ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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012. दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान का परिचय

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एक अद्वितीय जैन केन्द्र दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान

-कर्मयोगी ब्र.रवीन्द्र कुमार जैन
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पिछले तीन दशकों से राजधानी दिल्ली की उत्तर दिशा में उत्तरप्रदेश के जिला मेरठ पौराणिक तीर्थ हस्तिनापुर में ‘जम्बूद्वीप’ नाम से एक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय आकर्षण का केन्द्र अवस्थित है। २०० फुट के व्यास में निर्मित जैन भूगोल की अद्वितीय रचना ’जम्बूद्वीप’ के अन्दर हल्के गुलाबी संगमरमर से निर्मित १०१ फुट ऊँचे सुमेरु पर्वत की शोभा आज किसके मन को आर्किषत नहीं करती है?

प्राचीन जैन साहित्य एवं भूगोल के परिचायक, वैज्ञानिकों के लिए शोध केन्द्र, आध्याात्मक उन्नयन के लिए पवित्र स्थान, मानसिक शांति एवं जिनेन्द्र भगवान की पूजन-भक्ति के सम्पूर्ण साधनों तथा समस्त आधुनिक सुविधाओं की उपलब्धता सहित इस अनुपम तीर्थ की जनक संस्था का नाम है-दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान (रजि.)। जैन समाज की सर्वोच्च साध्वी पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी की पावन प्रेरणा से १९७२ में इस संस्थान का सूत्रपात किया गया। दिगम्बर जैन इंस्टीट्यूट ऑफ कॉस्मोग्राफिक रिसर्च (Digambar Jain Institute of Cosmographic Research) के नाम से प्रसिद्ध इस संस्थान का आधारभूत लक्ष्य था-जम्बूद्वीप का निर्माण और यह जम्बूद्वीप ही अंतत: संस्थान का मुख्य कार्यालय बन गया।

जंबूद्वीप की ३० एकड़ पवित्र भूमि पर संस्थान के द्वारा संचालित विभिन्न योजनाओं/रचनाओं का संक्षिप्त विवरण निम्नांकित है-

१. जंबूद्वीप रचना-जिनेन्द्र भगवान की २०७ प्रतिमाओं से पावन भारतीय शिल्प और जैन भूगोल का अद्वितीय उदाहरण, आधुनिक आकर्षणों-बिजली के फौव्वारे, नौका-विहार इत्यादि सहित।

२. कमल मंदिर-भगवान महावीर की अतिशयकारी खड्गासन प्रतिमा इस मंदिर में विराजमान हैं।

३. ध्यान मंदिर-२४ तीर्थंकर भगवन्तों की प्रतिमाओं सहित ‘ह्रीं’ रचना इस मंदिर में विराजमान हैं, जो कि ‘ध्यान’ (Meditation) करने हेतु उत्तमोत्तम माध्यम हैं।

४. त्रिर्मूित मंदिर-भगवान आदिनाथ, भरत एवं बाहुबली की खड्गासन प्रतिमाओं से इस मंदिर का नाम सार्थक है। कमल पर विराजमान भगवान नेमिनाथ एवं पार्श्वनाथ से इस मंदिर की शोभा द्विगुणित हो गयी है।

५. वासुपूज्य मंदिर-इस मंदिर में १२वें तीर्थंकर-वासुपूज्य स्वामी की खड्गासन प्रतिमा विराजमान हैं।

६. शांति-कुंथु-अरहनाथ मंदिर-जिन भगवन्तों के गर्भ, जन्म, तप और ज्ञान कल्याणकों से हस्तिनापुर की भूमि परम-पावन हुई है, उन शांति-कुंथु और अरहनाथ भगवंतों की खड्गासन प्रतिमाएं इस मंदिर में विराजमान हैं।

७. ॐ मंदिर-अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु परमेष्ठियों की प्रतिमाओं सहित ॐ (ओम) रचना इस मंदिर में विराजित है।

८. विद्यमान बीस तीर्थंकर मंदिर-इस मंदिर में विदेह क्षेत्र के विद्यमान २० तीर्थंकरों की प्रतिमाएँ बीस कमलों पर विराजमान हैं।

