ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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019.दिल्ली चातुर्मास, सन् १९७२-७३-७४

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दिल्ली चातुर्मास, सन् १९७२-७३-७४

समाहित विषयवस्तु

१. पहाड़ी धीरज-दिल्ली में प्रथम चातुर्मास सन् १९७२ में।

२. मोक्षशास्त्र पर मार्मिक प्रवचन।

३. जम्बूद्वीप निर्माण के लिए दि.जैन त्रिलोक शोध संस्थान की स्थापना।

४. वीर ज्ञानोदय ग्रंथमाला की स्थापना।

५. अष्टसहस्री का प्रकाशन।

६. मनोवती-मीनाबाई की आर्यिका दीक्षा।

७. माताजी अस्वस्थ-आचार्य देशभूषण जी महाराज का आशीर्वाद।

८. आचार्यकल्प श्रुतसागर जी का आशीर्वाद।

९. सम्पूर्ण दिल्ली को पावन किया।

१०. माताजी का भोजन अत्यंत सादा-नीरस।

११. नजफगढ़ दिल्ली में चातुर्मास।१९७३

१२. अनेक विधान सम्पन्न हुए।

१३. त्रिलोकभास्कर एवं न्यायसार ग्रंथों की रचना।

१४. त्रिभंगी संग्रह का अनुवाद।

१५. गाँधीनगर में प्रवास।

१६. सम्यग्ज्ञान मासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ।

१७. लाल मंदिर में चातुर्मास।१९७४

१८. २५०० वाँ निर्वाण महोत्सव में परामर्श।

१९. भगवान महावीर पर पुस्तक लेखन-भगवान महावीर कैसे बने?

२०. माताजी के १३ ग्रंथ प्रकाशित।

२१. बालविकास प्रथम भाग प्रकाशित।

२२. अष्टसहस्री का विमोचन।

२३. १४ ग्रंथों का विमोचन।

२४. हस्तिनापुर में महावीर जिनालय का पंचकल्याणक।

२५. हस्तिनापुर में मुनि-आर्यिका दीक्षाएँ।

२६. अनेक मुनिसंघों का मंगल सानिध्य।

२७. आचार्य श्री देशभूषण जी ने माताजी को आर्यिकारत्न, न्यायप्रभाकर उपाधियाँ दी।

२८. भगवान महावीर की सुंदरमूर्ति को नजर न लगे अत: गाल पर काजल लगाया।

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काव्य पद

नसीराबाद-अजमेर-गुड़गवाँ, हो दिल्ली की पूरी आस।

यहाँ पहाड़ी धीरज जाकर, किया स्थापित चातुर्मास।।
पर्व पर्यूषण के आने पर, दिये तत्त्वार्थसूत्र प्रवचन।
सरल, सारगर्भित, अतिमार्मिक, अतिशय हुए प्रभावित जन।।५८१।।

मोक्षशास्त्र है सागर गहरा, लिये गगन जैसा विस्तार।
समन्तभद्र-अकलंक देव से, पा ना पाये इसका पार।।
गागर में सागर लहराता, जिनदर्शन का तत्त्व-निचोड़।
आधार स्तम्भ वीरवाणी का, ग्रंथ स्वयं में है बेजोड़।।५८२।।

तत्त्वार्थ सूत्र जीवन अमृत है, जिसने इसका पान किया।
मानों उसने जैनागम के, सकल सार को जान लिया।।
सुख-दुख, जीवन-मरण द्वन्द्व में, समता को वह पालेगा।
राग-द्वेष का वर्जन करके, क्षमता को अपना लेगा।।५८३।।

सम्यग्दर्शन ताना इसका, बाना इसका सम्यग्ज्ञान।
चारित्र जुलाहा बुनने वाला, मोक्ष समझ लो वस्त्र समान।।
जो इसका पारायण करते, पाते फल निर्मल उपवास।
विषय-कषायों से मन हटता, पाप न आते उसके पास।।५८४।।

माताजी के प्रवचन सुनकर, वाह! वाह! की ध्वनि निकली।
जीवन बीता सुनते-सुनते, किन्तु न ऐसी बात मिली।।
जो पहले खाली रहते थे, अब उन कक्षों जगह नहीं।
अत: खड़े कक्ष के बाहर, श्रोता सुनते और कहीं।।५८५।।

अष्टसहस्री-त्रिलोकसार द्वय, हुए प्रकाशित चातुर्मास।
जम्बूद्वीपपण्णति अभिव्यक्ति, सरल रीति उपलब्धि खास।।
समयसार तत्त्वार्थ सूत्र पर, प्रवचन जो आया आनंद।
उसे रिकार्ड कर किया सुरक्षित, राजा टाइज कैलाशचंद।।५८६।।

