ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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011.दानतीर्थ हस्तिनापुर

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दानतीर्थ हस्तिनापुर

-पीठाधीश क्षुल्लक मोतीसागर
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भगवान आदिनाथ का प्रथम आहार-

हस्तिनापुर तीर्थ तीर्थों का राजा है। यह धर्म प्रचार का आद्य केन्द्र रहा है। यहीं से धर्म की परम्परा का शुभारंभ हुआ। यह वह महातीर्थ है जहाँ से दान की प्रेरणा संसार ने प्राप्त की।

भगवान आदिनाथ ने जब दीक्षा धारण की उस समय उनके देखा-देखी चार हजार राजाओं ने भी दीक्षा धारण की। भगवान ने केशलोंच किया, उन सबने भी केशलोंच किया, भगवान ने वस्त्रों का त्याग किया, उसी प्रकार से उन राजाओं ने भी नग्न दिगम्बर अवस्था धारण कर ली। भगवान हाथ लटकाकर ध्यान मुद्रा में खड़े हो गये, वे सभी राजागण भी उसी प्रकार से ध्यान करने लगे किन्तु तीन दिन के बाद उन सभी को भूख-प्यास की बाधा सताने लगी। वे बार-बार भगवान की तरफ देखते किन्तु भगवान तो मौन धारण करके नासाग्र दृष्टि किये हुए अचल खड़े थे, एक-दो दिन के लिए नहीं पूरे छह माह के लिए अतः उन राजाओं (मुनियों) ने बेचैन होकर जंगल के फल खाना एवं झरनों का पानी पीना प्रारंभ कर दिया।

उसी समय वन देवता ने प्रगट होकर उन्हें रोका कि-‘‘मुनि वेश में इस प्रकार से अनर्गल प्रवृत्ति मत करो। यदि भूख-प्यास का कष्ट सहन नहीं हो पाता है, तो इस जगत पूज्य मुनि पद को छोड़ दो।’’ तब सभी राजाओं ने मुनि पद को छोड़कर अन्य वेश धारण कर लिये। किसी ने जटा बढ़ा ली, किसी ने बल्कल धारण कर ली, किसी ने भस्म लपेट ली, कोई कुटी बनाकर रहने लगे इत्यादि।

भगवान ऋषभदेव का छह माह के पश्चात् ध्यान विर्सिजत हुआ, वैसे तो भगवान का बिना आहार किये भी काम चल सकता था किन्तु भविष्य में भी मुनि बनते रहें, मोक्षमार्ग चलता रहे, इसके लिए आहार के लिए निकले किन्तु उनको कहीं पर भी विधिपूर्वक एवं शुद्ध प्रासुक आहार नहीं मिल पा रहा था। सभी प्रदेशों में भ्रमण हो रहा था किन्तु कहीं भी दातार नहीं मिल रहा था। कारण यह था कि उनसे पूर्व में भोगभूमि की व्यवस्था थी। लोगों को जीवनयापन की सामग्री-भोजन, मकान, वस्त्र, आभूषण आदि सब कल्पवृक्षों से प्राप्त हो जाते थे। जब भोगभूमि की व्यवस्था समाप्त हुई, तब कर्मभूमि में कर्म करके जीवनोपयोगी सामग्री प्राप्त करने की कला भगवान के पिता नाभिराय ने एवं स्वयं भगवान ऋषभदेव ने सिखाई। असि, मसि, कृषि, सेवा, शिल्प एवं वाणिज्य करके जीवन जीने का मार्ग बतलाया। सब कुछ बतलाया किन्तु दिगम्बर मुनियों को किस विधि से आहार दिया जावे, इस विधि को नहीं बतलाया। जिस इन्द्र ने भगवान ऋषभदेव के गर्भ में आने से छह माह पहले से रत्नवृष्टि प्रारंभ कर दी थी, पाँचों कल्याणकों में स्वयं इन्द्र प्रतिक्षण उपास्थत रहता था किन्तु जब भगवान प्रासुक आहार प्राप्त करने के लिए भ्रमण कर रहे थे, तब वह भी नहीं आ पाया।

