ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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02.गति मार्गणा अधिकार

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गति मार्गणा अधिकार

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अथ गतिमार्गणाधिकार:

ततश्च चतुर्भिः स्थलैरष्टत्रिंशत्सूत्रैः एकेन जीवेन कालानुगमे गतिमार्गणाधिकारः प्रारभ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले नरकगतौ नारकाणां कालप्रतिपादनत्वेन ‘‘एगजीवेण कालाणुगमेण’’ इत्यादिनवसूत्राणि। तदनु द्वितीयस्थले तिर्यग्गतौ तिरश्चां कालकथनत्वेन ‘‘तिरिक्खगदीए’’ इत्यादिना नवसूत्राणि। पुनश्च तृतीयस्थले मनुष्यगतौ मनुष्याणां चतुर्विधानामपि कालनिरूपणत्वेन ‘‘मणुसगदीए’’ इत्यादि षट्सूत्राणि। ततश्च चतुर्थस्थले देवगतौ देवानां चतुर्णिकायानां एकजीवापेक्षया कालप्ररूपणत्वेन ‘‘देवगदीए’’ इत्यादिचतु-र्दशसूत्राणि। इति समुदायपातनिका सूचिता भवति।
संप्रति गतिमार्गणायां नरकगतौ एकजीवापेक्षया कालप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
एगजीवेण कालाणुगमेण गदियाणुवादेण णिरयगदीए णेरइया केवचिरं कालादो होंति ?।।१।।
जहण्णेण दसवस्ससहस्साणि।।२।।
उक्कस्सेण तेत्तीसं सागरोवमाणि।।३।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थः सुगमोऽस्ति।
कश्चिदाह-अत्र गतिसामान्यापेक्षया प्ररूपणा किन्न कृता ?
तस्य समाधानं-चतुर्गतिप्ररूपणेनैव तदवगमात्। तिरश्चो वा मनुष्यस्य वा दशसहस्रवर्षायुःस्थितिकेषु नारकेषु उत्पद्य निर्गतस्य जीवस्य दशसहस्रवर्षमात्रस्थितिदर्शनात्। एवं सप्तम्याःपृथिव्याः त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमायुः-स्थितिं बध्वा तत्रोत्पद्य स्वकस्थितिं अनुभूय निर्गतस्य जीवस्य उत्कृष्टस्थितिर्भवति।
प्रथमपृथिव्यां नारकाणां कालप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
पढमाए पुढवीए णेरइया केवचिरं कालादो होंति ?।।४।।
जहण्णेण दसवाससहस्साणि।।५।।
उक्कस्सेण सागरोवमं।।६।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-‘केवचिरं’ शब्दः समय-क्षण-लव-मुहूर्त-दिवस-पक्ष-मास-ऋतु-अयन-संवत्सर-युग-पूर्व-पल्य-सागरोपमादीनि अपेक्षते।
प्रथमपृथिव्याः जघन्योत्कृष्टायुषी सीमन्तादित्रयोदशइन्द्रकविलेषु तत्रस्थश्रेणिबद्ध-प्रकीर्णकेषु किमेवं भवतः आहोस्वित् न भवतः ?
एतेषु सर्वेषु च इमे जघन्योत्कृष्टायुषी न भवतः, किंतु सर्वेषां विलानां मध्ये स्थितनारकाणां पृथक्- पृथक् एव । तद्यथा-
श्रेणिबध्द-प्रकीर्णकसहिते सीमन्तकनामप्रथमप्रस्तरे जघन्यायुःदशसहस्रवर्षप्रमाणं, उत्कृष्टं नवतिसह-स्रवर्षाणि। निरयनामद्वितीयप्रस्तरे समयाधिक-नवतिसहस्रवर्षाणि जघन्यमायुः, उत्कृष्टं पुनः नवतिलक्षवर्षाणि। रौरवनाम्नितृतीयप्रस्तरे समयाधिकनवतिलक्षवर्षाणि जघन्यमायुः, उत्कृष्टं असंख्यातपूर्वकोटिप्रमाणं। भ्रान्तनाम-चतुर्थप्रस्तरे जघन्यमायुः समयाधिकाः असंख्याताः पूर्वकोट्यः उत्कृष्टं सागरोपमस्य दशमभागः। अयं दशमांशः अग्रतनप्रस्तरेषु जघन्योत्कृष्टायुः प्राप्त्यर्थं ‘मुखं’ कथ्यते अल्पत्वात्, सागरोपमं भूमिः भवति बहुतरत्वात्।

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अथ गतिमार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब चार स्थलों में विभक्त अड़तीस सूत्रों के द्वारा एक जीव की अपेक्षा कालानुगम प्रकरण में गतिमार्गणा अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में नरकगति के नारकियों का काल प्रतिपादन करने वाले ‘‘एगजीवेण कालाणुगमेण’’ इत्यादि नौ सूत्र हैं। पुन: द्वितीय स्थल में तिर्यञ्चगति में तिर्यञ्चों का काल कथन करने वाले ‘‘तिरिक्खगदीए’’ इत्यादि नौ सूत्र हैं। पुन: तृतीय स्थल में मनुष्यगति में चारों प्रकार के मनुष्यों का काल कथन करने हेतु ‘‘मणुसगदीए’’ इत्यादि छह सूत्र हैं। उसके पश्चात् चतुर्थ स्थल में देवगति में चारों निकाय के देवों का एक जीव की अपेक्षा काल कथन करने हेतु ‘‘देवगदीए’’ इत्यादि चौदह सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका सूचित की गई है।

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अब गतिमार्गणा में नरकगति में एक जीव की अपेक्षा काल बतलाने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

एक जीव की अपेक्षा कालानुगम से गतिमार्गणा के अनुवाद से नरकगति में नारकी कितने काल तक रहते हैं ?।।१।।'

नारकी जीव जघन्य से दस हजार वर्ष तक नरकगति में रहते हैं।।२।।'

उत्कृष्ट से तेंतीस सागरोपम काल तक नरक में रहते हैं।।३।।'

सिद्धान्तचिंतामणिटीका'तीनों सूत्रों का अर्थ सुगम है।

यहाँ कोई शंका करता है कि-गति सामान्य की अपेक्षा यहाँ प्ररूपणा क्यों नहीं की गई है ?

इस शंका का समाधान करते हैं-क्योंकि चारों गतियों की प्ररूपणा से उसका ज्ञान हो ही जाता है। किसी तिर्यंच या मनुष्य के दश हजार वर्ष की आयुस्थिति वाले नारकियों में उत्पन्न होकर वहाँ से निकले जीव के नरक में दश हजार वर्ष प्रमाण स्थिति देखी जाती है। इसी प्रकार सातवीं पृथिवी के लिए तेतीस सागरोपम की आयुस्थिति को बांधकर व वहाँ उत्पन्न होकर अपनी स्थिति पूरी करके निकले हुए जीव के तेंतीस सागरोपम उत्कृष्ट स्थिति होती है।

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अब प्रथम पृथिवी के नारकियों का काल प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-'

प्रथम पृथिवी में नारकी वहाँ कितने काल तक रहते हैं ?।।४।।'

प्रथम पृथिवी में नारकी जीव जघन्य से दस हजार वर्ष तक रहते हैं।।५।।'

प्रथम पृथिवी में नारकी जीव उत्कृष्ट से एक सागरोपम काल तक रहते हैं।।६।।'

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-'‘कितने काल तक’ यह शब्द समय, क्षण, लव, मुहूर्त, दिवस, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर, युग, पूर्व, पल्योपम व सागरोपम आदि की अपेक्षा रखता है।

शंका-'यह जो प्रथम पृथिवी की जघन्य और उत्कृष्ट आयु बतलाई गई है, सो क्या सीमन्तक, निरय, रौरव, भ्रान्तक, उद्भ्रान्त, संभ्रान्त, असंभ्रान्त, विभ्रान्त, तप्त, त्रसित, वक्रान्त, अवक्रान्त और विक्रान्त नामक तेरहों इन्द्रक बिलों तथा उनसे संबद्ध श्रेणीबद्ध और प्रकीर्णक सब बिलों की यह आयुस्थिति होती है, या नहीं होती ?

समाधान'-प्रथम पृथिवी के उक्त समस्त बिलों की जघन्य और उत्कृष्ट आयु इतनी ही नहीं होती, किन्तु सब बिलों की पृथक्-पृथक् जघन्य और उत्कृष्ट आयु होती है। वह इस प्रकार है-

अपने श्रेणीबद्ध और प्रकीर्णक बिलों सहित सीमन्तक नामक प्रथम प्रस्तर में जघन्य आयु दश हजार वर्ष और उत्कृष्ट आयु नब्बे हजार वर्ष प्रमाण होती है। निरय नाम के दूसरे प्रस्तर में जघन्य आयु एक समय अधिक नब्बे हजार वर्ष और उत्कृष्ट आयु नब्बे लाख वर्ष है। रौरव नाम के तीसरे प्रस्तर में जघन्य आयु एक समय अधिक नब्बे लाख वर्ष और उत्कृष्ट आयु असंख्यात पूर्वकोटिप्रमाण होती है। भ्रान्त नामक चतुर्थ प्रस्तर में जघन्य आुय एक समय अधिक असंख्यात पूर्वकोटि और उत्कृष्ट आयु एक सागरोपम के दशवें भाग होती है। यही सागरोपम का दशमांस आगे के पाथड़ों में जघन्य और उत्कृष्ट आयु प्राप्त करने के लिए ‘मुख’ कहलाता है, क्योंकि वह अल्प है तथा पूरा एक सागरोपम ‘भूमि’ कहलाती है, क्योंकि वह मुख की अपेक्षा बहुत है।

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अत्रोपयोगिनी करणगाथा-

मुहभूमीण विसेसो उच्छय भजिदो दु जो हवे वड्ढी।

वड्ढी इच्छागुणिदा मुहसहिया होइ वड्ढिफलं।।
पुनः एवमानीतवृद्धिं दशसु स्थानेषु स्थापयित्वा एकादि-एकोत्तरशलाकाभिः गुणयित्वा मुखप्रक्षेपे कृते इच्छितप्रस्तराणां आयुर्भवति।
तस्य प्रमाणमिदं-

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अयमर्थः सूत्रे अनुक्तः कथं ज्ञायते ?
किमिति न प्रोक्तः, उक्तश्चैव देशामर्शकभावेन।
एतत्सूत्रं देशामर्शकमिति कुतो ज्ञायते ?
गुरूपदेशात् ज्ञायते ।
संप्रति द्वितीयादिपृथिवीषु नारकाणां कालप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
विदियाए जाव सत्तमाए पुढवीए णेरइया केवचिरं कालादो होंति ?।।७।।
जहण्णेण एक्क तिण्णि सत्त दस सत्तारस बावीस सागरोवमाणि सादिरेयाणि।।८।।
उक्कस्सेण तिण्णि सत्त दस सत्तारस बावीस तेत्तीसं सागरोवमाणि।।९।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थः सुगमो वर्तते। अत्र सातिरेकपदेन एकसमयाधिकं ग्राह्यं।
सूत्रे सातिरेकपदेन एकश्चैव समयोऽधिकः इति कथं ज्ञायते ?
‘उवरिल्लुक्कस्सट्ठिदी समयाहिया जहण्णा’ इति आगमवचनात् ज्ञायते। अस्यायमर्थः—प्रथमपृथिव्याः उत्कृष्टस्थितिद्र्वितीयपृथिव्यां जघन्यस्थितिः समयाधिका ज्ञातव्या। एवमेव सर्वत्र पटलेषु नारकेष्वपि। द्वितीयपृथिव्यां जघन्यायुः समयाधिकमेकं सागरोपमं। तृतीयपृथिव्यां समयाधिकत्रिसागरोपमानि। चतुुथ्र्यां समयाधिकसप्तसागरोपमानि। पञ्चम्यां समयाधिकदशसागरोपमानि। षष्ठ्यां समयाधिकसप्तदश-सागरोपमानि। सप्तम्यां पृथिव्यां समयाधिकद्वाविंशति सागरोपमानि।
उत्कृष्टेण द्वितीयादिषु नरकेषु त्रि-सप्त-दश-सप्तदश-द्वाविंशति-त्रयस्त्रिंशत्-सागरोपमानि यथासंख्यमिति। अत्र द्वे अपि सूत्रे देशामर्शके, अत: अनेनैव कथनेन प्रत्येकनरकपटलानामपि जघन्योत्कृष्टायुषी गृहीतव्ये भवत:।
अधुना द्वितीयायां पृथिव्यां एकादशप्रस्तराणि-इन्द्रकपटलानि संति तेषां नामान्युच्यन्ते-तनक-स्तनक-वनक-मनक-घात-संघात-जिव्ह-जिव्हक-लोक-लोलुप-स्तनलोलुपाख्यानि। एषामुत्कृष्टायूंषि दर्शयन्ति-

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तृतीयायां पृथिव्यां नव प्रस्तराणि संति-तप्त-त्रसित-तपन-तापन-निदाघ-प्रज्वलित-उज्वलित-सुप्रज्वलित-संप्रज्वलितनामानि। एषामायुषां संदृष्टिः—

