ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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010.कलकत्ता चातुर्मास, सन् १९६३

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कलकत्ता चातुर्मास, सन् १९६३

समाहित विषयवस्तु

१. कलकत्ता में रक्त-रंजित पैरों से आगमन।

२. महानगर में हर्ष की लहर।

३. बेलगछिया ने धार्मिक मेलों के स्थान का रूप ले लिया।

४. माताजी की सभा में प्रश्न पूछने के खूब अवसर।

५. सिद्धचक्र मंडल विधान का आयोजन।

६. कु.सुशीला ने ब्रह्मचर्य व्रत लिया।

७. कलकत्ता से सम्मेदशिखर का विचार।

८. वंदना एवं विहार।

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काव्य पद

आषाढ़ सुदी चौथ दोपहर, संघ आर्यिका गमन हुआ।

दो सौ मील यात्रा करके, कलकत्ता आगमन हुआ।।
बहने लगा रक्त तलवों से, दुखते खूब, न चैन लिया।
चतुर्दशी आषाढ़ सुदी को, पहुँचा संघ बेलगछिया।।४४९।।

महानगर यह चाह रहा था, महासंत कोई आ जाए।
चातक जैसे हम प्यासों की, कोई प्यास बुझा जाये।।
आचार्यश्री शिवसागर जी के, शुभाशीष ने पूरी आश।
सन् तिरेसठ में माताजी का, हुआ स्थापित चातुर्मास।।४५०।।

महानगर ने माताजी का, किया हार्दिक अभिनंदन।
पग प्रक्षालन-करन आरती, जयकारे, शत शत वंदन।।
आबाल वृद्ध नर-नारी का गण, फूला नहीं समाया था।
महानगर ने महातीर्थ को, महायत्न से पाया था।।४५१।।

भरने लगा धर्म का मेला, सन्तों से रौनक आई।
पूजन-प्रवचन-भजन-आरती, नृत्य-गान मंगलदायी।।
कई एक चौके गये लगाये, पड़गाहें सौ-सौ नर-नार।
धन्य भाग वह माताजी के, जिस घर में हो जाँय अहार।।४५२।।

श्रोता मन जिज्ञासा होना, प्रश्न पूछना योग संभार।
पूर्ण सभा होती लाभान्वित, यह भी तप का एक प्रकार।।
प्रश्न तो मानो एक सुमन है, सुरभित होता सब वातास।
एक दीप से , दीप बहुत से , प्रज्ज्वलित होते करें प्रकाश।।४५३।।

प्रश्न बहुत से माताजी से, पूछे जाते यदा-कदा।
सब ही समाधान पा जाते, सप्रमाण, सौ-टंच सदा।।
माताजी तो ज्ञानमूर्ति हैं, करें प्रशंसा लोग सभी।
लेकिन धन्य-धन्य माताजी, हुआ ज्ञानमद नहीं कभी।।४५४।।

माताजी का रहा निरंतर, अध्ययन-अध्यापन जारी।
समाधिशतक-पंचसंग्रह ग्रंथ, अध्याये बारी-बारी।।
हुआ प्रशंसित संघ सब तरह, किंचित् याचकवृत्ति नहीं।
ज्ञान-ध्यान-तप ही प्रधान है, कलह-प्रपंच-अशांति नहीं।।४५५।।

किसी मुनि-साध्वी-साधु की, माँ को निंदा नहीं पसंद।
जो करता है अशुभ कर्म का, होता उसको बंध अनंद।।
शीघ्र रोक देतीं निंदक को, उपगूहन गुण पालन कर।
उचित नहीं निंदा करना, हो वशीभूत माया-मत्सर।।४५६।।

आर्षमार्ग विपरीत बोलकर, भीड़ नहीं अभिप्रेत कदा।
आगमसम्मत प्रवचन करना, ही इनको अभिप्रेत सदा।।
बार-बार कहते थे कुछ जन, करे शांति में धर्म निवास।
सप्रमाण समझाया इनने, धर्म में रहे शांति का वास।।४५७।।

सिद्धचक्र मण्डल विधान का, हुआ महत्तम आयोजन।
माताजी के प्रतिदिन होते, सारपूर्ण मार्मिक प्रवचन।।
कार्तिक शुक्ला चतुर्दशी दिन, हुआ पिच्छिका परिवर्तन।
तदनन्तर श्री संघ आर्यिका, किया शिखर जी ओर गमन।।४५८।।

आचार्य कल्प श्रुतसागर जी की, पुत्री श्री सुशीलाबाई।
उसको माताजी ने, भव-विराग की घूंटी थी पिलाई।।
हुई प्रभावित माताजी से, ब्रह्मचर्यव्रत धारणकर।
रहीं संघ में, आगे चलकर, हुर्इं श्रुतमती आर्यिका वर।।४५९।।

पूज्य आर्यिका माताजी के, विहार काल में हुई सभा।
कहा सभी ने चर्चा-चर्या, अनुशासन उत्कृष्ट प्रभा।।
निंदक या कि प्रशंसक के प्रति, रहा न माता हर्ष-विषाद।
हम कृतज्ञ हैं उपकारों को, सदा-सदा रक्खेंगे याद।।४६०।।

सिद्धचक्र मंडल विधान की, कोई नहिं महिमा का पार।
इस विधान में कई विधान हैं, भरा हुआ जिनवाणी सार।।
मैनासुंदरि इसे रचाया, पति का कुष्ट मिटाया था।
जन्म-जरा-मृतु कुष्ट रोग भी, इससे ही मिट पाया था।।४६१।।

कलकत्ता से कर विहार जब, संघ बढ़ा आगे की ओर।
दिया चर्तुिदक् शब्द सुनाई, हिन्दू-मुस्लिम दंगा का शोर।।
पर माताजी सम्यग्दृष्टि, उन्हें लगा न कुछ भी डर।
चल धनबाद-खरखरी हो के, संघ पहुँचा सम्मेदशिखर।।४६२।।

तीर्थराज की करी वंदना, सबने मिल माताजी संग।
श्री नंदीश्वर द्वीप प्रतिष्ठा, आयोजन का रहा प्रसंग।।
पुन: पुन: आग्रह भक्तों का, अत: वहाँ रुक लाभ दिया।
तदनन्तर सम्मेदशिखर से, गमन पुरलिया ओर किया।।४६३।।