएँ हैं अत: आठ अधिकार हैं, द्वितीय महाधिकार में गत्यागती नाम की चूलिका है। प्रथम प्रकृतिसमुत्कीर्तना नामक अधिकार के अन्तर्गत छ्यालीस सूत्रों के माध्यम से जीव के द्वारा बांधने वाली प्रकृतियों, किन-किन क्षेत्रों में किसके पास कितने दर्शनमोहनीय कर्म का क्षपण करने वाले जीव हैं, सम्पूर्ण चारित्र को प्राप्त होने वाले जीव के मोहनीय कर्म की उपशामना तथा क्षपणा होती है तथा प्रकृतियों के स्वरूप, भेद आदि का विस्तार से वर्णन है। दूसरी स्थानसमुत्कीर्तन चूलिका में प्रकृतिसमुत्कीर्तन चूलिका में प्ररूपित प्रकृतियों के बंध के बारे में बताया गया है, चारों गतियों में आठों कर्मों के उदय से जीव कौन सी आयु का बंध करता है इसका वर्णन करते हुए टीकाकत्र्री ने कहा है कि इसे जानकर अणुव्रती अथवा महाव्रती बनकर मनुष्य पर्याय को अवश्य सफल करना चाहिए। मुख्यत: आत्मा के भावों के फलस्वरूप पुद्गल कर्मवर्गणाएँ और जीव के प्रदेश एक-दूसरे में प्रवेश कर कर्मभाव को प्राप्त हो जाते हैं और कर्मसिद्धान्त से अनभिज्ञ ईश्वर को सृष्टि का कत्र्ता मानकर उन्हें दोष देते हैं जबकि वही पुद्गल द्रव्य कर्मरूप से परिणमन कर जीव को सुख-दु:ख देते हैं अत: राग द्वेषादि रूप विभाव भाव को छोड़कर आत्मा में रमण करने की प्रेरणा इसमें दी गई है। वस्तुत: सिद्धान्तचिंतामणिटीका की लेखिका सरस्वती स्वरूपा पूज्य माताजी ने स्थान-स्थान पर वर्तमान में उपलब्ध सैद्धान्तिक ग्रंथों का पूर्ण उपयोग करते हुए विषय को अत्यन्त रोचक और सरल बना दिया है जो इसके अवलोकन से ज्ञात होता है। पूर्वाचार्य रचित अनेकों ग्रंथों का समावेश कर उन्होंने सार रूप तथ्य को इसमें पिरोकर मानो मरकत आदि मणियों की सुन्दर माला ही गूँथ दी है।