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सप्तम्यां नरकपृथिव्यां अवधिस्थाननाम एकमेवेन्द्रकपटलं। तत्र जघन्यायुः एकसमयाधिकद्वाविंश-तिसागरोपमं, उत्कृष्टं च त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि।
इतो विस्तरः किंञ्चिदुच्यते नारकाणां-
सप्तस्वपि नरकेषु बिलानां संख्याः उच्यन्ते-
प्रथमादीनां नरकाणां क्रमेण त्रिंशल्लक्ष-पंचविंशतिलक्ष-पंचदशलक्ष-दशलक्ष-त्रिलक्ष-पञ्चोनैकलक्ष-पंचबिलानि संति। तत्र रत्नप्रभापृथिवीमारभ्य पञ्चमभुवः त्रिचतुर्थभागपर्यतं अत्युष्णं पञ्चमभुवश्चतुर्थे भागे षष्ठ्यां सप्तम्यां च भुवि भवत्यतिशीतम्।
तत्र नरकेषु जन्म गृहीत्वा नारकाः उपरि उत्पतन्ति, नानाविधदुःखानि चानुभवन्ति।
तथाहि- अंतोमुहुत्तकाले तदो चुदा भूतलम्हि तिक्खाणं।
सत्थाणमुपरि पडिदू-णुड्डीय पुणोवि णिवडंति।।१८१।।
ते नारकाः घर्मापृथिव्यायां उपपादस्थानेषूत्पन्नाः सप्तयोजनं सपादत्रिक्रोशपर्यन्तमुपरि उड्डीयन्ते। क्रमात् द्वितीयपृथिव्या आरभ्य पंचदशयोजन-सार्धद्वयक्रोशं, एकत्रिंशद्योजनं एकक्रोशं, द्वाषष्टियोजन-द्विक्रोशं, पंचविंशतियोजनाधिकैकशतयोजनं, पंचाशदधिकद्विशतयोजनपर्यतं चोत्प्लवन्ते आ षष्ठीं, सप्तम्यां च नारकाः पंचशतयोजनपर्यन्तं उद्गच्छन्ति।
पुनश्च तत्रस्थाः पुराणनारका उड्डीय पतितान् तान् नारकान् विलोक्य तत्रागत्य बहुविधानि दुःखानि उत्पादयन्ति-
पौराणिका तदा ते दट्ठूणइणिट्ठुरारवागम्म।
खींचंति णिसिंचंति य वणेसु बहुखारवारीणि।।१८३।।
तेवि विहंगेण तदो जाणिद पुव्वावरारिसंबंधा।
असुहापुहविक्किरिया हणंति हण्णंति वा तेहिं।।१८४।।
तत्रापृथग्विक्रिया एव तेषां स्वशरीराणां-
वयवग्घ-घूग-कागहि-विच्छियभल्लूक गिद्धसुणयादिं।
सूलग्गि-कोंत-मोग्गर-पहुदी-संगे विकुव्वंति।।१८५।।
वेदालगिरी भीमा जंतसयुक्कडगुहा य पडिमाओ।
लोहणिहग्गिकणड्ढा परसूछुरिगासिपत्तवणं।।१८६।।
कूडा सामलिरुक्खा वयिदरणि-णदीउ खारजलपुण्णा।
पूयरुहिरा दुगंधा दहा य किमिकोडिकुलकलिदा।।१८७।।
ते वैतरणीं नदीं प्राप्य कीदृशा भवन्तीति चेत् ?
अग्गिभया धावंता मण्णंता सीयलंति पाणीयं ।
ते वयिदरणिं पविसिय खारोदयदड्ढसव्वंगा।।१८८।।
उट्ठिय वेगेण पुणो असिपत्तवणं पयांति छायेत्ति।
कुंतासि-सत्ति जट्ठिहिं छिज्जंते वादपडिदेहिं।।१८९।।
तेषां बहिर्दुःखसाधनानि बहूनि संति तत्र-
लोहोदय भरिदाओ कुंभीओ तत्तबहुकडाहा य।
संतत्तलोहफासा भू सूईसद्दुलाइण्णा।।१९०।।
तत्र क्षेत्रस्पर्शजदुःखं शृणु-
विच्छियसहस्सवेयण-समधियदुक्खं धरित्तिफासादो।
कुक्खक्खिसीसरोगग-छुधतिसभयवेयणा तिव्वा।।१९१।।
नरकभूमिषु भोजनं कीदृशं इति चेत् ?
सादिकुहिदातिगंधं मणिमप्पं मट्टिंय विभुंजंति।
घम्मभवा वंसादिसु असंखगुणिदासुहं तत्तो।।१९२।।
तत्रस्था मृत्तिका यदि अत्र मत्र्यलोके आगच्छेत् तर्हि कियन्तो जीवा म्रियन्ते ?
तदेवोच्यते-
पढमासणमिह खित्तं कोसद्धं गंधदो विमारेदि।
कोसद्धद्धहियधराट्ठियजीवे पत्थरक्कमदो।।१९३।।
प्रथमपृथिवीप्रथमपटलाशनं इह मनुष्यक्षेत्रे क्षिप्तं चेत् क्रोशार्धं गन्धतो विमारयति इत्याद्यर्थोऽवगन्तव्यः।
तथापि ते तत्र न म्रियन्ते-
ण मरंति ते अकाले सहस्सखुत्तो वि छिण्णसव्वंगा।
गच्छंति तणुस्स लवा संघादं सूदगस्सेव।।१९४।।
एतद्दुःखं तत्र तर्हि ये केचित् तीर्थकरप्रकृतिबंधं कृत्वा तत्र गच्छन्ति तेषां मरणपर्यन्तमीदृशमेव दुःखमस्ति वा विंâचिदन्तरं इति चेत् ? उच्यते-
तित्थयरसंतकम्मुवसग्गं णिरए णिवारयंति सुरा।
छम्मासाउगसेसे सग्गे अमलाणमालंको।।१९५।।
यथा श्रेणिकमहाराजस्तत्र प्रथमनरकेऽधुना सर्वाणि दुःखानि भुंत्ते। अग्रेतनोत्सर्पिणीकाले यदा स मातुर्गर्भे आगमिष्यति तस्मात् षण्मासपूर्वमेव सुराः तत्र गत्वा तस्योपसर्गं निवारयिष्यन्ति।
अहो भव्या! श्रूयंतां, एतन्नरकदुःखं श्रुत्वा प्रतिक्षणं चिंतनीयं। यत् वयं कदाचिदपि नरकगतिकारणं पापं न करिष्यामः, किंच यदि एकबारं नरकायुर्बध्नीयात् तर्हि तत्र गमनं अवश्यंभावि। राज्ञा श्रेणिकेन भगवन्महतिमहावीरजिनेन्द्रस्य समवसरणे त्रिंशद्वर्षपर्यन्तंं दिव्यध्वनिः श्रुतः। किंतु नरकायुःप्रकृतेर्विच्छित्तिर्न जाता। तस्यायुषि अपकर्षणं तु जातं अतस्तत्र प्रथमनरके मध्यमायुः चतुरशीतिलक्षवर्षपर्यन्तमेव जातं।
तत्तो निर्गत्यासौ श्रेणिकचरः तीर्थकरो भविष्यति महापद्मनामधेयः।
ते नारका अपमृत्युं न लभन्ते-
अणवट्टसगाउस्से पुण्णे वादाहदब्भपडलं वा।
णेरइयाणं काया सव्वे सिग्घं विलीयंते।।१९६।।
ते नारकाः तत्रामरणांतं दुःखं भुञ्जन्ते-
खेत्तजणिदं असादं सारीरं माणसं च असुरकयं।
भुंजंति जहावसरं भवट्ठिदीचरिमसमयोत्ति।।१९७।।
नरकेषु चतुर्विधानि दुःखानि-क्षेत्रसंबंधि-शारीरिक-मानसिक-असुरकृतानि। ये केचित् प्रतिशोधभावेन वैरं बध्नंति ते प्राणिनः नरकभूमौ गत्वा महद्दुःखं भुञ्जन्ते, श्रेणिकराजादिवत्। तथा च ये केचित् सम्य-ग्दृष्टयो जीवास्ते कदाचिदपि प्रतिशोधभावनां न कुर्वन्ति सीतामहासतीवत्।
पद्मपुराणे च दृश्यते-
महासतीसीता आर्यिकावस्थायां समाधिना मृत्वाच्युतस्वर्गे प्रतीन्द्रो१ बभूव। एकदासौ प्रतीन्द्रस्तृतीयनरके गत्वा लक्ष्मण-रावणचरौ नारकौ सम्बोधयत्।
उक्तं च- यदीच्छतात्मनः श्रेयस्तत एवं गतेऽपि हि। सम्यक्त्वं प्रतिपद्यस्व काले बोधिप्रदं शुभं।।
इतोऽन्यदुत्तरं नास्ति न भूतं न भविष्यति। इह सेत्स्यन्ति सिद्ध्यन्ति सिषिधुश्च महर्षयः।।
इत्यादिप्रकारेण तौ संबोध्य सम्यग्दर्शनरत्नं च ग्राहयित्वा संतुष्टो बभूव।
अन्यत्रापि द्रष्टव्यं-ऐशानस्वर्गादागत्य श्रीधरदेवो महाबलचरः द्वितीयनरके गत्वा शतमतिमंत्रिणो जीवं नारकं संबोध्य सम्यग्दर्शनं प्रापयत्। सम्यग्दर्शनप्रभावेण नारकः तत्तो निर्गत्य विदेहक्षेत्रे जयसेननामा-चक्रवर्तिपुत्रोऽभवत्। तस्मिन् भवेऽपि विवाहसमये श्रीधरदेवेन संबोधनं प्राप्य दीक्षां गृहीत्वासौ ब्रह्मस्वर्गे देवो बभूव।
तात्पर्यमेतत्-सम्यग्दर्शनस्य माहात्म्यं विज्ञाय नरकदुःखेभ्यो भीत्वा सततं धर्म एवाराधनीयो भवति।
एवं प्रथमस्थले एकजीवापेक्षया कालानुगमे नारकाणां कालकथनत्वेन नव सूत्राणि गतानि।

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यहाँ उपयोगी करणगाथा इस प्रकार है-

गाथार्थ-मुख और भूमि का जो विशेष अर्थात् अन्तर हो उसे उत्सेध से भाजित कर देने पर जो वृद्धि का प्रमाण आता है, उस वृद्धि को अभीष्ट से गुणा करके मुख में जोड़ने पर वृद्धि का फल प्राप्त होता है।।

पुन: इस प्रकार लाये हुए वृद्धि के प्रमाण को दश स्थानों में स्थापित कर एक आदि एक-एक अधिक के क्रम से बढ़ी हुई शलाकाओं से गुणितकर लब्ध को मुख में मिला देने से प्रत्येक अभीष्ट पाथड़े की आयु का प्रमाण निकल आता है। इस प्रकार निकला हुआ चतुर्थ आदि पाथङों का आयु प्रमाण इस प्रकार है-

(इसका कोष्ठक ऊपर देखें)

शंका-यह अर्थ सूत्र में तो कहा नहीं गया, फिर वह कैसे जाना जाता है ?

समाधान-क्यों नहीं कहा गया, देशामर्शक भाव से कहा ही गया है।

शंका-प्रस्तुत सूत्र देशामर्शक है, यह कैसे जाना जाता है ?

समाधान-गुरु उपदेश से जाना जाता है।

[सम्पादन]
अब द्वितीय आदि पृथिवी के नारकियों का काल बतलाने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

दूसरी पृथिवी से लेकर सातवीं पृथिवी तक की पृथिवियों में नारकी जीव वहाँ कितने काल तक रहते हैं ?।।७।।

जघन्य से दूसरी पृथिवी में कुछ अधिक एक सागरोपम, तीसरी में कुछ अधिक तीन, चौथी में कुछ अधिक सात, पाँचवी में कुछ अधिक दश, छठवी में कुछ अधिक सत्तरह और सातवीं मेें कुछ अधिक बाईस सागरोपम काल तक नारकी जीव रहते हैं।।८।।

द्वितीयादि पृथिवियों में नारकी जीव उत्कृष्ट से क्रमश: तीन, सात, दश, सत्रह, बाईस और तेंतीस सागरोपम काल तक रहते हैं।।९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त तीनों सूत्रों का अर्थ सुगम है। यहाँ ‘सातिरेक’ अर्थात् ‘कुछ अधिक’ शब्द से एक समय अधिक ग्रहण करना चाहिए।

शंका-सूत्र में ‘सातिरेक’ अर्थात् ‘कुछ अधिक’ शब्द आया है। उससे मात्र एक समय ही अधिक होता है। यह कैसे जाना जाता है ?

समाधान-क्योंकि ‘‘उत्तरोत्तर उपरिम पृथिवी की उत्कृष्ट स्थिति एक समय अधिक होकर नीचे-नीचे की पृथिवियों की जघन्य स्थिति होती है’ इस आगमवचन से ही जाना जाता है। इसका अर्थ यह है कि प्रथम पृथिवी की उत्कृष्ट स्थिति दूसरी पृथिवी की जघन्य स्थिति एक समय अधिक जानना चाहिए। इसी प्रकार सभी पटलों के नारकियों में भी जानना चाहिए। द्वितीय पृथिवी के नारकियों की जघन्य आयु एक समय अधिक एक सागरोपम होती है। तृतीय पृथिवी के नारकियों की जघन्य आयु एक समय अधिक तीन सागरोपम है। चतुर्थ पृथिवी के नारकियों की जघन्य आयु एक समयाधिक सात सागर प्रमाण है। पाँचवी पृथिवी के नारकियों की जघन्य आयु एक समय अधिक दश सागर प्रमाण है। छठी पृथिवी के नारकियों की जघन्य आयु सत्रह सागर प्रमाण है और सातवीं पृथिवी के नारकियों की जघन्य आयु एक समय अधिक बाईस सागर प्रमाण है।

उत्कृष्ट की अपेक्षा द्वितीय आदि नरकों में क्रमश: नारकियोें की आयु तीन सागर, सात सागर, दश सागर, सत्रह सागर, बाईस सागर और तेंतीस सागर प्रमाण होती है। यहाँ दोनों ही सूत्र देशामर्शक हैं, अत: इसी कथन के द्वारा प्रत्येक नरक पटलों की भी जघन्य और उत्कृष्ट आयु ग्रहण कर ली जाती है।

अब द्वितीय पृथिवी के ग्यारह प्रस्तर बतलाते हैं-

उन इन्द्रक पटलों के नाम कहते हैं-

१. तनक

२. स्तनक

३. वनक

४. मनक

५. घात

६. संघात

७. जिव्ह

८. जिव्हक

९. लोक

१०. लोलुप और

११. स्तनलोलुप।

इन ग्यारह पटलों में रहने वाले नारकियों की उत्कृष्ट आयु बताते हैं-

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तीसरी पृथिवी में नौ प्रस्तर हैं उनके-

१. तप्त

२. त्रसित

३. तपन

४. तापन

५. निदाघ

६. प्रज्वलित

७. उज्वलित

८. सुप्रज्वलित

९. संप्रज्वलित नाम हैं।

इनमें रहने वाले नारकियों की आयु संदृष्टि इस प्रकार है-

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छठी पृथिवी में हिम, वर्दल और लल्लंक नामक तीन इन्द्रक हैं। उनके आयु प्रमाण की संदृष्टि यह है-

सातवीं पृथिवी में अवधिस्थान नामक एक ही इन्द्रक पटल है। वहाँ जघन्य आयु एक समय अधिक बाईस सागरोपम तथा उत्कृष्ट आयु तेतीस सागरोपम है।