जम्बूद्वीप रचना निर्माण हित, हुआ स्थापित इक संस्थान।
श्री दि.जैन त्रिलोक शोध का, दिया गया उसको शुभ नाम।।
उसके ही भीतर समाज ने, इक संस्था को शुरू किया।
वीर ज्ञानोदय ग्रंथमाला का, उसको उत्तम नाम दिया।।५८७।।

माताजी की दो शिष्याएँ, मनोवती-मीनाबाई।
संयम पथ पर आगे बढ़ने, उनकी काललब्धि आई।।
अत: प्रेरणा देकर उनको, माताजी तैयार किया।
आचार्यश्री देशभूषण ने, आर्यिका दीक्षा दान दिया।।५८८।।

ब्रह्मचारिणी मीनाबाई, हुर्इं आर्यिका यशोमती।
ब्रह्मचारिणी मनोवती जी, संज्ञा पाई संयममती।।
दोनों ही माताजी द्वारा, धार्मिक शिक्षा पाई है।
उनने ही गुरुभार सम्हाला, मोक्ष की राह दिखाई है।।५८९।।

माताजी का संघ छोटा-सा, दो मुनिश्री माताजी चार।
छै त्यागीजन साथ में चलकर, करें व्यवस्था संघ विहार।।
आचार्यश्री देशभूषण के, माताजी दर्शन पाये।
मन-मयूर ने किया महोत्सव, रोम-रोम थे हर्षाये।।५९०।।

माताजी अस्वस्थ हुर्इं, जब अशुभकर्म उदय आये।
आचार्यश्री देशभूषण जी, स्वयं वहाँ पर पधराये।।
आशीर्वाद दिया औ बोले, इनने बहु पुरुषार्थ किया।
अष्टसहस्री अनुवादन कर, अभूतपूर्व ही कार्य किया।।५९१।।

घर त्यागने समय आपने, जो झेला संघर्ष महान्।
पुरुषों से भी रहा असंभव, उसका साक्षी सकल जहान।।
स्वास्थ्य लाभ ये करें शीघ्र ही, मेरे हैं आशीष अनेक।
गद्गद मेरा हृदय हो रहा, अति सुयोग्य शिष्या को देख।।५९२।।

आचार्यकल्प श्री श्रुतसागर जी, माताजी प्रति कहे विचार।
ज्ञानमती तुम अद्भुत पारस, मेरे भावों के अनुसार।।
पारस तो लोहे को केवल, सोना मात्र बनाता है।
पर जो बनता शिष्य तुम्हारा, तुम से भी बढ़ जाता है।।५९३।।

चातुर्मास हुआ निष्ठापित, माताजी का हुआ विहार।
महानगर के जिनालयों जा, माता किया स्व-पर उपकार।।
जहाँ-जहाँ पधरातीं माता, हो जाते पावन वे क्षेत्र।
ज्ञानशलाका, जिनवच अंजन, खुल जाते अज्ञानी नेत्र।।५९४।।

सभी चाहते माताजी का, इसी मोहल्ले रहे प्रवास।
आहार दान का लाभ प्राप्त हो, प्रवचन पूरी हो अभिलाष।।
बालक-युवा-वृद्ध-नर-नारी, चरण पखारें बारम्बार।
करें आरती, गगन गुँजावें, माताजी की जय-जयकार।।५९५।।

एक मोहल्ला तृप्त न होता, दूजे की लगती बारी।
द्वार-अल्पना, गली सजावट, होने लगती तैयारी।।
जन-जन जोहे वाट इस तरह, जैसे चातक प्यास लगी।
कब माताजी यहाँ पधारें, अमृत बरसे घड़ी-घड़ी।।५९६।।

माताजी हैं बड़ी पारखी, रखती हैं सब ही का ज्ञान।
किसको कितनी प्यास लगी है, उनको रहता सबका ध्यान।।
उनके मन में लहराता है, करुणा सागर अपरम्पार।
आतमहित प्रामुख्य साथ में, करती रहतीं पर उपकार।।५९७।।

काजू-किशमिश-मावा-मिश्री, माताजी का सब कुछ त्याग।
लौकी-तोरई-दाल-चपाती, खुले रहे इनके ही भाग।।
रस-रसायन कुछ न लेतीं, लेतीं बस नीरस भोजन।
माताजी की भोजन चर्या, सस्ता-सुंदर आयोजन।।५९८।।

