ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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02. जान बची तो लाखों पाये

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जान बची तो लाखों पाये

(काव्य तीन व चार से सम्बन्धित कथा)
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‘‘हे स्वामिन्! नमोऽस्तु, नमोऽस्तु; नमोऽस्तु, अगच्छ, अगच्छ, अगच्छ; अन्न-जल शुद्ध है; स्वामिन् आईये!’’... की मधुर स्वर लहरी एक बार पुनः वायुमंडल में थिरक उठी! नव यौवन दम्पत्ति के सु-मधुर कण्ठों से एक साथ निकला हुआ यह स्वर केवल जड़ शब्दों के सहारे की प्रस्पुटित नहीं हुआ था बल्कि उसमें आन्तरिक हार्दिक श्रद्धा, विनय एवं उपासनादि तत्त्वों की महक थी।

कवि लोग जिस प्रकृति की छटा से विमुग्ध होकर आत्मविभोर हो जाते हैं-उसी प्रकृति के आँचल में हमारे नग्न दिगम्बर मुनि और तपस्वी वास किया करते हैं। प्रकृति क्या है? आत्मा की खुली हुई एक पुस्तक! जिस प्रकृति को हम नीरव, मौन और एकांकी बियाबान जंगलों और गुफाओं में देखते हैं, हरे-भरे स्थावर वृक्ष-लताओं में देखते हैं, कल-कल निनादनी नदियो में देखते हैं-वही सौम्य प्रकृति इन महामना महात्माओं की स्वयं अपनी प्रकृति है।इसलिये ऐसे नैसर्गिक क्षेत्र में वे आत्मविभोर तो होते ही हैं-साक्षात् आत्म-दर्शन करते हुए आत्म-कल्याण भी करते हैं; और जो आत्म-कल्याण कर सकते है; परोपकार भी उन्हीं से संभव है जो स्वयं भव-सागर से तर सवें, वहीं अन्यों को तार सकते हैं। तभी तो इन परम गुरâओं को तरण-तारण संज्ञा है।‘‘परोपकार सतां विभूतयः’’ के चूँकि वे साक्षात् अवतार होते हैं अतएव उन्हें मानव के सामाजिक क्षेत्र में भी प्रविष्ट होना पड़ता है; आहार ग्रहण के उद्देश्य से ही नहीं। हम लोगों की भाँति वे खाने के लिये नहीं जीते बल्कि जीने के लिये खाते हैं!

हाँ! तो पीत उत्तरीय ओढ़े, हाथ जोड़े वणिकपुत्र सुदत्त श्रेष्ठि सुमंगल-कलश गृहीता अपनी पत्नी के साथ खड़े हुए इन तरण-तारण गुरुवर्य का आह्वान कर रहे थे। आज भी हम परम दिगम्बर मुनियों को आहार देते हैं। यघपि न तो वह संख्या साधुओं की है और न आहार-दान देने वाले श्रावक-श्राविकाओं की ही, तथापि उपयुक्र्त स्वरों को श्रवण कर अवश्य ही हमारी सुषुप्त चेतना उस सांस्कृतिक वातावरण का स्पर्श पाते ही पुलक उठती है-आनन्द विभोर हो नाचने लगती है।भाव-पारखी मुनि ऐसे स्वरों के अभ्यस्त होते हैं। तत्काल ही भोजन-शाला में प्रविष्ट हुए एवं यथाविधि निरन्तराय आहार ग्रहण किये। उपरान्त गृहस्थ ने तत्त्वज्ञान श्रवण करने की इच्छा प्रकट की।

चूँकि वह भक्तिकाल का मध्य युग था; अन्याय सम्प्रदाय मन्त्रों के बल पर चमत्कार प्रकट कर अपने-अपने धर्मों की महत्ता व्यक्त करते हुए होड़ाहोड़ी में संलग्न थे।... जैन साधु भी समय की हवा पहिचानते थे इसलिये वे भी उस समय श्रावकों को तत्त्वज्ञान का पाठ ‘‘थ्योरिटिकल’’ (सैद्धांतिक) नहीं ‘‘प्रेक्टीकल’’ (प्रायोगिक) रूप से ही पढ़ाते थे। आज वैज्ञानिक यंत्रों से प्रयोगशालाएँ चलाते हैं, उस समय वे मंत्रों और तंत्रों से ही चलाई जाती थी इस प्रकार समयानुवूâल चलने से एक पंथ दो काज सिद्ध होते थे।गृहस्थ का लौकिक एवं पारलौकिक आत्म-कल्याण, आचार्यों का परोपकार लाभ तथा जैन तत्त्वज्ञान की प्रभावना।अतएव उन मुनिराज ने महाप्रभावक भक्तामर के द्वितीय युगल काव्य और उनकी मंत्र-ऋद्धि-साधना विधि आदि मौखिक रटा दी और चल दिये बियाबान जंगल की ओर!