उन नारकियों का यहाँ कुछ विस्तार से वर्णन करते हैं-

सातों नरकों में बिलों की संख्या बतलाते हैं-

प्रथम आदि नरकों में क्रमश: तीस लाख, पच्चीस लाख, पन्द्रह लाख, दश लाख, तीन लाख, पाँच कम एक लाख (९५ हजार) और पाँच बिल होते हैं। उनमें प्रथम रत्नप्रभा पृथिवी से पाँचवीं पृथिवी के तृतीय-चतुर्थ (३/४) भाग पर्यन्त अति उष्णता रहती है और पाँचवीं पृथिवी के चतुर्थ भाग में तथा छठी-सातवीं पृथिवी में अतिशीत पाई जाती है।

उन नरकों में जन्म लेकर नारकी ऊपर से नीचे गिरते हैं और नाना दु:खों का अनुभव करते हैं। कहा भी है-

गाथार्थ-नारकी जीव अन्तर्मुहूर्त काल में उपपाद स्थान से च्युत होकर नरक भूमि के तीक्ष्ण शस्त्रों पर गिरकर ऊपर उछलते हैं और पुन: उन्हीं पर गिरते हैं।।१८१।।

भावार्थ-पाँच के घन को सोलह से भाजित करने पर जो लब्ध प्राप्त हो उतने योजन प्रमाण प्रथम घर्मा पृथिवी के नारकी उछलते हैं तथा द्वितीयादि पृथिवियों के नारकी इनसे दूने-दूने उछलते हैं ऐसा जानना चाहिए।

घर्मापृथिवी के नारकी ७ योजन कोश तक ऊपर उछलते हैं पुन: क्रम से द्वितीय पृथिवी प्रारंभ करके १५ योजन ढ़ाई कोश, ३१ योजन १ कोश, ६२ योजन २ कोश, १२५ योजन, २५० योजन और सातवीं माघवी पृथिवी के नारकी ५०० योजन ऊँचे उछलते हैं।

पुन: वहाँ रहने वाले पुराने नारकी उछल कर गिरने वाले नारकियों को देखकर वहाँ आकर बहुत प्रकार के दु:खों को उत्पन्न कराते हैं-

गाथार्थ-पुराने नारकी नये नारकियों को देखकर अति कठोर शब्द करते हुए पास आकर उन्हें मारते हैं और उनके घावों पर अति खारा जल सींचते हैं।।१८३।।

अर्थात् पुराने नारकी नवीन नारकी को देखकर अति कठोर शब्द बोलते हुए उनके पास आकर उन्हें मारते हैं। मारने से तथा शस्त्रों पर गिरने से जो घाव हो जाते हैं, उन पर वे अत्यन्त खारा जल सींच-सींचकर पीड़ा पहुँचाते हैं।

गाथार्थ-विभङ्गज्ञान से पूर्वापर के वैर का संबंध जानकर वे नवीन नारकी भी अशुभ और अपृथक् विक्रिया द्वारा उन्हें मारते हैं और उनके द्वारा स्वयं मारे जाते हैं।।१८४।।

अब वहाँ होने वाली उन नारकियों के शरीरों की अपृथक् विक्रिया होती है, ऐसा बतलाते हैं-

गाथार्थ-नारकी जीव अपने ही शरीर में भेड़िया, व्याघ्र, घुग्घू, कौआ, सर्प, बिच्छू, रीछ, गिद्ध, कुत्ता आदि रूप तथा त्रिशूल, अग्नि, बरही, सेल, मुद्गरादि रूप विक्रिया करते हैं।।१८५।।

अर्थात् नारकी जीव परस्पर दु:ख देने के लिए अपने शरीर का व्याघ्रादिरूप तथा त्रिशूलादिरूप परिणमन कराकर नाना प्रकार के दु:ख दूसरों को देते हैं और स्वयं भोगते हैं।

गाथार्थ-उन नरको में बेताल सदृश भीमाकृति पर्वत हैं। दु:खदायक सैकड़ों यंत्रों से भरी गुफाएँ हैं। वहाँ स्थित प्रतिमाएँ लोहमयी है एवं अग्निकणों से व्याप्त हैं। फरसी, छुरिकादि शस्त्र सदृश पत्रों से युक्त असिपत्र वन हैं। कूट शाल्मलि वृक्ष हैं। वहाँ की वैतरणी नाम की नदियाँ और तालाब खारे जल से भरे हैं, दुर्गन्धित पीप, खून से युक्त हैं तथा उनमें करोंड़ों कीड़े भरे हैं।।१८६-१८७।।

वे वैतरणी नदी को प्राप्त कर कैसे होते हैं ? उसे कहते हैं-

गाथार्थ-अग्नि के भय से दौड़कर आने वाले नारकी ‘यह शीतल जल है’ ऐसा मानकर जब उस नदी मेें प्रवेश करते हैं, तो खारे जल से उनका सारा शरीर जल जाता है।।१८८।।

अर्थात् नवीन नारकी जीव अग्नि के भय से दौड़कर आते हैं और वैतरणी नदी के जल को शीतल मानकर शीतलता की कामना करते हुए उसमें प्रवेश कर जाते हैं किन्तु शीतलता मिलने के स्थान पर नदी के खारे जल से उनका सर्वाङ्ग दग्ध हो जाता है।

गाथार्थ-वे नारकी शीघ्र ही वहाँ से उठकर ‘यहाँ छाया है’ ऐसा मानते हुए असिपत्र वन में प्रवेश करते हैं। किन्तु वहाँ वायु से गिरने वाले सेल, तलवार, शक्ति और लकड़ी आदि के सदृश पत्रों से उनके शरीर छिद जाते हैं।।१८९।।

अर्थात् नारकी जीव अग्नि से तप्त हुए वैतरणी में प्रवेश करते हैं, वहाँ खारे जल के कारण उनकी वेदना और बढ़ जाती है। उस भंयकर वेदना से त्राण पाने के लिए वे शीतल छाया की कामना करते हुए वन में प्रवेश करते हैं, तो वहाँ भी वाणों के समान तीखे पत्तों से उनके शरीर छिद जाते हैं। वहाँ उन नारकियों के दु:खके बाह्य साधन बहुत से हैं, उन्हें कहते हैं-

गाथार्थ-उन नरकों में गर्म लोहे के समान जल से भरे कुम्भी पाक हैं, अत्यन्त गर्म कड़ाह हैं। वहाँ की भूमि गर्म, तपे हुए लोहे के समान स्पर्शवाली और सुई के समान पेनी दूूब से व्याप्त है।।१९०।।

अर्थात् जिस प्रकार यहाँ हंडिया आदि में रखकर भोजन पकाते हैं तथा कड़ाही के गर्म तेल आदि में भोज पदार्थ तलते हैं, उसी प्रकार नरकों में नारकी जीव एक-दूसरे को कुंभी में रखकर पकाते हैं और गर्म कड़ाहों में डालकर तलते हैं।

अब वहाँ की भूमि के स्पर्श से होने वाले दु:ख दृष्टान्त द्वारा कहते हैं, उन्हें सुनो-

गाथार्थ-हजार बिच्छुओं के एक साथ काटने पर जो वेदना होती है, उससे भी अधिक वेदना वहाँ की भूमि के स्पर्श मात्र से होती है। उन नारकियों को उदर, नेत्र एवं मस्तक आदि के रोगों से उत्पन्न तीव्र वेदना तथा भूख, प्यास, भय आदि की तीव्र बाधाएँ होती हैं।।१९१।।

अब नारकी जीवों का भोजन कैसा होता है ? उसे कहते हैं।

गाथार्थ-प्रथम घर्मा पृथिवी में उत्पन्न हुए नारकी जीव खानादि निकृष्ट प्राणियों के सड़े हुए कलेवरों की दुर्गन्ध से भी अधिक दुर्गन्ध वाली मिट्टी खाते हैं। वह दुर्गन्धित मिट्टी भी उन्हें अपनी भूख प्रमाण नहीं मिलती अर्थात् अल्प मात्रा में ही मिलती है, जिससे क्षुधा शांत नहीं होती। वंशादि पृथिवियों के नारकी इससे असंख्यातगुणित अशुभ मिट्टी का भक्षण करते हैं।।१९२।।

वहाँ की मिट्टी यदि मत्र्यलोक में आ जावे तो कितने जीव मर जाते हैं ? उसको बताते हैं-

गाथार्थ-प्रथम नरक के प्रथम पटल के नारकियों के भोजन की वह दुर्गन्धमय मिट्टी यदि मनुष्य क्षेत्र में डाल दी जाए तो वह अपनी दुर्गन्ध से आधे कोश के जीवों को मार डालेगी। इसी प्रकार प्रत्येक पटल के आधार की मिट्टी क्रम से आधा-आधा कोस अधिक पृथिवी स्थित जीवों को मारने की क्षमता वाली है।।१९३।।

इसका अर्थ यह है कि अंतिम नरक-सप्तम पृथिवी के अवधिस्थान नामक ४९वें पटल के नारकी जिस मिट्टी का आहार करते हैं, वह मिट्टी अपनी दुर्गन्ध से मध्यलोक में स्थित साढ़े चौबीस कोस के जीवों को मारने की सामथ्र्यवाली होती है, ऐसा जानना चाहिए।

फिर भी वे मरते नहीं है, इस बात को बताते हैं-

गाथार्थ-फिर भी वहाँ सम्पूर्ण शरीर को हजारों बार छिन्न-भिन्न कर देने पर भी उन नारकी जीवों का अकाल में मरण नहीं होता। पारे के कणों के सदृश नारकी जीवों के शरीर के टुकड़े भी संघात को प्राप्त हो जाते हैं। अर्थात् पुन: पुन: मिल जाते हैं।।१९४।।

भावार्थ-जिस प्रकार पारे के कण छिन्न-भिन्न नहीं रह सकते, शीघ्र ही चारों ओर से आकर एक हो जाते हैं, उसी प्रकार नारकियों के शरीर खंड-खंड हो जाने पर भी मिल कर एक हो जाते हैं। आयु पूर्ण हुए बिना उनका मरण नहीं होता, चाहे कितना ही दु:ख क्यों न हो।

इतने दु:ख नरक में हैं, तो जो तीर्थंकर प्रकृति का बंध करके नरक में जाते हैं, उनको भी मरण पर्यंत ऐसे दु:ख सहने पड़ते हैं अथवा कुछ अंतर होता है ? ऐसा प्रश्न होने पर कहते हैं-

गाथार्थ-नरक में जिन नारकी जीवों के तीर्थंकर नामकर्म सत्ता में हैं उनकी आयु के छ: माह शेष रहने पर देवगण उन नारकियों का उपसर्ग निवारण कर देते हैं तथा स्वर्ग में भी तीर्थंकर प्रकृति की सत्ता वाले देवों की आयु छह माह शेष रहने पर माला नहीं मुरझाती हैं।

भावार्थ-तीर्थंकर प्रकृति की सत्ता वाले नारकियों की आयु छह माह शेष रहने पर देव उनके उपसर्ग दूर कर देते हैं तथा इसी प्रकृति की सत्ता वाले देवों की छह माह आयु शेष रहने पर माला नहीं मुरझाती है।

जैसे महाराजा श्रेणिक प्रथम नरक में आज सभी दु:खों को भोग रहे हैं। आगे आने वाले उत्सर्पिणी काल में जब वे माता के गर्भ में आएँगे, तब गर्भ में आने के छह माह पूर्व ही देव वहाँ-नरक में जाकर उनके उपसर्ग का निवारण करेंगे।

अहो भव्यात्माओं! सुनो, नरकों के इन दु:खों को श्रवण करके प्रतिक्षण चिन्तन करो कि हम नरक गति को प्राप्त कराने के कारणभूत पापों को नहीं करेंगे, क्योंकि यदि एक बार भी नरक की आयु बंध गई तो नरक में अवश्यमेव जाना ही पड़ेगा। राजा श्रेणिक ने भगवान महावीर जिनेन्द्र के समवसरण में तीस वर्ष तक दिव्यध्वनि को सुना किन्तु नरकायु नामक प्रकृति नष्ट नहीं हो पाई। हाँ, उस नरकायु की स्थिति का अपकर्षण तो हो गया अत: उनकी सप्तम नरक की आयु प्रथम नरक की मध्यम आयु के रूप में चौरासी हजार वर्ष की हो गई।

उस प्रथम नरक से निकलकर श्रेणिकचर महापद्म नाम के तीर्थंकर होंगे।

वे नारकी नरक में अकालमृत्यु को प्राप्त नहीं होते हैं-

गाथार्थ-अपनी अनपवत्र्य आयु के पूर्ण होते ही नारकियों का सम्पूर्ण शरीर उसी प्रकार विलय को प्राप्त हो जाता है, जिस प्रकार पवन से ताड़ित मेघपटल विलय हो जाते हैं।।१९६।।

अर्थात् जिनजीवों की भुज्यमान आयु का कदलीघात नहीं होता है-अकाल में आयु का नाश नहीं होता-जहाँ अकाल मरण नहीं होता है, उसे अनपवत्र्यायु कहते हैं। जिस प्रकार वायु से आहत मेघपटल नाश को प्राप्त हो जाते हैं, उसी प्रकार अनपवत्र्य आयु समाप्त होते ही नारकियों का सम्पूर्ण शरीर विलय को प्राप्त हो जाता है।

वे नारकी वहाँ मरण पर्यन्त दु:ख भोगते हैं-

गाथार्थ-नारकी जीव भवस्थिति के चरमसमय पर्यन्त यथाअवसर क्षेत्रजनित, मानसिक, शारीरिक और असुरकृत असाता कर्म को भोगते रहते हैं।।१९७।।

अर्थात् नरकों में उक्त चारों प्रकार के दु:खों को भोगता हुआ प्राणी एक क्षण भी शांति का अनुभव नहीं कर पाता है। इसके अतिरिक्त परस्पर उदीरित दु:ख को भी वे नारकी भोगते हैं।

नरकों में चार प्रकार के दु:ख होते हैं-१. क्षेत्रसंबंधी २. शारीरिक ३. मानसिक ४. असुरकृत। जो जीव यहाँ प्रतिशोध भाव से-किसी से बदला लेने की भावना से वैर को बांध लेते हैं वे नरक भूमि में जाकर महान दु:खों को भोगते हैं, राजा श्रेणिक के समान। जो सम्यग्दृष्टि जीव होते हैं वे कभी किसी के प्रति प्रतिशोध की भावना नहीं रखते हैं, महासती सीता के समान। अर्थात् राजा श्रेणिक ने धर्मविद्वेष के कारण मिथ्यात्व बुद्धि से अपनी रानी चेलना से बदला लेने की भावना रखते हुए वीतरागी सन्त यशोधर नामक मुनि के गले में मरा हुआ सर्प डालकर उन पर उपसर्ग किया अत: उन्होंने उसी क्षण नरक आयु का बंध कर लिया और पुन: तीर्थंकर महावीर के समवसरण में सम्यक्त्व प्राप्त करके तीस वर्ष तक धर्मध्यान करने के बावजूद भी उन्हें नरक के दु:ख तो सहने ही पड़े, जबकि इससे विपरीत सम्यग्दर्शन से सुशोभित सती सीता ने अनेक संघर्षों को सहन करने के बाद भी किसी के प्रति विद्वेष भाव-बदला लेने का भाव नहीं किया, तो वह स्वर्ग में जाकर असीम सुख को भोगने लगी।