९. सहस्रकूट मंदिर-जिनेन्द्र भगवान की १००८ प्रतिमाओं सहित।

१०. भगवान ऋषभदेव मंदिर-धातु र्नििमत भगवान ऋषभदेव की मूलनायक प्रतिमा एवं अन्य जिन प्रतिमाओं सहित।

११. भगवान ऋषभदेव र्कीितस्तंभ-‘भगवान ऋषभदेव अन्तर्राष्ट्रीय निर्वाण महामहोत्सव वर्ष’में र्नििमत, भगवान के जीवन चरित्र को प्रर्दिशत करने वाला, ८ प्रतिमाओं से समान्वत ३१ फुट ऊँचा र्कीितस्तंभ।

१२. तेरहद्वीप जिनालय-इस मंदिर के अंदर मध्यलोक के तेरहद्वीपों की अकृत्रिम रचना का अति सुन्दरता के साथ दिग्दर्शन कराया गया है, जिसमें पंचमेरु पर्वतों के साथ-साथ कुल २१२७ प्रतिमाएँ विराजमान हैं।

१३. अष्टापद दिगम्बर जैन मंदिर-इस मंदिर के अंदर प्रथम जैन तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की निर्वाणभूमि अष्टापद-कैलाशपर्वत की आकर्षक प्रतिकृति विराजमान है। कैलाशपर्वत का ही दूसरा नाम अष्टापद है। ४ फरवरी २००० को लाल किला मैदान, दिल्ली में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा इस प्रतिकृति के समक्ष निर्वाणलाडू चढ़ाकर इसका उद्घाटन किया गया।

१४. नवग्रह शान्ति जिनमंदिर-पूज्य माताजी की पावन प्रेरणा से उत्तर भारत में प्रथम बार निर्मित इस नवग्रहशांति जिनमंदिर में नवग्रह अरिष्ट निवारक नव तीर्थंकरों की धातु निर्मित सुन्दर प्रतिमाएँ विराजमान हैं, जिनके दर्शन-पूजन करके भक्तगण अपने ग्रहों की शांति करते हुए देखे जाते हैं।

१५. जम्बूद्वीप पुस्तकालय-प्राचीन हस्तलिखित एवं प्रकाशित लगभग १५००० ग्रंथों एवं पुस्तकों के संग्रह सहित।

१६. जम्बूद्वीप औषधालय

१७. ज्ञानमती कला मंदिरम्-हस्तिनापुर के पौराणिक इतिहास को प्रर्दिशत करने वाली झांकियों सहित।

१८. हीरक जयंती एक्सप्रेस-विशेष कृत्रिम रेल, जिसमें विभिन्न तीर्थंकर जन्मभूमियों का विविध झाँकियों एवं चित्रावली के माध्यम से मनमोहक प्रस्तुतीकरण किया गया है।

१९. वीर ज्ञानोदय ग्रंथमाला-१९७२ में संस्थापित इस ग्रंथमाला द्वारा अब तक लाखों की संख्या में लगभग ३०० ग्रंथों एवं पुस्तकों के संस्करणों का प्रकाशन हो चुका है।

२०. सम्यग्ज्ञान मासिक पत्रिका-यह पत्रिका सन् १९७४ से लगातार प्रकाशित हो रही है, जिसमें जैन शास्त्रों के साररूप लेखों एवं अन्य महत्वपूर्ण कार्यक्रमों का संकलन एक स्थान पर प्राप्त होता है।

२१. राजा श्रेयांस भोजनशाला-आने वाले दर्शर्नािथयों को प्रतिदिन शुद्ध (जैनचर्या के अनुरूप) भोजन उपलब्ध कराने वाला यह दिगम्बर जैन समाज का प्रथम भोजनालय है, जहाँ एक साथ ५०० लोग बैठकर भोजन कर सकते हैं।

२२. धर्मशालाएं-२०० से अधिक फ्लैट, बंगले इत्यादि, जिनमें ठहरने संबंधी सभी आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं।

२३. मनोरंजन के साधन-तरह-तरह के झूले, बच्चों की रेल, हँसी के गोलगप्पे, नौका विहार, फौव्वारे, हरे-भरे लॉन, पूरे कैम्पस में घूमने के लिए ऐरावत हाथी (मोटर से संचालित), बिजली की आकर्षक व्यवस्था, सुन्दर प्राकृतिक दृश्य इत्यादि बरबस ही दर्शर्नािथयों को इस भव्य रचना की तुलना ‘स्वर्ग’ से करने के लिए प्रेरित करते हैं।

दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान द्वारा आयोजित सामाजिक एवं शैक्षणिक कार्यक्रम</center>==

अक्टूबर १९८१-जम्बूद्वीप (हस्तिनापुर) स्थल पर ’जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति सेमिनार’।

३१ अक्टूबर १९८२-फिक्की ऑडिटोरियम-दिल्ली में ‘जम्बूद्वीप सेमिनार’ जिसका उद्घाटन श्री राजीव गांधी, तत्कालीन संसद सदस्य द्वारा किया गया।

अप्रैल १९८५-जम्बूद्वीप (हस्तिनापुर) स्थल पर ‘जैन गणित और त्रिलोक विज्ञान’ विषय पर अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार, जिसका उद्घाटन उ.प्र. के तत्कालीन मंत्री प्रोफैसर वासुदेव िंसह द्वारा किया गया।

जून १९८२ से अप्रैल १९८५-लालकिला मैदान, दिल्ली से तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरागांधी द्वारा ४ जून, १९८२ को पूरे देश में भ्रमण करने हेतु ‘जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति’ रथ का उद्घाटन किया गया। जनसाधारण में अिंहसा, चारित्र-निर्माण तथा विश्व बन्धुत्व के संदेश का प्रचार-प्रसार करते हुए १०४५ दिन तक देश भर में भ्रमण करने के पश्चात् यह ज्ञान ज्योति तत्कालीन रक्षामंत्री श्री पी.वी. नरसिम्हा राव (भूतपूर्व प्रधानमंत्री) द्वारा जम्बूद्वीप के मुख्य द्वार के समक्ष सदैव के लिए स्थापित कर दी गई।

१९९२-‘अंतर्राज्यीय चरित्र निर्माण संगोष्ठी’ का जंबूद्वीप स्थल पर श्री नेमीचंद जैन, विधायक (मध्यप्रदेश) की अध्यक्षता में आयोजन किया गया।

‘जैन गणित’ एवं ‘चारित्र निर्माण’ आदि विषयों पर हुई संगोष्ठियाँ मेरठ विश्वविद्यालय एवं दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की गर्इं।

१९९३-अयोध्या में अवध विश्वविद्यालय-फैजाबाद के संयुक्त तत्वावधान में ’भारतीय संस्कृति के आद्य प्रणेता भगवान ऋषभदेव’ विषय पर संगोष्ठी।

अक्टूबर १९९५-मेरठ विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में पंचदिवसीय ‘गणिनी आर्यिका श्री ज्ञानमती साहित्य संगोष्ठी-९५’।

मार्च-अप्रैल १९९८-तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा ९ अप्रैल १९९८ को तालकटोरा स्टेडियम, दिल्ली से देश भर में भ्रमण करने हेतु ‘भगवान ऋषभदेव समवसरण श्रीविहार रथ’ का उद्घाटन। ३ वर्ष तक देशभर में तीर्थंकर भगवन्तों के सर्वोदयी सिद्धांतों एवं जैनधर्म की प्राचीनता का प्रचार-प्रसार करने के पश्चात् यह समवसरण इलाहाबाद उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश द्वारा तीर्थंकर ऋषभदेव तपस्थली प्रयाग तीर्थ (इलाहाबाद) में स्थापित कर दिया गया।

अक्टूबर १९९८-जम्बूद्वीप स्थल पर ‘राष्ट्रीय कुलपति सम्मेलन’, जिसका उद्घाटन किया गया-स्वर्गीय श्री राजेश पायलट (तत्कालीन संसद सदस्य द्वारा)।

फरवरी २०००-तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा ४ फरवरी २००० को लाल किला मैदान, दिल्ली में एक वर्ष तक चलने वाले ‘भगवान ऋषभदेव अंतर्राष्ट्रीय निर्वाण महामहोत्सव वर्ष’ का उद्घाटन किया गया।

