ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्ज एप पर मेसेज करें|

02. उत्तम मार्दव धर्म

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


उत्तम मार्दव धर्म

Bahubali.JPG

श्री रइधू कवि ने अपभृंश भाषा में मार्दव धर्म के विषय में कहा है

मद्दउ—भाव—मद्दणु माण—णिंकदणु दय—धम्महु मूल जि विमलु।

सव्वहं—हययारउ गुण—गण—सारउ तिसहु वउ संजम सहलु।।
मद्दउ माण—कसाय—बिहंडणु, मद्दउ पंचिंदिय—मण—दंडणु।
मद्दउ धम्मे करुणा—बल्ली, पसरइ चित्त—महीह णवल्ली।।
मद्दउ जिणवर—भत्ति पयासइ, मद्दउ कुमइ—पसरूणिण्णासइ।
मद्दवेण बहुविणय पवट्टइ—मद्दवेण जणवइरू उहट्टइ।।
मद्दवेण परिणाम—विसुद्धी, मद्दवेण विहु लोयहं सिद्धी।
मद्दवेण दो—विहु तउ सोहइ, मद्दवेण णरु जितगु विमोहइ।।
मद्दउ जिण—सासण जाकिज्जइ, अप्पा—पर—सरूव भाविज्जइ।
मद्दउ दोस असेस णिवारइ, मद्दउ जम्म—उअहि उत्तारइ।।
घत्ता— सम्मद्दंसण—अंगु मद्दउ परिणामु जि मुणहु।

इय परियाणि विचित्त मद्दउ धम्मु अमल थुणहु।।

अर्थ मार्दव धर्म संसार का नाश करने वाला है, मान का मर्दन करने वाला है, दया धर्म का मूल है, विमल है, सर्वजीवों का हितकारक है और गुण गणों में सारभूत है। इस मार्दव धर्म से ही सकल व्रत और संयम सफल होते हैं। मार्दव धर्म मान कषाय को दूर करता है, मार्दव धर्म पाँच इन्द्रिय और मन का निग्रह करता है, चित्तरूपी पृथ्वी के आश्रय से करुणारूपी नूतन बेल मार्दवरूपी धर्म पर फैल जाती है।

मार्दव धर्म जिनेन्द्र देव की भक्ति को प्रकाशित करता है, मार्दव धर्म कुमति के प्रसार को रोक देता है, मार्दव धर्म से बहुत अधिक विनयगुण प्रवृत्त होता है और मार्दव धर्म से मनुष्यों का बैर दूर हो जाता है।

मार्दव से परिणाम निर्मल होते हैं, मार्दव से उभय लोक की सिद्धि होती है, मार्दव से दोनों प्रकार का तप सुशोभित होता है और मार्दव से मनुष्य तीनों जगत् को मोहित कर लेता है।

मार्दव धर्म से जिनशासन का ज्ञान होता है तथा अपने और पर के स्वरूप की भावना भायी जाती है। मार्दव सभी दोषों का निवारण करता है और यह मार्दव ही जीवों को जन्म समुद्र से पार कराने वाला है।

यह मार्दव परिणाम, सम्यग्दर्शन का अंग है ऐसा जानकर हे भव्य! तुम विचित्र और अमल इस मार्दव धर्म की सदा स्तुति करो।

संस्कृत की पंक्तियों में देखें उत्तम मार्दव धर्म की व्याख्या

Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
मार्दव: स्यान्मृदोर्भावो, मानशत्रोर्विमर्दक:।

चतुर्धा विनयोपेतो, र्विजत: सोऽष्टभिर्मदै:।।१।।
इन्द्रवत् खग इन्द्राख्यो, रावणेन विर्निजत:।
रावणोऽपि स्वयं नष्ट:,किं मानेन प्रयोजनम्।।२।।
उच्चं नीचं धृतं सर्वं, पर्यायं भुवने मया।
इन्द्रसौख्यमवाप्तं हा! निगोदेष्वपि दु:खित:।।३।।
चक्रभृत् भरतेशोऽपि, वृषभाद्र व्यलोकयत्।
स्पेटयित्वाक्षरं तत्र, स्वप्रशस्तिं लिलेख स:।।४।।
स्वात्मगुणस्य सन्मानै: स्वात्मानंदामृतं स्वदे।
स्वाभिमाने पदे स्थित्वा ज्ञानादिगुणमाप्नुयाम्।।५।।