पद्मपुराण में भी कहा है-

महासती सीता ने आर्यिका अवस्था में समाधिपूर्वक मरण करके अच्युत स्वर्ग में प्रतीन्द्र का पद प्राप्त कर लिया। एक बार उस प्रतीन्द्र ने नरक में जाकर लक्ष्मण और रावणचर जीव को नरक में भी सम्बोधन प्रदान किया।

कहा भी है-

श्लोकार्थ-सीता ने नरक में जाकर दोनों को सम्बोधित करते हुए कहा कि-हे भव्यात्मन्! यदि आप लोग अपना भला चाहते हैं तो इस दशा में स्थित होने पर भी सम्यक्त्व को प्राप्त करो। यह सम्यक्त्व समय पर बोधि को प्रदान करने वाला एवं शुभरूप है। इससे बढ़कर दूसरा कल्याणकारी न हुआ है, न था, न होगा। इसके रहते हुए महर्षिगण सिद्ध होंगे, अभी हो रहे हैं और पहले भी हुए थे।

इत्यादि प्रकार से सीता का जीव प्रतीन्द्र-लक्ष्मण और रावण दोनों को सम्बोधित करके और उन्हें सम्यग्दर्शन ग्रहण करवाकर अतीव संतुष्ट हुआ। अन्यत्र-आदिपुराण में भी दृष्टव्य है-

महाबल राजा जो समाधिपूर्वक मरण करके दूसरे ऐशान स्वर्ग में श्रीधर नाम का देव हुआ था, उस श्रीधर देव ने दूसरे नरक में जाकर शतमति मंत्री के जीव नारकी को सम्बोधन प्रदान करके उसे सम्यग्दर्शन प्राप्त कराया था। सम्यग्दर्शन के प्रभाव से वह नारकी नरक से निकलकर विदेहक्षेत्र में चक्रवर्ति सम्राट् का जयसेन नामक पुत्र हुआ था। उस भव में भी जयसेन ने श्रीधरदेव से अपने विवाह के समय संबोधन प्राप्त करके जैनेश्वरी दीक्षा लेकर ब्रह्मस्वर्ग में देवपद को प्राप्त किया था।

तात्पर्य यह है कि-सम्यग्दर्शन का माहात्म्य जानकर हम सभी को नरक के दु:खों से भयभीत होकर सदैव धर्म की ही आराधना करना चाहिए। इस प्रकार प्रथम स्थल में एक जीव की अपेक्षा कालानुगम में नारकियों का काल कथन करने वाले नौ सूत्र पूर्ण हुए।

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अधुना तिर्यग्गतौ सामान्येन तिरश्चां कालप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-

तिरिक्खगदीए तिरिक्खो केवचिरं कालादो होंति ?।।१०।।

जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।११।।
उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियट्टं।।१२।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थः सुगमोऽस्ति । मनुष्येभ्यः आगत्य तिर्यगपर्याप्तेषु उत्पद्य तत्र जघन्यायुःस्थितिं स्थित्वा तत्रत्यात् निर्गतस्य जीवस्य क्षुद्रभवग्रहणमात्रजघन्यकालो भवति। उत्कर्षेण अनर्पितगतिभ्यः आगत्य तिर्यक्षु उत्पद्य आवलिकायाः असंख्यातभागमात्रपुद्गलपरिवर्तनकालपर्यंतं परिवत्र्य अन्यगतिं गतस्य सूत्रोक्तकालो भवति असंख्यातपुद्गलपरिवर्तनप्रमाणमनन्तकालमिति। अत्रासंख्यातपुद्गलपरिवर्ते उत्ते आवलिकायाः असंख्यातभागमात्रा एव भवन्ति ।
ततोऽधिकं न भवतीति कथं ज्ञायते ?
आचार्यपरंपरागतोपदेशात् ज्ञायते नावलिकायाः असंख्यातभागमात्रादधिकं।
जघन्यकालः क्षुद्रभवग्रहणं कियत्प्रमाणं ?
उच्यते- छत्तीसं तिण्णि सया छावट्ठिसहस्सबारमरणाणि
अंतोमुहुत्तमज्झे पत्तो सि णिगोयवासम्मि।।२८।।
वियलिंदिए असीदी सट्ठी चालीसमेव जाणीहि ।
पंचिंदिय चउवीसं खुद्दभवंतोमुहुत्तस्स।।२९।।
त्रिविधपंचेन्द्रियतिरश्चां कालनिरूपणाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
पंचिंदियतिरिक्ख-पंचिंदियतिरिक्खपज्जत्त-पंचिंदियतिरिक्खजोणिणी केवचिरं कालादो होंति ?।।१३।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं अंतोमुहुत्तं।।१४।।
उक्कस्सेण तिण्णि पलिदोवमाणि पुव्वकोडिपुधत्तेणब्भहियाणि।।१५।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थः सुगमोऽस्ति। सामान्यपंचेन्द्रियतिरश्चां क्षुद्रभवग्रहणं कालं, तत्रापर्याप्तानां संभवात्। शेषयोद्र्वयोः पंचेन्द्रियतिर्यक्पर्याप्तपंचेन्द्रियतिर्यग्योनिमत्योः अंतर्मुहूर्तं, तत्रापर्याप्तानामभावात्। न च पर्याप्तेषु जघन्यायुःस्थितिप्रमाणं क्षुद्रभवग्रहणं कालं भवति, अंतर्मुहूर्तोपदेशस्य एतस्य निरर्थकत्वप्रसंगात्। जघन्यकालमेतत् कथितं।
उत्कर्षेण-पंचेन्द्रियजीवान् मुक्त्वा अन्येन्द्रियजीवेभ्यः आगत्य पंचेन्द्रियतिर्यक्-पंचेन्द्रियाqतर्यक्पर्याप्त-पंचेन्द्रियतिर्यग्योनिनीषु उत्पद्य यथाक्रमेण पंचनवति-सप्तचत्वािंरशत्-पंचदशपूर्वकोटि-कालप्रमाणं परिभ्रम्य दानेन दानानुमोदनेन वा त्रिपल्योपमायुःस्थितिकेषु भोगभूमिजेषु तिर्यक्षु स्वकायुःस्थितिं स्थित्वा देवेषूत्पन्नस्य एतावन्मात्रकालस्योपलंभात्।
कथं तिर्यक्षु दानस्य संभवः ?
न, किंच-ये केचित् संयतासंयताः तिर्यंचः सचित्तभंजने गृहीतप्रत्याख्यानाः तेषां सल्लकिपल्लवादिं ददतां तिरश्चां तद्दानस्य अविरोधात्।
उक्तं च-‘‘तिरिक्खसंजदासंजदाणं सचित्तभंजणे गहिदपच्चक्खाणाणं सल्लइपल्लवादिं देंततिरि-क्खाणं तदविरोधात्।’’
स्त्री-पुरुष-नपुंसकवेदेषु अष्टाष्टपूर्वकोटिप्रमाणकालमेव जीवःतिष्ठति इति कथं ज्ञायते ?
उच्यते-‘‘आइरियपरंपरागयउवदेसादो।’’
संप्रति पंचेन्द्रियतिर्यगपर्याप्तानां कालकथनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
पंचिंदियतिरिक्खअपज्जत्ता केवचिरं कालादो होंति ?।।१६।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।१७।।
उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं।।१८।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-अविवक्षितपर्यायेभ्यः आगत्य पंचेन्द्रियतिर्यगपर्याप्तकेषूत्पद्य सर्वजघन्यकालेन भुज्यमानायुः कदलीघातेन घातयित्वा क्षुद्रभवग्रहणकालप्रमाणं स्थित्वा निर्गतस्य तदुपलंभात्।
कश्चिदाह-कदलीघातेन घातितभुज्यमानायुःस्थितिकेषु पंचेन्द्रियतिर्यक्पर्याप्तेषु क्षुद्रभवग्रहणमात्रकालः किन्नोपलभ्यते ?
आचार्यः प्राह-नैतत्, तत्र अतिसुष्ठुघातं प्राप्तस्यापि भुज्यमानायुष्कस्यान्तर्मुहूर्तस्याधः पतनाभावात्।
देव-नारकयोः क्षुद्रभवग्रहणमात्रा अन्तर्मुहूर्तमात्रा वा आयुःस्थितिः किन्नोपलभ्यते ?
नोपलभ्यते, तत्र दशानां वर्षसहस्राणां अधः आयुषः बंधाभावात्, तत्रतनभुज्यमानायुष्कस्य कदली-घाताभावाच्च। जघन्यस्थितिकथनमेतत्।
उत्कर्षेण-अविवक्षितपर्यायेभ्यः आगत्य पंचेन्द्रियतिर्यगपर्याप्तेषूत्पद्य सर्वोत्कृष्टभवस्थितिप्रमाणकालं स्थित्वा निर्गतस्यापि अंतर्मुहूर्तादधिककालस्यानुपलंभात्।
एवं तिर्यग्गतिनामद्वितीयान्तरस्थले नवसूत्राणि गतानि।
अधुना त्रिविधमनुष्याणां कालप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
(मणुसगदीए) मणुसा मणुसपज्जत्ता मणुसिणी केवचिरं कालादो होंति ?।।१९।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणमंतोमुहुत्तं।।२०।।

उक्कस्सेण तिण्णि पलिदोवमाणि पुव्वकोडिपुधत्तेणब्भहियाणि।।२१।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थः सुगमोऽस्ति।
अत्र कश्चिदाह-अस्मिन् अधिकारे एकजीवस्य कालानुगमे क्रियमाणे-‘मणुसो केवचिरं कालादो होदि’ इति एकजीवविषयपृच्छया भवितव्यम् ?
आचार्यदेवः समादधाति-नैतद् वक्तव्यं, एकस्मिन्नपि जीवे एकानेकसंख्योपलक्षिते अशुद्धद्रव्यार्थिक- नयविवक्षया अनेकत्वस्याविरोधात्।
सर्वत्र पृच्छापूर्वश्चैवार्थनिर्देशः किमर्थः क्रियते ?
न, वचनप्रवृत्तेः परार्थत्वप्रतिपादनफलत्वात्।
अत्र सामान्यमनुष्याणां जघन्यायुःस्थितिप्रमाणं क्षुद्रभवग्रहणं भवति, तत्रापर्याप्तानां संभवात्। पर्याप्त-मनुष्य-मनुष्यिनीषु जघन्यायुःस्थितिप्रमाणमंतर्मुहूर्तं, तत्र ततः अधः आयुःस्थितिविकल्पानामनुपलंभात्। जघन्यकालमेतत्।
उत्कर्षेण-अविवक्षितपर्यायेभ्यः आगत्य विवक्षितमनुष्येषूत्पद्य सप्तचत्वािंरशत्-त्रयोविंशति-सप्तपूर्वकोटिप्रमाणं यथाक्रमेण परिभ्रम्य दानेन दानानुमोदेन वा त्रिपल्योपमायुःस्थितिकमनुष्येषु भोगभूमिषु उत्पन्नस्य तदुपलंभात्।
संप्रति लब्ध्यपर्याप्तमनुष्याणां कालप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
मणुसअपज्जत्ता केवचिरं कालादो होंति ?।।२२।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।२३।।
उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं।।२४।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-अनर्पितपर्यायेभ्यः आगत्य लब्ध्यपर्याप्तकमनुष्येषूत्पद्य कदलीघातेन भुज्यमा-नायुःघातेन क्षुद्रभवग्रहणप्रमाणकालं स्थित्वा ततो निर्गत्य अनर्पितपर्यायेषूत्पन्नस्य जीवस्य सूत्रोक्तकालस्य प्राप्तिर्भवति। जघन्यकालमेतत्।
उत्कर्षेण अतिबारमेतेषु अपर्याप्तमनुष्येषु अतिदीर्घायुः भूत्वा उत्पन्नस्यापि घटिकाद्वयमात्रभवस्थितेः अभावात्।
एवं तृतीयान्तरस्थले मनुष्याणां कालप्रतिपादनत्वेन सूत्रषट्कं गतम्।
संप्रति सामान्येन देवानां कालव्यवस्थानिरूपणाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
देवगदीए देवा केवचिरं कालादो होंति ?।।२५।।
जहण्णेण दसवाससहस्साणि।।२६।।
उक्कस्सेण तेत्तीसं सागरोवमाणि।।२७।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-तिर्यग्भ्यः मनुष्येभ्यः वा आगत्य जघन्यायुःस्थितिमद्देवेषूत्पद्य निर्गतस्य एतावन्मात्रकालोपलंभात्। देवानां सामान्येन जघन्यायुः दशसहस्रवर्षप्रमाणं । उत्कर्षेण-सर्वार्थसिद्धिदेवेषु आयुर्बद्ध्वा क्रमेण तत्रोत्पद्य त्रयस्त्रिंशत्-सागरोपमप्रमाणं तत्र स्थित्वा निर्गतस्य उत्कृष्टायुरुपलंभात्।
कश्चिदाह-सप्ताष्टभवग्रहणपर्यंतं दीर्घायुःस्थितिकेषु देवेषु उत्पादिते कालो बहुशो लभ्यते इति चेत् ?
आचार्यदेवः समाधत्ते-नैतद् वक्तव्यं, किंच-देवानां नारकाणां भोगभूमितिरश्चां भोगभूमिमनुष्याणां च मृतानां पुनः तत्रैवानंतरमुत्पत्तेरभावात्।
कुतः ?
अत्यन्ताभावादिति।
संप्रति भवनत्रिकदेवानां कालनिरूपणाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
भवणवासिय-वाणवेंतर-जोदिसियदेवा-केवचिरं कालादो होंति ?।।२८।।
'जहण्णेण दसवाससहस्साणि, दसवासहस्साणि, पलिदोवमस्स अट्ठम-भागो।।२९।। '
उक्कस्सेण सागरोवमं सादिरेयं, पलिदोवमं सादिरेयं, पलिदोवमं सादिरेयं।।३०।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-भवनवासिनां वानव्यन्तराणां च जघन्यायुः स्थितिः दशसहस्रवर्षाणि। ज्योतिष्कदेवानां पल्योपमस्याष्टमभागः।

