वीर निर्वाण संवत 2544 सभी के लिए मंगलमयी हो - इन्साइक्लोपीडिया टीम

Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें|


22 अक्टूबर को मुंबई महानगर पोदनपुर से पू॰ गणिनी ज्ञानमती माताजी का मंगल विहार मांगीतुंगी की ओर हो रहा है|

02. प्रकृति समुत्कीर्तना का वर्णन

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

विषय सूची

प्रकृति समुत्कीर्तना का वर्णन

प्रथमो महाधिकार:

अथ प्रकृतिसमुत्कीर्तनचूलिका नाम
मंगलाचरणम्
सिद्धान् भूम्यष्टमीप्राप्तान्, अष्टगुणसमन्वितान्।
अष्टाङ्गेन नुमो नित्य-मष्टकर्मविमुक्तये।।१।।
श्री धरसेनाचार्यहिमवत्पर्वतान् निर्गता श्रुतज्ञानगंगा याभ्यामवगाह्य अंकलेश्वरग्रामे आगत्य वर्षायोगं कृत्वा षट्खण्डागमसरोवरो भव्येभ्योऽवतारित:, तस्मै श्रुतज्ञानगुरवे ताभ्यां पुष्पदन्तभूतबलिसूरिभ्यां चास्माकं कोटिश: नमो नम:।
अथ षट्खण्डागमस्य षट्खण्डा:-जीवस्थान-क्षुद्रकबंध-बंधस्वामित्वविचय-वेदनाखण्ड-वर्गणाखण्ड-महाबंधाश्चेति वर्तन्ते।
अस्मिन् षट्खण्डागमे प्रथमखण्डे द्विसहस्रत्रिशतपंचसप्तति सूत्राणि, द्वितीय खण्डे चतुर्नवत्यधिक-पंचदशशतसूत्राणि, तृतीयखण्डे चतुर्विंशत्यधिकत्रिशतसूत्राणि, चतुर्थखण्डे पंचविंशत्यधिकपंचदशशतानि, पंचमखण्डे त्रयोविंशत्यधिकैकसहस्राणि सूत्राणि वर्तन्ते।
एवं पंचखण्डसूत्राणां गणना:-षट्सहस्राष्टशतैकचत्वारिंशत्सूत्राणि सन्ति।
एतेष्वपि प्रथमखण्डे सत्प्ररूपणा, द्रव्यप्रमाणानुगम:, क्षेत्रानुगम:, स्पर्शनानुगम:, कालानुगम: अन्तरानुगमो भावानुगमोऽल्प-बहुत्वानुगमश्चेति अष्टौ अनुयोगद्वाराणि पञ्चग्रन्थेषु पूर्णानि बभूवु:।
अधुना नवचूलिका: वण्र्यन्ते, अस्मिन् षष्ठग्रन्थे-अत्र ग्रन्थे सूत्राणि पञ्चदशाधिकपञ्चशतानि सन्ति। नवचूलिकासु तेषां विभाजनं क्रियते। प्रथमतस्तावत् नवचूलिकानां नामानि-
प्रकृतिसमुत्कीर्तना-स्थानसमुत्कीर्तना-प्रथममहादण्डक-द्वितीयमहादण्डक-तृतीयमहादण्डक-उत्कृष्टस्थिति-जघन्यस्थिति-सम्यक्त्वोत्पत्ति-गत्यागती नामधेया:।
तत्र
१. प्रकृतिसमुत्कीर्तनाचूलिकायां षट्चत्वारिंशत्सूत्राणि,
२. स्थानसमुत्कीर्तनाचूलिकायां सप्तदशोत्तरशतानि,
३. प्रथममहादण्डकचूलिकायां द्वे सूत्रे,
४. द्वितीयमहादण्डकचूलिकायां द्वे सूत्रे,
५. तृतीयमहादण्डकचूलिकायां द्वे सूत्रे,
६. उत्कृष्टस्थितिनामषष्ठचूलिकायां चतुश्चत्वारिंशत्सूत्राणि,
७. जघन्यस्थितिनामचूलिकायां त्रिचत्वािंरशत्,
८. सम्यक्त्वोत्पत्तिचूलिकायां षोडशसूत्राणि,
९. गत्यागतिचूलिकायां त्रिचत्वारिंशदधिकद्विशतसूत्राणि इति समुदितानि पंचदशाधिकपञ्चशतसूत्राणि सन्ति।
अस्मिन् षष्ठग्रन्थे द्वौ महाधिकारौ विभक्तीकृतौ स्त:। तत्र प्रथममहाधिकारे अष्टौ चूलिका एव अष्टौ अधिकारा: सन्ति। पुनश्च द्वितीयमहाधिकारे गत्यागतिचूलिकानामतोऽस्ति।
अथ तावत् प्रथममहाधिकारान्तर्गते दशभि:स्थलै: षट्चत्वािंरशत्सूत्रै: श्रीभूतबलिसूरिवर्येण जीवस्थानचूलिकायां ‘प्रकृतिसमुत्कीर्तन-चूलिका’ नाम्ना प्रथमोऽधिकार: प्रारभ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले ‘कतय: प्रकृतयो बध्नंति’ इत्यादिना चतुर्विधप्रश्नान् अवतार्य तस्योत्तररूपेण ‘प्रकृतिसमुत्कीर्तन’ प्रतिपादनस्य प्रतिज्ञारूपेण वा ‘‘कदि काओ’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तदनु द्वितीयस्थले अष्टविधमूलप्रकृतिनामनिरूपणपरत्वेन ‘‘तं जहा’’ इत्यादिनवसूत्राणि। तत: परं तृतीयस्थले ज्ञानावरणस्य भेदकथनत्वेन ‘‘णाणावरणीयस्स’’ इत्यादिसूत्रद्वयं। तत्पश्चात् चतुर्थस्थले दर्शनावरणस्य भेदनिरूपणत्वेन ‘‘दंसणावरणीयस्स’’ इत्यादिसूत्रद्वयं। पुनश्च पंचमस्थले वेदनीयकर्मण: भेदप्रतिपादनत्वेन ‘‘वेदणीयस्स’’ इत्यादिसूत्रद्वयं। ततश्च षष्ठस्थले मोहनीयस्य भेद-प्रभेदनिरूपणत्वेन ‘‘मोहणीयस्स’’ इत्यादिसूत्रषट्कं। तत्पश्चात् सप्तमस्थले आयुष: भेदकथनत्वेन ‘‘आउगस्स’’ इत्यादिना द्वे सूत्रे। ततश्च अष्टमस्थले नामकर्मण: भेद-प्रभेदनिरूपणत्वेन ‘‘णामस्स’’ इत्यादिना अष्टादश सूत्राणि। तत: परं नवमस्थले गोत्रकर्मभेदकथनेन ‘‘गोदस्स’’ इत्यादिसूत्रमेकं। तदनंतरं दशमस्थले अन्तरायस्य भेदनिरूपणत्वेन ‘‘अंतराइयस्स’ इत्यादिसूत्रमेकं इति समुदायपातनिका सूचिता भवति।

जीव स्थान चूलिका (छठा ग्रंथ)प्रकृतिसमुत्कीर्तना नाम प्रथम चूलिका अधिकार

मंगलाचरण जो आठ गुणों से सहित हैं, आठवीं-ईषत्प्राग्भारा नाम की पृथ्वी को प्राप्त हो चुके हैं ऐसे सिद्ध भगवन्तों को हम आठों कर्मों से छूटने के लिये नित्य ही अष्टांग नमस्कार करते हैं।

श्री धरसेनाचार्यरूपी हिमाचल से श्रुतज्ञानरूपी गंगा निकली है। उसमें दोनों मुनियों ने अवगाहन करके ‘‘अंकलेश्वर’’ नाम के ग्राम में आकर वर्षायोग करके षट्खण्डागमरूपी सरोवर को भव्यों के लिये अवतारित किया। उन श्रीश्रुतज्ञानगुरु धरसेनाचार्य को एवं श्रीपुष्पदंत-श्रीभूतबली आचार्यों को हमारा कोटि-कोटि नमस्कार होवे, नमस्कार होवे।

इस षट्खण्डागम ग्रन्थराज में छह खण्ड हैं-जीवस्थान, क्षुद्रकबंध, बंधस्वामित्वविचय, वेदनाखण्ड, वर्गणाखण्ड और महाबंध। इस षट्खण्डागम ग्रन्थ के प्रथम खण्ड में दो हजार तीन सौ पचहत्तर सूत्र हैं। द्वितीय खण्ड में पन्द्रह सौ चौरानवे सूत्र हैं। तृतीय खण्ड में तीन सौ चौबीस सूत्र हैं। चौथे खण्ड में पन्द्रह सौ पच्चीस सूत्र हैं एवं पाँचवें खण्ड में एक हजार तेईस सूत्र हैं, इस प्रकार पाँच खण्डों में सूत्रों की गणना-छह हजार आठ सौ इकतालीस है।