प्रथम महादण्डक नामक तीसरे अधिकार में दो सूत्रों के माध्यम से प्रथम सम्यक्त्व के अभिमुख जीव के कौन-कौन सी प्रकृतियाँ बंधती हैं और कौन-कौन सी नहीं बंधती हैं, इसका वर्णन है।३४ बंधापसरणों एवं ५ लब्धियों के बारे में बताते हुए निष्कर्ष रूप में टीकाकत्र्री माताजी कहती हैं कि अनादिकालीन संसार में पर्यटन करते हुए हम और आप सभी ने काललब्धि के बल से पाँचों लब्धियों को प्राप्त कर सम्यग्दर्शन जैसे महारत्न को प्राप्त किया है अत: आठों अंगों का संरक्षण कर, पच्चीस मल दोषों को छोड़कर निर्दोषरीत्या इस रत्न को संभालते हुए ज्ञान की आराधना से सम्यग्ज्ञान को वृद्धिंगत कर सम्यग्चारित्र का भी स्पर्श करना चाहिए। द्वितीय महादण्डक नामक चतुर्थ अधिकार में दो सूत्रों के द्वारा प्रथमोपशम सम्यक्त्व के अभिमुख देव अथवा सातवीं पृथ्वी के नारकी को छोड़कर शेष नारकी जीवों के द्वारा ४४ प्रकृतियों को नहीं बांधने का वर्णन है। तृतीय महादण्डक नामक पंचम अधिकार में दो सूत्रों द्वारा सातवें नरक के नारकी जीवों के बंध योग्य प्रकृतियों का वर्णन है। ४४ सूत्रों से समन्वित छठे उत्कृष्टस्थिति बंध चूलिकाधिकार में किस प्रकार के स्थितिबंध के होने पर सम्यक्त्व की प्राप्ति नहीं होती है, इस जिज्ञासा का निराकरण करते हुए कर्मों की स्थिति, आबाधा और निषेक आदि का विस्तृत वर्णन किया है जिसे जानकर क्रोध, मान, माया, लोभ आदि कषायों का जब तक जड़मूल से नाश न हो तब तक वैराग्य तथा ज्ञान भावना से कषायों को कृश करना तथा दर्शन एवं चारित्रमोहनीय कर्मों के कारणरूप केवली, श्रुत, संघ, धर्म और देव के अवर्णवाद व कषायों के उदय से होने वाले तीव्र परिणामों से सदैव दूर रहना चाहिए। जघन्यस्थितिबंध चूलिकाधिकार नामक सातवें अधिकार में ४३ सूत्रों के द्वारा कर्मों की जघन्य स्थितिबंध बताते हुए कोष्ठक आदि के माध्यम से उसे समझाया है। तीर्थंकर प्रकृति बंध, अकाल मरण आदि का विस्तृत विवेचन अनेक ग्रंथों के आधार से करते हुए पूज्य माताजी ने अंत में धवला टीकाकार के ही शब्दों में सिद्धों के अतीन्द्रिय सुख का अत्यन्त सुन्दर वर्णन किया है। सोलह सूत्रों से संयुक्त आठवें सम्यक्त्वोत्पत्ति चूलिकाधिकार में सम्यक्त्व की उत्पत्ति का विवेचन है। इस अधिकार में ‘‘किस प्रकार से महामुनि कितनी बार संयम को प्राप्त कर सकते हैं, कितनी बार उपशमश्रेणी चढ़कर पुन: कैवल्य अवस्था प्राप्त करते हैं, उनका स्वरूप कैसा है, कैसे आगे वे सिद्ध अवस्था प्राप्त करते हैं, कौन से तीर्थंकर ने किस आसन से मोक्ष प्राप्त किया’’ यह विशेष पठनीय है। इस अध्याय के साररूप में यही समझना है कि सम्यग्दर्शन की पूर्णता क्षायिक सम्यग्दर्शन या परमावगाढ़ नामक सम्यक्त्व में होती है, ज्ञान की पूर्णता केवलज्ञान में और सम्यक्चारित्र की पूर्णता अयोगिकेवली भगवान के अंतिम समय में होती है अत: सदैव रत्नत्रय की पूर्णता की प्रार्थना करना श्रेयस्कर है।

गत्यागति चूलिका नामक द्वितीय महाधिकार में २४३ सूत्र हैं। चार अन्तराधिकार में विभक्त इस महाधिकार में चारों गतियों में जीव के आने-जाने के द्वार का विस्तृत वर्णन है। कौन सी गति से निकलकर जीव कहाँ-कहाँ जाता है? किस गति के जीव के कितने गुणस्थान हो सकते हैं? किस गति में सम्यक्त्व प्राप्ति के कितने कारण हैं? इत्यादि विषयों को बताते हुए आचार्यश्री ने मनुष्यगति को सर्वश्रेष्ठ बताया है जिसके द्वारा जीव पंचम गति-सिद्धगति को प्राप्तकर गति-आगति के चक्र से छूट जाता है। सिद्ध भगवान के अनंत सुखोें का वर्णन करते हुए अन्त में पूज्य माताजी ने धवला टीकाकार अथवा आचार्यों द्वारा लिखित आगमानुसार इस सिद्धान्त ग्रंथ को अकाल में पढ़ने का निषेध किया है। वस्तुत: अनेक अमूल्य सिद्धान्तों को स्वयं में समेटे, कोहिनूर हीरे के सदृश इस अनमोल टीका को लिखकर पूज्य माताजी ने वास्तव में भव्यात्माओं के लिए इस युग में दिव्यध्वनि रूप सम्यग्ज्ञान का प्रकाश ही प्रदान कर दिया है।