उत्कर्षेण-भवनवासिनां आयुःस्थितिः अद्र्धसागरोपमाधिकं एकसागरोपमं। वानव्यन्तराणां ज्योतिष्कानां चार्धपल्योपममधिकं एकपल्योपमं। एतेषु त्रिष्वपि देवलोकेषु जघन्यायुषः आरभ्य उत्कृष्टायुःपर्यंतं उत्तरोत्तरं एकैकसमयाधिकेन क्रमेणायुः वर्धते, किंचात्र प्रस्तराणामभावात्।

[सम्पादन]
अब तिर्यंचगति में सामान्य तिर्यंचों का काल प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

तिर्यंचगति में जीव कितने काल तक रहते हैं ?।।१०।।

तिर्यंच गति में तिर्यंच जीव वहाँ जघन्य से क्षुद्रभव ग्रहण काल तक रहते हैं।।११।।

तिर्यंच जीव उत्कृष्ट से अनन्तकाल तक रहते हैं, जो असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन प्रमाण है।।१२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त सूत्रों का अर्थ सुगम है। मनुष्यगति से आकर तिर्यंच अपर्याप्तकों में उत्पन्न होकर वहाँ जघन्य आयु स्थिति प्रमाण काल तक रहकर वहाँ से निकलने वाले जीव के क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण जघन्य काल पाया जाता है।

उत्कृष्टरूप से अविवक्षित गतियों से आकर तिर्यंचों में उत्पन्न होकर आवली के असंख्यातवें भाग प्रमाण पुद्गलपरिवर्तन काल तक तिर्यंचों में परिभ्रमण करके अन्यगति में जाने वाले जीव के सूत्रोक्त असंख्यात पुद्गलपरिवर्तनप्रमाण अनन्तकाल पाया जाता है। यहाँ असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन कहने पर आवली के असंख्यातवें भाग प्रमाण ही वे पुद्गल परिवर्तन होते हैं।

शंका-असंख्यात पुद्गलपरिवर्तनों का तात्पर्य आवली के असंख्यातवेें भाग प्रमाण ही है, इससे अधिक नहीं, यह कैसे जाना जाता है?

समाधान-आचार्य परम्परागत उपदेश से यह जाना जाता है कि आवली के असंख्यातवें भाग मात्र अधिक नहीं है।

जघन्यकालरूप क्षुद्रभवग्रहण का कितना प्रमाण होता है ? इस प्रश्न के उत्तर में कहते हैं-

गाथार्थ-निगोदस्थान में निगोदिया जीव एक अन्तर्मुहूर्त में छ्यासठ हजार तीन सौ छत्तीस (६६३३६) बार मरण करते हैं।।२८।।

विकलेन्द्रिय जीव क्रमश: अस्सी, साठ और चालिस बार अर्थात् एक अन्तर्मुहूर्त में दो इंद्रिय जीव अस्सी बार मरण करते हैं, तीन इन्द्रिय जीव साठ बार मरते हैं और चार इन्द्रिय जीव चालिस बार मरते हैं तथा पंचेन्द्रिय जीव एक अन्तर्मुहूर्त में चौबिस बार मरण करते हैं, ये ही इनके क्षुद्रभव जानना चाहिए।।२९।।

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अब तीन प्रकार के पंचेन्द्रिय तिर्यंचों का कालनिरूपण करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त व पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिमती जीव वहाँ कितने काल तक रहते हैं ?।।१३।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहण काल तक व पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त व पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिमती अन्तर्मुहूर्तकाल तक रहते हैं।।१४।।

उत्कृष्टकाल पूर्वकोटि पृथक्त्व से अधिक तीन पल्योपमप्रमाण काल तक पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पंचेन्द्रिय पर्याप्त व पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिमती जीव रहते हैं।।१५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त तीनों सूत्रों का अर्थ सुगम है। सामान्य पंचेन्द्रिय तिर्यंचों का जघन्यकाल क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण है, कारण कि पंचेन्द्रिय तिर्यंचो में अपर्याप्त जीवों का होना संभव है। शेष दोनों प्रकार के पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त एवं स्त्रीवेदी तिर्यंचों का प्रमाण काल अन्तर्मुहूर्त है, क्योंकि उनमें अपर्याप्त नहीं होते। अपर्याप्त जीवों में जघन्यायु स्थिति का प्रमाण क्षुद्रभवग्रहणकाल नहीं होता है, अर्थात् उससे अधिक होता है, क्योंकि यदि पर्याप्त काल के जघन्य आयु प्रमाण भी क्षुद्रभवग्रहणकाल मात्र होता तो प्रस्तुत सूत्र में अन्तर्मुहूर्त काल के उपदेश के निरर्थक होने का प्रसंग आ जाता। यह जघन्य काल की अपेक्षा वर्णन किया गया है।

उत्कृष्ट से-पंचेन्द्रियों को छोड़कर एकेन्द्रिय आदि अन्य जातीय जीवों में से आकर पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त व पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिमती जीवों में उत्पन्न होकर क्रमश: पंचानवे, सैंतालीस व पन्द्रह पूर्व कोटिप्रमाण तक परिभ्रमण करके दान देने से अथवा दान का अनुमोदन करने से तीन पल्योपम की आयु स्थिति वाले भोगभूमिज तिर्यंचों में उत्पन्न होकर अपनी आयु स्थिति प्रमाण काल तक वहाँ रहकर देवों में उत्पन्न होने वाले जीव के सूत्र्रोक्त काल घटित होता हुआ पाया जाता है।

शंका-तिर्यंचों में दान देना कैसे संभव है?

समाधान-नहीं, क्योंकि जो तिर्यंच संयतासंयत जीव सचित्तभंजन के प्रत्याख्यान अर्थात् त्यागव्रत को ग्रहण कर लेते हैं उनके लिए शल्लकी के पत्तों आदि का दान करने वाले तिर्यंचों के दान देने में कोई विरोध नहीं आता है।

धवला टीका में कहा है-जो संयतासंयत तिर्यंच जीव सचित्तभंजन के प्रत्याख्यान करने वाले तिर्यंचों के लिए शल्लकी पत्ते आदि लाकर उन्हें देते हैं, उनके दान देने में कोई विरोध नहीँ आता है।

शंका-स्त्री, पुरुष व नपुंसकवेदी पंचेन्द्रिय तिर्यंचों में आठ-आठ पूर्वकोटिप्रमाण काल तक ही जीव रहता है यह कैसे जाना जाता है ?

समाधान-आचार्य परम्परागत उपदेश से यह जाना जाता है।

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अब पंचेन्द्रिय अपर्याप्त तिर्यंचों के कालकथन हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्त जीव वहाँ कितने काल तक रहते हैं ?।।१६।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहण काल तक जीव पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्त रहते हैं।।१७।।

उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त काल तक जीव पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्त रहते हैं।।१८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-किन्हीं भी अविवक्षित पर्यायोें से आकर पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्तकों में उत्पन्न होकर व सर्वजघन्य काल से भुज्यमान आयु को कदलीघात से नष्ट करके क्षुद्रभवग्रहण काल प्रमाणकाल तक रहकर निकल जाने वाले जीव के उपर्युक्त काल पाया जाता है।

यहाँ कोई शंका करता है कि-कदलीघात से भुज्यमान आयु को नष्ट करने वाले पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्तकों में क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण काल क्यों नहीं पाया जाता है ?

आचार्य इसका समाधान देते हैं कि-ऐसा नहीं है, क्योंकि पर्याप्तकों में बहुत अच्छी तरह आयु का घात करने वाले जीव के भी अन्तर्मुहूर्त भुज्यमान आयु का इससे कम में पतन नहीं होता है।

शंका-देव और नारकी जीवों में क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण अथवा अन्तर्मुहूर्तप्रमाण आयु स्थिति क्यों नहीं पाई जाती है ?

समाधान-नहीं पाई जाती है, क्योंकि देव और नारकियों संबंधी आयु का बंध दश हजार वर्ष से कम नहीं होता है और उनकी भुज्यमान आयु का कदलीघात भी नहीं होता है। यह कथन जघन्य स्थिति की अपेक्षा है।

उत्कृष्टरूप से-किन्हीं भी अविवक्षित पर्यायों से आकर पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्तकों में उत्पन्न होकर और वहाँ सर्वोत्कृष्ट भवस्थितिप्रमाण काल तक रहकर निकलने वाले जीव के भी अन्तर्मुहूर्त से अधिक काल नहीं पाया जाता है।

इस प्रकार तिर्यंचगति नाम के द्वितीय अन्तर स्थल में नौ सूत्र पूर्ण हुए।

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अब तीन प्रकार के मनुष्यों का काल प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

(मनुष्यगति में) मनुष्य, मनुष्य पर्याप्त व मनुष्यिनी जीव वहाँ कितने काल तक रहते हैं ?।।१९।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहण काल तक जीव मनुष्य और अन्तर्मुहूर्त काल तक मनुष्य पर्याप्त व मनुष्यिनी रहते हैं।।२०।।

उत्कृष्ट से पूर्वकोटिपृथक्त्व से अधिक तीन पल्योपम काल तक जीव मनुष्य, मनुष्यपर्याप्त व मनुष्यिनी रहते हैं।।२१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीकाउपर्युक्त सभी सूत्रों का अर्थ सुगम है।

यहाँ कोई शंका करता है कि-

इस अधिकार में एक जीव का कालानुगम बतलाये जाने पर ‘मनुष्य कितने काल तक रहता है’ ऐसा एक जीव विषयक ही प्रश्न पूछा जाना चाहिए ?

आचार्यदेव इस शंका का समाधान करते हैं कि-

ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि एक व अनेक संख्या से उपलक्षित जीव में अशुद्ध द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा अनेकपने का कोई विरोध नहीं उत्पन्न होता।

शंका-सर्वत्र पृच्छापूर्वक ही अर्थ का निर्देश क्यों किया जा रहा है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि वचनप्रवृत्ति का फल पर के लिए प्रतिपादन करना है।

यहाँ सामान्य मनुष्यों की जघन्य आयु स्थिति का प्रमाण क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण होता है, क्योंकि सामान्य मनुष्यों में अपर्याप्त जीवों का होना संभव है। किन्तु पर्याप्तक मनुष्य और मनुष्यिनियों में जघन्य आयु स्थिति का प्रमाण अन्तर्मुहूर्त है, क्योंकि उनमें (अपर्याप्तकों के अभाव से) आयु स्थिति के विकल्प अन्तर्मुहूर्त से कम के नहीं पाये जाते। यह कथन जघन्य काल की अपेक्षा है।

उत्कृष्ट की अपेक्षा-किन्हीं भी अविवक्षित पर्यायों से लेकर विवक्षित मनुष्यों में उत्पन्न होकर क्रमश: सैंतालीस, तेईस व सात पूर्वकोटि काल परिभ्रमण करके दान देकर अथवा दान का अनुमोदन करके तीन पल्योपम आयु स्थिति वाले भोगभूमिज मनुष्यों में उत्पन्न हुए जीव के सूत्रोक्त काल पाया जाता है।

[सम्पादन]
अब लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्यों का काल बतलाने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

अपर्याप्तक मनुष्य वहाँ कितने काल तक रहते हैं ?।।२२।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण काल तक जीव अपर्याप्त मनुष्य रहते हैं।।२३।।

उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त काल तक अपर्याप्त मनुष्य रहते हैं।।२४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-किन्हीं भी अन्य पर्यायों से आकर अपर्याप्त मनुष्यों में उत्पन्न होकर कदलीघात से भुज्यमान आयु के घात द्वारा क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण काल तक रहकर व वहाँ से निकलकर किसी भी अन्य पर्याय में उत्पन्न होने वाले जीव के सूत्रोक्त काल की प्राप्ति होती है। यह कथन जघन्य काल की अपेक्षा है।

उत्कृष्ट से अनेकों बार अपर्याप्त मनुष्यों में अतिदीर्घायु होकर भी उत्पन्न हुए जीव के दो घड़ी प्रमाण काल तक भवस्थिति का होना असंभव है।

इस प्रकार तृतीय अन्तरस्थल में मनुष्यों का काल प्रतिपादन करने वाले छह सूत्र पूर्ण हुए।

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अब सामान्य से देवों की काल व्यवस्था का निरूपण करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

देवगति में देव वहाँ कितने काल तक रहते हैं ?।।२५।।

जघन्य से दश हजार वर्ष तक जीव देवगति में रहते हैं।।२६।।

उत्कृष्ट से तेंतीस सागरोपमकाल तक जीव देवगति में रहते हैं।।२७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तिर्यंचों में या मनुष्यों में से आकर जघन्य आयु वाले देवों में उत्पन्न होकर वहाँ से निकले हुए जीव के सूत्रोक्त काल ही देवपर्याय में पाया जाता है। देवों में सामान्य से जघन्य आयु दश हजार वर्ष प्रमाण रहती है। उत्कृष्टरूप से-सर्वार्थसिद्धि विमानवासी देवों में आयु को बांधकर क्रमश: वहाँ उत्पन्न होकर व तेंतीस सागरोपम काल तक वहाँ रहकर निकले हुए जीव के उत्कृष्टकाल पाया जाता है।

यहाँ कोई शंका करता है कि-दीर्घायु स्थिति वाले देवों में सात-आठ भवों तक उत्पन्न कराने पर क्या और भी अधिक काल देवगति में पाया जा सकता है ?

आचार्य देव इसका समाधान देते हैं कि-ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि देव, नारकी, भोगभूमिज तिर्यंच और भोगभूमिज मनुष्य, इनके मरने पर पुन: उसी पर्याय में अनन्तर उत्पत्ति नहीं पाई जाती है, कारण कि उनके वहाँ पुन: उत्पन्न होने का अत्यंत अभाव है।

प्रश्न-ऐसा क्यों है ?