सम्पूर्ण प्रदेशों में भ्रमण करने के पश्चात् हस्तिनापुर आगमन से पूर्व रात्रि के पिछले प्रहर में यहाँ के राजा श्रेयांस को सात स्वप्न दिखाई दिये, जिसमें प्रथम स्वप्न में सुदर्शन मेरु पर्वत दिखाई दिया। प्रातःकाल में उन्होंने ज्योतिषी को बुलाकर उन स्वप्नों का फल पूछा, तब ज्योतिषी ने बताया कि जिनका मेरु पर्वत पर अभिषेक हुआ है, जो सुमेरु के समान महान् हैं, ऐसे तीर्थंकर भगवान के दर्शनों का लाभ प्राप्त होगा।

कुछ ही देर बाद भगवान ऋषभदेव का हस्तिनापुर नगरी में मंगल पदार्पण हुआ। भगवान का दर्शन करते ही राजा श्रेयांस को जातिस्मरण हो गया, उन्हेें आठ भवपूर्व का समरण हो आया। जब भगवान ऋषभदेव राजा वज्रजंघ की अवस्था में व स्वयं राजा श्रेयांस वज्रजंघ की पत्नी रानी श्रीमती की अवस्था में थे और उन्होंने चारण ऋद्धिधारी मुनियों को नवधा भक्तिपूर्वक आहारदान दिया था, तभी राजा श्रेयांस समझ गये कि भगवान आहार के लिए निकले हैं।

यह ज्ञान होते ही वे अपने राजमहल के दरवाजे पर खड़े होकर मंगल वस्तुओं को हाथ में लेकर भगवान का पड़गाहन करने लगे।

हे स्वामी! नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु अत्र तिष्ठ तिष्ठ........विधि मिलते ही भगवान राजा श्रेयांस के आगे खड़े हो गये। राजा श्रेयांस ने पुनः निवेदन किया-मन शुद्धि, वचन शुद्धि, काय शुद्धि, आहार जल शुद्ध है, भोजनशाला में प्रवेश कीजिये। चौके में ले जाकर पाद प्रक्षाल करके पूजन की एवं इक्षुरस का आहार दिया। आहार होते ही देवों ने पंचाश्चर्य की वृष्टि की। चार प्रकार के दानों में से केवल आहार दान के अवसर पर ही पंचाश्चर्य वृष्टि होती है। भगवान जैसे पात्र का लाभ मिलने पर उस राजा श्रेयांस की भोजनशाला में उस दिन भोजन अक्षय हो गया। शहर के सारे नर-नारी भोजन कर गये, तब भी भोजन जितना था उतना ही बना रहा।

एक वर्ष के उपवास के बाद हस्तिनापुर में जब भगवान का प्रथम आहार हुआ तो समस्त पृथ्वी मंडल पर हस्तिनापुर के नाम की धूम मच गई, सर्वत्र राजा श्रेयांस की प्रशंसा होने लगी। अयोध्या से भरत चक्रवर्ती ने आकर राजा श्रेयांस का भव्य समारोहपूर्वक सम्मान किया तथा प्रथम आहार की स्मृति में यहाँ एक विशाल स्तूप का निर्माण कराया।

दान के कारण ही भगवान आदिनाथ के साथ राजा श्रेयांस को भी याद करते हैं। जिस दिन यहाँ प्रथम आहार दान हुआ, वह दिन वैशाख सुदी तीज का था। तब से आज तक वह दिन प्रतिवर्ष पर्व के रूप में मनाया जाता है। अब उसे आखा तीज या अक्षय तृतीया कहते हैं।