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टीकाकत्र्री पूज्य माताजी साक्षात् सरस्वती माता के सदृश हैं-

प्राचीन काल से ही देखा जाता है कि महान आत्माएँ सदैव महान से महान कार्य करके भी अपनी लघुता प्रदर्शित करती देखी जाती हैं, जैसे पूज्य माताजी ने इतने महानतम, क्लिष्ट ग्रंथ को सिद्धान्त ज्ञान के रहस्य के जिज्ञासुओं के लिए इतना सरल और रुचिपूर्ण बनाने के बाद भी इस ग्रंथ का उपसंहार करते हुए कहा है कि इस टीका की रचना मैंने विद्वानों में विद्वत्ता प्रदर्शन के लिए अथवा ख्याति, लाभ, पूजा की चाह से न करके मात्र द्वादशांग श्रुतज्ञान के द्वारा केवलज्ञान की प्राप्ति के लिए की है। भगवान श्री ऋषभदेव के श्रीचरणों में अपनी यह कृति समर्पित करते हुए उन्होंने चौबीसों तीर्थकरों के दीक्षावृक्ष को भी नमन किया है। मांगीतुंगी यात्रा के मध्य पदविहार करते हुए शारीरिक थकान के बावजूद भी पूज्य माताजी के द्वारा किया गया टीकालेखन उनके श्रुतज्ञान के प्रति अतीव लगन और आगामी भव में केवलज्ञान प्राप्ति का ही परिचायक है। सन् १९९५ में अपनी जन्म एवं वैराग्य से पावन तिथि शरदपूर्णिमा के दिन संघस्थ पूज्य प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी के विनम्र निवेदन पर संस्कृत टीका का लेखन कार्य प्रारंभ कर पूज्य माताजी ने अनेक तीर्थों की यात्रा करते हुए सरस्वती माता की कृपाप्रसाद एवं अटूट जिनभक्ति के फलस्वरूप ४ अप्रैल २००७, वैशाख कृ. द्वितीया के दिन अपनी र्आियका दीक्षा के ५२वें वर्ष के शुभारंभ दिवस पर सोलहों पुस्तकों की टीका लिखकर परिपूर्ण कर दिया और इसकी हिन्दी टीका करने का दुरुह कार्य अपनी संघस्थ शिष्या प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी की विशेष प्रज्ञाशक्ति देखकर उन्हें सौंपा, गुरु आज्ञानुसार उनके उन गरिमापूर्ण शब्दों को गरिमापूर्ण भाषाशैली में ही अनुवादित कर पूज्य चन्दनामती माताजी ने पाँच पुस्तके हिन्दी टीका सहित साहित्य जगत को प्रदान कीं पुन: आर्यिका चर्या के परिपालन के साथ-साथ हजारों किमी. की पदयात्रा, विशाल प्रभावनात्मक महोत्सव, अनेक अन्य ग्रंथों के लेखन-सम्पादन, संघस्थ शिष्यों के अध्ययन आदि की व्यस्तता के कारण यह कार्य मंदगति से होते देख पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने सिद्धान्तचिंतामणिटीका के षष्ठम एवं अष्टम ग्रंथ का स्वयं हिन्दी अनुवाद किया है। इन अनेकानेक कार्यों को करते हुए भी पूज्य आर्यिका श्री चंदनामती माताजी की प्रबल इच्छा गुरु भाव्नाानुसार शीघ्र ही सभी ग्रंथों के हिन्दी अनुवाद करने की है, वर्तमान में आप सिद्धान्तचिंतामणि टीका की सातवीं एवं नवमीं पुस्तक का हिन्दी अनुवाद कर रही हैं जो शीघ्र ही प्रकाशित होकर आप सभी स्वाध्यायी जिज्ञासु भव्यात्माओं के समक्ष ज्ञानावरण कर्म के क्षय में निमित्त बनेंगे।