उत्तर-क्योंकि वहाँ उत्पन्न होने का अत्यंताभाव हो जाता है।

[सम्पादन]
अब भवनत्रिक देवों का कालनिरूपण करने हेतु तीन सूत्र अवतरित हो रहे हैं-

सूत्रार्थ-

भवनवासी वानव्यन्तर व ज्योतिषी देव वहाँ कितने काल तक रहते हैं ?।।२८।।

जघन्य से दश हजार वर्ष तक, दश हजार वर्ष तक तथा पल्योपम के अष्टम भाग काल तक जीव क्रमश: भवनवासी, वानव्यन्तर व ज्योतिषी देव रहते हैं।।२९।।

उत्कृष्ट से क्रमश: कुछ अधिक एक सागरोपम, कुछ अधिक एक पल्योपम व कुछ अधिक एक पल्योपम काल तक जीव भवनवासी, वानव्यन्तर व ज्योतिषी देव रहते हैं।।३०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-भवनवासी और वानव्यन्तर देवों की जघन्य आयु स्थिति दश हजार वर्ष है तथा ज्योतिषी देवों में जघन्य आयु स्थिति पल्योपम के आठवें भागप्रमाण है।

उत्कृष्ट से भवनवासी देवों में उत्कृष्ट आयु स्थिति का प्रमाण अर्ध सागरोपम अधिक एक सागरोपम होता है तथा वानव्यन्तर और ज्योतिषी देवों में अर्ध पल्योपम अधिक एक पल्योपम होता है। इन तीनों देवलोकों में जघन्यायु से लेकर उत्कृष्ट आयु पर्यन्त उत्तरोत्तर एक-एक समय अधिक क्रम से आयु बढ़ती है, क्योंकि यहाँ प्रस्तरों का अभाव है।

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अब तीन प्रकार के पंचेन्द्रिय तिर्यंचों का कालनिरूपण करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त व पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिमती जीव वहाँ कितने काल तक रहते हैं ?।।१३।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहण काल तक व पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त व पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिमती अन्तर्मुहूर्तकाल तक रहते हैं।।१४।।

उत्कृष्टकाल पूर्वकोटि पृथक्त्व से अधिक तीन पल्योपमप्रमाण काल तक पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पंचेन्द्रिय पर्याप्त व पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिमती जीव रहते हैं।।१५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त तीनों सूत्रों का अर्थ सुगम है। सामान्य पंचेन्द्रिय तिर्यंचों का जघन्यकाल क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण है, कारण कि पंचेन्द्रिय तिर्यंचो में अपर्याप्त जीवों का होना संभव है। शेष दोनों प्रकार के पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त एवं स्त्रीवेदी तिर्यंचों का प्रमाण काल अन्तर्मुहूर्त है, क्योंकि उनमें अपर्याप्त नहीं होते। अपर्याप्त जीवों में जघन्यायु स्थिति का प्रमाण क्षुद्रभवग्रहणकाल नहीं होता है, अर्थात् उससे अधिक होता है, क्योंकि यदि पर्याप्त काल के जघन्य आयु प्रमाण भी क्षुद्रभवग्रहणकाल मात्र होता तो प्रस्तुत सूत्र में अन्तर्मुहूर्त काल के उपदेश के निरर्थक होने का प्रसंग आ जाता। यह जघन्य काल की अपेक्षा वर्णन किया गया है।

उत्कृष्ट से-पंचेन्द्रियों को छोड़कर एकेन्द्रिय आदि अन्य जातीय जीवों में से आकर पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त व पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिमती जीवों में उत्पन्न होकर क्रमश: पंचानवे, सैंतालीस व पन्द्रह पूर्व कोटिप्रमाण तक परिभ्रमण करके दान देने से अथवा दान का अनुमोदन करने से तीन पल्योपम की आयु स्थिति वाले भोगभूमिज तिर्यंचों में उत्पन्न होकर अपनी आयु स्थिति प्रमाण काल तक वहाँ रहकर देवों में उत्पन्न होने वाले जीव के सूत्र्रोक्त काल घटित होता हुआ पाया जाता है।

शंका-तिर्यंचों में दान देना कैसे संभव है?

समाधान-नहीं, क्योंकि जो तिर्यंच संयतासंयत जीव सचित्तभंजन के प्रत्याख्यान अर्थात् त्यागव्रत को ग्रहण कर लेते हैं उनके लिए शल्लकी के पत्तों आदि का दान करने वाले तिर्यंचों के दान देने में कोई विरोध नहीं आता है।

धवला टीका में कहा है-जो संयतासंयत तिर्यंच जीव सचित्तभंजन के प्रत्याख्यान करने वाले तिर्यंचों के लिए शल्लकी पत्ते आदि लाकर उन्हें देते हैं, उनके दान देने में कोई विरोध नहीं आता है।

शंका-स्त्री, पुरुष व नपुंसकवेदी पंचेन्द्रिय तिर्यंचों में आठ-आठ पूर्वकोटिप्रमाण काल तक ही जीव रहता है यह कैसे जाना जाता है ?

समाधान-आचार्य परम्परागत उपदेश से यह जाना जाता है।

[सम्पादन]
अब पंचेन्द्रिय अपर्याप्त तिर्यंचों के कालकथन हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्त जीव वहाँ कितने काल तक रहते हैं ?।।१६।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहण काल तक जीव पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्त रहते हैं।।१७।।

उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त काल तक जीव पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्त रहते हैं।।१८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-किन्हीं भी अविवक्षित पर्यायोें से आकर पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्तकों में उत्पन्न होकर व सर्वजघन्य काल से भुज्यमान आयु को कदलीघात से नष्ट करके क्षुद्रभवग्रहण काल प्रमाणकाल तक रहकर निकल जाने वाले जीव के उपर्युक्त काल पाया जाता है।

यहाँ कोई शंका करता है कि-कदलीघात से भुज्यमान आयु को नष्ट करने वाले पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्तकों में क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण काल क्यों नहीं पाया जाता है ?

आचार्य इसका समाधान देते हैं कि-ऐसा नहीं है, क्योंकि पर्याप्तकों में बहुत अच्छी तरह आयु का घात करने वाले जीव के भी अन्तर्मुहूर्त भुज्यमान आयु का इससे कम में पतन नहीं होता है।

शंका-देव और नारकी जीवों में क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण अथवा अन्तर्मुहूर्तप्रमाण आयु स्थिति क्यों नहीं पाई जाती है ?

समाधान-नहीं पाई जाती है, क्योंकि देव और नारकियों संबंधी आयु का बंध दश हजार वर्ष से कम नहीं होता है और उनकी भुज्यमान आयु का कदलीघात भी नहीं होता है। यह कथन जघन्य स्थिति की अपेक्षा है।

उत्कृष्टरूप से-किन्हीं भी अविवक्षित पर्यायों से आकर पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्तकों में उत्पन्न होकर और वहाँ सर्वोत्कृष्ट भवस्थितिप्रमाण काल तक रहकर निकलने वाले जीव के भी अन्तर्मुहूर्त से अधिक काल नहीं पाया जाता है।

इस प्रकार तिर्यंचगति नाम के द्वितीय अन्तर स्थल में नौ सूत्र पूर्ण हुए।

[सम्पादन]
अब तीन प्रकार के मनुष्यों का काल प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

(मनुष्यगति में) मनुष्य, मनुष्य पर्याप्त व मनुष्यिनी जीव वहाँ कितने काल तक रहते हैं ?।।१९।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहण काल तक जीव मनुष्य और अन्तर्मुहूर्त काल तक मनुष्य पर्याप्त व मनुष्यिनी रहते हैं।।२०।।

उत्कृष्ट से पूर्वकोटिपृथक्त्व से अधिक तीन पल्योपम काल तक जीव मनुष्य, मनुष्यपर्याप्त व मनुष्यिनी रहते हैं।।२१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीकाउपर्युक्त सभी सूत्रों का अर्थ सुगम है।

यहाँ कोई शंका करता है कि-

इस अधिकार में एक जीव का कालानुगम बतलाये जाने पर ‘मनुष्य कितने काल तक रहता है’ ऐसा एक जीव विषयक ही प्रश्न पूछा जाना चाहिए ?

आचार्यदेव इस शंका का समाधान करते हैं कि-

ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि एक व अनेक संख्या से उपलक्षित जीव में अशुद्ध द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा अनेकपने का कोई विरोध नहीं उत्पन्न होता।

शंका-सर्वत्र पृच्छापूर्वक ही अर्थ का निर्देश क्यों किया जा रहा है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि वचनप्रवृत्ति का फल पर के लिए प्रतिपादन करना है।

यहाँ सामान्य मनुष्यों की जघन्य आयु स्थिति का प्रमाण क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण होता है, क्योंकि सामान्य मनुष्यों में अपर्याप्त जीवों का होना संभव है। किन्तु पर्याप्तक मनुष्य और मनुष्यिनियों में जघन्य आयु स्थिति का प्रमाण अन्तर्मुहूर्त है, क्योंकि उनमें (अपर्याप्तकों के अभाव से) आयु स्थिति के विकल्प अन्तर्मुहूर्त से कम के नहीं पाये जाते। यह कथन जघन्य काल की अपेक्षा है।

उत्कृष्ट की अपेक्षा-किन्हीं भी अविवक्षित पर्यायों से लेकर विवक्षित मनुष्यों में उत्पन्न होकर क्रमश: सैंतालीस, तेईस व सात पूर्वकोटि काल परिभ्रमण करके दान देकर अथवा दान का अनुमोदन करके तीन पल्योपम आयु स्थिति वाले भोगभूमिज मनुष्यों में उत्पन्न हुए जीव के सूत्रोक्त काल पाया जाता है।

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अब लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्यों का काल बतलाने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

अपर्याप्तक मनुष्य वहाँ कितने काल तक रहते हैं ?।।२२।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण काल तक जीव अपर्याप्त मनुष्य रहते हैं।।२३।।

उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त काल तक अपर्याप्त मनुष्य रहते हैं।।२४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-किन्हीं भी अन्य पर्यायों से आकर अपर्याप्त मनुष्यों में उत्पन्न होकर कदलीघात से भुज्यमान आयु के घात द्वारा क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण काल तक रहकर व वहाँ से निकलकर किसी भी अन्य पर्याय में उत्पन्न होने वाले जीव के सूत्रोक्त काल की प्राप्ति होती है। यह कथन जघन्य काल की अपेक्षा है।

उत्कृष्ट से अनेकों बार अपर्याप्त मनुष्यों में अतिदीर्घायु होकर भी उत्पन्न हुए जीव के दो घड़ी प्रमाण काल तक भवस्थिति का होना असंभव है।

इस प्रकार तृतीय अन्तरस्थल में मनुष्यों का काल प्रतिपादन करने वाले छह सूत्र पूर्ण हुए।

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अब सामान्य से देवों की काल व्यवस्था का निरूपण करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

देवगति में देव वहाँ कितने काल तक रहते हैं ?।।२५।।

जघन्य से दश हजार वर्ष तक जीव देवगति में रहते हैं।।२६।।

उत्कृष्ट से तेंतीस सागरोपमकाल तक जीव देवगति में रहते हैं।।२७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तिर्यंचों में या मनुष्यों में से आकर जघन्य आयु वाले देवों में उत्पन्न होकर वहाँ से निकले हुए जीव के सूत्रोक्त काल ही देवपर्याय में पाया जाता है। देवों में सामान्य से जघन्य आयु दश हजार वर्ष प्रमाण रहती है। उत्कृष्टरूप से-सर्वार्थसिद्धि विमानवासी देवों में आयु को बांधकर क्रमश: वहाँ उत्पन्न होकर व तेंतीस सागरोपम काल तक वहाँ रहकर निकले हुए जीव के उत्कृष्टकाल पाया जाता है।

यहाँ कोई शंका करता है कि-दीर्घायु स्थिति वाले देवों में सात-आठ भवों तक उत्पन्न कराने पर क्या और भी अधिक काल देवगति में पाया जा सकता है ?

आचार्य देव इसका समाधान देते हैं कि-ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि देव, नारकी, भोगभूमिज तिर्यंच और भोगभूमिज मनुष्य, इनके मरने पर पुन: उसी पर्याय में अनन्तर उत्पत्ति नहीं पाई जाती है, कारण कि उनके वहाँ पुन: उत्पन्न होने का अत्यंत अभाव है।

प्रश्न-ऐसा क्यों है ?

उत्तर-क्योंकि वहाँ उत्पन्न होने का अत्यंताभाव हो जाता है।

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अब भवनत्रिक देवों का कालनिरूपण करने हेतु तीन सूत्र अवतरित हो रहे हैं-

सूत्रार्थ-

भवनवासी वानव्यन्तर व ज्योतिषी देव वहाँ कितने काल तक रहते हैं ?।।२८।।

जघन्य से दश हजार वर्ष तक, दश हजार वर्ष तक तथा पल्योपम के अष्टम भाग काल तक जीव क्रमश: भवनवासी, वानव्यन्तर व ज्योतिषी देव रहते हैं।।२९।।

उत्कृष्ट से क्रमश: कुछ अधिक एक सागरोपम, कुछ अधिक एक पल्योपम व कुछ अधिक एक पल्योपम काल तक जीव भवनवासी, वानव्यन्तर व ज्योतिषी देव रहते हैं।।३०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-भवनवासी और वानव्यन्तर देवों की जघन्य आयु स्थिति दश हजार वर्ष है तथा ज्योतिषी देवों में जघन्य आयु स्थिति पल्योपम के आठवें भागप्रमाण है।

उत्कृष्ट से भवनवासी देवों में उत्कृष्ट आयु स्थिति का प्रमाण अर्ध सागरोपम अधिक एक सागरोपम होता है तथा वानव्यन्तर और ज्योतिषी देवों में अर्ध पल्योपम अधिक एक पल्योपम होता है। इन तीनों देवलोकों में जघन्यायु से लेकर उत्कृष्ट आयु पर्यन्त उत्तरोत्तर एक-एक समय अधिक क्रम से आयु बढ़ती है, क्योंकि यहाँ प्रस्तरों का अभाव है।

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इदानीं सौधर्मैशानादिसहस्रारकल्पवासिनां कालप्ररूपणाय सूत्रत्रयमवतार्यते-