इस युग में जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव पर १००८ संगोष्ठियों की शृंखला, भगवान ऋषभदेव र्कीितस्तंभों का निर्माण तथा अन्य अनेक सामाजिक एवं शैक्षणिक कार्यक्रम राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस वर्ष के अंतर्गत आयोजित किये गये ।

टोरण्टो, कनाडा, न्यूजर्सी आदि विदेश की भूमियों पर भी इन्हीं प्रेरणाओं के माध्यम से ४ फरवरी २००० को निर्वाण महामहोत्सव मनाया गया।

जून २०००-जम्बूद्वीप स्थल पर ११ जून २००० को ‘जैनधर्म की प्राचीनता’ विषय पर राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया गया।

फरवरी २००१-भगवान ऋषभदेव की दीक्षाभूमि-प्रयाग (इलाहाबाद) में ‘तीर्थंकर ऋषभदेव तपस्थली तीर्थ’ का नवनिर्माण। इस तीर्थ पर भगवान के दीक्षा कल्याणक के प्रतीकस्वरूप धातु के वटवृक्ष के नीचे ध्यान में लीन महायोगी ऋषभदेव की सवा पांच फुट उत्तुंग पिच्छी-कमण्डलु सहित खड्गासन प्रतिमा, केवलज्ञान कल्याणक के प्रतीकस्वरूप भगवान की चतुर्मुखी प्रतिमा सहित दिव्य समवसरण रचना तथा निर्वाण कल्याणक के प्रतीक स्वरूप ५१ फुट उत्तुंग ‘कैलाशपर्वत’ की भव्य रचना पर भगवान ऋषभदेव की १४ फुट उत्तुंग अत्यंत मनोहारी लालवर्णी पद्मासन प्रतिमा तथा तीन चौबीसी के प्रतीक स्वरूप ७२ जिन प्रतिमाएँ विराजमान हैं। ‘ऋषभदेव र्कीितस्तंभ’ भी स्थापित है। ४ से ८ फरवरी २००१ तक ‘भगवान ऋषभदेव पंचकल्याणक प्रतिष्ठा’ एवं १००८ महाकुंभों से कैलाशपर्वत पर प्रतिष्ठित भगवान ऋषभदेव का ‘महाकुंभमस्तकाभिषेक’ कार्यक्रम।

सन् २००३-२००४-भगवान महावीर की जन्मभूमि कुण्डलपुर (नालंदा) में ’नंद्यावर्त महल तीर्थ’ का निर्माण। भगवान महावीर मंदिर, भगवान ऋषभदेव मंदिर, नवग्रहशांति जिनमंदिर, त्रिकाल चौबीसी मंदिर और नंद्यावर्त महल (भगवान महावीर का जन्म महल) एवं उसमें स्थापित भगवान शांतिनाथ जिनालय इस तीर्थ के मुख्य आकर्षण हैं। महावीर की जन्मभूमि के प्रचार-प्रसार हेतु भगवान महावीर ज्योति रथ सम्पूर्ण भारतवर्ष में प्रवर्तन कर चुका है।

सन् २००५-२००७-भगवान पार्श्वनाथ जन्मकल्याणक तृतीय सहस्राब्दि महोत्सव-६ जनवरी २००५ को जन्मभूमि वाराणसी से इसका भव्य उद्घाटन होकर पूरे एक वर्ष तक (२७ दिसम्बर २००५ तक) इसे विभिन्न आयोजनों के साथ मनाया गया।

पुन: सन् २००६ में पूज्य माताजी ने भगवान पार्श्वनाथ निर्वाणभूमि ‘‘सम्मेदशिखर वर्ष’’ घोषित किया तथा दिसम्बर २००७ में केवलज्ञान भूमि अहिच्छत्र तीर्थ पर भगवान पार्श्वनाथ सहस्राब्दि महोत्सव का राष्ट्रीय कार्यक्रम आयोजित करके ४ जनवरी २००८ को भगवान पार्श्वनाथ जन्मकल्याणक तृतीय सहस्राब्दि महोत्सव का समापन किया।

वर्तमान में जम्बूद्वीप स्थल पर भगवान शांतिनाथ, कुंथुनाथ एवं अरहनाथ की की ३१-३१ फुट उत्तुंग विशाल खड्गासन प्रतिमाओं का निर्माणकार्य ग्रेनाइट के पाषाण में चल रहा है।