इस प्रकार दान की परम्परा हस्तिनापुर से प्रारंभ हुई। दान के कारण ही धर्म की परम्परा भी तब से अब तक बराबर चली आ रही है क्योंकि मंदिरों का निर्माण, र्मूितयों का निर्माण, शास्त्रों का प्रकाशन, मुनि संघों का विहार, दान से ही संभव है और यह दान श्रावकों के द्वारा ही होता है। श्रवणबेलगोल में एक हजार साल से खड़ी भगवान बाहुबली की विशाल प्रतिमा भी चामुण्डराय के दान का ही प्रतिफल है, जो कि असंख्य भव्य जीवों को दिगम्बरत्व का, आत्मशांति का पावन संदेश बिना बोले ही दे रही है।

यहाँ बनी यह जम्बूद्वीप की रचना भी संपूर्ण भारतवर्ष के लाखों नर-नारियों के द्वारा उदार भावों से प्रदत्त दान के कारण मात्र दस वर्ष में बनकर तैयार हो गई, जो कि सम्पूर्ण संसार के लिए आकर्षण का केन्द्र बन गई है। जम्बूद्वीप की रचना सारी दुनिया में अभी केवल यहाँ हस्तिनापुर में ही देखने को मिल सकती है। नंदीश्वर द्वीप की रचना, समवसरण की रचना तो अनेक स्थलों पर बनी है और बन रही है। यह हमारा व आप सबका परम सौभाग्य है कि हमारे जीवनकाल में ऐसी भव्य रचना बनकर तैयार हो गई और उसके दर्शनों का लाभ सभी को प्राप्त हो रहा है।

भगवान आदिनाथ के प्रथम आहार के उपलक्ष्य में वह तिथि पर्व के रूप में मनाई जाने लगी, वह दिन इतना महान हो गया कि कोई भी शुभ कार्य उस दिन बिना किसी ज्योतिषी से पूछे कर लिया जाता है। जितने विवाह अक्षय तृतीया के दिन होते हैं उतने शायद ही अन्य किसी दिन होते हों और तो और जब से भगवान का प्रथम आहार इक्षुरस का हुआ, तब से इस क्षेत्र में गन्ना भी अक्षय हो गया, जिधर देखों उधर गन्ना ही गन्ना नजर आता है। सड़क पर गाड़ी में आते-जाते बिना खाये मुँह मीठा हो जाता है। कदम-कदम पर गुड़, शक्कर बनता दिखाई देता है। हस्तिनापुर में आने वाले प्रत्येक यात्री को जम्बूद्वीप प्रवेश द्वार पर भगवान के आहार के प्रसाद रूप में यहाँ लगभग बारह महीने इक्षुरस पीने को मिलता है।

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भगवान शांतिनाथ, कुंथुनाथ, अरहनाथ के चार-चार कल्याणक-

भगवान आदिनाथ के पश्चात् अनेक महापुरुषों का इस पुण्य धरा पर आगमन होता रहा है। भगवान शांतिनाथ, कुंथुनाथ एवं अरहनाथ के चार-चार कल्याणक यहाँ हुए हैं। तीनों तीर्थंकर चक्रवर्ती एवं कामदेव पद के धारी थे। तीनों तीर्थकरों ने यहाँ से समस्त छह खण्ड पृथ्वी पर राज्य किया किन्तु उन्हें शांति की प्राप्ति नहीं हुई। छियानवे हजार रानियाँ भी उन्हें सुख प्रदान नहीं कर सकीं अतएव उन्होंने सम्पूर्ण आरंभ परिग्रह का त्याग कर नग्न दिगम्बर अवस्था धारण की, मुनि बन गये। जैसा कि आज भी वैराग्यभावना में पढ़ा जाता है-

छोड़े चौदह रत्न नवों निधि, अरु छोड़े संग साथी।

कोटि अठारह घोड़े छोड़े, चौरासी लख हाथी।।
इत्यादिक संपति बहुतेरी जीरण तृण सम त्यागी।
नीति विचार नियोगी सुत को, राज दियो बड़भागी।।

