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ॐ ह्रीं शनिग्रहारिष्टशांतिकराय श्री मुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्राय नम:।

017.श्री षट्खण्डागम ग्रंथराज की मंगल आरती

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श्री षट्खण्डागम ग्रंथराज की मंगल आरती

रचयित्री-ब्र. कु. सारिका जैन (संघस्थ)
तर्ज-चाँद मेरे आ जा रे...............

आज हम आरति करते हैं-२
षट्खण्डागम ग्रंथराज की, आरति करते हैं।।
महावीर प्रभू के शासन का, ग्रंथ प्रथम कहलाया।
उनकी वाणी सुन गौतम, गणधर ने सबको बताया।।
आज हम आरति करते हैं-२
वीरप्रभू के परम शिष्य की, आरति करते हैं।।१।।

क्रम परम्परा से यह श्रुत, धरसेनाचार्य ने पाया।
निज आयु अल्प समझी तब, दो शिष्यों को बुलवाया।।
आज हम आरति करते हैं-२
श्री धरसेनाचार्य प्रवर की, आरति करते हैं।।२।।

मुनि नरवाह नव सुबुद्धी, ने गुरु का मन जीता था।
देवों ने आ पूजा कर, उन नामकरण भी किया था।।
आज हम आरति करते हैं-२
पुष्पदंत अरु भूतबली की, आरति करते हैं।।३।।

श्री वीरसेन सूरी ने, इस ग्रंथराज के ऊपर।
धवला टीका रच करके, उपकार कर दिया जग पर।।
आज हम आरति करते हैं-२
वीरसेन आचार्य प्रवर की, आरति करते हैं।।४।।

गणिनी माँ ज्ञानमती ने, इस ग्रंथ की संस्कृत टीका।
लिखकर सिद्धान्तसुचिन्तामणि नाम दिया है उसका।।
आज हम आरति करते हैं-२
श्री सिद्धान्तसुचिन्तामणि की, आरति करते हैं।।५।।

चन्दनामती माताजी, माँ ज्ञानमती की शिष्या।
हिन्दी अनुवाद किया है, इस चिन्तामणि टीका का।।
आज हम आरति करते हैं-२
सरल-सरस टीका की ‘‘सारिका’’ आरति करते हैं।।६।।