आहारदान देना माताजी, लेकिन ये है टेढ़ी खीर।
सज्जातित्त्व, शुद्धजल ग्राही, की ही खुलती है तकदीर।।
इसके बिना पूछ न होती, कैसा भी होवे धनवान।
इनसे युक्त सभी नर-नारी, कर सकते हैं आहारदान।।५९९।।

दिल्ली तो भारत का दिल है, माताजी ने जीत लिया।
उपकृत करने सकल जनों को, सादर वर्ष व्यतीत किया।।
समय बीतते देर न लगती, फिर आ पहुँचा चातुर्मास।
तथा नजफगढ़ दिल्ली में ही, माताजी ने किया प्रवास।६००।।

चातुर्मास हुआ स्थापित, हुए कार्यक्रम तदा अनेक।
विधान बहुत से हुये हैं उनमें, तीनलोक विधान है एक।।
हुई प्रभावना अति ही इनसे, तीन लोक का पाया ज्ञान।
माताजी ने यहाँ सिखाया, करना तीन लोक का ध्यान।।६०१।।

त्रिलोकभास्कर, न्यायसार आपने, महाग्रंथ दो रचे यहाँ।
आस्रव-भाव-त्रिभंगी-संग्रह, का अनुवादन किया यहाँ।।
हो कृपालु शिष्यों के ऊपर, कातंत्र व्याकरण किया अनुवाद।
सदा रहीं ज्ञानार्जन तत्पर, किया न माँ ने कभी प्रमाद।।६०२।।

चातुर्मास अनंतर माँ ने, गाँधीनगर में किया विहार।
प्रभु पूजन का पाठ पढ़ाकर, माँ ने किया जगत् उपकार।।
श्री प्रकाश हितैषी शास्त्री, सम्पादक सन्मति-संदेश।
लेते भाग तत्त्व चर्चा में, सुनते माता के उपदेश।।६०३।।

नयी योजना मंगलकारी, हुई क्रियान्वित परमपवित्र।
त्रिलोक शोध संस्थान निकाला, सम्यग्ज्ञान नाम का पत्र।।
माताजी के आदेशों का, जन-जन करता इससे पान।
चतुरनुयोगी ज्ञान से भरा, प्रत्युपयोगी सम्यग्ज्ञान।।६०४।।

माताजी ने निज चर्या से, सबको यह उपदेश दिया।
दृढ़तापूर्वक नियम संभालो, मैंने हरदम यही किया।।
साधक अगर ठान ले मन मेें, कोई नहीं कठिन है काम।
नियम सफलतापूर्वक पलता, मिल जाते हैं योग तमाम।।६०५।।

दिल्ली-दिल में समा गर्इं माँ, दिल से बाहर जा न सकीं।
सन् चौहत्तर चतुर्मास में, लाल जिनालय रुकी रहीं।।
दिल्ली का दिल बहुत बड़ा है, रही देश की रजधानी।
धर्म-देशभूषण-विद्या की, दिल्ली ने की अगवानी।।६०६।।

सन् चौहत्तर वर्ष महत्तम, छाया अखिल विश्व में हर्ष।
वीरप्रभू निर्वाण को बीते, दो हजार पाँच सौ वर्ष।।
एतदर्थ उत्सव आयोजन, अखिल विश्व में है होना।
धर्म अहिंसा जयकारों से, गूँज उठा कोना-कोना।।६०७।।

महा-महोत्सव आयोजन में, चलता सदा विचार-विमर्श।
माताजी की उपस्थिती से, उसमें आ जाता उत्कर्ष।।
विद्यानंद-देशभूषण जी, सादर इन्हें बुलाते थे।
माताजी के परामर्श से, कार्य श्रेष्ठता पाते थे।।६०८।।

लाल जिनालय में माताजी, प्रवचन करतीं प्रात:काल।
धर्मामृत की वर्षा होती, सुनकर श्रोता होंय निहाल।।
प्रवचन रहते अति ही सुंदर, प्रामाणिक प्रभाव भरे।
लालायित हो श्रोताओं ने, उनके टेप-रिकार्ड करे।।६०९।।

रहे वहाँ पर घोर अंधेरा, होता नहीं जहाँ आदित्य।
मुर्दा है वह जाति कि जिसका, होता नहिं उत्तम साहित्य।।
इस अवसर पर माताजी ने, महावीर पर लिखी किताब।
मौलिक-उत्तम-जगहितकारी, महावीर चमके सरताज।।६१०।।