इनमें से प्रथम खण्ड में सत्प्ररूपणा, द्रव्यप्रमाणानुगम, क्षेत्रानुगम, स्पर्शनानुगम, कालानुगम, अन्तरानुगम, भावानुगम और अल्पबहुत्वानुगम ये आठ अनुयोग द्वार हैं जो कि पाँच ग्रन्थों में-पुस्तकों में पूर्ण हो चुके हैं।

अब इस छठे ग्रन्थ में नव चूलिकाओं का वर्णन किया जा रहा है। इसमें पाँच सौ पन्द्रह सूत्र हैं। नव चूलिकाओं में इनका विभाजन किया जा रहा है। पहले तो उन नव चूलिकाओं के नाम बताते हैं- १. प्रकृतिसमुत्कीर्तना,

२. स्थानसमुत्कीर्तना,

३. प्रथम महादण्डक,

४. द्वितीय महादण्डक,

५. तृतीय महादण्डक,

६. उत्कृष्टस्थितिबंध,

७. जघन्यस्थितिबंध,

८. सम्यक्त्वोत्पत्ति और

९. गत्यागती ये नव चूलिकायें हैं।

उसमें से प्रकृतिसमुत्कीर्तना चूलिका में छ्यालीस सूत्र हैं। स्थानसमुत्कीर्तना चूलिका में एक सौ सत्रह सूत्र हैं। प्रथम महादण्डक नाम की तीसरी चूलिका में दो सूत्र हैं। द्वितीय महादण्डक नामक चौथी चूलिका में दो सूत्र हैं। तृतीय महादण्डक नामक पाँचवीं चूलिका में दो सूत्र हैं। उत्कृष्टस्थितिबंध नाम की छठी चूलिका में चवालीस सूत्र हैं। जघन्य स्थितिबंध नाम की सातवीं चूलिका में तेतालीस सूत्र हैं। सम्यक्त्वोत्पत्ति नाम की आठवीं चूलिका में सोलह सूत्र हैं और गत्यागती नाम की नवमीं चूलिका में दो सौ तेतालीस सूत्र हैं। इस प्रकार सर्व सूत्र मिलकर पाँच सौ पन्द्रह सूत्र हैं।

इस छठे ग्रन्थ में दो महाधिकार विभक्त किये हैं। उसमें से प्रथम महाधिकार में आठ चूलिकायें हैं, अत: इस महाधिकार में आठ अधिकार हैं। पुन: द्वितीय महाधिकार में गत्यागती नाम की चूलिका है।

अब प्रथम महाधिकार के अन्तर्गत दश स्थलों द्वारा छ्यालीस सूत्रों से श्रीभूतबलि सूरिवर्य जीवस्थानचूलिका में प्रकृतिसमुत्कीर्तन चूलिका नाम का प्रथम अधिकार प्रारम्भ करते हैं। उसमें प्रथम स्थल में ‘कितनी प्रकृतियाँ बंधती हैं ? इत्यादि रूप से चार प्रकार के प्रश्नों को अवतारित करके उनके उत्तररूप से प्रकृतिसमुत्कीर्तन का प्रतिपादन करते हुये अथवा प्रतिज्ञारूप से ‘‘कदि काओ’’ इत्यादि तीन सूत्र कहेंगे। इसके बाद दूसरे स्थल में आठ प्रकार की मूल प्रकृतियों के नाम का निरूपण करते हुये ‘‘तं जहा’’ इत्यादि नव सूत्र कहेंगे। इसके बाद तीसरे स्थल में ज्ञानावरण के भेद कहने रूप से ‘‘णाणावरणीयस्स’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। इसके अनन्तर चौथे स्थल में दर्शनावरण के भेदों का निरूपण करते हुये ‘‘दंसणावरणीयस्स’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। पुन: पाँचवें स्थल में वेदनीय के भेदों का निरूपण करने रूप से ‘‘वेदणीयस्स’’ इत्यादि दो सूत्र कहेंगे। अनन्तर छठे स्थल में मोहनीय कर्म के भेद-प्रभेदों का निरूपण करने रूप से ‘‘मोहणीयस्स’’ इत्यादि छह सूत्र कहेंगे। इसके पश्चात् सातवें स्थल में आयु के भेदों को कहने रूप से ‘‘आउगस्स’’ इत्यादि दो सूत्र कहेंगे। अनन्तर आठवें स्थल में नामकर्म के भेद-प्रभेदों को कहते हुये ‘‘णामस्स’’ इत्यादि अठारह सूत्र कहेंगे। इसके बाद नवमें स्थल में गोत्रकर्म के भेदों को बतलाते हुये ‘‘गोदस्स’’ इत्यादि एक सूत्र कहेंगे। इसके अनन्तर दशमें स्थल में अन्तराय के भेदों का निरूपण करते हुये ‘‘अंतराइयस्स’’ इत्यादि एक सूत्र कहेंगे, इस प्रकार यहाँ ‘‘समुदायपातनिका’’ सूचित की गई है।

