ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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014.षट्खण्डागम व्रत विधि

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षट्खण्डागम व्रत विधि

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-गणिनी ज्ञानमती

युग की आदि में भगवान ऋषभदेव ने अयोध्या में जन्म लिया। प्रजा को असि, मषि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प ऐसी षट् क्रियाओं का उपदेश देकर जीने की कला सिखाई, अनन्तर किसी समय वैराग्य को प्राप्त होकर इन्द्रों द्वारा लायी गई पालकी में बैठकर प्रयाग में वटवृक्ष के नीचे जैनेश्वरी दीक्षा लेकर एक हजार वर्ष के तपश्चरण के बाद प्रयाग में वटवृक्ष के नीचे दिव्य केवलज्ञान प्राप्त किया, भगवान की दिव्यध्वनि खिरी जो कि सात सौ अट्ठारह भाषाओं में प्रसिद्ध है। प्रभु ऋषभदेव के समवसरण में उन्हीं के तृतीय पुत्र ऋषभसेन प्रथम गणधर हुए हैं, प्रथम पुत्र सम्राट् भरत चक्रवर्ती मुख्य श्रोता थे तथा पुत्री ब्राह्मी आर्यिकाओं में प्रधान गणिनी थीं। तभी से द्वादशांगरूप श्रुत अवतरित हुआ है।

यद्यपि यह द्वादशांगश्रुत विदेहक्षेत्र की अपेक्षा अनादि अनंत है तथापि भरत-ऐरावत क्षेत्र में चतुर्थकाल में तीर्थंकरोें से अवतरित होने से सादि-सान्त भी है।

जब चतुर्थकाल में तीन वर्ष साढ़े आठ माह शेष थे, तभी अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी पावापुरी से कार्तिक कृष्णा अमावस्या को प्रात: प्रत्यूष बेला में निर्वाण को प्राप्त हुए हैं। उस दिन देवों ने निर्वाणकल्याणक महोत्सव मनाकर अगणित दीप प्रज्ज्वलित करके दीपमालिका पर्व मनाया है पुन: उसी दिन सायंकाल में श्री गौतम गणधर को केवलज्ञान प्राप्त हुआ है। आज यह वीर निर्वाण संवत् २५३४वाँ चल रहा है।

इससे पूर्व तीस वर्ष पहले भगवान महावीर को जृंभिका ग्राम के निकट ऋजुकूला नदी के किनारे दिव्य केवलज्ञान प्राप्त हुआ था। फिर भी भगवान की दिव्यध्वनि नहीं खिरी थी पुन: राजगृही में विपुलाचल पर्वत पर भगवान महावीर के समवसरण में युक्ति के द्वारा लाये गये गौतम गोत्रीय इन्द्रभूति ब्राह्मण ने भगवान के शिष्यत्व को स्वीकार कर मुनि बनकर गणधर पद प्राप्त किया था, उसी क्षण भगवान की दिव्यध्वनि खिरी थी वह श्रावण कृष्णा प्रतिपदा का दिवस था, जो कि प्रथम देशना के रूप में ‘‘वीर शासन जयंती पर्व’’ के नाम से प्रसिद्ध है। उसी दिन श्री गौतम स्वामी ने द्वादशांग की रचना की थी।

इसलिए भावश्रुत और अर्थपदों के कर्ता तीर्थंकर महावीर स्वामी हैं और श्रुत पर्याय से परिणत श्री गौतम स्वामी द्रव्यश्रुत के कर्ता हैं। इन प्रथम गणधर ने संपूर्ण श्रुतज्ञान लोहार्य महामुनि को दिया। इन्होंने श्री जम्बूस्वामी को दिया। परिपाटी के क्रम से ये तीनों ही सकलश्रुत के धारक हुए हैं। क्रम-क्रम से इन तीनों के मोक्ष प्राप्ति के बाद विष्णु, नंदिमित्र, अपराजित, गोवद्र्धन और भद्रबाहु ये पाँचों ही आचार्य परिपाटी से चौदह पूर्व के धारी श्रुतकेवली हुए हैं।

