ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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012. कु. प्रभावती को ब्रह्मचर्य

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कु. प्रभावती को ब्रह्मचर्य

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चारित्रचक्रवर्ती आचार्य देव बारामती में विराजमान थे। वहाँ से वुंâथलगिरि विहार करने वाले थे। यह निर्णय हो चुका कि- ‘‘आचार्य महाराज अब कुंलगिरि में यमसल्लेखना लेने वाले हैं, अतः यह उनका अंतिम विहार है।’’ इस प्रसंग पर मैं भी क्षुल्लिका विशालमती माताजी के साथ यहाँ आ गई थी। क्षुल्लिका अजितमती अम्मा और क्षुल्लिका जिनमती अम्मा ये दोनों ही यहाँ थीं। आचार्यश्री का दर्शन कर मन गद्गद हो गया। आचार्यश्री ने उत्तरी अम्मा या अयोध्या की अम्मा कहकर संबोधा। उनके शब्द अमृत के समान मधुर और प्रिय लगते थे। उनके सामने बैठे हुए भक्तगण चातक पक्षी के समान आचार्यश्री के मुखकमल की ओर एकटक निहारा करते थे। मध्य में कदाचित् आचार्यश्री के मुखारविंद से कुछ भी शब्द निकलते, सुनकर सभी भावविभोर हो जाते थे। मेरे भाव आर्यिका दीक्षा लेने के हो रहे थे, अतः मैंने क्षुल्लिका विशालमती जी से कई बार कहा था कि मुझे आचार्यश्री से आर्यिका दीक्षा दिला दो। परन्तु वे कहती थीं-‘‘अम्मा! अभी कुछ दिन ठहरो, हम और आप दोनोें एक साथ आर्यिका दीक्षा लेवेंगी।’’

‘‘एक दिन रात्रि के पिछले प्रहर में मैंने स्वप्न में निर्धूम अग्नि जलते हुए देखा था, तथा सामायिक में मेरे भाव बहुत ही तीव्रता से आर्यिका दीक्षा लेने के हो रहे थे।’’ मैंने प्रातः विशालमती जी से अपने भाव भी सुनाये और पिछली रात्रि का स्वप्न भी सुनाया। तब उन्होंने कहा- ‘‘अम्मा! तुम्हें सच्चा वैराग्य है। अब मैं तुम्हें दीक्षा में बढ़ने से नहीं रोवूँâगी। चलो, बारामती में आचार्यश्री से प्रार्थना करना, वहीं पर तुम्हें दीक्षा दिला दूंगी।’’ अतः इस अवसर पर मैंने आचार्यश्री से प्रार्थना की और कहा-‘‘हे गुरुदेव! हमें संसार समुद्र से पार होने के लिए आर्यिका दीक्षा प्रदान कीजिये।’’ आचार्य श्री ने बहुत ही कोमल शब्दों में कहा-‘‘ अब मैंने दीक्षा नहीं देने का नियम ले लिया है। अतः तुम मेरे शिष्य नेमिसागर या वर्धमान सागर के पास दीक्षा ले लो। मैं सूचना भिजवा दूूँगा अथवा तुम्हें तुम्हारे शरीर, स्वास्थ्य और भाषा आदि के अनुकूल उत्तर प्रान्त ठीक रहेगा वहाँ वीरसागर जी महाराज हैं, उनके संघ में वयोवृद्ध आर्यिकायें भी हैं। तुम उसी संघ में जाकर दीक्षा लेओ तो अच्छा रहेगा, क्योंकि इधर इस समय कोई आर्यिकायें नहीं हैं।’’