भगवान शांतिनाथ, कुंथुनाथ, अरहनाथ ने महान तपश्चर्या करके दिव्य केवलज्ञान की प्राप्ति की। उनकी ज्ञान ज्योति के प्रकाश से अनेकोें भव्य जीवों का मोक्षमार्ग प्रशस्त हुआ। अंत में उन्होंने सम्मेदशिखर से निर्वाण प्राप्त किया। आज प्रतिमाह हजारों लोग उन तीर्थंकरों की चरण रज से पवित्र उस पुण्यधरा की वंदना करने आते हैं। उस पुनीत माटी को मस्तक पर चढ़ाते हैं।

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कौरव-पांडव की राजधानी-

महाभारत की विश्व विख्यात घटना भगवान नेमीनाथ के समय में यहाँ घटित हुई। यह वही हस्तिनापुर है, जहाँ कौरव पांडव ने राज्य किया। सौ कौरव भी पाँव पांडवों को हरा नहीं सके। क्या कारण था? कौरव अनीतिवान थे, अन्यायी थे, अत्याचारी थे, ईष्र्यालु थे, द्वेषी थे। उनमें अभिमान बाल्यकाल से ही कूट-कूट कर भरा हुआ था। पांडव प्रारंभ से धीर-वीर-गंभीर थे। सत्य आचरण करने वाले थे। न्याय-नीति से चलते थे। सहिष्णु थे। इसलिए पांडवों ने विजय प्राप्त की। यहाँ तक कि पांडव भी सती सीता की तरह अग्नि परीक्षा में सफल हुए। कौरवों के द्वारा बनाये गये जलते हुए लाक्षागृह से भी णमोकार महामंत्र का स्मरण करते हुए एक सुरंग के रास्ते से बच निकले।

वे दूसरी बार पुनः अग्नि परीक्षा में सफल हुए, जब शत्रुंजय में नग्न दिगम्बर मुनि अवस्था में ध्यान में लीन थे, उस समय दुर्योधन के भानजे कुर्युधर ने लोहे के आभूषण बनवाकर गरम करके पहना दिये। जिसके फलस्वरूप बाहर से उनका शरीर जल रहा था और भीतर से कर्म जल रहे थे। उसी समय सम्पूर्ण कर्म जलकर भस्म हो गये और अंतकृत केवली बनकर तीन पांडवों ने निर्वाण प्राप्त किया और नकुल, सहदेव उपशम श्रेणी का आरोहरण करके ग्यारहवें गुणस्थान में मरण को प्राप्त करके सर्वार्थसिद्धि गये।

कौरव-पांडव तो आज भी घर-घर में देखने को मिलते हैं। यदि विजय प्राप्त करना है, तो पांडवों के मार्ग का अनुसरण करना चाहिए। सदैव न्याय-नीति से चलना चाहिए। तभी पांडवों की तरह यश की प्राप्ति होगी। धर्म की सदा जय होती है।

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रक्षाबंधन पर्व-

एक समय हस्तिनापुर में अकंपनाचार्य आदि सात सौ मुनियों का संघ आया हुआ था। उस समय यहाँ महापद्म चक्रवर्ती के पुत्र राजा पद्म राज्य करते थे। उनसे कारणवश बली मंत्री ने वरदान के रूप में सात दिन का राज्य माँग लिया। राज्य लेकर बली ने अपने पूर्व अपमान का बदला लेने के लिए जहाँ सात सौ मुनि विराजमान थे, वहाँ उनके चारों ओर यज्ञ के बहाने अग्नि प्रज्वलित कर दी। उपसर्ग समझकर सभी मुनिराज शांत परिणाम से ध्यान में लीन हो गये।

दूसरी तरफ उज्जैनी में विराजमान विष्णुकुमार मुनिराज को मिथिला नगरी में चातुर्मास कर रहे मुनिश्री श्रुतसागर जी के द्वारा भेजे गये क्षुल्लक श्री पुष्पदंत से सूचना प्राप्त हुई कि हस्तिनापुर में मुनियों पर घोर उपसर्ग हो रहा है और उसे आप ही दूर कर सकते हैं।

