ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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011.हैदराबाद में चातुर्मास, सन् १९६४

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हैदराबाद में चातुर्मास, सन् १९६४

समाहित विषयवस्तु

१. सम्मेदशिखर से पुरलिया में प्रवास।

२. सराक बंधुआें की बस्ती में कुछ दिन बिताए।

३. उड़ीसा-खंडगिरि-उदयगिरि, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश।

४. अंडा-मछली-मांसाहार त्याग का उपदेश।

५. संग्रहणी रोग का प्रकोप।

६. हैदराबाद में नाजुक स्थिति और रोग शमन।

७. मनोवती को क्षुल्लिका दीक्षा-अभयमती नाम रखा।

८. नगर में प्रथम बार जिनालय पर शिखर का निर्माण।

९. हैदराबाद चातुर्मास की अनेक उपलब्धियाँ।

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काव्य पद

बिहार पुरलिया वन अंचल में, सराक जाति जन करें निवास।

वत्सलतावश माताजी ने, कुछ दिन वहाँ पर किया प्रवास।।
काल संक्रमण श्रावक बिछुडे, अब कहलाने लगे सराक।
धर्म अहिंसा, जीवन सात्विक, कृषि-पशुपालन, भोजन शाक।।४६४।।

क्रमश: कर विहार माताजी, कटक उड़ीसा किया प्रवेश।
खंडगिरि उदयगिरि, गुफा क्षेत्र के, संघ ने दर्शन किए विशेष।।
प्रान्त उड़ीसा छोड़ संघ जब, आँध्रप्रदेश में किया विहार।
पाया बहुतायत से प्रचलित, अंडा-मछली-मांसाहार।।४६५।।

इस प्रदेश के विहार काल में, किया अहिंसा धर्म प्रचार।
अंडा-मछली-माँस त्याग ही, रहता इन प्रवचन का सार।।
हुए प्रभावित श्रोताओं ने, त्याग कर दिया मांसाहार।
मांस पकाते बर्तन फैके, स्वीकारा सात्विक आहार।।४६६।।

घर जाकर लोगों ने अपने, मात-पिता को समझाया।
बालक-बूढ़ों सभी से उनने, त्याग माँस का करवाया।।
धीरे-धीरे मार्ग पार कर, पहुँची हैदराबाद नगर।
सबने खुशियाँ खूब मनार्इं, नगर सजाया डगर-डगर।।४६७।।

आषाढ़ माह में माताजी ने, अति ही करी चलाई थी।
भीषण गर्मी-संग्रहणी ने, इन पर करी चढ़ाई थी।।
रस-पय-दवा न पचती कुछ भी, निकल वमन से जाती थी।
फलस्वरूप दुर्बल तन माता, उठ या बैठ न पाती थीं।।४६८।

एक बार ही भोजन-पानी, साथ उसी के औषध पान।
जीवित रखना कठिन था इनको, वैद्य-डाक्टर का अनुमान।।
सकल समाज हुई अति चिंतित, करें परस्पर वार्तालाप।
अल्पवयस्का साध्वी माता, हैं अनन्य अपने में आप।।४६९।।

विदुषी, प्रवचनकला दक्ष हैं, आगमोक्त चर्याधारी।
यदि समाधि हो गई यहाँ पर, हमें लगे अपयश भारी।।
किंकर्तव्य विमूढ़ हुए सब, कुछ उपाय न सूझा है।
कलकत्ते वालों ने भेजा, कुशल वैद्य तब दूजा है।।४७०।।

इनकी नाजुक स्थिति देखी, हुए वैद्य के होश हवा।
आयुकर्म जब शेष रहे तो, कर जाती है काम दवा।।
इन सलाह से कर परिवर्तन, वैद्य ने दिया दवाई है।
धीरे-धीरे रोग शमन हो, तन स्फूर्ती आई है।।४७१।।

चातुर्मास हुआ स्थापित, हर्ष लहर की आई है।
आबाल-वृद्ध-नर-नारी सबके, चेहरे रौनक आई है।।
हुए कार्यक्रम समय-समय पर, माँ के प्रवचन रोज हुए।
माताजी से धर्मामृत के, चषक सभी ने खूब पिये।।४७२।।

आचार्यश्री शिवसागर जी से, स्वीकृति पाकर दीक्षा की।
माताजी ने मनोवती को, तदा क्षुल्लिका दीक्षा दी।।
श्रावण शुक्ला सातें शुभतिथि, मोक्षकल्याणक पारसनाथ।
अभयमती माता इच्छामि, करके सबने नमाया माथ।।४७३।।

परम पूज्य माताजी सन्निधि, अति ऐतिहासिक कार्य हुए।
पर्वपर्यूषण-चातुर्मास में, छप्पन विविधविधान हुए।।
नहीं शिखर था जिनमंदिर पर, शासनकाल मुसलमानी।
माताजी से प्राप्त प्रेरणा, शिखर बन गया मनहारी।।४७४।।

शांतिनाथ जिन हुए विराजित, कलशारोहण किया गया।
प्रथमबार रथयात्रा का भी, महदायोजन किया गया।।
प्राप्त प्रेरणा माताजी से, जो ऐतिहासिक कार्य हुए।
वैसे अब तक नहीं किसी के, शुभाशीष सम्पन्न हुए।।४७५।।

हैदराबादिक चतुर्मास की, रहीं उपलब्धि अनेकानेक।
सबसे उत्तम माताजी का, स्वास्थ्य लाभ है उनमें एक।।
बहु विधान, क्षुल्लिका दीक्षा, मंदिरजी पै शिखर बना।
संघ चला मन बाहुबली भज, शांतिनाथ को शीश नमा।।४७६।।