आचार्य श्री की मृदुमय वाणी सुनकर यद्यपि मेरे भाव अति उग्र थे कि ‘‘अभी-अभी दीक्षा ले लूँ।’’ फिर भी शांति रखनी पड़ी और यही सोचा कि इस वर्ष का चातुर्मास इसी प्रांत में करके आचार्यदेव की सल्लेखना देख लूँ पुनः चातुर्मास के बाद दीक्षा लूँगी। एक दिन आचार्य देव ने रेल-मोटर पर बैठने वाले क्षुल्लक-क्षुल्लिकाओं के प्रति अनादर भाव व्यक्त किये। तब विशालमती जी ने कहा- ‘‘महाराज जी! यह क्षुल्लिका वीरमती तो रेल-मोटर में कतई नहीं बैठना चाहती थी परन्तु इसके गुरु आचार्य देशभूषण जी २०-२० मील पैदल चलते हैं। उन्होंने जबर्दस्ती इसे बैठने का आदेश दिया है।’’

उसी समय मैंने आचार्यश्री के सानिध्य में यह नियम कर लिया कि-‘‘इस चातुर्मास के बाद बाहुबली की यात्रा करके जिनसे दीक्षा लेनी है उनके पास पहुँचने तक ही मैं रेल-मोटर में बैठूंंगी। उन गुरु के पास पहुँचकर यावज्जीवन मैं रेल-मोटर में बैठने का त्याग करती हूँ।’’ मेरे इस त्याग से भी आचार्य देव बहुत ही प्रसन्न हुए और मुझे बहुत-बहुत आशीर्वाद देकर कहा- ‘‘यह निकट भव्य है। इसके परिणाम बहुत ही कोमल हैं।’’ इतना कहकर आचार्यश्री ने हमें बहुत सी शिक्षायें दीं।

वहाँ विहार के समय जिनेंद्र देव का रथ निकाला गया था। उस रथ को चमेली और जूही के फूलों से इतना सुन्दर सजाया गया था कि जो देखते ही बनता था। उस पर छोटी-छोटी दो कन्यायें हाथ में चँवर लेकर खड़ी थीं। वे भी फूलों से ही सजी हुई थीं। भक्तों की भीड़ बेशुमार थी। आसपास गाँव के सभी स्त्री-पुरुष आचार्यश्री के अंतिम विहार को देखने के लिए उपस्थित हो गये थे। सेठ चंदूलाल जी सर्राफ उस समय बारामती के प्रसिद्ध मुनि-भक्त व्यक्ति थे।

आचार्यदेव ने मंगल आशीर्वाद देकर अपना अंतिम विहार कर दिया। वे भगवान् के रथ के साथ-साथ चल रहे थे। यह भव्य जुलूस सेठ चंदूलाल के बगीचे में पहुँचा और वहाँ सभा के रूप में परिणत हो गया। भक्तों ने आचार्यश्री के चरणों की रज अपने-अपने मस्तक पर चढ़ाई और हर्ष-विषाद से मिश्रित भावों को लिए हुए वापस अपने-अपने स्थान चले गये। उस समय आचार्यश्री के मंगल विहार के समय प्रायः सभी की आँखें सजल थीं चूँकि लोगों को यह विदित था कि अब आचार्यश्री कुंथलगिरि पहुँचकर पुनः इस पर्याय में विहार नहीं करेंगे। हम दोनों क्षुल्लिकाओं ने सन् १९५५ में म्हसवड़ गाँव में चातुर्मास कर लिया। वहाँ चातुर्मास स्थापना के समय विशालमती जी ने सूचना कर दी थी कि- ‘‘आचार्यश्री की सल्लेखना देखने के लिए हम दोनों कुंथलगिरि जावेंगी।’’ वहाँ का चातुर्मास बहुत ही अच्छा चल रहा था, मैं प्रतिदिन कुछ बालिकाओं को कातन्त्र व्याकरण, द्रव्यसंग्रह आदि पढ़ा रही थी और विशालमती माताजी प्रतिदिन मध्याह्न में उपदेश करती थीं।