सोहम्मीसाणप्पहुडि जाव सदर-सहस्सारकप्पवासियदेवा केवचिरं कालादो होंति ?।।३१।।

जहण्णेण पलिदोवमं वे सत्त दस चोद्दस सोलस सागरोवमाणि सादिरेयाणि।।३२।।
उक्कस्सेण वे सत्त दस चोद्दस सोलस अट्ठारस सागरोवमाणि सादिरेयाणि।।३३।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सौधर्मैशानयोः सार्धैकपल्योपमं जघन्यायुः। सानत्कुमारमाहेन्द्रयोः सार्धद्वय-सागरोपमं, ब्रह्म-ब्रह्मोत्तरयोः सार्धसप्तसागरोपमं, लान्तव-कापिष्ठयोः सार्धदशसागरोपमं, शुक्रमहाशुक्रयोः सार्धचतुर्दशसागरोपमं, शतारसहस्रारयोः सार्धषोडशसागरोपमं च जघन्यायुः कथितं ।
उत्कर्षेण-सौधर्मैशानयोः सार्धद्वयसागरोपमानि देशोनानि, सनत्कुमारमाहेन्द्रयोः सार्धसप्तसागरोपमाणि देशोनानि, ब्रह्म-ब्रह्मोत्तरयोः सार्धदशसागरोपमाणि देशोनानि, लांतवकापिष्ठयोः सार्धचतुर्दशसागरोपमाणि किञ्चिन्न्यूनानि, शुक्रमहाशुक्रयोः सार्धषोडशसागरोपमाणि किञ्चिदूनानि, शतार-सहस्रारयोः सार्धाष्टादश-सागरोपमाणि किञ्चिन्न्यूनानि। अत्र किञ्चिन्न्यूनप्रमाणं आगमग्रन्थाद् ज्ञात्वा वक्तव्यं। एते द्वे अपि सूत्रे देशामर्शके स्तः। तेन एताभ्यां सूचितार्थस्य प्ररूपणा क्रियते। तद्यथा-
सौधर्मैशानकल्पयोः एकत्रिंशत्प्रस्तराणि संति-ऋतु-विमल-चंद्र-वल्गु-वीर-अरुण-नन्दन-नलिन-काञ्चन-रुधिर-चञ्च-मरुत्-ऋध्दीश-वैडूर्य-रुचक-रुचिर-अंक-स्फटिक-तपनीय-मेघ-अभ्र-हरित-पद्म-लोहितांक-वरिष्ठ-नंदावर्त-प्रभंकर-पिष्टाक-गज-मित्र-प्रभाख्यानि-संति। अत्र ऋतुनामप्रथमप्रस्तरे जघन्यायुः-सार्धैकपल्योपमं, उत्कृष्टमर्धसागरोपमं। अधुनात्र त्रिशदिन्द्रकाणां वृद्धिरुच्यते-तत्रार्धसागरोपमं मुखं भवति, साद्र्धद्वयसागरोपमाणि भूमिः। भूमितः मुखमपनीय उच्छ्रयेण भागे हिते सागरोपमस्य पञ्चदशभागो वृद्धिर्भवति। इदमिच्छितप्रस्तरसंख्यया गुणयित्वा मुखे प्रक्षिप्ते विमलादीनां त्रिंशत्प्रस्तराणां आयूंषि भवन्ति।
कश्चिदाह-सौधर्मैशानयोः एकत्रिंशत्प्रस्तराणि इति कथं ज्ञायते ?
उच्यते- ‘‘इगतीस सत्त चत्तारि दोण्णि एक्केक्क छक्क एक्काए ।
उदुआदिविमाणिंदा तिरधियसट्ठी मुणेयव्वा।।’’
इति आर्षवचनाद् ज्ञायते।
अञ्जन-वनमाल-नाग-गरुड-लांगल-बलभद्र-चक्राख्यानि इमानि सप्तप्रस्तराणि सनत्कुमार-माहेन्द्रकल्पयोः संति। एतेषामायुःप्रमाणे आनीयमाने मुखं सार्धद्वय सागरोपमाणि, भूमिः सार्धसप्तसागरोपमाणि, सप्त उत्सेधः भवति। पूर्ववत् गणितं ज्ञातव्यं।
अरिष्ट-देवसमित-ब्रह्म-ब्रह्मोत्तरनामानि चत्वारि प्रस्तराणि ब्रह्म-ब्रह्मोत्तरकल्पयोः। अत्रारिष्टे सागरोपमाणि देवसमिते नवसागरोपमाणि, ब्रह्मप्रस्तरे सागरोपमाणि, ब्रह्मोत्तरप्रस्तरे सागरोपमाणि।
लांतवकापिष्ठयोः ब्रह्मनिलय-लांतवनामनी-द्वे प्रस्तरे स्तः। अत्र ब्रह्मनिलये सार्धद्वादशसागरोपमाणि, लांतवप्रस्तरे सार्धचतुर्दशसागरोपमाणि।
शुक्रमहाशुक्रयोः महाशुक्रनाम एकप्रस्तरं, तत्रायुःप्रमाणं सार्धषोडशसागरोपमाणि।
शतार-सहस्रारयोः सहस्रारनाम एकप्रस्तरं। तत्रायुः सार्धाष्टादशसागरोपमं ज्ञातव्यं।
संप्रति आनतादिसर्वार्थसिद्धिपर्यंतदेवानां आयुःप्रतिपादनाय सूत्रपंचकमवतार्यते-
आणदप्पहुडि जाव अवराइदविमाणवासियदेवा केवचिरं कालादो होंति ?।।३४।।
जहण्णेण अट्ठारस वीसं बावीसं तेवीसं चउवीसं पणुवीसं छव्वीसं सत्तावीसं अट्ठावीसं एगुणत्तीसं तीसं एक्कत्तीसं बत्तीसं सागरोवमाणि सादिरेयाणि।।३५।।
उक्कस्सेण वीसं बावीसं तेवीसं चउवीसं पणुवीसं छव्वीसं सत्तावीसं अट्ठावीसं एगुणत्तीसं तीसं एक्कत्तीसं बत्तीसं तेत्तीसं सागरोवमाणि।।३६।।
सव्वट्ठसिद्धियविमाणवासियदेवा केवचिरं कालादो होंति ?।।३७।।
जहण्णुक्कस्सेण तेत्तीस सागरोवमाणि।।३८।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थः सुगमोऽस्ति। आनत-प्राणतकल्पयोः सार्धाष्टदशसागरोपमप्रमाणानि। आरणाच्युतकल्पयोः समयाधिकविंशति-सागरोपमाणि। उपरि यथाक्रमेण नवग्रैवेयकेषु द्वाविंशति-त्रयो- विंशति-चतुर्विंशति-पंचविंशति-षड्विंशति-सप्तिंवशति-अष्टाविंशति-एकोनत्रिंशत्-त्रिंशत्-सागरोपमाणि समयाधिकानि। नवानुदिशेषु एकत्रिंशत्सागरोपमाणि समयाधिकानि। चतुःषु अनुत्तरेषु द्वात्रिंशत्सागरोपमाणि समयाधिकानि, जघन्यायुरेतत्कथितं।
उत्कर्षेण-आनत-प्राणतकल्पयोः आनत-प्राणत-पुष्पकनामानि त्रीणि प्रस्तराणि। आनतप्रस्तरे एकोनविंशतिसागरोपमाणि, प्राणतप्रस्तरे सार्धेन एकोनविंशतिसागरोपमाणि, पुष्पकप्रस्तरे विंशतिसागरो-पमाणि।
आरणाच्युतकल्पयोः सातंकर-आरण-अच्युतनामानि त्रिप्रस्तराणि।सातंकरे सागरोपमाणि, आरणे सागरोपमाणि, अच्युतप्रस्तरे द्वाविंशतिसागरोपमाणि।
एभ्य: उपरि नवग्रैवेयकेषु सुदर्शन-अमोघ-सुप्रबुद्ध-यशोधर-सुभद्र-सुविशाल-सुमनस् - सौमनस-प्रीतिंकरनामानि नवपटलानि। एषु पटलेषु वृद्धिहानी न स्तः, प्रत्येकं एकैकप्रस्तरस्य प्राधान्यात्। अस्यायमर्थः—प्रथमग्रैवेयके त्रयोविंशतिसागरप्रमाणं, अग्रे एकैकवृद्ध्या अंतिमग्रैवेयके एकत्रिंशत्सागरप्रमाणमुत्कृष्टायुः अस्ति।
नवानुदिशेषु आदित्यो नाम एक एव पटलं। तस्मिन्नायुः द्वात्रिंशत्सागरप्रमाणमायुः कथितं।
पंचानुत्तरेषु सर्वार्थसिद्धिसंज्ञितः एकश्चैव इन्द्रकप्रस्तरं। विजय-वैजयंत-जयंतापराजितनाम्नां श्रेणिबद्ध-विमानानां जघन्यायुः समयाधिकद्वात्रिंशत्सागरोपममात्रं, उत्कृष्टायुः त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि।
पुनश्च जघन्योत्कृष्टभेदाभावात् सर्वार्थसिद्धिविमानस्य पृथक् प्ररूपणार्थं पृथगेव द्वे सूत्रे कथिते स्तः।
तात्पर्यमेतत्—सर्वार्थसिद्धौ जघन्योत्कृष्टं त्रयस्त्रिंशत्सागरोपममायुःप्रमाणम्।
इदानीं गतिमार्गणायाः उपसंहारः क्रियते-
चतुर्गतिजीवानां जघन्योत्कृष्टायुःप्रमाणं ज्ञात्वा नारकायुभ्र्यः भीत्वा तिर्यगायुभ्र्योऽपि अपसृत्य मनुष्यायुः-देवायुषोः बंधं कृत्वा संसारपरिभ्रमणं निवारयितव्यं भव्यपुंगवैरिति।
इति श्रीषट्खण्डागमग्रन्थे क्षुद्रकबंधनामद्वितीयखण्डे एकजीवापेक्षया कालानुगमप्ररूपकः सिद्धांतचिंतामणिटीकायां गतिमार्गणानाम प्रथमोऽधिकारः समाप्तः।

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अब सौधर्म-ईशान स्वर्ग से लेकर सहस्रार स्वर्ग तक के कल्पवासी देवों का कालप्ररूपण करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

जीव सौधर्म-ईशान से लगाकर शतार-सहस्रार पर्यन्त कल्पवासी देव वहाँ कितने काल तक रहते हैं ?।।३१।।

जघन्य से कुछ अधिक एक पल्योपम, कुछ अधिक दो सागरोपम, कुछ अधिक सात सागरोपम, कुछ अधिक दश सागरोपम, कुछ अधिक चौदह सागरोपम व कुछ अधिक सोलह सागरोपम काल तक जीव सौधर्म-ईशान से लेकर शतार-सहस्रार तक के कल्पवासी देव रहते हैं।।३२।।

उत्कृष्ट से कुछ अधिक दो, कुछ अधिक सात, कुछ अधिक दश, कुछ अधिक चौदह, कुछ अधिक सोलह व कुछ अधिक अठारह सागरोपमकाल तक जीव सौधर्म-ईशान आदि कल्पों में रहते हैं।।३३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सौधर्म और ईशान स्वर्गों में डेढ़ पल्योपम जघन्य आयु है। सानत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्गोें में अढ़ाई सागरोपम, ब्रह्म और ब्रह्मोत्तर स्वर्गों में साढ़े सात सागरोपम, लांतव और कापिष्ठ स्वर्गों में साढ़े दश सागरोपम, शुक्र और महाशुक्र में साढ़े चौदह सागरोपम तथा शतार और सहस्रार स्वर्गों में साढ़े सोलह सागरोपम जघन्य आयु कही गई है।

उत्कृष्ट से-सौधर्म-ईशान कल्पों में कुछ कम ढ़ाई सागरोपम, सनत्कुमार-माहेन्द्र में कुछ कम साढ़े सात सागरोपम, ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर में कुछ कम साढ़े दस सागरोपम, लांतव-कापिष्ठ में कुछ कम साढ़े चौदह सागरोपम, शुक्र-महाशुक्र में कुछ कम साढ़े सोलह सागरोपम तथा शतार-सहस्रार कल्पों में कुछ कम साढ़े अठारह सागरोपम उत्कृष्ट आयु प्रमाण होता है। यहाँ कुछ कम का प्रमाण आगम ग्रंथों से जानकर कहना चाहिए। ये दोनों ही सूत्र देशामर्शक हैं। इसलिए इन दोनों सूत्रों के द्वारा सूचित अर्थ की प्ररूपणा करते हैं वह इस प्रकार है-

सौधर्म और ईशान कल्प में ३१ प्रस्तर हैं-ऋतु, विमल, चन्द्र, वल्गु, वीर, अरुण, नन्दन, नलिन, कांचन, रुधिर, चंच, मरुत (मारुतज्ञ), ऋद्धीश (द्वीश), वैडूर्य, रुचक, रुचिर, अंक, स्फटिक, तपनीय, मेघ अभ्र, हरित, पद्म, लोहितताड़क, वरिष्ठ, नंदावर्त, प्रभंकर, पिष्टाक, गज, मित्र और प्रभा इन नामों वाले हैं। इनमें से ऋतु नामक प्रथम प्रस्तर में जघन्य आुय डेढ़ पल्योपम व उत्कृष्ट आयु अर्ध सागरोपम प्रमाण है। अब यहाँ तीस इंद्रकों में वृद्धि का प्रमाण कहते हैं-वहाँ अर्ध सागरोपम मुख होता है और अढ़ाई सागरोपम भूमि है। अतएव भूमि में से वे मुख को घटाकर उच्छ्रय अर्थात् उत्सेध (३०) से भाग देने पर एक सागरोपम का पन्द्रहवाँ भाग वृद्धि का प्रमाण आता है। इसको अभीष्ट प्रस्तर की संख्या से गुणित करके मुख में मिला देने पर विमलादिक तीस प्रस्तरों की आयु का प्रमाण होता है।

यहाँ कोई शंका करता है कि-सौधर्म-र्ईशान कल्प में इकतीस विमान प्रस्तर हैं, यह कैसे जाना जाता है ?

