ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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सोलहकारण व्रत की जाप्य - "ऊँ ह्रीं अर्हं साधुसमाधि भावनायै नमः"

01. भगवान ऋषभदेव का संक्षिप्त परिचय

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भगवान ऋषभदेव का संक्षिप्त परिचय

समय - चतुर्थकाल प्रारंभ होने में चौरासी लाख पूर्व वर्ष, तीन वर्ष, आठ माह, एक पक्ष काल शेष रहने पर |

जन्मभूमि - अयोध्या |

आगमन - सर्वार्थसिद्धि विमान से |

पिता - चौदहवें कुलकर नाभिराय |

माता - महारानी मरुदेवी |

गर्भावतरण - आषाढ़ कृष्णा द्वितीया। उत्तराषाढ़ नक्षत्र |

जन्म - चैत्र कृष्णा नवमी, उत्तराषाढ़ नक्षत्र |

नाम - ऋषभदेव, वृषभदेव, आदिनाथ, पुरुदेव, आदिपुरुष, आदिब्रह्मा, प्रजापति, युगस्रष्टा आदि ।

आयु - चौरासी लाख पूर्व वर्ष |

शरीर ऊँचाई - पाँच सौ धनुष (दो हजार हाथ) |

वंश - इक्ष्वाकु |

कुमार काल - बीस लाख पूर्व वर्ष |

कार्य विशेष - असि, मषि आदि षट्कर्मों का सर्वप्रथम निर्देश, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र वर्ण की व्यवस्थापना ।

भगवान की रानियाँ - यशस्वती, (नन्दा) सुनन्दा ।

पुत्र-पुत्रियाँ - चक्रवर्ती भरत, कामदेव बाहुबली आदि एक सौ एक पुत्र तथा ब्राह्मी, सुन्दरी दो कन्याएँ ।

राज्यकाल - त्रेसठ लाख पूर्व वर्ष |

वन गमन साधन - सुदर्शना पालकी |

दीक्षा दिवस - चैत्र वदी नवमी |

दीक्षास्थल - सिद्धार्थ वन (प्रयाग) |

दीक्षा समय उपवास - षट्मास |

दीक्षा वन - वटवृक्ष के नीचे |

सहदीक्षित - कच्छ, महाकच्छ आदि चार हजार राजागण |

आहार लाभ - एक वर्ष उनतालीस दिन बाद हस्तिनापुर में |

आहार दिन - वैशाख शुक्ला तृतीया (अक्षयतृतीया) |

दानतीर्थ प्रवर्तक - राजा सोमप्रभ और राजा श्रेयांसकुमार |

आहार दानविधि ज्ञान - राजा श्रेयांस को पूर्व के आठवें भव का स्मरण (राजा वङ्काजंघ, रानी श्रीमती ने चारण ऋद्धिधारी मुनियों को आहार दिया तथा राजा वङ्काजंघ का जीव आदिनाथ तीर्थंकर और रानी श्रीमती का जीव राजा श्रेयांस हुआ) |

नवधाभक्ति - पड़गाहन करना, ऊँचे स्थान पर विराजमान करना, चरण प्रक्षालन, अष्टद्रव्य से पूजन, नमस्कार, मन, वचन, काय और आहार की शुद्धि कहना ।

देवताओं द्वारा पंचाश्चर्यवृष्टि - रत्नवृष्टि, पुष्पवृष्टि, शीतलवायु, दुंदुभिवाद्य, अहो दानं आदि प्रशंसा वाक्य ।

बरसे हुए रत्नों की गणना - दातारों के आंगन में अधिक से अधिक से साढ़े बारह करोड़, कम से कम साढ़े बारह लाख रत्नों की वर्षा ।

आहारदान के प्रारंभ से आज तक का काल - कुछ अधिक कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण ।

भगवान का छद्मस्थकाल - एक हजार वर्ष ।

केवलज्ञान स्थान - पुरिमताल नगर का बाह्य उद्यान, प्रयाग |

न्यग्रोध - वटवृक्ष के नीचे ।

केवलज्ञान तिथि - फाल्गुन कृष्णा एकादशी, उत्तराषाढ़ नक्षत्र ।

भगवान के समवसरण में - चौरासी गणधर, एक लाख अड़सठ हजार मुनि, तीन लाख पचास हजार आर्यिकाएं, तीन लाख श्रावक, पाँच लाख श्राविकाएं |

उपदेश काल - लगभग एक हजार वर्ष कम एक लाख पूर्व वर्ष तक |

मोक्षस्थान - कैलाशपर्वत ।

सह मुक्त - एक हजार मुनिगण ।

मोक्षतिथि - माघ कृष्णा चतुर्दशी ।