‘‘व्यापारे वसति लक्ष्मी’’...फिर भला वणिक्पुत्र अकर्मण्य या निष्क्रिय वैâसे बैठा रह सकता है?..जहाजों पर माल लदवा कर यल दिया समुद्र के उस पार रत्नद्वीप की ओर...। रत्नद्वीप कहाँ हैं? इस विषय में आज के इतिहास और भूगोल बिल्कुल ही मौन हैं; केवल पुरातन पुराणों के ही मुँह खुले हुए हैं।...अस्तु! समुद्र की छाती को रौंदते-चीरते हुए जहाज बढ़े जा रहे हैं।...उनमें बैठे हुए मानव मानो उस अगाध जल पर विजय पाकर अट्टहास कर रहे हो; परन्तु उन्हे यह खबर कहाँ कि हमारी बनाई हुर्इं रूप रेखाओं पर भाग्य-कर्म-या दैव सदैव चलेगा ही-वह निश्चत नहीं। कर्म की रेखाएँ या पगडंडियाँ तो उसकी अपनी निराली ही हैं-स्वतंन्त्र हैं।... हाँ यह बात दूसरी है कि किसी जगह पुरुषार्थ की पगडंडी से कहीं कोई एकाध कर्म की पगडंडी क्रास कर जावे!...इस क्रास स्थान को हमें ‘‘संयोग’’ कहना चाहिये; पर हम ऐसा न कहकर कत्र्तव्य बुद्धि के नशे में कुछ और ही बकते हैं और सिर पर आसमान उठाये फिरते हैं- अहंकार का!

...हाँ तो होता क्या है कि एकाएक जोरों का तूफान आता है, घटाएँ घिर आती हैं, जहाजों का विजय-अभिमान डोलने लगता है। खर्राटे भरते हुये मनुष्य जग जाते हैं! जगते हुए रोते हैं और रोतें हुए के प्राण कहाँ अटके होंगे ? कहा नहीं जा सकता है!! जहाजों में भरी हुई अपार दौलत के बदले प्राण-दान का सौदा करने वाला यदि वहाँ कोई होता तो निश्चय ही वहाँ मोल तोल का प्रश्न ही नहीं उठता और मनमाने हीरे जवाहरात पाता!!!

सामायिक में लीन एक एकान्त कोने में बैठे हुये सुदत्त श्रेष्ठि के कर्ण -कपाट व नेत्र-द्वार तब विस्फारित हुये जब चारों ओर ‘‘बचाओ-बचाओ’’ का कर्णभेदी शोर होने लगा। अपने पति ‘मानस’ के साथ आत्म-ज्योति के दर्शनार्थ गई हुर्इं पाँचों इन्द्रियों तो तब लौटी जब उनका वहाँ बैठना ही कठिन हो गया।... वणिव्पुत्र सुदत्त श्रेष्ठि को स्थिति समझते देन न लगी। तत्काल उन मंत्र काव्यों का उच्चारण जोर जोर से करने लगे जो कि उन्हें मौखिक याद कराये गये थे। शुद्धोच्चारण के एक-एक शब्द ने मानो सजीव प्रतिमा का निर्माण कर दिया। सौन्दर्य की उस प्रतिमा ने अपना नाम देवी ‘प्रभावती’ बतलाया और उन्हें ‘चन्द्रकान्त’ मणि प्रदान कर ज्यों ही वह विलीन हुई त्यों ही चन्द्रमा छिटक कर मुस्कुराने लगा।बादल छट कर आसमान साफ हो गया और प्रलय-पवन सौम्य हो गई।... सुनहरा प्रभात हुआ तो रत्नद्वीप के निवासियों ने देखा कि जहाज समुद्र तट पर खड़े हैं। यात्री उनसे उतर कर मुस्करा रहे हैं-मानो कुछ हुआ ही नहीं। कृतज्ञता प्रकाशन के लिये यात्रियों ने सुदत्त श्रेष्ठि के सन्मुख रत्नों से भरी हुई झोलियाँ प्रस्तुत की किन्तु उस विवेकी वणिव्पुत्र ने उन्हें लेने से इनकार कर दिया और अत्यन्त कोमल करुण स्वर में बोला:- ‘‘जान बची तो लाखों पाये’’