उसका समाधान करते हैं कि-

गाथार्थ-सौधर्म-ईशान कल्पों में इकतीस विमान प्रस्तर हैं, सानत्कुमार-माहेन्द्र कल्पों में सात, ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर में चार, लांतव-कापिष्ठ में दो, शुक्र-महाशुक्र में एक, शतार-सस्रार में एक, आनत-प्राणत और आरण-अच्युत कल्पों में छह तथा नौ ग्रैवेयकोें में एक-एक, अनुदिशों में एक और अनुत्तर विमानों में एक इस प्रकार ऋतु आदिक इन्द्रक विमान तिरेसठ जानना चाहिए।

ऐसा इस आर्ष वचन से जाना जाता है।

अंजन, वनमाल, नाग, गरुड, लांगल, बलभद्र और चक्र ये सात प्रस्तर सनत्कुमार-माहेन्द्र कल्पों में हैं। उनमें आयु का प्रमाण लाने पर मुख ढाई सागरोपम, भूमि साढ़े सात सागरोपम और उत्सेध सात है। पूर्ववत् गणित को जानना चाहिए।

अरिष्ट, देवसमित, ब्रह्म और ब्रह्मोत्तर, ये चार विमान-प्रस्तर ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर कल्पों में हैं। उनमें से अरिष्ट में सवा आठ सागरोपम, देवसमित में ९ सागरोपम है, ब्रह्म प्रस्तर में ९ सही तीन बटे चार () सागरोपम और ब्रह्मोत्तर में साढ़े दश सागरोपम होता है।

लांतव-कापिष्ठ कल्पों में ब्रह्मनिलय और लांतव ये दो विमान प्रस्तर हैं। यहाँ ब्रह्म निलय में साढ़े बारह और लांतव प्रस्तर में साढ़े चौदह सागरोपम है।

शुक्र-महाशुक्र कल्पों में महाशुक्र नाम का एक ही प्रस्तर है। वहाँ आयु का प्रमाण सागरोपम है।

शतार-सहस्रार कल्पों में सहस्रार नाम का एक ही प्रस्तर है। उसमें आयु प्रमाण साढ़े अठारह सागरोपम है, ऐसा जानना चाहिए।

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अब आनत कल्प से लेकर सर्वार्थसिद्धि तक के देवों की आयु का प्रतिपादन करने हेतु पाँच सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

आनत कल्प से लेकर अपराजित विमान तक के विमानवासी देव वहाँ कितने काल तक रहते हैं ?।।३४।।

जघन्य से सातिरेक अठारह, बीस, बाईस, तेईस, चौबीस, पच्चीस, छब्बीस, सत्ताईस, अट्ठाईस, उनतीस, तीस, इकतीस व बत्तीस सागरोपम काल तक जीव क्रमश: आनत आदि अपराजित विमानवासी देव रहते हैं।।३५।।

उत्कृष्ट से बीस, बाईस, तेईस, चौबीस, पच्चीस, छब्बीस, सत्ताईस, अट्ठाईस, उनतीस, तीस, इकतीस, बत्तीस और तेतीस सागरोपम काल तक जीव आनत-प्राणत आदि विमानवासी देव रहते हैं।।३६।।

सर्वार्थसिद्धि विमानवासी देव वहाँ कितने काल तक रहते हैं ?।।३७।।

जघन्य से और उत्कृष्ट से वहाँ तेंतीस सागरोपमप्रमाण काल तक सर्वार्थसिद्धि विमानवासी देव रहते हैं।।३८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त सूत्रों का अर्थ सुगम है। आनत-प्राणत कल्प में जघन्य आयु-प्रमाण साढ़े अठारह सागरोपम व आरण-अच्युत कल्प में एक समय अधिक बीस सागरोपम है। इससे ऊपर यथाक्रम से नव ग्रैवेयकों में क्रमश: सुदर्शन में बाईस, अमोघ में तेईस, सुप्रबुद्ध में चौबीस, यशोधर में पच्चीस, सुभद्र में छब्बीस, सुविशाल में सत्ताईस, सुमनस में अट्ठाईस, सौमनस में उनतीस और प्रीतिंकर में एक समय अधिक तीस सागरोपम प्रमाण जघन्य आयु स्थिति हैं। नव अनुदिशों में एक समय अधिक इकतीस सागरोपम प्रमाण जघन्य आयुस्थिति हैं। विजय, वैजयन्त, जयन्त और अपराजित इन चार अनुत्तर विमानों में एक समय अधिक बत्तीस सागरोपमप्रमाण जघन्य आयु है।

उत्कृष्ट से-आनत-प्राणत कल्पों में तीन प्रस्तर हैं-आनत, प्राणत और पुष्पक। उनमें से आनत प्रस्तर में १९ सागरोपम, प्राणतप्रस्तर में साढ़े १९ सागरोपम और पुष्पक में २० सागरोपम आयुस्थिति है।

आरण-अच्युत कल्प में सातंकर, आरण और अच्युत ये तीन प्रस्तर हैं। आयु का प्रमाण इनमें से सांतकर में बीस सही दो बटे तीन सागरोपम, आरण में इक्कीस सही एक बटे तीन सागरोपम और अच्युत प्रस्तर में २२ सागरोपम है।

अच्युत कल्प से ऊपर नौ ग्रैवेयकों में नौ प्रस्तर हैं, जिनके नाम हैं-सुदर्शन, अमोघ, सुप्रबुद्ध, यशोधर, सुभद्र, सुविशाल, सुमनस, सौमनस और प्रीतिंकर। इनमेें आयुओं की हानिवृद्धि नहीं है, क्योंकि प्रत्येक में एक-एक प्रस्तर की प्रधानता है। इसका अर्थ यह है कि प्रथम ग्रैवेयक में २३ सागरोपम आयु है और आगे एक-एक सागर की वृद्धि करके अंतिम ग्रैवेयक में ३१ सागरप्रमाण उत्कृष्ट आयु हो जाती है।

नौ अनुदिशों में आदित्य नाम का एक ही प्रस्तर है, जिसमें आयु का प्रमाण ३२ सागरोपम कहा गया है। पाँच अनुत्तरों में सर्वार्थसिद्धि नाम का एक ही प्रस्तर है इनमें विजय, वैजयन्त, जयन्त और अपराजित इन चार विमानों की जघन्य आयु एक समय अधिक बत्तीस सागरोपम प्रमाण तथा उत्कृष्ट आयु तेतीस सागरोपम है।

सर्वार्थसिद्धि विमान में जघन्य और उत्कृष्ट आयु का भेद नहीं है, इसलिए उसकी पृथक् प्ररूपणा के लिए पृथक् ही दो सूत्र कहे गये हैं।

तात्पर्य यह है कि-सर्वार्थसिद्धि विमान में जघन्य और उत्कृष्ट आयु तेंतीस सागर प्रमाण रहती है।

अब यहाँ गतिमार्गणा का उपसंहार किया जा रहा है-

चारों गति के जीवों की जघन्य और उत्कृष्ट आयु का प्रमाण जानकर नरकायु से भयभीत होकर तिर्यंच आयु को भी छोड़कर मनुष्यायु और देवायु का बंध करके भव्यात्माओं को अपने संसार परिभ्रमण का निवारण करना चाहिए।

विशेषार्थ-गोम्मटसार जीवकाण्ड में मार्गणाओं के प्रकरण में गतिमार्गणा का सुंदर वर्णन करते हुए आचार्य श्री नेमिचन्द्रसिद्धान्तचक्रवर्ती ने भी मनुष्यगति की दुर्लभता बतलाकर उसका सदुपयोग करने हेतु बारम्बार प्रेरणा प्रदान की है।

जिनके द्वारा अथवा जिनमें जीवों का मार्गण् अर्थात् अन्वेषण किया जाता है, उन्हें मार्गणा कहते हैं। मार्गणा के १४ भेद हैं-गति, इन्द्रिय, काय, योग, वेद, कषाय, ज्ञान, संयम, दर्शन, लेश्या, भव्यत्व, सम्यक्त्व, संज्ञी, आहार। मार्गणा के दो भेद भी हैं-सान्तर और निरन्तर। उपर्युक्त चौदह मार्गणायें निरन्तर मार्गणा कहलाती हैं जिनमें अन्तर-विच्छेद नहीं पड़ता उनको निरंतर मार्गणा कहते हैं। संसारी जीवों के उपर्युक्त १४ मार्गणाओं में से किसी का विच्छेद नहीं पड़ता, वे सभी जीवों के सदा ही पाई जाती हैं, इसलिए निरन्तर मार्गणा कही जाती हैं, और जिनमें अंतर-विच्छेद पड़ जाता है उन्हें सान्तर मार्गणा कहते हैं। अर्थात् कुछ मार्गणा ऐसी भी हैं कि जिनमें समय के एक नियत प्रमाण तक विच्छेद पाया जाता है। उन्हीं को सांतर मार्गणा कहते हैं।

ये सान्तर मार्गणाएँ आठ हैं-उपशमसम्यक्त्व, सूक्ष्मसाम्परायसंयम, आहारककाययोग, आहारक- मिश्रयोग, वैक्रियिकमिश्रकाययोग, लब्ध्यपर्याप्त मनुष्य, सासादन सम्यक्त्व और मिश्र ये आठ सांतर मार्गणाएँ हैं। उपशमसम्यक्त्व का उत्कृष्ट विरहकाल ७ दिन का है। सूक्ष्मसाम्पराय का महीना, आहारक काययोग का पृथक्त्व वर्ष, आहारकमिश्र का पृथक्त्व वर्ष, वैक्रियिकमिश्र का १२ मुहूर्त, अपर्याप्त मनुष्य का पल्य के असंख्यातवें भाग, सासादन सम्यक्त्व और मिश्र का पल्य के असंख्यातवें भाग है और सबका जघन्य अन्तरकाल एक समय है। मतलब यह है कि यदि तीन लोक में कोई भी उपशमसम्यग्दृष्टि न रहे, तो ऐसा अन्तर सात दिन के लिए पड़ सकता है। उसके बाद कोई न कोई उपशमसम्यग्दृष्टि अवश्य ही होता है। गति मार्गणा-गति नाम कर्म के उदय से होने वाली जीव की पर्याय विशेष को अथवा चारों गतियों में गमन करने के कारण को गति कहते हैं। गति शब्द के निरुक्ति के अनुसार तीन तरह के अर्थ संभव हैं। गम्यते इति गति:, गमनं वा गति: और गम्यते अनेन सा गति:। इन निरुक्ति अर्थों में गतिनाम कर्म के उदय से होने वाली जीव की नर नारक आदि पर्याय विशेष को ही ग्रहण करना चाहिए।

गति के चार भेद हैं-नरकगति, तिर्यग्गति, मनुष्यगति, देवगति।

नरकगति-जो द्रव्य क्षेत्र काल भाव में स्वयं तथा परस्पर में प्रीति को प्राप्त नहीं होते हैं, उनको नारत कहते हैं। अर्थात् जो किसी भी अवस्था में स्वयं या परस्पर में प्रीति को प्राप्त न हों, वे नारत-नारकी कहलाते हैं अथवा जो ‘नरान् कायंति’ मनुष्यों को क्लेश पहुँचावें, उनको नारक कहते हैं क्योंकि नीचे सातों ही भूमियों में रहने वाले नारकी निरन्तर ही स्वाभाविक, शारीरिक, मानसिक, आगंतुक तथा क्षेत्रजन्य इन पाँच प्रकार के दु:खों से दु:खी रहते हैं। नरक गति नाम कर्म के उदय से जीव नरक में आयु पर्यंत महान कष्टों का अनुभव करते रहते हैं। न रमन्ते इति नारता-नारका-इस व्युत्पत्ति के अनुसार नारकी आपस में कभी भी प्रेम नहीं करते हैं।

तिर्यग्गति-जो मन, वचन, काय की कुटिलता को प्राप्त हों अथवा जिनकी आहारादि संज्ञाएं दूसरों को स्पष्ट दिखें और जो निकृष्ट अज्ञानी हों, जिनमें पाप की बहुलता हो, वे तिर्यंच कहलाते हैं। निरुक्ति के अनुसार ‘तिर: तिर्यग्भावं-कुटिल परिणाम अन्वति इति तिर्यंच’ जो कुटिल-मायाचार परिणामों को प्राप्त करें वे तिर्यंच कहलाते हैं। इससे तिर्यंचगति में मायाचार की बहुलता जानी जाती है।

मनुष्यगति-जो नित्य ही तत्व-अतत्व, आप्त-अनाप्त आदि का विचार करें, जो मन के द्वारा गुण- दोषादि का विचार-स्मरण आदि कर सके, जो मन के विषय में उत्कृष्ट हों, शिल्प कलादि में कुशल हों तथा युग की आदि में मनुओं से उत्पन्न हुए हों, वे मनुष्य कहलाते हैं। ‘मनु अवबोधने’ मनु धातु से मनु शब्द बनता है और जो मनु की संतान हैं, उसे मनुष्य कहते हैं। यहाँ निरुक्ति के अनुसार अर्थ किया गया है।

देवगति-जो देवगति में रहने वाले अणिमा, महिमा आदि आठ ऋद्धियों से सुखी हों तथा रूप यौवन आदि से दीप्ति को प्राप्त हों, वे देव कहलाते हैं। ‘दीव्यंति इति देव:’ दिव् धातु क्रीड़ा, विजिगीषा, दीप्ति, मोद आदि अर्थ में है उससे देव शब्द निष्पन्न हुआ है।

इन चारों गतियों के अर्थ में निरुक्ति अर्थ प्रधान है किन्तु यह सर्वथा लागू नहीं होता है। मुख्यत: जो उन-उन गति नामकर्म के उदय से उस-उस भव को प्राप्त करते हैं, वे उस गति वाले कहलाते हैं।

सिद्धगति-एकेन्द्रिय आदि जाति, वृद्धावस्था, मरण, भय, अनिष्ट संयोग, इष्ट वियोग, इनसे होने वाले दु:ख आहारादि वाञ्छाएं, रोग आदि जिस गति में नहीं पाये जायें वह ‘सिद्धगति’ कहलाती है। इसे पंचम गति भी कहते हैं। यह सिद्धगति मार्गणातीत है सभी कर्मों के क्षय से प्रकट होती है। तिर्यंचों के पाँच भेद हैं-सामान्य तिर्यंच, पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पर्याप्त तिर्यंच, योनिमती (भावस्त्री वेदी) तिर्यंच और अपर्याप्त तिर्यंच।

मनुष्यों के चार भेद हैं-सामान्य मनुष्य, पर्याप्त मनुष्य, योनिमती (भाव स्त्रीवेदी) मनुष्य और लब्ध्यपर्याप्त मनुष्य। इनमें पंचेन्द्रिय भेद इसलिए पृथक नहीं हैं कि मनुष्यों में पंचेन्द्रिय मनुष्य ही होते हैं एकेन्द्रिय आदि नहीं होते हैं।

पर्याप्त मनुष्यों की संख्या-७९२२८१६२५१४२६४३३७५९३५४३९५०३३६।

इन चारों गतियों में एक मनुष्य गति ही ऐसी गति है कि जिसमें आठों कर्मों का नाशकर यह जीव सिद्धपद को प्राप्त कर सकता है अतएव इस दुर्लभ मनुष्य पर्याय को प्राप्त करके संयम को धारण करके संसार परम्परा को समाप्त करना चाहिए।