तदनंतर विशाखाचार्य, प्रोष्ठिल आदि ग्यारह महामुनि परिपाटी क्रम से ग्यारह अंग और दश पूर्वों के ज्ञाता तथा शेष चारों पूर्वों के एकदेश ज्ञाता हुए हैं।

इसके बाद नक्षत्राचार्य आदि पाँच आचार्य ग्यारह अंगों और चौदह पूर्वों के एकदेश धारी हुए हैं। तदनंतर श्रीसुभद्र यशोभद्र, यशोबाहु और लोहार्य ये चारों ही आचार्य संपूर्ण आचारांग के धारक और शेष अंग तथा पूर्वों के एकदेश के धारक हुए हैं।

इसके बाद सभी अंग और पूर्वों का एकदेश ज्ञान आचार्य परम्परा से श्रीधरसेनाचार्य को प्राप्त हुआ है।

सौराष्ट्र-गुजरात-कठियावाड़ देश के गिरिनगर के निकट ऊर्जयंत पर्वत की चन्द्रगुफा में रहने वाले, अष्टांग महानिमित्त के पारगामी प्रवचन वत्सल ये श्रीधरसेनाचार्य द्वितीय अग्राणयीय पूर्व की पंचम वस्तु के चतुर्थ महाकर्म प्रकृति प्राभृत के ज्ञाता थे।‘‘ऊर्जयंतगिरि की गुफा में’’ यह वर्णन इंद्रनंदिकृत श्रुतावतार में वर्णित है। यथा-

देशे तत: सुराष्ट्रे गिरिनगरपुरान्तिकोर्जयंतगिरौ।

चन्द्रगुहाविनिवासी महातपा: परममुनिमुख्या।।

इन धरसेनाचार्य को एक समय यह चिंता हुर्ई कि आगे इन अंग-पूर्व के अंश के ज्ञान का विच्छेद हो जावेगा अत: इस ज्ञान को किन्हीं योग्य शिष्यों को देना चाहिए। उन दिनों दक्षिण देश में वेणाक नदी के निकट जैन साधुओं का पंचवर्षीय महासम्मेलन था। वहाँ पत्र देकर एक ब्रह्मचारी को भेजा। वहाँ उपस्थित आचार्यों ने श्री धरसेनाचार्य द्वारा प्रेषित पत्र को पढ़कर श्री धरसेनाचार्य के अभिप्राय को समझकर अच्छी तरह निर्णय करके दो योग्य शिष्यों को भेजा। ये दोनों मुनिराज श्रीधरसेन गुरु के पास आये, विधिवत् गुरुवंदना आदि करके अपने आने का हेतु बताया। श्री आचार्यदेव ने इनकी यथायोग्य परीक्षा करके उन्हें शुभ मुहूर्त में अध्ययन कराना प्रारंभ किया और कुछ ही दिनोें में आषाढ़ शुक्ला एकादशी को ग्रंथ पूर्ण किया। तभी व्यंतर देवों ने आकर इन गुरु की और दोनों शिष्यों-मुनियों की भी विशेष पूजा की। इस देवों द्वारा की गई पूजा के अनंतर श्री आचार्यदेव ने एक मुनि का ‘पुष्पदंत’ एवं दूसरे मुनि का ‘भूतबलि’ नाम घोषित किया। इसके पूर्व इनके नाम ‘सुबुद्धि’ और ‘नरवाहन’ थे, ऐसा विवुधश्रीधर के श्रुतावतार में आया है।

पुन: गुरुदेव ने दोनों को वहाँ से विहार का आदेश दे दिया। ‘गुरु आज्ञा अलंघनीय होती है’ ऐसा सोचकर वे वहाँ से प्रस्थान कर अंकलेश्वर गुजरात में पहुँचे, वहाँ वर्षायोग धारण किया। अनंतर श्री पुष्पदंत मुनि ने बीस प्ररूपणा गर्भित सत्प्ररूपणा सूत्र १७७ सूत्रों को लिखकर अपने शिष्य जिनपालित को पढ़ाकर पुन: उन सूत्रों को देकर जिनपालित मुनि को श्री भूतबलि महामुनि के पास भेजा।