विशेषरूप से इस संस्थान द्वारा २१ दिसम्बर २००८ को जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर में ‘विश्वशांति अहिंसा सम्मेलन’ का आयोजन किया गया, जिसका उद्घाटन पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ के सानिध्य में भारत गणतंत्र की राष्ट्रपति महामहिम श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटील के करकमलों द्वारा सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर राष्ट्रपति जी अपने पति डॉ. देवीसिंह शेखावत के साथ सम्मेलन में पधारीं। कार्यक्रम में उत्तरप्रदेश के राज्यपाल श्री टी.वी. राजेश्वर तथा स्वास्थ्य मंत्री श्री अनंत कुमार मिश्रा भी पधारे। इसी अवसर पर पूज्य माताजी द्वारा वर्ष २००९ को ‘‘शांति वर्ष’’ के रूप में मनाने की घोषणा की गई। यह ‘शांति वर्ष-२००९’ वर्तमान में समस्त जैन समाज द्वारा भारत के विभिन्न प्रान्तों में अनेक कार्यक्रमों के माध्यम से मनाया जा रहा है।

इस संस्थान के द्वारा समय-समय पर विविध पंचकल्याणक प्रतिष्ठाएं एवं र्धािमक कार्यक्रम सम्पन्न होते रहते हैं। संस्थान के अद्भुत कार्यकलाप की श्रेणी में है-णमोकार महामंत्र बैंक, जहाँ प्रतिवर्ष श्रद्धालु भक्तों द्वारा लाखों की संख्या में णमोकार मंत्र लिखकर जमा कराए जाते हैं, तुमकूर (कर्नाटक) से एक करोड़ मंत्र एवं उदयपुर (राज.) से एक करोड़ मंत्र सन् २००६ में इस बैंक में जमा हुए अत: उन्हें विशेष रूप से सम्मानित किया गया। करोड़ों महामंत्र विश्वशांति की किरणें प्रसारित करने में अतिशय धरोहरस्वरूप हैं।

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संस्थान द्वारा दिये जाने वाले पुरस्कार

गणिनी ज्ञानमती पुरस्कार-सन् १९९५ से प्रत्येक पाँच वर्ष में यह पुरस्कार जैन धर्म पर उच्चस्तरीय शोध तथा संस्थान की शैक्षणिक गतिविधियों में सहयोग हेतु किसी भी जैन विद्वान या समर्पित कार्यकर्ता को १,००,०००/- (एक लाख) रुपये की नगद राशि, प्रशास्त-पत्र इत्यादि के साथ प्रदान किया जाता था। अप्रैल २००६ में ‘‘गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी आर्यिका दीक्षा स्वर्ण जयंती महोत्सव’’ के अवसर पर संस्थान द्वारा प्रतिवर्ष इस पुरस्कार को देने का निर्णय लिया गया अत: अब यह पुरस्कार प्रतिवर्ष किसी वरिष्ठ विद्वान अथवा विशिष्ट समाजसेवी को प्रदान किया जाता है।

आर्यिका रत्नमती पुरस्कार-सन् १९९९ में स्थापित ११,०००/- रुपये की नगद राशि सहित प्रतिवर्ष प्रदान किया जाने वाला पुरस्कार।

जम्बूद्वीप पुरस्कार-सन् २००० में स्थापित २५,०००/- रुपये की नगद राशि सहित प्रतिवर्ष प्रदान किया जाने वाला पुरस्कार।

श्री छोटेलाल जैन पुरस्कार-सन् २००३ में स्थापित ११,०००/-रुपये की नगद राशि सहित प्रतिवर्ष प्रदान किया जाने वाला पुरस्कार।

नंद्यावर्त महल पुरस्कार-सन् २००४ से प्रारंभ २५०००/-रुपये की नगद राशि सहित प्रतिवर्ष प्रदान किया जाने वाला पुरस्कार।