‘‘जात्यादिमहावेशादभिमानाभावो मार्दवं माननिर्हरणम्१।’’

जाति आदि मदों के आवेशवश होने वाले अभिमान का अभाव करना मार्दव है। मार्दव का अर्थ है मान का नाश करना। ‘‘मृदु का भाव मार्दव है, यह मार्दव मानशत्रु का मर्दन करने वाला है, यह आठ प्रकार के मद से रहित है और चार प्रकार की विनय से संयुक्त है। देखो इन्द्र नाम का विद्याधर इन्द्र के समान वैभवशाली था फिर भी रावण के द्वारा पराजय को प्राप्त हुआ है और वह रावण भी एक दिन मान के वश में नष्ट हो गया, अत: मान से क्या लाभ है ? मैंने इस संसार में ऊँच और नीच सभी पर्यायें धारण की हैं। अहो! मैंने इन्द्रों के सुख भी प्राप्त किये हैं और हा! खेद है कि निगोद पर्याय में दु:ख भी प्राप्त किये गए हैं। देखो! चक्ररत्न को धारण करने वाला भरत चक्रवर्ती भी वृषभाचल पर्वत को देखता है पुन: उस पर से अक्षर को मिटाकर वह अपनी प्रशस्ति को लिखता है। अपने आत्म गुणों के सन्मान से अपने आत्मा के आनन्दरूपी अमृत को चखना चाहता हूँ। अपने स्वाभिमानमय पद में स्थित होकर मैं ज्ञानादिगुण को प्राप्त कर लेऊँ मेरी यही भावना है।।१ से ५।। प्रत्येक व्यक्ति को ऐसी भावना सदा भाते रहना चाहिये। जाति, कुल, बल, ऐश्वर्य, रूप, तप, विद्या और धन इन आठ मदों के आश्रय से जो मान करते हैं वे तत्काल नीच गति के कारणभूत कर्मों का संचय करते हैं। मानी पुरुष मान के वश होकर पूज्य—पूजा का व्यतिक्रम कर देते हैं। इस संसार में मान किसका करना ? जहाँ पर प्राणी राजा होकर विष्ठा में कीड़ा हो गया। विनय के चार भेद हैं—ज्ञान, दर्शन, चारित्र और उपचार।

ज्ञान की विनय के अर्थशुद्धि, व्यंजनशुद्धि, उभयशुद्धि, कालशुद्धि, विनयशुद्धि, उपधान, बहुमान और अनिन्हव ये आठ भेद हैं। इनका पालन करना और ज्ञानी की विनय करना। दर्शन के नि:शंकित आदि आठ अंगों का पालन करना और दर्शनधारी की विनय करना। चारित्र के अतीचारों को दूरकर चारित्रधारी की विनय करना तथा गुरु की प्रत्यक्ष और परोक्ष में मन—वचन—काय से विनय करना। गुरुओं की वैयावृत्ति करना, उनके अनुवूâल प्रवृत्ति करना आदि। इंद्र का रावण से पराजय होना साक्षात् गुरु के अपमान का फल है।