श्री पुष्पदंताचार्य भी अल्पायु हैं, ऐसा जानकर एवं उन सत्प्ररूपणा सूत्रों को देखकर अति प्रसन्न होकर श्री भूतबलि आचार्य ने ‘‘महाकर्म प्रकृति प्राभृत’’ का विच्छेद न हो, इस भावना से आगे ‘द्रव्यप्रमाणानुगम’ को आदि लेकर ग्रंथ रचना प्रारंभ कर दी। अतएव इस खण्ड सिद्धांत की अपेक्षा श्री पुष्पदंत और भूतबलि आचार्य भी श्रुत के कर्ता कहे गये हैं।

जब यह षट्खण्डागम ग्रंथ सूत्ररूप में लिपिबद्ध होकर पूर्ण हुआ, तभी चतुर्विध संघ ने मिलकर बहुत ही महोत्सवपूर्वक श्रुत की महापूजा की थी। वह तिथि ज्येष्ठ शुक्ला पंचमी थी, जो कि आज भी जैनसमाज में श्रुतपंचमी के नाम से प्रसिद्ध है और सभी जैन बंधु-स्त्री, पुरुष भक्तिभाव से शास्त्रों की पूजा करते हैं।

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षट्खण्डागम व्रत

यह षट्खण्डागम ग्रंथ छह खण्डों में विभक्त है- १. जीवस्थान

२. क्षुद्रकबंध

३. बंधस्वामित्व विचय

४. वेदनाखण्ड

५. वर्गणाखण्ड और

६. महाबंध।

प्रारंभ के पाँच खण्डों पर श्रीवीरसेनाचार्यवर्य ने धवला टीका लिखी है तथा महाबंध ग्रंथराज पर ‘महाधवला’ नाम से टीका प्रसिद्ध है।

इससे पूर्व श्रीकुन्दकुन्ददेव आदि अनेक आचार्यों ने टीकाएँ लिखी हैं ऐसा ग्रंथों में ही उल्लेख है, आज वे टीकाएँ हमें उपलब्ध नहीं हो रही हैं। इन धवला टीका समन्वित पाँच खण्डों का हिन्दी अनुवाद सहित प्रकाशन सोलह ग्रंथों में छप चुका है।

इसी धवला टीका को आधार बना करके तथा इस टीका के ही कुछ सार अंशों को ग्रहण कर एवं अन्य ग्रंथों के भी आधार लेकर मैंने सिद्धान्त चिन्तामणि टीका नाम से संस्कृत टीका लिखी है पुन: उनके व्रत को करना प्रारंभ किया। आप सभी जिनागम भक्ति में ओतप्रोत भव्यों के लिए यह व्रत और उनके मंत्रों को यहाँ दिया जा रहा है।

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व्रत विधि एवं मंत्र

प्रथम जीवस्थान खण्ड के नव व्रत हैं, उनके नव मंत्र हैं- १. सत्प्ररूपणा

२. द्रव्यप्रमाणानुगम

३. क्षेत्रानुगम

४. स्पर्शनानुगम

५. कालानुगम

६. अन्तरानुगम

७. भावानुगम

८. अल्पबहुत्वानुगम और

९. नव चूलिका।

यह प्रथम खण्ड छह ग्रंथों-पुस्तकों में वर्णित है।

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द्वितीय खण्ड क्षुद्रकबंध के १३ व्रत हैं-

१. बंधकसत्त्वप्ररूपणा

२. स्वामित्वानुगम

३. एकजीवापेक्षयाकालानुगम

४. एक जीवापेक्षयान्तरानुगम

५. नानाजीवापेक्षया भंगविचयानुगम

६. द्रव्यप्रमाणानुगम

७. क्षेत्रानुगम

८. स्पर्शनानुगम

९. नाना जीवापेक्षया कालानुगम

१०. नाना जीवापेक्षयान्तरानुगम

११. भागाभागानुगम

१२. अल्पबहुत्वानुगम

१३. महादण्डक।

यह द्वितीय खण्ड केवल ७वें ग्रंथ में-सातवीं पुस्तक में वर्णित है।

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तृतीय खण्ड बंधस्वामित्वविचय के १५ व्रत हैं-