अधुना चतुर्विधप्रश्नकरणार्थं श्रीभूतबलिस्वामिना प्रथमं सूत्रमवतार्यते-

कदि काओ पयडीओ बंधदि,

केवडि कालट्ठिदिएहि कम्मेहि सम्मत्तं लब्भदि वा ण लब्भदि वा, केवचिरिण कालेण वा कदि भाए वा करेदि मिच्छत्तं,
उवसामणा वा खवणा वा केसु व खेत्तेसु कस्स व मूले केवडियं वा दंसणमोहणीयं कम्मं खवेंत्तस्स चारित्तं वा संपुण्णं पडिवज्जंत्तस्स।।१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सम्यक्त्वस्योत्पादक: मिथ्यादृष्टिर्जीव: कियती: का: काश्च प्रकृती: बध्नाति ? कियत्कालस्थितिकै: कर्मभि: सम्यक्त्वं लभ्यते वा न लभ्यते वा ? कियच्चिरेण कालेन वा कतिभागान् वा मिथ्यात्वं करोति ? केषु वा क्षेत्रेषु कस्य वा पादमूले कियद्दर्शनमोहनीयं कर्म क्षपयत: जीवस्य वा चारित्रं संपूर्णं प्रतिपद्यमानस्य जीवस्य मोहनीयकर्मण: उपशामना वा क्षपणा वा भवति ? इति प्रश्नानि अवतारितानि भवन्ति।
अत्र कश्चिदाह-
सत्प्ररूपणाद्यष्टसु अनियोगद्वारेषु समाप्तेषु अत्र चूलिकाधिकार: किमर्थमागत: ? आचार्यदेव: परिहरति-पूर्वोक्ताष्टानामनियोगद्वाराणां विषमप्रदेशविवृत्तिकरणार्थमयं चूलिकाधिकार: आगत:।
कश्चिदाशंकते-अष्टभिरनियोगद्वारै: प्ररूपितमेवार्थं किं चूलिका प्ररूपयति अन्यं वा ? यदि तमेवार्थं प्ररूपयति, तर्हि पुनरुक्तदोष: आगच्छति, यदि अन्यमर्थं प्ररूपयति, तर्हि चतुर्दश जीवसमास प्रतिबद्धमर्थं प्ररूपयति, अप्रतिबद्धं वा ?
प्रथमविकल्पे ‘‘चोदसण्हं जीवसमासाणं परूवणट्ठदाए तत्थ इमाणि अट्ठ चेव अणियोगद्दाराणि णादव्वादि भवंति’’ इति एतस्य सूत्रस्य अवधारणपदस्य एवकारस्य विफलत्वं प्रसज्यते ? किंच, चूलिका- संज्ञितस्य चतुर्दशजीवसमासप्रतिबद्धार्थप्ररूपयत: नवमस्य अनियोगद्वारस्योपलंभात्। द्वितीयविकल्पे जीवस्थानस्य पृथग्भूतोऽयं चूलिकानामाधिकारो भवेत्, चतुर्दशजीवसमासप्रतिबद्धार्थे अकथयत: जीवस्थानव्यपदेशविरोधात् ?
अत्र परिहरति-न तावत् पुनरुक्तदोष:, प्रथमपक्षे त्वया कथित:, यत् अष्टानियोगद्वारै: अप्ररूपितस्य तत्र उक्तार्थनिश्चयजननस्यार्थस्य तत: कथंचित् पृथग्भूतस्य तैश्चैव सूचितस्य प्ररूपणात्।
न च एवकारपदस्य विफलत्वं, चूलिकाया: अष्टानियोगद्वारेषु अंतर्भावात्।
अस्या: चूलिकाया: अष्टानियोगद्वारेषु कथमन्तर्भावोऽस्ति ?
तदेव कथ्यते, क्षेत्र-काल-अन्तरप्ररूपणाभि: गत्यागतीनामा चूलिका सूचिता भवति। सापि गत्यागतीचूलिका प्रकृतिसमुत्कीर्तनं स्थानसमुत्कीर्तनं च सूचयति, बंधेन बिना सप्तविधपरिवत्र्तेषु परिवर्तनानुपपत्ते:। प्रकृतिस्थानसमुत्कीर्तनाभ्यां जघन्योत्कृष्टस्थिती सूचिते स्त:, सकषायजीवस्य स्थितिबंधेन बिना प्रकृतिबन्धानुपपत्ते:। कालप्ररूपणान्तर्गतकथितेन ‘‘अद्धपोग्गलपरियट्टं देसूणमिदि’’ वचनेन प्रथमसम्यक्त्वग्रहणं सूचितं, अन्यथा देशोनाद्र्धपुद्गलपरिवर्तनमात्रमिथ्यात्वस्थिते: संभवाभावात्।
तेनापि प्रथमसम्यक्त्वग्रहणेन त्रयो महादण्डका: प्रथमसम्यक्त्वग्रहणयोग्यक्षेत्रेन्द्रिय-त्रिविधकरणप्राप्ति-पर्याप्त-स्थितिखण्ड-अनुभागखण्डादय: सूचिता: भवन्ति। एतेनैव मोक्षोऽपि सूचित:।
कुत:?
अद्र्धपुद्गलपरिवत्र्तादुपरि आलीढसम्यक्त्वानां संसाराभावात्। तेनापि मोक्षेणदर्शनमोहनीय-चारित्रमोहनीयक्षपणविधानं तद्योग्य क्षेत्र-गति-करण-स्थितयश्च सूचिता भवन्ति।
न च तेषामष्टानियोगद्वारेषु निर्णय: कृत:, तत्र निर्णये क्रियमाणे शिष्याणां मतिव्याकुलत्वप्रसंगात्।
यत् त्वया द्वितीयविकल्प: कथित:, चूलिका जीवस्थानाम् पृथग्भूतमर्थं कथयति किं। तद्विकल्पोऽस्माकं अनभ्युपगमात्। अत: एतज्ज्ञातव्यं अयं चूलिकानामा नवमोऽधिकार: कथंचित् अष्टानियोगद्वारेभ्य: पृथग्भूत: अस्ति तत्राकथितार्थस्यप्ररूपणात्, कथंचिदपृथग्भूतोऽस्ति तेषु अनियोगद्वारेषु सूचितार्थेषु निश्चयोत्पादकत्वात्।
अधुना चूलिकाया: भेदो निगद्यते-सापि चूलिका सामान्यापेक्षया एकविधा भवति। पर्यायार्थिक-नयापेक्षया नवविधा भवति।
सूत्रे यानि पदानि आगतानि तेषां विवरणं क्रियते तेषु वा नवविधा चूलिका: कथं गर्भिता: सन्ति, इति सूचयन्ति श्रीवीरसेनाचार्यदेवा:-
तं जहा-‘कदि पगडीओ बंधदि’ अस्मिन् पदे प्रकृति-स्थानसमुत्कीर्तनसंज्ञिते द्वे चूलिके भवत:। ‘काओ पयडीओ बंधदि’ अस्मिन् पदे प्रथम-द्वितीय-तृतीयदण्डकसंज्ञिता: तिस्र: चूलिका: स्थिता:। ‘केवडिकालट्ठिदिएहि कम्मेहि सम्मत्तं लभदि वा ण लभदि वा’ अस्मिन् पदे जघन्योत्कृष्टस्थितिसंज्ञिते द्वे चूलिके अवस्थिते। ‘केवचिरेण कालेण कदि भाए वा करेदि मिच्छत्तं, उवसामणा वा खवणा वा केसु व खेत्तेसु कस्स व मूले, केवडियं वा दंसणमोहणीयं कम्मं खवेंत्तस्स चारित्तं वा संपुण्णं पडिवज्जंतस्स’ एतेषु पदेषु अष्टमी चूलिका गर्भिता। ‘वा संपुण्णं’ इति ‘वा’ शब्दे गत्यागती नाम नवमी चूलिका सूचिता। एवं नवचूलिका: भवन्ति।
आसु नवचूलिकासु तावत् प्रथमचूलिकायां षट्चत्वािंरशत्सूत्राणि। द्वितीयायां स्थानसमुत्कीर्तनचूलिकायां सप्तदशोत्तरशतसूत्राणि। प्रथममहादण्डकनामतृतीयचूलिकायां द्वे सूत्रे। द्वितीयमहादण्डकनामचतुर्थचूलिकायां द्वे सूत्रे। तृतीयमहादण्डकनामपंचमचूलिकायां द्वे सूत्रे। उत्कृष्टस्थितिबंधचूलिकायां षष्ठयां चतुश्चत्वािंरशत्सूत्राणि। जघन्यस्थितिबंधनामसप्तमचूलिकायां त्रिचत्वािंरशत्सूत्राणि। सम्यक्त्वोत्पत्तिनामाष्टमीचूलिकायां षोडशसूत्राणि। गत्यागतीनामनवमीचूलिकायां त्रिचत्वािंरशदधिकद्विशतसूत्राणि वक्ष्यन्ते इति।
इयं नवविधा चूलिका। अवान्तरभेदेन अनेकविधा वा ज्ञातव्या।

अब चार प्रकार के प्रश्न को करने के लिये श्री भूतबलि स्वामी प्रथम सूत्र अवतारित करते हैं-

सूत्रार्थ-

सम्यक्त्व को उत्पन्न करने वाला मिथ्यादृष्टि जीव कितनी और किन-किन प्रकृतियों को बांधता है ?

कितने काल स्थिति वाले कर्मोें के साथ सम्यक्त्व को प्राप्त करता है, अथवा नहीं प्राप्त करता है ?

कितने काल के द्वारा मिथ्यात्व कर्म को कितने भागरूप करता है ?

और किन-किन क्षेत्र में किसके पास में कितने दर्शनमोहनीय कर्म को क्षपण करने वाले जीव के तथा सम्पूर्ण चारित्र को प्राप्त होने वाले जीव के मोहनीय कर्म की उपशामना तथा क्षपणा होती है ?।।१।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-सम्यक्त्व को उत्पन्न करने वाला मिथ्यादृष्टि जीव कितनी और कौन-कौन सी प्रकृतियों को बांधता है ? कितने काल की स्थिति वाले कर्मों के होने पर सम्यक्त्व को प्राप्त करता है, अथवा नहीं भी प्राप्त करता है ? कितने काल से अथवा कितने भागरूप मिथ्यात्व को करता है ?

किन-किन क्षेत्रों में किनके सान्निध्य में-पादमूल में कितनी दर्शनमोहनीय कर्म का क्षपण करते हुए जीव के अथवा सम्पूर्ण चारित्र को प्राप्त करते हुए जीव के मोहनीय कर्म की उपशामना अथवा क्षपणा होती है ? इस प्रकार ये चार प्रश्न अवतारित किये गये हैं। यहाँ कोई प्रश्न करता है-

सत्प्ररूपणा आदि आठ अनुयोग द्वारों के समाप्त हो जाने पर पुन: यहाँ यह ‘चूलिका’ नाम से अधिकार क्यों कहा गया है ?

आचार्यदेव परिहार करते हैं-

पूर्वोक्त आठों अनुयोग द्वारों के विषम स्थलों के विवरण के लिये यह चूलिका नाम का अधिकार कहा जा रहा है। पुन: कोई शंका करता है-

यह चूलिका अधिकार आठों अनुयोग द्वारों से प्ररूपित अर्थ को ही प्ररूपित करता है अथवा अन्य अर्थ को कहता है ? यदि उसी अर्थ को प्ररूपित करता है तब तो पुनरुक्त दोष आता है। यदि अन्य अर्थ को कहता है, तो उसमें चौदह जीवसमास से प्रतिबद्ध अर्थ का निरूपण करता है या अप्रतिबद्ध अर्थ को कहता है ?