इंद्र विद्याधर

विद्याधर की श्रेणी पर रथनूपुर नगर में राजा सहस्रार की रानी मानस सुन्दरी के गर्भ में पुण्यशाली बालक के आने से उसे इंद्र की संपदा भोगने की इच्छा हुई। राजा ने रानी का दोहला पूर्ण किया, पुत्र का जन्म होने पर उसका नाम ‘इंद्र’ रखा। इंद्र ने तरुण होकर अपने वैभव को इंद्र सदृश बनाया। उसके ४८ हजार रानियाँ थीं। २६ हजार नृत्यकार थे, ऐरावत नाम का हाथी था, पट्रानी का नाम शची, चारों दिशाओं में चार लोकपाल, सुधर्मा सभा, वङ्का नाम का शस्त्र, उर्वशी, मेनका आदि अप्सरायें और बृहस्पति मंत्री आदि वैभव थे। रावण जब दिग्विजय के लिये निकला तब उसने इंद्र विद्याधर को जीतकर बाँध लिया। उधर इंद्रजीत ने इंद्र के पुत्र जयंत को बाँध लिया और लंका नगरी वापस आ गए। दु:ख से व्याकुल हो इंद्र के सामंत सहस्रार पिता को आगे कर रावण के पास पहुँचे। सहस्रार ने रावण से अपने पुत्र को छोड़ने के लिए कहा। उस समय रावण ने हँसकर कहा कि मैं इस शर्त पर इंद्र को छोड़ सकता हूँ कि आज से लेकर तुम सब मेरे नगर के भीतर और बाहर बुहारी देने का कार्य करो। इंद्र घड़ा लेकर पृथ्वी को सिंचित करे और उसकी रानियाँ रांगोली बनावें। पुन: विनयावनत होकर उसने सहस्रार को पितृ तुल्य कहकर आदर देकर इंद्र को बंधन मुक्त कर दिया और कहा कि आज से यह मेरा चौथा भाई है इत्यादि।

इंद्र अपने विजयार्ध पर्वत पर आ गया किन्तु इस पराजय से वह अतीव दु:खी रहने लगा। विरक्त होकर निर्वाणसंगम मुनिराज के पास प्रश्न किया। भगवन् ! मैं किस पाप से मृत्यु से भी अधिक दुख:दायी इस पराजय को प्राप्त हुआ हूँ। मुनि ने कहा इंद्र! अिंरजयपुर में अहिल्या के स्वयंवर में तुम भी गए थे किन्तु उस सुन्दरी ने आनंदमाल के गले में वरमाला डाली। इससे तुम्हें आनन्दमाल से ईष्र्या हो गई। किसी समय आनन्दमाल विरक्त हो मुनि होकर रथावर्त पर्वत पर प्रतिमायोग से विराजमान थे। अकस्मात् आकाश मार्ग से जाते हुए तूने उन्हें देखकर क्रोधवश उनकी हँसी की और कहा अरे! काम भोग का प्रेमी अहिल्यापति तू इस समय यहाँ क्यों बैठा है ? पुन: उन्हें रस्सियों से कसकर बाँध दिया। फिर भी वे मुनि निर्विकार हुए तत्वचिंतन में लीन थे। उन्हीं के समीप उनके भाई कल्याणमाल मुनि ऋद्धिधारी थे। वे प्रतिमायोग संकुचित कर दु:खी होकर बोले—‘तूने अकारण मुनिराज का तिरस्कार किया है अत: तू भी बहुत भारी तिरस्कार को प्राप्त होगा’ उन मुनि का क्रोध बढ़ रहा था कि तेरी पत्नी सर्वश्री ने उनसे क्षमा याचना करते हुए उन्हें शांत किया। ‘‘जो मनुष्य मन से भी साधुजनों का पराभव करता है वह उससे उभय लोक में पराभव को प्राप्त होता है। जो दुष्टचित्त मनुष्य निग्र्रंथ मुनि को गाली देता है अथवा मारता है उस पापी मनुष्य के विषय में क्या कहा जाये१ ?’’

हे इंद्र ! इस भव के ही उस पाप के फल से तुम्हें यह पराजय का दु:ख सहना पड़ा है। पुन: इंद्र ने उन्हीं गुरु के पास दीक्षा लेकर अंत में निर्वाणधाम को प्राप्त कर लिया। जिस रावण ने इंद्र को पराजित किया था उसी ने मान कषाय में आकर सीता के निमित्त रामचंद्र से युद्ध करके नरक गति प्राप्त कर ली।