१. गुणस्थान संबंधि-बंधस्वामित्वविचय

२. गतिमार्गणासंबंधि बंधस्वामित्वविचय

३. इन्द्रियमार्गणा संबंधि बंधस्वामित्वविचय

४. कायमार्गणासंबंधि बंधस्वामित्वविचय

५. योगमार्गणासंबंधि बंधस्वामित्वविचय

६. वेदमार्गणासंबंधि बंधस्वामित्वविचय

७. कषायमार्गणासंबंधि बंधस्वामित्वविचय

८. ज्ञानमार्गणासंबंधि बंधस्वामित्वविचय

९. संयममार्गणासंबंधि बंधस्वामित्वविचय

१०. दर्शनमार्गणासंबंधि बंधस्वामित्वविचय

११. लेश्यामार्गणासंबंधि बंधस्वामित्वविचय

१२. भव्यत्वमार्गणासंबंधि बंधस्वामित्वविचय

१३. सम्यक्त्वमार्गणा-संबंधि बंधस्वामित्वविचय

१४. संज्ञिमार्गणासंबंधि बंधस्वामित्वविचय

१५. आहारमार्गणासंबंधि बंधस्वामित्वविचय।

यह तृतीय खण्ड भी ८वें ग्रंथ-पुस्तक में निबद्ध है।

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चतुर्थ वेदनाखण्ड के १७ व्रत हैं-

१. कृति अनुयोगद्वार

२. वेदना निक्षेपानुयोगद्वार

३. वेदनानयविभाषणता

४. वेदना नामविधान

५. वेदना द्रव्यविधान

६. वेदना क्षेत्रविधान

७. वेदना कालविधान

८. वेदना भावविधान

९. वेदना प्रत्ययविधान

१०. वेदना स्वामित्वविधान

११. वेदना वेदनाविधान

१२. वेदना गतिविधान

१३. वेदनानन्तर विधान

१४. वेदना सन्निकर्षविधान

१५. वेदना परिमाणविधान

१६. वेदना भागाभागविधान और

१७. वेदनाल्पबहुत्वानुयोगद्वार।

अग्रायणीय पूर्व की पंचम वस्तु के चतुर्थ प्राभृत का नाम कर्मप्रकृति है-जिनके कृति, वेदना, स्पर्श, कर्म, प्रकृति आदि २४ अनुयोगद्वार हैं। चतुर्थ खण्ड में ९, १०, ११ और १२ ये ४ ग्रंथ-पुस्तक हैं। नवमें ग्रंथ में मात्र कृत्यनुयोगद्वार का वर्णन है। १०, ११, १२वें ग्रंथ में वेदनानुयोगद्वार के १६ भेद विस्तार से वर्णित हैं।

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पंचम वर्गणा खण्ड के २२ व्रत हैं-

१. स्पर्शानुयोगद्वार

२. कर्मानुयोगद्वार

३. प्रकृति

४. बंधन

५. निबंधन

६. प्रक्रम

७. उपक्रम

८. उदय

९. मोक्ष

१०. संक्रम

११. लेश्या

१२. लेश्याकर्म

१३. लेश्यापरिणाम

१४. सातासात

१५. दीर्घ-ह्रस्व

१६. भवधारणीय

१७. पुद्गलात्त

१८. निधत्तानिधत्त

१९. निकाचितानिकाचित

२०. कर्मस्थिति

२१. पश्चिमस्कंध और

२२. अल्पबहुत्वानुयोगद्वार।

इस पंचमखण्ड में १३, १४, १५ और १६ इन चार ग्रंथों-पुस्तकों में स्पर्शानुयोगद्वार आदि २२ अनुयोगद्वार वर्णित हैं।

छठे खण्ड महाबंध का १ व्रत है-

१. महाबंध

कषायप्राभृत ग्रंथ का १ व्रत है-

१. कषायप्राभृत।

इस प्रकार ये व्रत ९±१३±१५±१७±२२±१±१·७८ हैं।

विधि-इन व्रतों को अष्टमी, चतुर्दशी आदि किन्हीं भी तिथि में कर सकते हैं। उत्तम विधि उपवास, मध्यम विधि अल्पाहार और जघन्य विधि एक बार शुद्ध भोजन करना है तथा आगे लिखे मंत्रों की जाप्य करना है। समुच्चय मंत्र तो प्रत्येक व्रत में जपना ही है पुन: एक-एक व्रत में १-१ मंत्रों का जाप्य करना है।

