ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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01. भूमिका

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भूमिका

प्रस्तुति—श्रीमती त्रिशला जैन, लखनऊ

(१)

श्री मुनिसुव्रत तीर्थंकर के, युग की ये अमर कहानी है।
बलभद्र रामप्रभु की गाथा, सुनिये ये बहुत पुरानी है।।
विद्यागुरु ‘‘ज्ञानमती मां’’ का, मन में पहले स्मरण करूँ ।

चौबिस जिन का वंदन करके, श्री राम प्रभू को नमन करूँ।।
(२)

है आज दु:ख क्या नारी को, दुख तो सीता ने झेले थे।
वो गये वनों में संग—संग, फिर भी रह गये अकेले थे ।।
सुकुमारी सीता के देखो ,सुख के क्षण कितने गिनती के ।

जब जंगल में था छुड़वाया, तब शब्द कहे क्या विनती के ।।
(३)

जाकर कहना हे सेनापति! उन रामप्रभु से संदेशा ।
जिस तरह मुझे छोड़ा प्रियवर, मत धर्म छोड़ना जिन प्रभु का ।।
जब चला गया वह सेनापति सीता ने करुण विलाप किया ।

क्या पाप किए हमने स्वामिन्! जो तुमने ये आघात दिया।।
(४)

कितने निष्ठुर हो गये राम, हे माता! किसकी शरण गहूँ ?।
हे भामंडल! हे भ्रात लखन! किससे मैं अपनी व्यथा कहूँ ?।।
हे राम! अगर यह करना था, क्यों इतना भीषण युद्ध किया।

क्यों लोगों के बहकावे से, इतना भारी दु:ख दिया?।।
(५)

अब उधर सुनो श्री रामचंद्र भी, जब सीता के वचन सुने।
मूच्र्छित होकर गिर पड़े तभी, होकर सचेत सोचा मन में।।
नियती को हैं मंजूर यही, यह सोच धैर्य धारा उर में।

मर्यादा रक्षा की खातिर वह राज्य करें आहत दिल से ।।