यदि प्रथम विकल्प लेते हैं तो-‘चौदह जीव समासों के प्ररूपण करने के लिये उस विषय में ये आठ ही अनुयोग द्वार जानने योग्य हैं’। इस प्रकार के इस अवधारणरूप एवकार पद को विफलता प्राप्त होती है, क्योंकि चतुर्दश जीवसमास में प्रतिबद्ध अर्थ का प्ररूपण करने वाला ‘चूलिका’ नाम से यह नवमां अनुयोगद्वार पाया जा रहा है। द्वितीय विकल्प के माने जाने पर ‘चूलिका’ नाम का यह अधिकार जीवस्थान से पृथग्भूत हो जावेगा, क्योंकि चतुर्दश जीवसमास से प्रतिबद्ध अर्थों को नहीं कहने वाले अधिकार के ‘जीवस्थान’ इस संज्ञा का विरोध है ? यहाँ तक शंकाकार ने अपना पक्ष रखा है।

तब आचार्यदेव उनका समाधान करते हैं- प्रथम पक्ष में आपके द्वारा कथित पुनरुक्त दोष नहीं आता है, क्योंकि, आठों अनुयोग द्वारों से नहीं प्ररूपित किये गये तथा वहाँ पर कहे गये अर्थ के निश्चय उत्पन्न करने वाले और जीवस्थान से ‘कथंचित्’ पृथग्भूत तथा उन आठों अनुयोग द्वारों से ही सूचित अर्थ का इस ‘चूलिका’ नामक अधिकार में प्ररूपण किया गया है।

द्वितीय पक्ष के अन्तर्गत प्रथम पक्ष में बतलायी गई ‘एवकार’ पद की विफलता भी नहीं आती है, क्योंकि चूलिका का आठों अनुयोग द्वारों में अंतर्भाव हो जाता है।

शंका-चूलिका का आठों अनुयोग द्वारों में कैसे अन्तर्भाव होता है ?

समाधान-क्योंकि यह अधिकार आठों अनुयोग द्वारों से सूचित अर्थ का प्ररूपण करता है। इसे ही कहते हैं-क्षेत्रप्ररूपणा, कालप्ररूपणा और अन्तरप्ररूपणा, इन तीन अनुयोग द्वारों से गति-आगति नाम की चूलिका सूचित की गई है। वह गति-आगति चूलिका भी प्रकृतिसमुत्कीर्तन और स्थानसमुत्कीर्तन इन दो अधिकारों को सूचित करती है, क्योंकि, कर्मबन्ध के बिना सात प्रकार के परिवर्तनों में परिभ्रमण हो नहीं सकता। प्रकृतिसमुत्कीर्तन और स्थानसमुत्कीर्तन के द्वारा कर्मों की जघन्य स्थिति और उत्कृष्टस्थिति इन दो चूलिकाओं को कहा गया है, क्योंकि कषायसहित जीव के स्थितिबंध के बिना प्रकृतिबंध नहीं हो सकता। कालप्ररूपणा में कहे गये ‘देशोन अद्र्धपुद्गल परिवर्तन’ इस वचन से प्रथम सम्यक्त्व का ग्रहण सूचित किया गया है। यदि ऐसा न माना जावे तो देशोन-कुछ कर्म अद्र्धपुद्गल परिवर्तन मात्र मिथ्यात्व की स्थिति का होना संभव नहीं है।

उस प्रथम सम्यक्त्व ग्रहण के द्वारा भी तीन महादण्डक, प्रथम सम्यक्त्व ग्रहण करने के योग्य क्षेत्र, इन्द्रिय, त्रिविधकरण की प्राप्ति, पर्याप्तकपना, स्थितिखण्ड और अनुभागखण्ड आदिक सूचित किये गये हैं। इसी से मोक्ष भी सूचित किया गया है। क्योंकि सम्यक्त्व ग्रहण करने वालों के अद्र्धपुद्गल परिवर्तन काल से ऊपर संसार का अभाव हो जाता है। उस मोक्ष के द्वारा भी दर्शनमोहनीय और चारित्रमोहनीय कर्म के क्षपण का विधान, उसके योग्य क्षेत्र, गति, करण और स्थितियाँ सूचित की गई हैं।

इन सभी विषयों का उन आठ अनुयोग द्वारों में निर्णय नहीं किया गया है, क्योंकि वहाँ उन सबका निर्णय करने पर शिष्यों के बुद्धिव्याकुलता का प्रसंग प्राप्त होता।

जो आपने दूसरा विकल्प कहा है कि क्या यह चूलिका जीवस्थान से पृथग्भूत अर्थ को कहती है ?

सो यह दूसरा विकल्प भी हमने स्वीकार नहीं किया है, क्योंकि यह चूलिका जीवस्थान से पृथग्भूत नहीं है।

इसलिये यह चूलिका नाम का नवमां अधिकार कथंचित्-किसी अपेक्षा से आठ अनुयोग द्वारों से पृथग्भूत-भिन्न है, क्योंकि उसमें नहीं कहे गये अर्थ का प्ररूपण करता है। कथंचित्-किसी अपेक्षा से अपृथग्भूत-अभिन्न है, क्योंकि उन अनियोग द्वारों में सूचित अर्थों में निश्चय को उत्पन्न करता है। अब चूलिका के भेदों का वर्णन करते हैं-

वह चूलिका सामान्य की अपेक्षा से एक प्रकार की होती है और पर्यायार्थिक नय की अपेक्षा से नव प्रकार की है। यहाँ सूत्र में जो पद आये हैं, उनका विवरण करते हैं, अथवा उनमें नव प्रकार की चूलिका कैसे गर्भित होती हैं ?

श्री वीरसेनाचार्य देव इसे ही सूचित करते हैं-

वह इस प्रकार है-‘कितनी प्रकृतियाँ बांधता है ?’ इस पद में प्रकृतिसमुत्कीर्तन और स्थानसमुत्कीर्तन नाम की दो चूलिकायें आई हैं। ‘किन प्रकृतियों को बांधता है ?’ इस पद में प्रथम, द्वितीय और तृतीय दण्डक वाली तीन चूलिकायें अवस्थित हैं। ‘कितने काल वाले कर्मों के द्वारा सम्यक्त्व को प्राप्त करता है, अथवा नहीं प्राप्त करता है।’ इस पद में जघन्य स्थिति और उत्कृष्ट स्थिति नाम की दो चूलिकायें अवस्थित हैं। ‘कितने काल के द्वारा मिथ्यात्व कर्म को कितने भागरूप करता है ? और किन क्षेत्रों में तथा किनके पास में कितने दर्शनमोहनीय कर्म को क्षपण करने वाले और सम्पूर्ण चारित्र को प्राप्त करने वाले जीव के मोहनीय कर्म की उपशामना तथा क्षपणा होती है ? इन पदों में आठवीं चूलिका आई है तथा ‘वा संपुण्णं’ इस वाक्य में आये हुये ‘वा’ शब्द में गति-आगति नाम की नवमीं चूलिका विवक्षित है। इस प्रकार पूर्वोक्त चूलिकायें नव होती हैं।

इन नव चूलिकाओं में सर्वप्रथम पहली चूलिका में छ्यालीस सूत्र हैं। दूसरी स्थानसमुत्कीर्तन चूलिका में एक सौ सत्रह सूत्र हैं। प्रथम महादण्डक नाम की तीसरी चूलिका में दो सूत्र हैं। द्वितीय महादण्डक नाम की चौथी चूलिका में दो सूत्र हैं। तृतीय महादण्डक नाम की पांचवीं चूलिका में दो सूत्र हैं। उत्कृष्ट स्थितिबन्ध नाम की छठी चूलिका में चवालीस सूत्र हैं। जघन्य स्थितिबंध नाम की सातवीं चूलिका में तेतालीस सूत्र हैं। सम्यक्त्वोत्पत्ति नाम की आठवीं चूलिका में सोलह सूत्र हैं। गति-आगति नाम की नवमी चूलिका में दो सौ तेतालीस सूत्र हैं। ये नव प्रकार की चूलिका इस ग्रन्थ में कही जायेंगी अथवा अवान्तर भेद से अनेक भेद भी जानना चाहिये।