श्रावक-श्राविकाओं को प्रत्येक व्रतों के दिन श्रुतस्कंध यंत्र का अभिषेक करके षट्खण्डागम ग्रंथ की पूजा करना है।

इस व्रत को करने वाले श्रुतज्ञान की वृद्धि करके नियम से आगे भवों में श्रुतकेवली पद को प्राप्त करेंगे।

षट्खण्डागम व्रत के ७८ मंत्र

समुच्चय मंत्र

ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमजिनागमेभ्यो नम:।

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प्रथम खण्ड के ९ मंत्र

१. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य प्रथमखंडान्तर्गत-सप्तसप्त्यधिकशतसूत्रसमन्वित-सत्प्ररूपणानाम- जीवस्थानेभ्यो नम:।

२. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य प्रथमखंडान्तर्गत-द्विनवत्यधिकशतसूत्रसमन्वित-द्रव्यप्रमाणानुगमनाम- जीवस्थानेभ्यो नम:।

३. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य प्रथमखंडान्तर्गत-द्विनवतिसूत्रसमन्वित-क्षेत्रानुगमनामजीवस्थानेभ्यो नम:।

४. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य प्रथमखंडान्तर्गत-पंचाशीत्यधिकशतसूत्रसमन्वित-स्पर्शनानुगमनाम- जीवस्थानेभ्यो नम:।

५. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य प्रथमखंडान्तर्गत-द्विचत्वारिंशदधिकत्रिशतसूत्रसमन्वित-कालानुगम- नामजीवस्थानेभ्यो नम:।

६. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य प्रथमखंडान्तर्गत-सप्तनवत्यधिकत्रिशतसूत्रसमन्वित-अन्तरानुगम- नामजीवस्थानेभ्यो नम:।

७. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य प्रथमखंडान्तर्गत-त्रिनवतिसूत्रसमन्वित-भावानुगमनामजीवस्थानेभ्यो नम:।

८. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य प्रथमखंडान्तर्गत-द्वयशीत्यधिकत्रिशतसूत्रसमन्वित-अल्पबहुत्वानुगम- नामजीवस्थानेभ्यो नम:।

९. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य प्रथमखंडान्तर्गत-पञ्चदशाधिकपञ्चशतसूत्रसमन्वित-नवचूलिकानाम- जीवस्थानेभ्यो नम:।

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द्वितीय खण्ड के १३ मंत्र

१. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य द्वितीयखंडान्तर्गत-त्रिचत्वारिंशत्सूत्रसमन्वित-बन्धकसत्त्वप्ररूपणा- नामक्षुद्रक-बंधेभ्यो नम:।

२. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य द्वितीयखंडान्तर्गत-एकनवतिसूत्रसमन्वित-स्वामित्वानुगमनामक्षुद्रक-बंधेभ्यो नम:।

३. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य द्वितीयखंडान्तर्गत-षोडशोत्तरद्विशतसूत्रसमन्वित-एकजीवापेक्षाकालानुगम- नाम-क्षुद्रकबंधेभ्यो नम:।

४. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य द्वितीयखंडान्तर्गत-एकपंचाशदधिकशतसूत्रसमन्वित- एकजीवा-पेक्षान्तरानुगमनाम-क्षुद्रकबंधेभ्यो नम:।

५. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य द्वितीयखंडान्तर्गत-त्रयोविंशतिसूत्रसमन्वित-नानाजीवापेक्षाभंग-विचयानुगमनाम-क्षुद्रकबंधेभ्यो नम:।

६. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य द्वितीयखंडान्तर्गत-एकसप्तत्यधिकशतसूत्रसमन्वित-द्रव्यप्रमाणानुगम- नाम-क्षुद्रकबंधेभ्यो नम:।

७. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य द्वितीयखंडान्तर्गत-चतुर्विंशत्यधिकशतसूत्रसमन्वित-क्षेत्रानुगमनाम-क्षुद्रकबंधेभ्यो नम:।

८. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य द्वितीयखंडान्तर्गत-एकोनाशीत्यधिकद्विशतसूत्रसमन्वित-स्पर्शनानुगम- नाम-क्षुद्रकबंधेभ्यो नम:।

९. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य द्वितीयखंडान्तर्गत-पंचपंचाशतसूत्रसमन्वित-नानाजीवापेक्षाकालानुगम- नाम-क्षुद्रकबंधेभ्यो नम:।

१०. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य द्वितीयखंडान्तर्गत-अष्टषष्टिसूत्रसमन्वित-नानाजीवापेक्षान्तरानुगम- नाम-क्षुद्रकबंधेभ्यो नम:।

११. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य द्वितीयखंडान्तर्गत-अष्टाशीतिसूत्रसमन्वित-भागाभागानुगमनाम- क्षुद्रकबंधेभ्यो नम:।

१२. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य द्वितीयखंडान्तर्गत-षडुत्तरद्विशतसूत्रसमन्वित-अल्पबहुत्वानुगमनाम- क्षुद्रकबंधेभ्यो नम:।

१३. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य द्वितीयखंडान्तर्गत-एकोनाशीतिसूत्रसमन्वित-महादण्डकनाम- क्षुद्रकबंधेभ्यो नम:।

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तृतीय खण्ड के १५ मंत्र

१. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य तृतीयखण्डान्तर्गत-द्विचत्वारिंशत्सूत्रसमन्वित-गुणस्थानसंबंधि-बंधस्वामित्वविचयेभ्यो नम:।

२. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य तृतीयखण्डान्तर्गत-एकोनषष्टिसूत्रसमन्वित-गतिमार्गणासंबंधि- बंधस्वामित्वविचयेभ्यो नम:।

३. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य तृतीयखण्डान्तर्गत-पंचत्रिंशत्सूत्रसमन्वित-इन्द्रियमार्गणासंबंधि- बंधस्वामित्वविचयेभ्यो नम:।

४. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य तृतीयखण्डान्तर्गत-त्रिसूत्रसमन्वित-कायमार्गणासंबंधिबंधस्वामित्व-विचयेभ्यो नम:।

५. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य तृतीयखण्डान्तर्गत-एकोनत्रिंशत्सूत्रसमन्वित-योगमार्गणासंबंधि- बंधस्वामित्वविचयेभ्यो नम:।

६. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य तृतीयखण्डान्तर्गत-एकोनविंशतिसूत्रसमन्वित-वेदमार्गणासंबंधि- बंधस्वामित्वविचयेभ्यो नम:।

७. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य तृतीयखण्डान्तर्गत-एकोनविंशतिसूत्रसमन्वित-कषायमार्गणासंबंधि- बंधस्वामित्वविचयेभ्यो नम:।

८. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य तृतीयखण्डान्तर्गत-अष्टादशसूत्रसमन्वित-ज्ञानमार्गणासंबंधिबंधस्वामित्व-विचयेभ्यो नम:।

९. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य तृतीयखण्डान्तर्गत-अष्टाविंशतिसूत्रसमन्वित-संयममार्गणासंबंधि- बंधस्वामित्वविचयेभ्यो नम:।

१०. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य तृतीयखण्डान्तर्गत-पंचसूत्रसमन्वित-दर्शनमार्गणासंंबंधिबंधस्वामित्व-विचयेभ्यो नम:।

११. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य तृतीयखण्डान्तर्गत-सप्तदशसूत्रसमन्वित-लेश्यामार्गणासंबंधि- बंधस्वामित्वविचयेभ्यो नम:।

१२. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य तृतीयखण्डान्तर्गत-त्रिसूत्रसमन्वित-भव्यत्वमार्गणासंबंधिबंधस्वामित्व-विचयेभ्यो नम:।

१३. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य तृतीयखण्डान्तर्गत-द्विचत्वारिंशत्सूत्रसमन्वित-सम्यक्त्वमार्गणासंबंधि- बंधस्वामित्वविचयेभ्यो नम:।

१४. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य तृतीयखण्डान्तर्गत-त्रिसूत्रसमन्वित-संज्ञिमार्गणासंबंधिबंधस्वामित्व-विचयेभ्यो नम:।

१५. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य तृतीयखण्डान्तर्गत-द्विसूत्रसमन्विताहारमार्गणासंबंधिबंधस्वामित्व-विचयेभ्यो नम:।

