ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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02.महापुराण नाम की सार्थकता

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महापुराण नाम की सार्थकता

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तीर्थेशामपि चव्रेषां, हलिनामर्धचक्रिणाम्।

त्रिषष्टिलक्षणं वक्ष्ये, पुराणं तद्द्विषामपि।।२०।।
पुरातनं पुराणं स्यात्, तन्महन्महदाश्रयात्।
महद्भिरुपदिष्टत्वात्, महाश्रेयोऽनुशासनात्।।२१।।
कविं पुराणमाश्रित्य, प्रसृतत्वात् पुराणता।
महत्त्वं स्वमहिम्नैव, तस्येत्यन्यैर्निरुच्यते।।२२।।
महापुरुषसंबंधि, महाभ्युदयशासनम्।
महापुराणमाम्नात-मत एतन्महर्षिभि:।।२३।।
ऋषिप्रणीतमार्षं स्यात्, सूक्तं सूनृतशासनात्।
धर्मानुशासनाच्चेदं, धर्मशास्त्रमिति स्मृतम्।।२४।।
इतिहास इतीष्टं तद्, इतिह हासीदिति श्रुते:।
इतिवृत्तमथैतिह्य-माम्नायं चामनन्ति तत्।।२५।।
पुराणमितिहासाख्यं, यत्प्रोवाच गणाधिप:।
तत्किलाहमधीर्वक्ष्ये, केवलं भक्तिचोदित:।।२६।।

तीर्थंकरों, चक्रवर्तियों, बलभद्रों, नारायणों और उनके शत्रुओं-प्रतिनारायणों का भी पुराण कहूँगा। यह ग्रंथ अत्यन्त प्राचीन काल से प्रचलित है, इसलिए पुराण कहलाता है। इसमें महापुरुषों का वर्णन किया गया है अथवा तीर्थंकर आदि महापुरुषों ने इसका उपदेश दिया है अथवा इसके पढ़ने से महान् कल्याण की प्राप्ति होती है इसलिए इसे महापुराण कहते हैं। प्राचीन कवियों के आश्रय से इसका प्रसार हुआ है, इसलिए इसकी पुराणता-प्राचीनता प्रसिद्ध ही है तथा इसकी महत्ता इसके माहात्म्य से ही प्रसिद्ध है, इसलिए इसे महापुराण कहते हैं, ऐसा भी कितने ही विद्वान् महापुराण की निरुक्ति-अर्थ करते हैं। यह पुराण महापुरुषोें से संबंध रखने वाला है तथा महान् अभ्युदय-स्वर्ग मोक्षादि कल्याणों का कारण है इसलिए महर्षि लोग इसे महापुराण मानते हैं। यह ग्रंथ ऋषिप्रणीत होने के कारण आर्ष, सत्यार्थ का निरूपक होने से सूक्त तथा धर्म का प्ररूपक होने के कारण धर्मशास्त्र माना जाता है। ‘इति इह आसीत्’ यहाँ ऐसा हुआ-ऐसी अनेक कथाओं का इसमें निरूपण होने से ऋषिगण इसे ‘इतिहास’ और ‘ऐतिह्य’ भी मानते हैं। जिस इतिहास नामक महापुराण का कथन स्वयं गणधरदेव ने किया है, उसे मैं मात्र भक्ति से प्रेरित होकर कहूँगा, क्योंकि मैं अल्पज्ञानी हूँ। प्राचीन कवियों द्वारा क्षुण्ण किये गये-निरूपण कर सुगम बनाये गये कथामार्ग में मेरी भी गति है क्योंकि आगे चलने वाले पुरुषों के द्वारा जो मार्ग साफ कर दिया जाता है, फिर उस मार्ग में कौन पुरुष सरलतापूर्वक नहीं जा सकता है ? अर्थात् सभी जा सकते हैं।

इसलिए मैं प्राचीन कवियों को ही हाथ का सहारा मानकर इस पुराणरूपी समुद्र को तैरने के लिए तत्पर हुआ हूँ। उत्तम-उत्तम उपदेशरूपी रत्नों से भरे हुए इस कथारूप समुद्र में मगरमच्छों को छोड़कर सार वस्तुओं के ग्रहण करने में ही प्रयत्न करना चाहिए।।२०-२६।।

इसलिए जिनके वचनरूपी दर्पण में समस्त शास्त्र प्रतिबिम्बित थे, मैं उन कवियों को बहुत मानता हूँ-उनका आदर करता हूँ। मुझे उन अन्य कवियों से क्या प्रयोजन है, जो व्यर्थ ही अपने को कवि माने हुए हैं।

मैं उन पुराण के रचने वाले कवियों को नमस्कार करता हूँ, जिनके मुखकमल में सरस्वती साक्षात् निवास करती हैं तथा जिनके वचन अन्य कवियों की कविता में सूत्रपात का कार्य करते हैं-मूलभूत होते हैं।

इन प्रकरणों के पढ़ने से यह स्पष्ट है कि वर्तमान में मुद्रित आदिपुराण भाग-१, भाग-२ और उत्तरपुराण ये तीनों ग्रंथ मिलकर ही ‘महापुराण’ कहलाते हैं। इन तीनों ग्रंथों में चौबीस तीर्थंकर, बारह चक्रवर्ती, नव बलदेव, नव नारायण और नव प्रतिनारायण, ऐसे त्रेसठ शलाका पुरुषों का वर्णन है। इनके अंतर्गत तो हजारों कथानकों का यह महापुराण ग्रंथ भण्डार है।