अधुना नवानां चूलिकानामर्थप्ररूपणार्थं सूत्रमवतरति-

कदि काओ पगडीओ बंधदि त्ति जं पदं तस्स विहासा।।२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-‘जहा उद्देसो तहा णिद्देसो’ इत्यस्मात् न्यायात् प्रथमं उद्दिष्टस्य प्रथमं चैव निर्देशो भवति इति ज्ञायते। ततो न प्रारभनीयमिदंसूत्रम् ?
नैष दोष:, एतस्मिन् पदे इमा: चूलिका: अवस्थिस्ता:, इमाश्च न स्थिता: इति ज्ञापनार्थं, ‘यथा उद्देश: तथा निर्देश:’ इति न्यायस्यास्तित्वप्ररूपणार्थं च अस्य सूत्रस्यारंभोऽभवत्। विविधा भाषा विभाषा, प्ररूपणा निरूपणा व्याख्यानमिति एकार्थ:।
संप्रति अस्याधिकारस्य प्रतिज्ञापनार्थं सूत्रमवतरति-इदाणिं पगडिसमुक्कित्तणं कस्सामो।।३।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-प्रकृतीनां समुत्कीत्र्तनं प्रकृतिसमुत्कीर्तनं, प्रकृतिस्वरूपनिरूपणमित्यर्थ:। इदानीं- संप्रति, ‘कस्सामो’ भणिष्याम: इति एकार्थ:।
प्रथमं प्रकृतिसमुत्कीर्तनं चैव किमर्थं उच्यते ?
नैतद् वक्तव्यं, प्रकृते: अनवगते: स्थानसमुत्कीर्तनादीनामवगमोपायाभावात्, न चावयविनि अनवगते अवयवा: अवगंतुं शक्यन्ते, अन्यत्र तथानुपलंभात्। तस्मात् प्रकृतिसमुत्कीर्तनमेव पूर्वं प्ररूपयिष्यते। तदपि प्रकृतिसमुत्कीर्तनं मूलोत्तरप्रकृतिसमुत्कीर्तनभेदेनद्विविधं भवति।
संगृहीताशेषविकल्पा द्रव्यार्थिकनयनिबंधना मूलप्रकृति: नाम। पृथक्-पृथक् अवयवा पर्यायार्थिक-नयनिबंधना उत्तरप्रकृतिर्नाम। अत्र मूलप्रकृतिसमुत्कीर्तनं प्रथमं क्रियते, संगृहीताशेषोत्तरप्रकृते: मूलप्रकृते: प्ररूपिताया: उत्तरप्रकृतिप्ररूपणानुपपत्ते:।
एवं प्रथमस्थले प्रकृतिसमुत्कीर्तनप्रतिज्ञाकथनरूपेण त्रीणि सूत्राणि गतानि।
संप्रति प्रकृते: अष्टभेदप्ररूपणाय नवसूत्राण्यवतार्यन्ते-तं जहा।।४।।
णाणावरणीयं।।५।।
दंसणावरणीयं।।६।।
वेदणीयं।।७।।
मोहणीयं।।८।।
आउअं।।९।।
णामं।।१०।।
गोदं।।११।।
अंतरायं चेदि।।१२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-‘तं जहा’ इदं पृच्छासूत्रं अस्ति। सूत्रकत्र्तु प्रमाणत्वप्ररूपणात् सूत्रस्य प्रमाणत्वप्ररूपणार्थं इदं सूत्रं उक्तं भवति।
ज्ञानमवबोध: अवगम: परिच्छेद: इति एकार्थ:। तज्ज्ञानमावारयति इति ज्ञानावरणीयं कर्म भवति।
अस्य ज्ञानविनाशकं नाम किं न क्रियते ?
न, जीवलक्षणयो: ज्ञानदर्शनयो: विनाशाभावात्। विनाशे वा जीवस्यापि विनाशो भवेत्, लक्षणरहित-लक्ष्यानुपलंभात्।
ज्ञानस्य विनाशाभावे सर्वजीवानां ज्ञानास्तित्वं प्रसज्यते इति चेत् ?
भवतु नाम, विरोधाभावात्। ‘अक्खरस्स अणंतभाओ णिच्चुग्घाडियओ’ इति सूत्रानुकूलत्वाद्वा।
तर्हि सर्वावयवै: ज्ञानस्योपलंभो भवतु ?
इति वक्तं न युक्तं, आवरित ज्ञानभागानामुपलंभविरोधात्।
पुनरपि कश्चिदाह-सावरणे जीवे आवरितज्ञानभागा: किं सन्ति, आहोस्विद् न सन्ति। यदि सन्ति न ते आवरिता:, सर्वात्मना विद्यमानानामावरितत्वविरोधात्। अथ न संति, तह्र्यपि नावरणं, आव्रियमाणाणामभावे आवरणस्यास्तित्वविरोधात् इति ?
अस्य परिहार: उच्यते-द्रव्यार्थिकनये अवलम्ब्यमाने आवरितज्ञानभागा: सावरणेऽपि जीवे सन्ति, जीवद्रव्यात् पृथग्भूतज्ञानाभावात्, विद्यमानज्ञानभागात् आवरितज्ञानभागानामभेदाद्वा।
आवरितानावरितयो: कथमेकत्वमिति चेत् ?
नैतद् वक्तव्यं, राहुकेतुभ्यां मेघैश्च आवरितानावरितानां सूर्यचन्द्रमण्डलभागानामेकत्वोपलंभात्। एवं सति आव्रियमाणावारकभावौ युज्येते, अन्यथा तयोरनुपलंभप्रसंगात्।
पर्यायार्थिकनये अवलम्ब्यमाने आव्रियमाणज्ञानभागा: सावरणे जीवे न सन्ति, तेषां तदुपलंभाभावात्।
न चेदं सूत्रं पर्यायार्थिकनयमवलम्ब्य स्थितं, तदाव्रियमाणावारकव्यवहाराभावात्, किन्तु द्रव्यार्थिकनयमाश्रित्य सूत्रमिदं अवस्थितं, तेनात्र आव्रियमाणावारकभावो न विरुध्यते।
किमर्थं ज्ञानमाव्रियमाणं ?
उच्यते-आत्मनो विरोधिद्रव्यसन्निधाने सत्यपि यन्निर्मूलतो न विनश्यति, तदाव्रियमाणं, इतरच्चावारकं। न च ज्ञानस्य विरोधिकर्मद्रव्यसन्निधाने सत्यपि निर्मूलविनाशोऽस्ति, जीवविनाशप्रसंगात्। ततो ज्ञानमाव्रियमाणं कर्मद्रव्यं चावारकमिति उक्तं।
कथं पुद्गलेन जीवात् पृथग्भूतेन जीवलक्षणं ज्ञानं विनाश्यते ?
नैषदोष:, जीवात् पृथग्भूतानां घट-पट-स्तंभ-अंधकारादीनां जीवलक्षणज्ञानविनाशकानामुपलंभात्। ज्ञानावारक: पुद्गलस्कंध: प्रवाहस्वरूपेण अनादिबंधनबद्धो ज्ञानावरणीयं कर्म इति भण्यते।
यत्कर्म आत्मन: दर्शनगुणमावृणोति तद्दर्शनावरणीयं।
आत्मविषय: उपयोगो दर्शनं। न ज्ञानभेदं, तस्य बाह्यार्थविषयत्वात्। न च बाह्यान्तरंगविषययोरेकत्वं, विरोधात्। न च ज्ञानमेव द्विशक्तिसहितं, पर्यायस्य पर्यायाभावात्। ततो ‘ज्ञानदर्शनलक्षणो जीव: स्वीकर्तव्य:’। इदं च दर्शनमावार्यं, विरोधिद्रव्यसन्निधाने सत्यपि एतस्य निर्मूलत: विनाशाभावात्। भावे वा जीवस्यापि विनाश: प्रसज्यते, लक्षणविनाशे लक्ष्यस्यावस्थानविरोधात्। न च ज्ञानदर्शनयो: जीवलक्षणत्वमसिद्धं, द्वयोरभावे जीवद्रव्यस्यैवाभावप्रसंगात्।
भवतु चेत् ?
न, प्रमाणाभावे प्रमेयानां शेषद्रव्याणामपि अभावापत्ते:।
उक्तं चाप्यन्यत्र- ‘एक्को मे सासदो अप्पा, णाणदंसणलक्खणो।
सेसा हु बाहिरा भावा, सव्वे संजोगलक्खणा।।
एतद् दर्शनमावारयति इति दर्शनावरणीयं। य: पुद्गलस्कंध: मिथ्यात्वासंयमकषाययोगै: कर्मस्वरूपेण परिणतो जीवसमवेतो दर्शनगुणप्रतिबंधक: स दर्शनावरणीयं इति गृहीतव्य:।
वेद्यते इति वेदनीयम्।
एतद्व्युत्पत्ते: सर्वकर्मणां वेदनीयत्वं प्रसज्यते ?
नैष दोष:, रूढिवशेन कुशलशब्द इव अर्पितपुद्गलपुंजे चैव वेदनीय शब्दप्रवृत्ते: अथवा वेदयतीति वेदनीयं। जीवस्य सुखदु:खानुभवननिबंधन: पुद्गलस्वंâध: मिथ्यात्वादिनिमित्तवशेन कर्मपर्यायपरिणत: जीवसमवेत: वेदनीयमिति कथ्यते।
सुखदु:खकार्यान्यथानुपपत्ते: तस्यास्तित्वं ज्ञायते। न कार्यं कारणनिरपेक्षमुत्पद्यते, अन्यत्र तथानुपलंभात्। न जीवो दु:खस्वभावो, जीवलक्षणज्ञानदर्शनविरोधिदु:खस्य जीवस्वभावत्वविरोधात्।
मुह्यते इति मोहनीयम्।
एवं सति जीवस्य मोहनीयत्वं प्रसज्यते ?
नैतद् आशंकनीयं, जीवाद् अभिन्ने पुद्गलद्रव्ये कर्मसंज्ञिते उपचारेण कर्तृत्वमारोप्य तथा उक्ते:। अथवा मोहयति इति मोहनीयम्।
एवं सति मदिराकलत्रादीनामपि मोहनीयत्वं प्रसज्यते इति चेत् ?
न, कर्मद्रव्यमोहनीयस्यात्राधिकारात्। न कर्माधिकारे सुराकलत्रादीनां संभवोऽस्ति।
किं कर्म ?
पुद्गलद्रव्यं। यदि एवं, तर्हि सर्वपुद्गलानां कर्मत्वं प्रसज्यते ?
न, मिथ्यात्वादिप्रत्ययै: जीवे संबद्धानां जातिजरामरणकार्यकरणे समर्थानां पुद्गलानामेव कर्मत्वाभ्युपगमात्।
उक्तं- जीवपरिणामहेदू, कम्मत्तं पोग्गला परिणमंति।
ण य णाणपरिणदो पुण, जीवो कम्मं समादियदि।।
अतो मिथ्यात्वादिप्रत्ययै: क्रोधमानमायालोभादिकार्यकारित्वेन परिणता: पुद्गला: जीवेन सह संबद्धा मोहनीयसंज्ञिता भवन्तीति उक्तं भवति।
एति भवधारणं प्रति इत्यायु:। ये पुद्गला: मिथ्यात्वादिकारणै: नरकादिभवधारणशक्तिपरिणता: जीवनिविष्टास्ते आयु:संज्ञिता: भवन्ति।
अस्यायुष: अस्तित्वं कथमवगम्यते ?
देहस्थिति-अन्यथानुपपत्ते: गम्यते।
नाना मिणोति निर्वत्र्तयतीति नाम। ये पुद्गला: शरीरसंस्थान-संहनन-वर्णगंधादिकार्यकारका: जीवनिविष्टास्ते नामसंज्ञिता: भवन्तीति। तस्य नामकर्मणोऽस्तित्वं शरीर-संस्थान-वर्णादिकार्यभेदान्यथानुपपत्ते: अवगम्यते।
गमयत्युच्च-नीचकुलमिति गोत्रम्। उच्चनीचकुलोत्पादक: पुद्गलस्कंध: मिथ्यात्वादिप्रत्ययैर्जीवसंबद्धो गोत्रमिति उच्यते।
अन्तरमेति गच्छति द्वयोरित्यन्तराय:। दान-लाभ-भोगोपभोगादिषु विघ्नकरणक्षम: पुद्गलस्कंध: सकारणै: जीवसमवेत: अन्तरायमिति कथ्यते।
इयन्त्यश्चैव मूलप्रकृतयो भवन्तीति ज्ञापनार्थं अत्र सूत्रे ‘इति’ शब्द: प्रयुक्तोऽस्ति। अस्मिन् विषये उपयुक्त: श्लोक: कथ्यते-
हेतावेवम्प्रकारादौ व्यवच्छेदे विपर्यये।
प्रादुर्भावे समाप्तौ च इति शब्दं विदुर्बुधा:१।।
अष्टावेव मूलप्रकृतय:, एतत्कुतो ज्ञायते ?
अष्टकर्मजनितकार्येभ्य: पृथग्भूतकार्यस्य अनुपलंभात्। एताभिरष्टभि: प्रकृतिभि: अनंतानंतपरमाणु-समुदयसमागमेन उत्पन्नाभि: एवैâकजीवप्रदेशे संबद्धानंतपरमाणुभि: अनादिस्वरूपेण संबद्धोऽमूत्र्तोऽपि मूत्र्तत्वमुपगत: आविद्धकुलालचक्रमिव सप्तसु संसारेषु जीव: संसरतीति गृहीतव्यं।
अत्र मेधाविजीवानुग्रहार्थं संग्रहनयमवलम्ब्य प्रकृतिसमुत्कीर्तनं कथितं। पुन: मंदबुद्धिजनानुग्रहार्थं व्यवहार-नयपर्यायमाश्रित्य आसां अष्टानां भेदा: कथयिष्यन्ते।
एवं द्वितीयस्थले अष्टविधमूलप्रकृतीनां कथनपरत्वेन नव सूत्राणि गतानि।