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चतुर्थ खण्ड के १७ मंत्र

कृतिअनुयोगद्वार का १ मंत्र

१. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य चतुर्थखण्डान्तर्गत-णमोजिणाणमित्यादिगणधरमंत्रयुत सप्तभेदसहित षट्सप्ततिसूत्रसमन्वित कृति-अनुयोगद्वारनामवेदनाखण्डेभ्यो नम:।

वेदना के १६ भेद के १६ मंत्र

२. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य चतुर्थखण्डान्तर्गत-त्रिसूत्रसमन्वित-वेदनानिक्षेपानुयोगद्वारनामवेदना-खण्डेभ्यो नम:।

३. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य चतुर्थखण्डान्तर्गत-चतुस्सूत्रसमन्वित-वेदनानयविभाषणतानुयोगद्वार- नामवेदनाखण्डेभ्यो नम:।

४. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य चतुर्थखण्डान्तर्गत-चतु:सूत्रसमन्वित-वेदनानामविधानानुयोगद्वारनाम- वेदनाखण्डेभ्यो नम:।

५. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य चतुर्थखण्डान्तर्गत-चूलिकासमेतत्रयोदशोत्तरद्विशतसूत्रसमन्वित-वेदनाद्रव्य-विधानानुयोगद्वारनामवेदनाखण्डेभ्यो नम:।

६. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य चतुर्थखण्डान्तर्गत-नवनवतिसूत्रसमन्वित-वेदनाक्षेत्रविधानानुयोगद्वार- नामवेदनाखण्डेभ्यो नम:।

७. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य चतुर्थखण्डान्तर्गत-द्वयचूलिकासमेत-एकोनाशीत्यधिक द्विशतसूत्रसमन्वित-वेदनाकालविधानानुयोगद्वारनामवेदनाखण्डेभ्यो नम:।

८. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य चतुर्थखण्डान्तर्गत-त्रिचूलिकासमेत-चतुर्दशोत्तरत्रिशत्सूत्रसमन्वित- वेदनाभावविधानानुयोगद्वारनामवेदनाखण्डेभ्यो नम:।

९. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य चतुर्थखण्डान्तर्गत-षोडशसूत्रसमन्वित-वेदनाप्रत्ययविधानानुयोगद्वार-नामवेदनाखण्डेभ्यो नम:।

१०. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य चतुर्थखण्डान्तर्गत-पंचदशसूत्रसमन्वित-वेदनास्वामित्वविधानानुयोगद्वार- नामवेदनाखण्डेभ्यो नम:।

११. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य चतुर्थखण्डान्तर्गत-अष्टपंचाशत्सूत्रसमन्वित-वेदनावेदनाविधानानुयोगद्वार- नामवेदनाखण्डेभ्यो नम:।

१२. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य चतुर्थखण्डान्तर्गत-द्वादशसूत्रसमन्वित-वेदनागतिविधानानुयोगद्वार- नामवेदनाखण्डेभ्यो नम:।

१३. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य चतुर्थखण्डान्तर्गत-एकादशसूत्रसमन्वित-वेदनानन्तरविधानानुयोेगद्वार- नामवेदनाखण्डेभ्यो नम:।

१४. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य चतुर्थखण्डान्तर्गत-विंशत्युत्तरत्रिशतसूत्रसमन्वित-वेदनासन्निकर्ष- विधानानुयोगद्वारनामवेदनाखण्डेभ्यो नम:।

१५. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य चतुर्थखण्डान्तर्गत-त्रिपंचाशत्सूत्रसमन्वित-वेदनापरिमाण-विधानानुयोगद्वारनामवेदनाखण्डेभ्यो नम:।

१६. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य चतुर्थखण्डान्तर्गत-एकविंशतिसूत्रसमन्वित-वेदनाभागाभागविधानानुयोगद्वार- नामवेदनाखण्डेभ्यो नम:।

१७. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य चतुर्थखण्डान्तर्गत-सप्तविंशतिसूत्रसमन्वित-वेदनाल्पबहुत्वानुयोगद्वार- नामवेदनाखण्डेभ्यो नम:।