वर्तमान युग में पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी जैसी महान गुरु को पाकर हमारा जीवन धन्य है। वस्तुत: उत्तर भारत की देदीप्यमान सूर्यरूप सरस्वती स्वरूपा माताजी हम सभी के लिए परम स्तुत्य हैं, जिनके जीवन में चारित्रचक्रवर्ती आचार्यश्री शांतिसागर महाराज द्वारा प्रदर्शित की गई आगमचर्या, गंभीरता, शांत मुद्रा, जिनधर्म, जिनागम, जिनचैत्य आदि के प्रति अकाट्य भक्ति और समर्पण दिखता है। आगम को अपना प्राण समझने वाले उन महान आचार्यवर्य के दर्शन हमें भले ही सुलभ नहीं हुए हों किन्तु पूज्य माताजी के दर्शन कर हम उन गुरुदेव की झलक उनमें सहज ही प्राप्त कर सकते हैं। जिनागम का इतना ज्ञान, इतनी विद्वत्ता होने पर भी निरभिमान, सरल एवं मोहक छवियुक्त, अपनी मंद मुस्कान से हर आगत प्राणी की पीड़ा हरने वाली पूज्य माताजी का साहित्य जगत चिरऋणी रहेगा और उनकी यशपताका चिरकाल तक दिग्दिगन्त व्यापी होती रहेगी।

मैं स्वयं को पुण्यशालिनी समझती हूँ कि इस सिद्धान्त ग्रंथ का अंश मात्र ज्ञान मुझमें न होते हुए भी पूज्य माताजी ने मुझ पर महान उपकार कर इस ग्रंथ की प्रूफरीडिंग का सौभाग्य मुझे प्रदान किया और ग्रंथ की आद्योपांत प्रूफरीडिंग करते हुए कुछ सैद्धान्तिक प्रसंगों को पढ़कर मैंने प्रस्तावना के माध्यम से आपके समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास मात्र किया है। वास्तव में इसमें छिपे सिद्धान्त रहस्य को समझ पाना हम जैसे अल्पज्ञों के वश की बात नहीं है फिर भी गुरुआज्ञा शिरोधार्य कर स्वाध्याय का महान पुण्य सहज ही मुझे प्राप्त हो गया है। मूलाचार ग्रंथ में स्वाध्याय की महिमा का वर्णन करते हुए स्वयं श्री कुन्दकुन्द स्वामी कहते हैं-

विणयेण सुदमधीदं, जदि वि पमादेण होदि विस्सरिदं।

तं उवट्ठादि परभवे, केवलणाणं च आहवदि।।

अर्थात् जो प्राणी विनयपूर्वक श्रुत को पढ़ता है, वह पढ़ा गया श्रुत यदि प्रमाद से कभी विस्मृत भी हो जावे, तो अगले भव में कभी न कभी उपलब्ध हो जाता है तथा केवलज्ञान प्राप्ति में भी निमित्त बन जाता है। बंधुओं! वर्तमान युग में उन पूर्वाचार्यों की वाणी को विभिन्न माध्यमों से हम तक पहुँचाने वाली पूज्य माताजी के बारे में कुछ भी कहना पर्वत की ऊँचाई और सागर की गहराई को मापने की वाचालता के सदृश ही होगा अत: जिनेन्द्र देव से यही प्रार्थना है कि ब्राह्मी माता के समान पूज्य माताजी शीघ्र ही दिव्य केवलज्ञान की प्राप्ति कर अपनी दिव्यदेशना के द्वारा भव्यजीवों को धर्मामृत पान कराते हुए मुक्तिलक्ष्मी का वरण करें और उस श्रुतज्ञान का अंशमात्र भी अपने जीवन में उतारकर मैं भी शीघ्र ही आर्यिका दीक्षा की प्राप्ति कर कर्मशृँखला को काटते हुए अपनी आत्मा का कल्याण कर सकू पूज्य माताजी के चरणकमलों में अपनी यही विनम्र प्रार्थना अर्पित करते हुए मैं अपनी लेखनी को विराम देती हूँ।