अब नवों चूलिकाओं के अर्थ का प्ररूपण करने के लिये सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

‘कितनी और किन प्रकृतियों को बांधते हैं’ यह जो पूर्व सूत्र में कथित पद है उसका व्याख्यान किया जाता है।।२।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-जिस प्रकार का उद्देश्य होता है उसी प्रकार से निर्देश किया जाता है, इस न्याय से पहले उद्दिष्ट का पहले निर्देश होता है यह बात जानी जाती है। अतएव यह सूत्र आरम्भ नहीं करना चाहिये ?

यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि इस पद में ये चूलिकायें अवस्थित हैं और ये चूलिकायें अवस्थित नहीं हैं, इस विषय का ज्ञान कराने के लिये तथा ‘जिस प्रकार से उद्देश्य होता है, उसी प्रकार से निर्देश होता है’ इस न्याय का अस्तित्व प्ररूपण करने के लिये इस सूत्र को प्रारम्भ किया गया है। विभाषा-विविध प्रकार के भाषण-कथन करने को विभाषा कहते हैं। विभाषा, प्ररूपणा, निरूपणा और व्याख्यान, ये सब एकार्थवाची नाम हैं।

अब इस अधिकार का प्रतिज्ञासूत्र अवतार लेता है-

सूत्रार्थ-

अब प्रकृतियों के स्वरूप का निरूपण करेंगे।।३।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-प्रकृतियों का समुत्कीर्तन प्रकृतिसमुत्कीर्तन है अर्थात् प्रकृतियों के स्वरूप का निरूपण करना, ऐसा अर्थ होता है। अब-इस समय सत्प्ररूपणा आदि आठों प्ररूपणाओं के अनन्तर ‘प्रकृतिसमुत्कीर्तन’ नाम की चूलिका को कहेंगे। यहाँ ‘कस्सामो-भणिष्याम:’ ये दोनों पर्यायवाची हैं-एकार्थवाची हैं।

शंका-प्रथम ही प्रकृतिसमुत्कीर्तन को किसलिये कहते हैं ?

समाधान-ऐसा नहीं कहना, क्योंकि, प्रकृतियों को जाने बिना स्थानसमुत्कीर्तन आदि को जानने का कोई उपाय नहीं है। दूसरी बात यह है कि अवयवी को जाने बिना अवयव नहीं जाने जा सकते हैं, क्योंकि अन्यत्र वैसा पाया नहीं जाता। इसलिये प्रकृतिसमुत्कीर्तन को ही पहले कहेंगे। वह प्रकृति समुत्कीर्तन भी मूलप्रकृतिसमुत्कीर्तन और उत्तरप्रकृतिसमुत्कीर्तन के भेद से दो प्रकार का है। अपने अन्तर्गत समस्त भेदों का संग्रह करने वाली, द्रव्यार्थिक नय निमित्तक प्रकृति का नाम मूल प्रकृति है। पृथक-पृथक अवयव वाली तथा पर्यायार्थिक नय निमित्तक प्रकृति को उत्तर प्रकृति कहते हैं।

यहाँ मूलप्रकृति समुत्कीर्तन को पहले कहते हैं, क्योंकि समस्त उत्तरप्रकृतियों का संग्रह करने वाली, मूलप्रकृति के प्ररूपण किये जाने पर ही उत्तरप्रकृतियों की प्ररूपणा बन सकती है, अन्यथा नहीं।

इस प्रकार प्रथम स्थल में प्रकृतिसमुत्कीर्तन के कथन की प्रतिज्ञा रूप से तीन सूत्र पूर्ण हुए हैं।

अब प्रकृति के आठ भेदों को प्ररूपित करने के लिये नव सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

वह प्रकृति समुत्कीर्तन किस प्रकार है ?।।४।।

ज्ञानावरणीय कर्म है।।५।।

दर्शनावरणीय कर्म है।।६।।

वेदनीय कर्म है।।७।।

मोहनीय कर्म है।।८।।

आयु कर्म है।।९।।

नाम कर्म है।।१०।।

गोत्र कर्म है।।११।।

अन्तराय कर्म है।।१२।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-‘तं जहा’ यह पृच्छासूत्र है। सूत्रकर्ता की प्रमाणता के प्ररूपण द्वारा सूत्र की प्रमाणता का निरूपण करने के लिये यह ‘पृच्छासूत्र’ कहा गया है।

ज्ञान, अवबोध, अवगम और परिच्छेद ये सब एकार्थवाची नाम हैं। उस ज्ञान का जो आवरण करता है-ढकता है, वह ज्ञानावरण कर्म है।

शंका-इसका ‘ज्ञानावरण’ कर्म का ज्ञानविनाशक ऐसा नाम क्यों नहीं कहते ?