मेरी दीक्षा की उत्कट भावना देखकर एक दिन विशालमती जी ने कहा- ‘‘अम्मा! तुम कटोरी में आहार लेती हो उसे छोड़कर करपात्र में आहार लेना शुरू कर दो, दुपट्टा भी तुम्हारे नाम मात्र को है केवल बाहर जाते समय ऊपर डाल लेती हो सो इसे भी छोड़ दो। अपने को आर्यिका रूप में ही समझो। तुम्हारे परिणाम बहुत ही उज्ज्वल हैं।’’ मैंने उनकी आज्ञा से ऐसा ही किया तब कभी-कभी वे मुझे पहले वंदना करने लगतीं किन्तु मैं वैसा करने से उन्हें रोक देती थी। एक बार मैंने सुना-‘‘मेरे पास एक प्रभावती लड़की पढ़ने आती है वह विवाह नहीं करना चाहती।।’’ मैंने उससे एकांत में पूछा तब उसने इतना ही कहा कि-‘‘मैं स्वतंत्र रहना चाहती हूँ इसलिए विवाह नहीं करना चाहती।’’ बाकी उद्देश्य वह कुछ नहीं बता सकी। उसी गाँव में सेठ केवलचन्द्र शाह की पुत्री कंकुबाई ने भी पूर्व में ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया था तथा वह आयुर्वेद पढ़ रही थी। उनका भी कोई दृष्टिकोण दीक्षा आदि का नहीं था। इस प्रान्त में ऐसी एक-दो कन्यायें और भी थीं। मैंने कु. प्रभावती को यह शिक्षा देना शुरू किया कि- ‘‘यदि तुम्हें गृहस्थाश्रम में नहीं फसना है तो मेरे साथ चलो, पढ़-लिखकर आत्म कल्याण का मार्ग ग्रहण करो।’’ धीरे-धीरे मेरी शिक्षा से वह प्रभावित होती गई।

उस वर्ष भाद्रपद दो थे। प्रथम भाद्रपद में एक दिन रात्रि के पिछले प्रहर में मैंने स्वप्न में देखा कि-‘‘मानस्तंभ के ऊपर का भाग गिर गया है।’’ मैंने नित्य क्रिया से निवृत्त होकर प्रातः विशालमती माताजी को यह स्वप्न सुनाया, तब उन्होंने कहा कि-‘‘मुझे भी ऐसा स्वप्न हुआ है कि सूर्य डूबता जा रहा है।’’ हम दोनों ने परस्पर में विचार किया- ‘‘आज अवश्य ही किसी महापुरुष के प्रयाण के बारे में कुछ समाचार आयेगा।’’ दिन में समाचार मिला कि-‘आचार्यश्री ने कुंथलगिरि में यमसल्लेखना ग्रहण कर ली है।’ हम दोनों ने श्रावकों से परामर्श कर वहाँ जाने का निर्णय लिया। ‘‘प्रभावती ने चिंतित होकर कहा-‘‘अम्मा! मेरा क्या होगा?’’

विशालमती जी से परामर्श कर मैंने उसे सान्त्वना दी और कहा-‘‘तुम चिंता मत करो। कुंथलगिरि आचार्यश्री के दर्शन करने आना तब वहीं पर तुम्हें दो प्रतिमा के व्रत दिला दूँगी। अनंतर तो हम दोनोें वापस यहीं आकर चातुर्मास समापन करेंगे, तब तुम्हें अपने साथ ले चलेंगे।’’ हमारे साथ वहाँ की व्रतिक महिला फूलूबाई आ गई थीं और सौ. सोनूबाई भी आ गई थीं। यह सोनूबाई सेठ लालचन्द्र जी की धर्मपत्नी थीं। उनके तीन पुत्र व एक पुत्री थी। बड़े पुत्र गुलाबचन्द्र का विवाह हो चुका था। उसके एक पुत्र भी था। शेष अविवाहित थे। पुत्री स्नेहलता विवाह नहीं करना चाहती थी। वह सोलापुर श्राविका आश्रम में पढ़ रही थी।