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पाँचवें खण्ड के २२ मंत्र

१. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य पंचमखण्डान्तर्गत-त्रयस्त्रिंशत्सूत्रसमन्वित-स्पर्शानुयोगद्वारनामवर्गणा-खण्डेभ्यो नम:।

२. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य पंचमखण्डान्तर्गत-एकत्रिंशत्सूत्रसमन्वित-कर्मानुयोगद्वारनामवर्गणा-खण्डेभ्यो नम:।

३. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य पंचमखण्डान्तर्गत-द्विचत्वारिंशदधिकशतसूत्रसमन्वित-प्रकृत्यनुयोगद्वार- नामवर्गणाखण्डेभ्यो नम:।

४. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य पंचमखण्डान्तर्गत-चूलिकायुत बंध-बंधक-बंधनीयसमेत-सप्तनवत्यधिक-सप्तशतसूत्रसमन्वित-बंधनानुयोगद्वारनामवर्गणाखण्डेभ्यो नम:।

५. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य पंचमखण्डान्तर्गत-विंशतिसूत्रसमन्वित-निबंधनानुयोगद्वारनामवर्गणा-खण्डेभ्यो नम:।

६. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य पंचमखण्डान्तर्गत-प्रक्रमानुयोगद्वारनामवर्गणाखण्डेभ्यो नम:।

७. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य पंचमखण्डान्तर्गत-उपक्रमानुयोगद्वारनामवर्गणाखण्डेभ्यो नम:।

८. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य पंचमखण्डान्तर्गत-उदयानुयोगद्वारनामवर्गणाखण्डेभ्यो नम:।

९. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य पंचमखण्डान्तर्गत-मोक्षानुयोगद्वारनामवर्गणाखण्डेभ्यो नम:।

१०. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य पंचमखण्डान्तर्गत-संक्रमानुयोगद्वारनामवर्गणाखण्डेभ्यो नम:।

११. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य पंचमखण्डान्तर्गत-लेश्यानुयोगद्वारनामवर्गणाखण्डेभ्यो नम:।

१२. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य पंचमखण्डान्तर्गत-लेश्याकर्मानुयोगद्वारनामवर्गणाखण्डेभ्यो नम:।

१३. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य पंचमखण्डान्तर्गत-लेश्यापरिणामानुयोगद्वारनामवर्गणाखण्डेभ्यो नम:।

१४. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य पंचमखण्डान्तर्गत-सातासातानुयोगद्वारनामवर्गणाखण्डेभ्यो नम:।

१५. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य पंचमखण्डान्तर्गत-दीर्घह्रस्वानुयोगद्वारनामवर्गणाखण्डेभ्यो नम:।

१६. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य पंचमखण्डान्तर्गत-भवधारणीयानुयोगद्वारनामवर्गणाखण्डेभ्यो नम:।

१७. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य पंचमखण्डान्तर्गत-पुद्गलात्तानुयोगद्वारनामवर्गणाखण्डेभ्यो नम:।

१८. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य पंचमखण्डान्तर्गत-निधत्तानिधत्तानुयोगद्वारनामवर्गणाखण्डेभ्यो नम:।

१९. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य पंचमखण्डान्तर्गत-निकाचितानिकाचितानुयोगद्वारनामवर्गणाखण्डेभ्यो नम:।

२०. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य पंचमखण्डान्तर्गत-कर्मस्थित्यनुयोगद्वारनामवर्गणाखण्डेभ्यो नम:।

२१. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य पंचमखण्डान्तर्गत-पश्चिमस्कन्धानुयोगद्वारनामवर्गणाखण्डेभ्यो नम:।

२२. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य पंचमखण्डान्तर्गत-अल्पबहुत्वानुयोगद्वारनामवर्गणाखण्डेभ्यो नम:।

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छठे महाबंध नाम षट्खण्डागम का मंत्र-

१. ॐ ह्रीं अर्हं षट्खण्डागमस्य षष्ठखण्डान्तर्गत-चत्वारिंशत्सहस्रसूत्रसमन्वित-महाबन्धेभ्यो नम:।

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कषायप्राभृत ग्रंथ का मंत्र-'

१. ॐ ह्रीं अर्हं चूर्णिसूत्रसमन्वितत्र्यशीतिगाथासूत्रस्वरूप-कषायप्राभृतेभ्यो नम:।।