यह समाचार सुनकर परम करुणार्मूित विष्णुकुमार मुनिराज के मन में साधर्मी मुनियों के प्रति तीव्र वात्सल्य की भावना जागृत हुई। तपस्या से उन्हें विक्रिया ऋद्धि उत्पन्न हो गई थी। वे वात्सल्य भावना से ओतप्रोत होकर उज्जैनी से चातुर्मास काल में हस्तिनापुर आते हैं। अपनी पूर्व अवस्था के भाई वहाँ के राजा पद्म को डांटते हैं। राजा उनसे निवेदन करते हैं-हे मुनिराज! आप ही इस उपसर्ग को दूर करने में समर्थ हैं, तब मुनि विष्णुकुमार ने वामन का वेष बनाकर बलि से तीन कदम जमीन दान में मांगी। बलि ने देने का संकल्प किया। मुनिराज ने विक्रिया ऋद्धि से विशाल शरीर बनाकर दो कदम में सारा अढ़ाई द्वीप नाप लिया, तीसरा पैर रखने की जगह नहीं मिली। चारों तरफ त्राहिमाम् होने लगा। रक्षा करो, क्षमा करो की ध्वनि गूंजने लगी। बलि ने भी क्षमा मांगी। मुनिराज तो क्षमा के भंडार होते ही हैं, उन्होंने बलि को क्षमा प्रदानकर की। उपसर्ग दूर होने पर विष्णुकुमार ने पुनः दीक्षा धारण की। सभी ने मिलकर विष्णुकुमार की बहुत भारी पूजा की।

अगले दिन श्रावकों ने भक्ति से मुनियों को सिवर्इं की खीर का आहार दिया और आपस में एक-दूसरे को रक्षा सूत्र बाँधे। यह निश्चय किया कि विष्णुकुमार मुनिराज की तरह वात्सल्य भावनापूर्वक धर्म एवं धर्मायतनों की रक्षा करेंगे। तभी से वह दिन प्रतिवर्ष रक्षाबंधन पर्व के रूप में श्रावण सुदी र्पूिणमा को मनाया जाने लगा। इसी दिन बहनें भाइयों के हाथ में राखी बाँधती हैं। अब आगे से रक्षाबंधन के दिन हस्तिनापुर का स्मरण करें। देव-शास्त्र-गुरु के प्रति तन-मन-धन न्योछावर कर दें। साधर्मी के प्रति वात्सल्य की भावना रखें। तभी रक्षाबंधन पर्व मनाना सार्थक हो सकता है।

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दर्शन प्रतिज्ञा में प्रसिद्ध मनोवती-

गजमोती चढ़ाकर भगवान के दर्शन कर भोजन करने का अटल नियम निभाने वाली इतिहास प्रसिद्ध महिला मनोवती भी इसी हस्तिनापुर की थी। यह नियम उसने विवाह के पूर्व लिया था। विवाह के पश्चात् जब ससुराल गई, तो वहाँ संकोचवश कह नहीं पाई। तीन दिन तक उपवास हो गया। जब उसके पीहर में सूचना पहुँची, तो भाई आया, उसे एकांत में मनोवती ने सब बात बता दी। उसके भाई ने मनोवती के स्वसुर को बताया, तो उसके स्वसुर ने कहा कि हमारे यहाँ तो गजमोती का कोठार भरा है। तभी मनोवती ने गजमोती चढ़ाकर भगवान के दर्शन करके भोजन किया।