रूप का मद

सिंधुमती रानी ने रूप के गर्व में उन्मत्त होकर मुनि को कड़वी तूंबड़ी का आहार दे दिया। फलस्वरूप नरक, तिर्यंचों के दु:ख भोगकर कालांतर में गुरु के उपदेश से रोहिणी व्रत करके रोहिणी नाम की रानी होकर सुख प्राप्त किया। ऐसे ही एक मद के निमित्त से जीवों ने दु:ख उठाए हैं। जब राजा भी मरकर कीड़े जैसी तुच्छ पर्याय में जन्म ले सकता है तब किसका मद करना ? मिथिला नगर के राजा का नाम ‘‘शुभ’’ था, उनकी रानी का नाम मनोरमा और पुत्र का नाम देवरति था। राजा को आर्तध्यान के निमित्त से किसी समय तिर्यंचायु का बंध हो गया। एक समय उनके शहर में देवगुरु नाम के अवधिज्ञानी मुनिराज अपने चर्तुिवध संघ सहित वहाँ आये। राजा ने गुरुदेव का दर्शन किया अनंतर प्रश्न किया। ‘‘भगवन्! इस राजपद के बाद मरणकर मेरी कौन सी गति होगी’’? मुनिराज ने अपने अवधिज्ञान से जानकर कहा— ‘‘राजन् ! आज से सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु हो जावेगी और तुम मरकर अपने विष्ठागृह में पंचरंगी कीड़ा हो जावोगे।’’ राजा को अपनी इस भावी गति को सुनकर बहुत ही आश्चर्य हुआ और साथ ही महान् दु:ख हुआ। उसके मन में कुछ शंकायें उठने लगीं— ‘‘क्या यह सच है ? मुनिराज के वचन तो झूठे नहीं होते हैं ऐसा सुनने में आता है सो क्या ऐसा भी हो जायेगा! मैं मरकर मेरे ही विष्ठागृह में कीड़ा हो जाऊँगा।’’ मुनिराज ने सही प्रतीति के लिए कहा— ‘‘राजन् इसी बीच शहर में प्रवेश करते समय तुम्हारे मुँह में विष्ठा प्रविष्ट हो जाएगी। तुम्हारा छत्र भंग हो जावेगा और आज से सातवें दिन बिजली के गिरने से तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी।’’ राजा चितित और दु:खी वापस घर आ गया। एक दिन उद्यान से शहर में प्रवेश करते समय रथ के घोड़ों के पाँव की ठोकर से विष्ठा उछल कर राजा के मुँह मेंं आ पड़ी। यहाँ से वह थोड़ा ही आगे बढ़े थे कि अकस्मात् जोर की आँधी आने से उनका छत्र टूट कर गिर गया। इस घटना से राजा को मुनिराज का कथन सत्य प्रतीत होने लगा। तब उसने अपने पुत्र देवरति को बुलाकर मुनि द्वारा कथित सब बातें सुना दीं और बोले— ‘‘हे पुत्र! यदि मैं मरकर विष्ठागृह में कीड़ा हो जाऊँ तो तुम शीघ्र ही आकर मुझे मार देना कि जिससे मैं इस िंनद्य योनि में अधिक दिन न रह सवूँâ।’’ पिता की बात पुत्र ने स्वीकार कर ली। फिर भी राजा के मन में संदेह झूलता ही रहा, तब उसने अपनी रक्षा के उपायस्वरूप एक लोहे का बड़ा संदूक बनवाया। उसमें आप बैठ गए और मंत्रियों से कहा कि— ‘‘तुम लोग इस संदूक को बंद कर गंगा नदी के गहरे जल में इसे रख दो कि जिससे बिजली के गिरने से इस पर कुछ भी असर नहीं होगा और मैं बच जाऊँगा। फिर अमुक दिन के बाद तुम लोग संदूक को वापस लाकर हमें खोल देना।’’ मंत्रियों ने वैसा ही किया, राजा का संदूक गंगा नदी में रख दिया। किन्तु होनहार टलती नहीं है और मुनियों के वचन झूठे नहीं होते हैं। ठीक मुनि के कहे अनुसार उसी दिन बादल घिर आए, बिजली चमकने लगी। इसी समय बड़े मच्छ ने संदूक को एक ऐसा उथेला दिया कि संदूक जल के बाहर दो हाथ ऊपर तक उछल आया। संदूक का बाहर होना और आकाश से बिजली का गिरना एक साथ हो गया। बिजली ठीक उसी संदूक पर पड़ी कि जिसने लोहे को भेद कर राजा को जला दिया। वह शुभ राजा उसी क्षण मरकर तिर्यंच योनि में अपने ही विष्ठागृह में एक बड़ा सा पंचरंगी कीड़ा हो गया। तूफान और बिजली के बाद राजा के पुत्र देवरति ने पहले तो गंगा के किनारे से संदूक मंगाया, पिता को मरा हुआ पाकर बहुत ही दु:खी हुये, अन्त्येष्टि क्रिया करके विष्ठागृह के निकट गये और पंचरंगी कीड़ा देखकर उसे मारने को तलवार उठाई किन्तु वह कीड़ा उसी गूथ में छिप गया। बार—बार वह कीड़ा बाहर आता था और देवरति की तलवार उठते ही अंदर घुस जाता था। अंत में देवरति वापस चला गया। परन्तु इस घटना से उसे अत्यन्त दु:ख और आश्चर्य हो रहा था। सो उसने महामुनि के दर्शन कर उनसे सारी घटना सुना दी। मुनिराज ने देवरति को समझाया और कहा— ‘‘हे वत्स! जीव जिस गति में जाता है वहीं आसक्त हो जाता है पुन: मरना नहीं चाहता है। भले ही वह कितना ही निकृष्ट योनि में क्यों न हो। अत: तुम्हारे पिता का जीव भी अब तिर्यंच योनि से मरना नहीं चाह रहा है अब वह उसी में अपने को सुखी मानेगा। संसार में प्रत्येक जीव अनादिकाल से इसी तरह नाना योनियों में जन्म लेता रहता है कोई ऐसी निकृष्ट योनि नहीं है कि जिसमें इस जीव ने जन्म न लिया हो और उत्कृष्ट योनियों में भी राजा, महाराजा तो क्या नव ग्रैवेयक तक के अहमिन्द्र पद को भी प्राप्त कर लिया है किन्तु पुन: मिथ्यात्व के निमित्त पंच परावर्तन रूप संसार में भटकता ही रहा है अत: किस चीज का गर्व करना। यह मान कषाय ही जीवों को नीच योनियों में ले जाने वाली है। इसीलिए तो तुम पूजा में पढ़ते हो कि ‘‘भूप कीड़ों में गया।’’ अत: जाति, कुल आदि के घमंड को छोड़कर मार्दव धर्म धारण करना चाहिये। मार्दव धर्म के प्रसाद से उच्च गोत्र का आस्रव होता है। रामचन्द्र ने अपने कुल का गर्व नहीं किया किन्तु गौरव रखा अत: आज भी कहते हैं कि—

रघुकुल रीति सदा चलि आई।
प्राण जायें पर वचन न जाई।।

हम मनु की संतान हैं ‘मनोरपत्यं मानव:’। अत: हमारा कर्तव्य है कि हम मानवता को अपनावें। जो सदैव अपने कुल, जाति और धर्म का गौरव रखते हुए गर्व का त्याग करते हैं वे ही अपने स्वाभिमान की रक्षा करके इसलोक में सर्वमान्य होते हैं तथा परलोक में उच्च कुल में जन्म लेकर मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं क्योंकि— ‘जातिगोत्रादिकर्माणि शुक्लध्यानस्य हेतव:।’ उच्च जाति, गोत्र और क्रिया आदि शुक्लध्यान के हेतु माने गए हैं। इसलिए उच्च वर्ण आदि को मोक्ष के लिए कारण सामग्री प्राप्त करने हेतु मान कषाय को छोड़कर विनय का आश्रय लेकर मार्दव धर्म को हृदय में स्थान देना चाहिए।

जाप्य—ॐ ह्रीं उत्तममार्दवधर्माङ्गाय नम:।