ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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02. दूसरा भव

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(दूसरा भव)

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प्रश्न १ -सल्लकी वन में कौन से मुनिराज का संघ ठहरा था?

उत्तर -उस वन में आचार्यश्री अरविन्द मुनि का विशाल संघ ठहरा था।

प्रश्न २ -मरुभूति के जीव वङ्काघोष हाथी ने उन मुनियों को देखकर क्या किया?

उत्तर -वङ्काघोष हाथी विशाल संघ में क्षोभ उत्पन्न करता हुआ विचरण करने लगा और सारे संघ में खलबली मचा दी।

प्रश्न ३ -उसे किस प्रकार शांत किया गया?

उत्तर -वह मतवाला हाथी अपने कपोलों से मदजल को बरसाता हुआ जब मुनिराज अरविन्द के सम्मुख पहुँचा तब सुमेरु के समान अचल मुनि के वक्षःस्थल में श्रीवत्स का चिन्ह देखकर उसे जातिस्मरण हो गया और वह शांत हो गया।

[सम्पादन] प्रश्न ४ -गजराज के शांत हो जाने पर मुनिराज ने क्या किया?

उत्तर -गजराज के शांत हो जाने पर मुनिराज ने उसे पूर्वजन्म की सारी बातें याद दिलाते हुए संसार की असारता का बोध करा दिया और सम्यक्त्व ग्रहण करा दिया।

प्रश्न ५ -अरविन्द मुनि कौन थे?

उत्तर -अरविन्द मुनि पोदनपुर के राजा अरविन्द ही थे जिन्हें वैराग्य उत्पन्न हो गया और उन्होंने दीक्षा ले ली।

प्रश्न ६ -उनके वैराग्य का क्या कारण था?

उत्तर -एक बार राजा अरविन्द अपने महल की छत पर बैठे हुए प्राकृतिक छटा को देख रहे थे तभी मेघ पटल से निर्मित एक सुन्दर मंदिर (उन्नत शिखर युक्त) दिखाई दिया। राजा ने सोचा कि ऐसा सुन्दर मंदिर तो बनवाना चाहिए और चित्र खींचने को कागज-कलम उठाया तभी वह सुन्दर भवन विघटित हो गया, यह देख उन्हें संसार की स्थिति का सच्चा ज्ञान हो गया और राज्यभार पुत्र को सौंपकर उन्होंने गुरु के पास जाकर जैनेश्वरी दीक्षा ले ली।

प्रश्न ७ -अरविन्द मुनि किस नगर की ओर विहार कर रहे थे?

उत्तर -अरविन्द मुनि संघ सहित सम्मेदशिखर महातीर्थ की वंदना हेतु जा रहे थे।

[सम्पादन] प्रश्न ८ -सम्मेदशिखर की वन्दना करने से क्या फल मिलता है?

उत्तर -सम्मेदशिखर की एक भी वंदना करने वाले जीव भव्य ही होते हैं, उन्हें नरक गति व तिर्यंचगति नहीं मिलती है, यहाँ तक कि ४९ भव के भीतर वे मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं।

प्रश्न ९ -मोक्षमहल में चढ़ने के लिए प्रथम सीढ़ी क्या है?

उत्तर -सम्यग्दर्शन।

प्रश्न १०-सम्यग्दर्शन की क्या परिभाषा है?

उत्तर -सच्चे देव, शास्त्र, गुरु पर दृढ़ श्रद्धान करना, इनके सिवाय रागव्देषादि मल से मलिन ऐसे देव को, दयारहित धर्म को और पाखंडी साधुओं को नहीं मानना ही सम्यग्दर्शन है।

प्रश्न ११-पंच अणुव्रत किसे कहते हैं?

उत्तर -हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील एवं परिग्रह इन ५ पापों का एकदेश त्याग करना पांच अणुव्रत है।

[सम्पादन] प्रश्न १२-सात शील के नाम बताइये?

उत्तर -३ गुणव्रत एवं ४ शिक्षाव्रत ये सात शील हैं।

प्रश्न १३-किस आयु के बंध जाने पर यह जीव अणुव्रत और महाव्रत को ग्रहण नहीं कर सकता है?

उत्तर -देवायु के सिवाय अन्य आयु के बंध जाने पर।

प्रश्न १४-अणुव्रती एवं महाव्रती को किस गति का बंध नहीं होता है?

उत्तर -जो अणुव्रती या महाव्रती है वह नियम से देवगति में ही जावेगा अन्यत्र तीन गति में जा नहीं सकता अथवा कदाचित् महाव्रती महामुनि है तो मोक्ष भी जा सकता है।

प्रश्न १५-मुनिराज से सम्यक्त्व ग्रहण करने के बाद क्या हाथी ने उसका पालन किया?

उत्तर -मुनिराज से सम्यक्त्व ग्रहण करने के बाद गजराज ने उसका विधिवत् पालन करते हुए सभी के प्रति पूर्ण क्षमा रखी और पांच अणुव्रतों एवं सात शीलों का विधिवत् पालन करते हुए संयमासंयम को साधा।

[सम्पादन] प्रश्न १६-कीचड़ में फस जाने पर हाथी ने क्या चिन्तवन किया?

उत्तर -कीचड़ में फस जाने पर उस गजपति (श्रावक) ने सोचा-अब मुझे इस अथाह कीचड़ से कोई निकालने वाला नहीं है जैसे कि मोहरूपी कीचड़ में फसे हुए संसारी जीव को इस संसाररूपी अथाह समुद्र से निकालने वाला कोई नहीं है। हाँ, यदि मैं सल्लेखनारूपी बंधु का सहारा ले लूँ तो वह मुझे अवश्य ही यहाँ से निकालकर उत्तम देवगति में पहुँचा सकता है।

प्रश्न १७-हाथी ने किस प्रकार की सल्लेखना ग्रहण की?

उत्तर -हाथी ने चतुराहार का जीवन भर के लिए त्याग करके महामंत्र का स्मरण करते हुए पंच परमेष्ठी का ही अवलम्बन ले लिया।

[सम्पादन] प्रश्न १८-उसकी मृत्यु किस प्रकार हुई?

उत्तर -कुछ समय पूर्व एक कुक्कुट जाति का सांप वहाँ आया और पूर्व जन्म के संस्कारवश उस हाथी को डस लिया। वेदना से व्याकुल हाथी ने गुरु द्वारा प्राप्त उपदेश का चिन्तवन करते हुए धर्मध्यानपूर्वक इस नश्वर देह का त्याग किया।

प्रश्न १९-हाथी ने किस गति की प्राप्ति की?

उत्तर -हाथी बारहवें स्वर्ग में स्वयंप्रभ विमान में ‘शशिप्रभ’ नाम का देव हुआ।

प्रश्न २०-कुक्कुट सर्प कौन था?

उत्तर -कुक्कुट सर्प कमठ का जीव था।