इसके बाद मनोवती को तो उसका भाई अपने घर लिवा ले गया। इधर उन मोतियों के चढ़ाने से इस परिवार पर राजकीय आपत्ति आ गई, जिसके कारण मनोवती के पति बुधसेन के छहों भाइयों ने मिलकर उन दोनों को घर से निकाल दिया। घर से निकलने के बाद मनोवती ने तब तक भोजन नहीं किया, जब तक गजमोती चढ़ाकर भगवान के दर्शनों का लाभ नहीं मिला। जब चलते-चलते थक गये, तो रास्ते में सो गये, पिछले रात्रि में उन्हें स्वप्न होता है कि तुम्हारे निकट ही मंदिर है शिला हटाकर दर्शन करो। उठकर संकेत के अनुसार शिला हटाते ही भगवान के दर्शन हुए। वहीं पर चढ़ाने के लिए गजमोती मिल गये। दर्शन करके भोजन किया। आगे चलकर पुण्ययोग से बुधसेन राजा के जमाई बन गये।

इधर वे छहों भाई अत्यन्त दरिद्र अवस्था को प्राप्त हो जाते हैं। गाँव छोड़कर कार्य की तलाश में घूमते-घूमते छहों भाई, उनकी पत्नियाँ व माता-पिता सभी वहाँ पहुँचते हैं, जहाँ बुधसेन जिनमंदिर का निर्माण करा रहे थे। लोगों ने उन्हें बताया कि आप बुधसेन के यहाँ जाओ आपको वे काम पर लगा लेंगे। वे सभी वहाँ पहुँचे, उनको काम पर लगाया, बुधसेन मनोवती उन्हें पहचान गये अन्त में सबका मिलन हुआ। सभी भाइयों-भौजाइयोें तथा माता-पिता ने क्षमायाचना की। धर्म की जय हुई। इस घटना से यही शिक्षा मिलती है कि आपस में सबको मिलकर रहना चाहिए। न मालूम किसके पुण्ययोग से घर में सुख-शांति और समृद्धि होती है।

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सुलोचना जयकुमार-

महाराज सोम के पुत्र जयकुमार भरत चक्रवर्ती के प्रधान सेनापति हुए। उनकी धर्म परायणशील शिरोमणि धर्मपत्नी सुलोचना की भक्ति के कारण गंगा नदी के मध्य आया हुआ उपसर्ग दूर हुआ।

रोहिणी व्रत की कथा का घटनास्थल भी यही हस्तिनापुर तीर्थ है।

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जम्बूद्वीप की रचना-

अनेक घटनाओं की श्रृंखला के क्रम में एक और मजबूत कड़ी के रूप में जुड़ गई जम्बूद्वीप की रचना। इस रचना ने विस्मृत हस्तिनापुर को पुनः संसार के स्मृति पटल पर अंकित कर दिया। न केवल भारत के कोने-कोने में अपितु विश्वभर में जम्बूद्वीप रचना के दर्शन की चर्चा रहती है। जैन जगत में ही नहीं प्रत्युत्त वर्तमान दुनिया में पहली बार हस्तिनापुर में जम्बूद्वीप रचना का विशाल खुले मैदान पर भव्य निर्माण हुआ है, जो कि गणिनी र्आियका ज्ञानमती माताजी के ज्ञान व उनकी प्रेरणा का प्रतिफल है।

सन् १९६५ में श्रवणबेलगोल स्थत भगवान बाहुबली के चरणों में ध्यान करते हुए इन्हें तेरहद्वीप रचना के दिव्य दर्शन हुए थे, उसमें से एकमात्र जम्बूद्वीप को बीस वर्ष के पश्चात् यहाँ हस्तिनापुर में आकर साकार रूप प्राप्त हुआ। वर्तमान में जम्बूद्वीप रचना दर्शन के निमित्त से ही लाखों जैन-जैनेतर दर्शनार्थी हस्तिनापुर आने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं।