महावीर कैसे बने यह, था पुस्तक का नाम रखा।
प्राणिमात्र पर करुणा करना, महावीर का काम रहा।।
पच्चीस हजार पुस्तके छापी, एक हफ्ते में बिकी सभी।
दस हजार और छपवायीं, एक माह बिक गर्इं सभी।।६११।।

मिले राम को तुलसी जैसे, महावीर को तथा कवी।
मिल जाता तो महावीर से, परिचित होता जगत सभी।।
माताजी की इस किताब ने, उसी कमी को पूर्ण किया।
माँ ने अच्छी तरह बताया, जीवन जो महावीर जिया।।६१२।।

पूज्य आर्यिका ज्ञानमतीजी, किया सतत ज्ञान अभ्यास।
हुये त्रयोदश ग्रंथ प्रकाशित, रहा विशिष्ट यह चातुर्मास।।
बालविकास का प्रथम भाग भी, हुआ प्रकाशित इस ही काल।
माताजी के सु-प्रयास से, हुआ जाति का उन्नत भाल।।६१३।।

अष्टसहस्री ग्रंथराज की, माताजी ने टीका की।।।
कष्टसहस्री लौहचना को,बना दिया मक्खन-मिस्री
नीरसता को माताजी ने, सरल-सरसता रूप दिया।
हिन्दी में अनुवादन करके, जन-जन महदुपकार किया।।६१४।।

अष्टसहस्री ग्रंथत्रयोदश, सबका हुआ विमोचन है।
एतदर्थ इक समारोह का, हुआ बृहद् आयोजन है।।
जैन समाज के सकल साधुगण, का सान्निध्य मिला पावन।
साहु शांतिप्रसाद सदृश बहु, गणमान्य पधारे आयोजन।।६१५।।

आठ दिसम्बर सन् चौहत्तर, हुर्इं अनके विध दीक्षाएँ।
मनुज विरागी हुए मुनीवर, नारी बनीं आर्यिकाएँ।।
पूज्य आर्यिका ज्ञानमती ने, केशलुंच सहयोग दिया।
आचार्यश्री धर्मसागर ने, सब दीक्षा संस्कार किया।।६१६।।

इस अवसर पर विराजमान थे, देश-धर्म-विद्या बहु संघ।
लालबहादुर, हीरालाल जी, दिये सुष्ठु वक्तव्य प्रसंग।।
आचार्यश्री देशभूषण ने, विद्यानंद मुनिराज श्री।
उपाध्याय किया विभूषित, नव मयूर पिच्छिका दी।।६१७।।

आचार्य श्री देशभूषण ने, पूज्य आर्यिका ज्ञानमती।
आर्यिका रत्न, न्यायप्रभाकर, महत् पदेन समलंकृत की।।
गुरुवर ने गौरव पद देकर, निज वात्सल्य प्रदान किया।
नूतन पिच्छी, शास्त्र आदि दे, शिष्या को सम्मान दिया।।६१८।।

चातुर्मास हुआ निष्ठापित, संघ धर्मनिधि गमन हुआ।
पूज्य आर्यिका ज्ञानमती सह, हस्तिनापुर आगमन हुआ।।
उपाध्याय श्री विद्यानंद भी, हस्तिनापुर पधराये हैं।
क्षेत्र पुरातन, ऐतिहासिक में, जीवन्त तीर्थ बहु आये हैं।।६१९।।

बाहुबली जी बड़े जिनालय, महावीर जलमंदिर के।
फरवरी में पंचकल्याणक, तीर्थक्षेत्र हस्तिनापुर के।।
तभी क्षेत्र नव जम्बूद्वीप में, उसी पंचकल्याणक संग।
हुई प्रतिष्ठा महावीर जिन, खड्गासन अवगाहन तुंग।।६२०।।

महावीर जिनवर की मूरत, अतिशय प्यारी-प्यारी है।
कलाकार ने मनोयोग से, बांकी छवी उतारी है।।
नजर नहीं लग जाय किसी की, सब भग जाए अलाबला।
विद्यानंद कर्पूर का काजल, दिया मूर्ति के गाल लगा।।६२१।।

मूर्तित्रयों के पंचकल्याणक, प्राणप्रतिष्ठा, धार्मिक कार्य।
सकल संघ की मंगल सन्निधि, होकर छाया हर्ष अपार।।
जैसे सरिता रुके न इक थल, अविरल चलना उसका काम।
साधु संघ भी चले यहाँ से, लेकर कुछ दिन अल्प विराम।।६२२।।