उपरोक्त पुरस्कारों के अतिरिक्त ‘भगवान ऋषभदेव अंतर्राष्ट्रीय निर्वाण महोत्सव वर्ष’ के अवसर पर घोषित ‘भगवान ऋषभदेव नेशनल अवार्ड’ एवं ‘ब्राह्मी पुरस्कार’ भी संस्थान द्वारा प्रदान किया गया। भगवान ऋषभदेव नेशनल अवार्ड सन् २००३ में ‘कुण्डलपुर महोत्सव’ के अवसर पर तत्कालीन सांसद एवं पूर्व वित्त राज्य मंत्री श्री वी.धनंजय कुमार जैन को भगवान महावीर जन्मभूमि कुण्डलपुर (नालंदा) में प्रदान किया गया।

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इलाहाबाद-उ.प्र. में तीर्थंकर ऋषभदेव तपस्थली प्रयाग तीर्थ का निर्माण

सन् २००१ में संस्थान के अन्तर्गत भगवान ऋषभदेव दीक्षा एवं केवलज्ञानकल्याणक भूमि प्रयाग (उ.प्र.) में इस तीर्थ का निर्माण इलाहाबाद-बनारस हाइवे पर किया गया है। इस तीर्थ परिसर में ‘‘ऋषभदेव दीक्षाकल्याणक तपोवन’’ एवं समवसरण रचना मंदिर के साथ-साथ भगवान की निर्वाणभूमि के प्रतीक में विशाल कैलाशपर्वत का भी निर्माण हुआ। इसमें ७२ चैत्यालय हैं तथा पर्वत के नीचे गुफा मंदिर में भगवान ऋषभदेव की अतिशयकारी धातु प्रतिमा (सवा तीन फुट पद्मासन) विराजमान है। पर्वत के ईशान कोण में निर्मित ३१ फुट ऊँचे कीर्तिस्तंभ में ऋषभदेव-महावीर स्वामी की ८ प्रतिमाएँ हैं। क्षेत्र पर यात्रियों के आवास-भोजन आदि की सम्पूर्ण आधुनिक व्यवस्था उपलब्ध है। इस तीर्थ का संचालन संस्थान के अंतर्गत गठित उपसमिति के द्वारा किया जा रहा है।

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भगवान महावीर जन्मभूमि कुण्डलपुर तीर्थ का विकास

भगवान महावीर जन्मभूमि कुण्डलपुर (नालंदा-बिहार) का विकास करने हेतु संस्थान के अन्तर्गत भगवान महावीर जन्मभूमि कुण्डलपुर दिगम्बर जैन समिति नाम से एक उपसमिति बनाई गई, जिसके माध्यम से वहाँ ‘नंद्यावर्त महल’ तीर्थ परिसर का निर्माण किया गया। वहाँ नंद्यावर्त महल तीर्थ परिसर में भगवान शांतिनाथ चैत्यालय के अतिरिक्त विश्वशांति महावीर मंदिर, भगवान ऋषभदेव मंदिर, नवग्रहशांति मंदिर तथा तीन मंजिल का त्रिकाल चौबीसी मंदिर है। वहाँ यात्रियों के लिए आधुनिक सुविधायुक्त आवास एवं भोजन की समुचित व्यवस्था है।

उपरोक्त सभी निर्माण योजनाएं, सामाजिक, धार्मिक तथा शैक्षणिक कार्यक्रम पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की पावन प्रेरणा से उनके ससंघ सानिध्य में इस संस्थान द्वारा आयोजित किये गये हैं। संघस्थ प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी का मार्गदर्शन एवं पीठाधीश क्षुल्लकरत्न श्री मोतीसागर जी महाराज का निर्देशन इन समस्त कार्यों में अत्यन्त महत्वपूर्ण रहता है।

पूज्य माताजी की प्रेरणा से संस्थान के अन्तर्गत गठित ‘‘अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थंकर जन्मभूमि विकास कमेटी’’ द्वारा वर्तमान में भगवान पुष्पदंतनाथ की जन्मभूमि काकन्दी (निकट गोरखपुर-उ.प्र.) का विकासकार्य चल रहा है। इस प्रकार यह संस्थान अपनी विभिन्न सर्मिपत कार्य योजनाओं द्वारा समाज की सेवा में प्रतिक्षण संलग्न है। मानसिक शांति, आध्यााqत्मक विकास, प्राकृतिक सौन्दर्य एवं अन्य अनेक लाभ एक साथ प्राप्त करने हेतु यह संस्थान जंबूद्वीप दर्शन के लिए आपको सादर आमंत्रित करता है।