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तेरहद्वीप की स्वर्णिम रचना-

पुनश्च उस पूरी तेरहद्वीप रचना का निर्माण भी पूज्य माताजी की प्रेरणा से जम्बूद्वीप तीर्थ परिसर में एक विशाल गोलाकार जिनालय के अन्दर हुई है। उसमें पंचमेरु पर्वत सहित ४५८ अकृत्रिम चैत्यालय, १७० समवसरण एवं लगभग ९०० देवभवन आदि में कुल २१२७ जिनप्रतिमाएँ विराजमान हैं। इस स्वर्णिम रचना के दर्शन करके भक्तगण अभूतपूर्व आल्हाद का अनुभव करते हैं।

हस्तिनापुर आने वाले सभी दर्शर्नािथयों के मुख से एक स्वर से यही कहते हुए सुनने में आता है कि हमें तो कल्पना भी नहीं थी कि इतनी आकर्षक जम्बूद्वीप एवं तेरहद्वीप की रचना बनी होगी, ऐसा लगता है मानो यहाँ स्वर्ग ही उतर आया हो।

पूज्य माताजी ने जम्बूद्वीप रचना की प्रेरणा तो दी ही, साहित्य निर्माण के क्षेत्र में भी अद्भुत र्कीितमान स्थापित किया। अढ़ाई हजार वर्ष में दिगम्बर जैन समाज में ज्ञानमती माताजी पहली आर्यिका माता हैं, जिन्होंने ग्रंथो की रचना की है। अब से पहले के लिखे जितने भी ग्रंथ उपलब्ध होते हैंं वे सब पुरुष वर्ग के द्वारा लिखे गये हैं, आचार्यों ने लिखे, मुनियों ने लिखे या पंडितों ने लिखे। किसी र्आियका माता द्वारा लिखा एक भी ग्रंथ किसी ग्रंथ भंडार में देखने में नहीं आया।

पूज्य ज्ञानमती माताजी ने त्याग और संयम को धारण करते हुए एक-दो नहीं २५० से भी अधिक छोटे-बड़े ग्रंथो का सृजन किया। न्याय, व्याकरण, सिद्धांत, अध्यात्म आदि विविध विषयों के ग्रंथों की टीका आदि की। भाक्तपरक पूजाओं के निर्माण में उल्लेखनीय कार्य किया है। इन्द्रध्वज विधान, कल्पदु्रम विधान, सर्वतोभद्र विधान, जम्बूद्वीप विधान जैसी अनुपम कृतियों का सृजन किया। सभी वर्ग के व्याqक्तयों को दृष्टि में रखकर माताजी ने विभिन्न रुचि के साहित्य की रचनाएँ की। प्राचीन र्धािमक कथाओं को उपन्यास की शैली में लिखा है। अब तक माताजी की कृतियों का प्रकाशन विभिन्न भाषाओं में दस लाख से अधिक मात्रा में हो चुका है।

पूज्य माताजी की लेखनी अभी भी अविरल गति से चल रही है। आचार्य कुन्दकुन्ददेव द्वारा रचित समयसार की आचार्य अमृतचंद्र एवं आचार्य जयसेनकृत संस्कृत टीकाओं का हिन्दी अनुवाद किया। जो कि काफी समय पूर्व छपकर जन-जन के हाथों में पहुँच चुका है। इसी प्रकार उन्होंने षट्खण्डागम सूत्रग्रंथ की सोलहों पुस्तकों की ‘‘सिद्धान्तचिंतामणि’’ नामक सरल संस्कृत टीका भी ३१०७ पृष्ठों में पूर्ण करके समाज को प्रदान किया है। प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी द्वारा क्रमश: उनकी हिन्दी टीकाएँ लिखी जा रही हैं और वे भी यथाक्रम प्रकाशित हो रहे हैं। अन्य प्रकाशन कार्य भी सतत चल रहा है।

अनेक निर्माणात्मक एवं साहित्यिक, ऐतिहासिक कृतियों से समन्वित ऐसे दानतीर्थ हस्तिनापुर क्षेत्र का दर्शन महान् पुण्य फल को देने वाला है। यह तीर्थक्षेत्र युगों-युगों तक पृथ्वी तल पर धर्म की वर्षा करता रहे, यही मंगल भावना है।