समाधान-नहीं, क्योंकि जीव के लक्षणस्वरूप ज्ञान और दर्शन का विनाश नहीं होता है। यदि ज्ञान और दर्शन का विनाश हो जाए, तो जीव का भी विनाश हो जायेगा, क्योंकि लक्षण से रहित लक्ष्य पाया नहीं जाता है।

शंका-ज्ञान का विनाश नहीं होने पर तो सभी जीवों के ज्ञान का अस्तित्व प्राप्त होता है ?

समाधान-यदि सभी जीवों के ज्ञान का अस्तित्व प्राप्त होता है तो होने दो, उसमें कोई विरोध नहीं है अथवा ‘अक्षर का अनन्तवां भाग ज्ञान नित्य ही उद्घाटित-आवरणरहित रहता है’ इस सूत्र के अनुकूल होने से सभी जीवों के ज्ञान का अस्तित्व सिद्ध है।

शंका-यदि सर्व जीवों के ज्ञान का अस्तित्व सिद्ध है, तब तो सर्व अवयवों के साथ ज्ञान की उपलब्धि होनी चाहिये ?

समाधान-यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि आवरण किये गये ज्ञान के भागों की उपलब्धि होने में विरोध है। शंका-आवरणयुक्त जीव में आवरण किये गये-ढके हुये ज्ञान के भाग क्या हैं ? अथवा नहीं हैं ? यदि हैं, तो वे आवृत-ढके हुये नहीं कहे जा सकते, क्योंकि सम्पूर्ण रूप से विद्यमान भागों के आवरण मानने में विरोध आता है। यदि नहीं है, तो उनका आवरण नहीं माना जा सकता है, क्योंकि आव्रियमाण-आवरण किये जाने योग्य ज्ञान के अभाव में आवरण के अस्तित्व का विरोध है ?

समाधान-आचार्यदेव इसका परिहार करते हैं-द्रव्यार्थिक नय का अवलम्बन लेने पर आवरण किये गये ज्ञान के अंश सावरण जीव में भी होते हैं, क्योंकि जीव से पृथग्भूत ज्ञान का अभाव है, अथवा विद्यमान ज्ञान के अंश से आवरण किये गये ज्ञान के अंशों का कोई भेद नहीं है।

शंका-ज्ञान के आवरण किये गये और आवरण नहीं किये गये अंशों की एकता कैसे हो सकती है ? समाधान-ऐसा नहीं कहना, क्योंकि, राहु और केतु से तथा मेघों से सूर्यमण्डल और चन्द्रमण्डल के आवरित और अनावरित भावों के एकता पायी जाती है।

इस प्रकार उक्त व्यवस्था के होने पर आव्रियमाण और आवारकभाव बन जाता है अर्थात् ज्ञान तो आवरण करने योग्य और कर्मपुद्गल आवरण करने वाले सिद्ध हो जाते हैं। यदि उक्त व्यवस्था न मानी जाए तो उसके अनुपलंभ का प्रसंग प्राप्त होगा किन्तु पर्यायार्थिक नय का अवलम्बन लेने पर आव्रियमाण ज्ञान भाग सावरण जीव में नहीं होते, क्योंकि वे ज्ञानभाग उक्त जीव में नहीं पाये जाते।

दूसरी बात यह है कि यह सूत्र पर्यायार्थिक नय का अवलम्बन लेकर स्थित नहीं है, क्योंकि उसमें आव्रियमाण और आवारक, इन दोनों के व्यवहार का अभाव है किन्तु यह सूत्र द्रव्यार्थिक नय का आश्रय लेकर अवस्थित है इसलिये यहाँ आव्रियमाण और आवारक भाव विरुद्ध नहीं है।

शंका-ज्ञान को आव्रियमाण-ढक जाने योग्य क्यों कहा ?

समाधान-इसका स्पष्टीकरण करते हैं-अपने विरोधी द्रव्य के निकट होने पर भी जो जड़मूल से नष्ट नहीं होता, वह ‘आव्रियमाण’ कहलाता है और आवरण करने वाले विरोधी द्रव्य को ‘आवारक’ कहते हैं। ज्ञान के विरोधी कर्म द्रव्य के सन्निकट होने पर भी ज्ञान का निर्मूल विनाश नहीं होता है क्योंकि वैसा मानने पर तो जीव के ही विनाश का प्रसंग आ जावेगा, इसलिये ज्ञान तो आव्रियमाण है और कर्मद्रव्य आवारक है, ऐसा कहा गया है। शंका-जीव से भिन्न ऐसे पुद्गल के द्वारा जीव का जो लक्षण है ऐसा ज्ञान कैसे नष्ट हो सकता है ? समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि जीव द्रव्य से भिन्न ऐसे घट, पट, स्तम्भ और अंधकार आदि पदार्थ जीव के लक्षणस्वरूप ज्ञान के विनाशक देखे जाते हैं। अत: ज्ञान पर आवरण करने वाला, प्रवाहरूप से चला आया, अनादिकाल से बंधनबद्ध ऐसा जो पुद्गलस्कंध है, वही ‘ज्ञानावरणीयकर्म’ इस नाम से कहा जाता है।

जो कर्म आत्मा के दर्शनगुण को ढकता है वह ‘दर्शनावरणीय कर्म’ है।

आत्मा को विषय करने वाला उपयोग ‘दर्शन’ कहलाता है। यह दर्शन ज्ञान का भेद नहीं है, क्योंकि ज्ञान बाह्य पदार्थों को विषय करता है। बाह्य और अन्तरंग को विषय करने वाले ज्ञान और दर्शन में एकता भी नहीं है, क्योंकि वैसा मानने में विरोध है। ज्ञान को ही दो शक्तियों से सहित नहीं माना जा सकता, क्योंकि पर्याय में पर्याय का अभाव है। इसलिये ज्ञान-दर्शन लक्षणस्वरूप जीव को मानना चाहिये।

यह दर्शन ढक जाने योग्य है, क्योंकि विरोधी द्रव्य के सन्निकट होने पर भी इस दर्शन का निर्मूल विनाश नहीं होता है। यदि ऐसा-निर्मूल विनाश मान लेवें, तो जीव के भी विनाश का प्रसंग आ जावेगा, क्योंकि लक्षण के विनाश होने पर लक्ष्य के अवस्थान का विरोध है। ज्ञान और दर्शन के जीव का लक्षणपना असिद्ध भी नहीं है, क्योंकि इन ज्ञान और दर्शन के अभाव में जीवद्रव्य के ही अभाव का प्रसंग आ जाता है।

जीव द्रव्य का अभाव हो जाता है तो हो जाने दो ?

ऐसा नहीं कहना, क्योंकि प्रमाण के अभाव में प्रमेय-जानने योग्य शेष सभी द्रव्यों के भी अभाव का प्रसंग आ जावेगा, किन्तु ऐसा है नहीं। कहा भी है-

मेरा आत्मा एक है, शाश्वत है और वह ज्ञान-दर्शन लक्षण वाला है, शेष सभी भाव-पदार्थ संयोग लक्षण वाले हैं, अत: वे बाह्य हैं।

जो ऐसे दर्शन का आवरण करता है-ढकता है वह ‘दर्शनावरणीय कर्म’ है। जो पुद्गल स्कंध मिथ्यात्व, असंयम, कषाय और योग के द्वारा कर्मस्वरूप से परिणत होकर जीव से समवेत-जीव के साथ एकमेक होकर दर्शनगुण का प्रतिबन्ध करने वाले हैं वे ‘दर्शनावरणीय’ हैं ऐसा ग्रहण करना चाहिये।

वेदनीय कर्म-

जो वेदन-अनुभवन किया जाता है वह ‘वेदनीय कर्म’ है।

शंका-इस व्युत्पत्ति से तो सभी कर्मों को ‘वेदनीयपने’ का प्रसंग आ जावेगा ? समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि रूढ़ि के वश से कुशलशब्द के समान विवक्षित पुद्गलपुंज-पुद्गल समूह में ही ‘वेदनीय’ शब्द की प्रवृत्ति पायी जाती है। अथवा जो वेदन कराता है वह वेदनीय कर्म है। जीव के सुख-दु:ख के अनुभवन का कारण, मिथ्यात्व आदि के निमित्त से कर्म पर्याय से परिणत और जीव से समवेत-जीव के साथ एक क्षेत्रावगाहरूप सम्बन्ध को प्राप्त ऐसा जो पुद्गलस्कंध है वह ‘वेदनीय’ इस नाम से जाना जाता है।

सुख और दु:ख कार्यों की अन्यथानुपपत्ति होने से-सुख-दु:ख कार्य अन्य किसी प्रकार से हो नहीं सकते, अत: इस वेदनीय कर्म का अस्तित्व जाना जाता है, क्योंकि कोई भी कार्य कारण के बिना हो नहीं सकता क्योंकि अन्यत्र-कहीं पर भी वैसा देखा नहीं जाता-कोई भी कार्य कारण के बिना कहीं पर भी नहीं देखे जाते हैं।

जीव दु:खस्वभाव वाला नहीं है क्योंकि जीव के लक्षण जो ज्ञान और दर्शन हैं, उनका विरोधी जो दु:ख है, उसके जीव के स्वभावत्व का विरोध है।

मोहनीय कर्म-

जो मोहित किया जाता है, वह मोहनीय कर्म है।

ऐसा मानने पर तो जीव को मोहनीय कर्मपना प्राप्त हो जाता है ?

