ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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01. सोलह स्वप्न दर्शन

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सोलह स्वप्न दर्शन

( गर्भकल्याणक के बाह्य दृश्य में माता के सोलह स्वप्न देखने के समय प्रतिष्ठाचार्य इन पद्यों को पढ़ें )


पहले स्वपन में माता गज देख रही हैं।

सुन्दर सफेद हाथी गर्जन से युक्त है।।
त्रैलोक्य पूज्य पुत्र को वह प्राप्त करेगी ।
जननी जगत जननी का लाभ प्राप्त करेगी ।।1।।

उत्तुंग वृषभ देखतीं द्वितीय स्वप्न में ।
अति रून्द्रतर ध्वनी से युक्त शुभ गजेन्द्र है।।
त्रयज्ञानधारि श्रेष्ठ श्रुत को प्राप्त करेगी ।
जननी जगत जननी का लाभ प्राप्त करेगी ।।2।।

माँ देख रहीं सिंह को तृतीय स्वप्न में ।
पर्वत समान गज का भी मद नाश करे है।।
आनंत शक्ति युक्त पुत्र प्राप्त करेगी ।
जननी जगत जननी का लाभ प्राप्त करेगी ।।3।।

चैथे स्वप्न में देखतीं कमलासनी लक्ष्मी।
जो स्वर्णकुंभ से स्नान प्राप्त कर रहीं।।
जन्माभिषेक युक्त सुत को प्राप्त करेगी ।
जननी जगत जननी का लाभ प्राप्त करेगी ।।4।।

मंदार की माला युगल ये देख रही हैं।
सुन्दर खिलीं पंचम स्वपन में देख रही हैं।।
सद्धर्म प्रचारक सुपुत्र प्राप्त करेगी ।
जननी जगत जननी का लाभ प्राप्त करेगी ।।5।।

छट्ठे स्वपन में श्वेत दुग्ध सम है चन्द्रमा।
माता को मानो दे रहा अमृत सुखोपमा।।
त्रैलोक्य आल्हादक सुपुत्र प्राप्त करेंगी ।
जननी जगत जननी का लाभ प्राप्त करेगी ।।6।।

सप्तम स्वपन में सूर्य बिम्ब देख रही माँ।
जग का तिमिर विनाश वह प्रकाश भर रहा ।।
इस फल में माँ तेजस्वी पुत्र प्राप्त करेंगी ।
जननी जगत जननी का लाभ प्राप्त करेगी ।।7।।

मछली युगल को देख रहीं मात नींद में ।
अष्टम स्वपन में क्रीड़ा करती हुई मीन है।।
अतिशय प्रसन्न पुत्र को वे प्राप्त करेंगी ।
जननी जगत जननी का लाभ प्राप्त करेगी ।।8।।

दो स्वर्ण कुंभ देखती माँ नवम स्वप्न में ।
सुन्दर सजे अमृत से वे आकण्ठ भरे हैं।।
निधियों की प्राप्ति वाले सुत को मात लहेंगी ।
जननी जगत जननी का लाभ प्राप्त करेगी ।।9।।

दसवें में प्रफुल्लित कमल से युक्त सरोवर।
माँ देख रहीं स्वप्न में सुन्दर सा सरोवर।
वे पुत्र सहस लक्षणों युत प्राप्त करेंगी ।
जननी जगत जननी का लाभ प्राप्त करेगी ।।10।।

रत्नों से युक्त सागर लहराता हुआ है।
माता को ग्यारहवें स्वपन में दीख रहा है।।
कैवल्यज्ञानी पुत्र को ये प्राप्त करेंगी ।
जननी जगत जननी का लाभ प्राप्त करेगी ।।11।।

रत्नों की कांति युक्त सिंहपीठ देखतीं ।
माँ बारहवें स्वपन में सिंहासन को देखतीं ।।
त्रैलोक्यपती पुत्र को वह प्राप्त करेगी ।
जननी जगत जननी का लाभ प्राप्त करेगी ।।12।।

मणियों से बना देव का विमान दिख रहा ।
अब तेरवें स्वपन में माँ को पूर्ण सुख कहा ।।
स्वर्गावतीर्ण पुत्र को वह प्राप्त करेगी ।
जननी जगत जननी का लाभ प्राप्त करेगी ।।13।।

देखा स्वपन में चैदवें शुभ नाग विमाना ।
माता को वह विमान मानो सूर्य समाना ।।
वह अवधिज्ञान युक्त पुत्र प्राप्त करेगी ।
जननी जगत जननी का लाभ प्राप्त करेगी ।।14।।

पन्द्रहवें स्वपन में रतन की राशि देखतीं।
जो अपनी चमक से दिशाओं को प्रकाशतीं।।
माता अनन्तगुणी पुत्र प्राप्त करेगी ।
जननी जगत जननी का लाभ प्राप्त करेगी ।।15।।

निर्धूम अग्नि देखतीं सोलहवें स्वपन में ।
सर्दी व अंधेरे को दूर जो करे क्षण में ।।
पापों से रहित पुत्र को वे प्राप्त करेंगी ।
जननी जगत जननी का लाभ प्राप्त करेगी ।।16।।

शंभु छंद- ये स्वप्न देखकर माता प्रातः सुखद नींद से जगती हैं ।
बाजों व प्रभाती के मंगल स्वर सुनकर निद्रा तजती हैं ।।
उन स्वप्नों का फल पति से फिर सुनकर वे बहुत प्रसन्न हुईं ।
मानों मैंने तीर्थंकर सुत को पा ही लिया वे तृप्त हुईं ।।17।।