ऐसी आशंका नहीं करना, क्योंकि जीव से अभिन्न और ‘कर्म’ संज्ञा वाले पुद्गलद्रव्य में उपचार से कर्तृत्व का आरोपण करके उस प्रकार की व्युत्पत्ति की गई है।

अथवा, जो मोहित करता है वह मोहनीय कर्म है।

ऐसा मानने पर तो धतूरा, मदिरा और स्त्री आदि के भी मोहनीयकर्मपना प्राप्त हो जावेगा ?

ऐसा नहीं कहना, क्योंकि यहाँ कर्मद्रव्यस्वरूप जो मोहनीय कर्म है उसका अधिकार है, अतएव कर्म के अधिकार में धतूरा, मदिरा, भार्या आदि को मोहनीय कर्म मानना संभव नहीं है।

‘कर्म’ क्या है ?

पुद्गल द्रव्य कर्म है। यदि ऐसा है तो सभी पुद्गलों के कर्मपना प्राप्त हो जावेगा ?

ऐसा नहीं कहना, क्योंकि, मिथ्यात्व आदि बंध कारणों के द्वारा जीव में सम्बन्ध को प्राप्त एवं जन्म, जरा और मरण आदि कार्यों के करने में समर्थ ऐसे पुद्गलों के माना ही गया है।

कहा भी है-‘जीव के रागादि परिणामों के निमित्त से पुद्गल कर्मरूप परिणत होते हैं, किन्तु ज्ञान से परिणत हुये जीव कर्मों को प्राप्त नहीं करते हैं अर्थात् शुद्धोपयोग से परिणत निर्विकल्प समाधि में स्थित जीवों के कर्मों का आस्रव नहीं होता है।।’

इसलिये मिथ्यात्व, असंयम, कषाय और योगरूप प्रत्ययों के द्वारा क्रोध, मान, माया, लोभ आदि कार्य करने की शक्ति से परिणत हुये पुद्गल जीव के साथ सम्बन्ध को प्राप्त होकर ‘मोहनीय’ इस नाम वाले हो जाते हैं, ऐसा इस कथन का सार है।

आयुकर्म-

अवधारण के प्रति जो जाता है, वह आयु कर्म है अर्थात् भव को प्राप्त कराता है वह आयु कर्म है। जो पुद्गल स्कन्ध मिथ्यात्व आदि बंध कारणों के द्वारा नरक आदि भव धारण करने की शक्ति से परिणत होकर जीव में सम्बन्ध को प्राप्त करते हैं-जीव में बंध जाते हैं, वे ‘आयु’ इस नाम से कहलाते हैं।

शंका-इस आयुकर्म का अस्तित्व कैसे जाना जाता है ?

समाधान-मनुष्य आदि शरीर की स्थिति अन्यथा हो नहीं सकती, इस अन्यथानुपपत्ति से आयुकर्म का अस्तित्व जाना जाता है।

नामकर्म-

जो नाना प्रकार की रचना निष्पन्न करता है, वह नामकर्म है। जो पुद्गल वर्गणायें शरीर, संस्थान, संहनन, वर्ण, गंध आदि कार्यों के करने वाले हैं एवं जीव में निविष्ट-संबद्ध हैं, वे ‘ नामकर्म’ इस संज्ञा वाले होते हैं, यह उक्त कथन का तात्पर्य है।

शरीर, संस्थान, वर्ण आदि कार्यों के भेद अन्यथा हो नहीं सकते, इस अन्यथानुपपत्ति से ही नामकर्म का अस्तित्व जाना जाता है।

गोत्रकर्म-

जो उच्च और नीच कुल को प्राप्त कराता है, वह गोत्रकर्म है। मिथ्यात्व आदि बन्ध के कारणों द्वारा जीव के साथ सम्बन्ध को प्राप्त एवं उच्च और नीच कुलों में उत्पन्न कराने वाले पुद्गलस्कंध ‘गोत्र’ इस नाम से कहे जाते हैं।

अन्तराय कर्म-

जो दो पदार्थों के अन्तर-मध्य में आता है, वह अन्तराय कर्म है। दान, लाभ, भोग और उपभोग आदि के साथ सम्बन्ध को प्राप्त हुए पुद्गलस्कंध ‘अंतराय’ इस नाम से कहे जाते हैं।

ये मूल प्रकृतियाँ इतनी ही-आठ ही हैं, इस बात को बतलाने के लिये सूत्र में ‘इति’ शब्द का प्रयोग किया गया है। इस विषय में उपर्युक्त श्लोक कहते हैं-

‘‘हेतु, एवं, प्रकार, आदि, व्यवच्छेद, विपर्यय, प्रादुर्भाव और समाप्ति इनके सभी के अर्थ में ‘इति’ शब्द का प्रयोग होता है ऐसा विद्वानों ने कहा है अर्थात् ‘इति’ शब्द से ये हेतु आदि अर्थ होते हैं।।

इसलिये यहाँ ‘इति’ शब्द से मूल प्रकृतियाँ आठ ही हैं, ऐसा जानना।

मूल प्रकृतियाँ आठ ही हैं, यह कैसे जाना जाता है ?

आठ कर्मों के द्वारा उत्पन्न होने वाले कार्यों से पृथग्भूत कार्य पाये नहीं जाते, इससे जाना जाता है कि मूलप्रकृतियाँ आठ ही हैं।

इन आठ प्रकृतियों के द्वारा जो कि अनन्तानन्त परमाणुओं के समुदाय के समागम से उत्पन्न हुई हैं और एक-एक जीव प्रदेश पर संबद्ध अनन्त परमाणुओं के द्वारा अनादिस्वरूप से सम्बन्ध को प्राप्त अमूर्त भी यह जीव मूत्र्तत्व को प्राप्त होता हुआ आविद्ध कुलाल चक्र के समान-प्रयोग प्रेरित कुंभकार के चक्र के समान सात प्रकार के संसारों में संसरण-भ्रमण करता है ऐसा अर्थ ग्रहण करना चाहिये।

यहाँ मेधावी-बुद्धिमान जीवों पर अनुग्रह करने के लिए संग्रहनय का अवलम्बन लेकर प्रकृतिसमुत्कीर्तन नाम का प्रकरण कहा गया है। पुन: मंदबुद्धि वाले जनों पर अनुग्रह करने के लिये व्यवहारनयरूप पर्याय का आश्रय लेकर आचार्यदेव इन आठों प्रकृतियों के भेदों को कहेंगे।

इस प्रकार द्वितीयस्थल में आठ प्रकार की मूल प्रकृतियों के कथन रूप से नव सूत्र पूर्ण हुये हैं।

अधुना ज्ञानावरणीयस्य पंचभेदतल्लक्षणप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते

-णाणावरणीयस्स कम्मस्स पंच पयडीओ।।१३।।

आभिणिबोहियणाणावरणीयं सुदणाणावरणीयं ओहिणाणावरणीयं मणपज्जवणाणावरणीयं केवलणाणावरणीयं चेदि।।१४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अत्र पूर्वं सूत्रं द्रव्यार्थिकशिष्यानुग्रहकारि, पश्चिमं सूत्रं पर्यायार्थिकनय-शिष्यानुग्रहकारि इति द्वयोरपि सूत्रयो: सार्थक्यं। अभिमुख-नियमितार्थावबोध: आभिनिबोध:। स्थूल-वर्तमान-अनंतरितार्था अभिमुखा:। चक्षुरिन्द्रिये रूपं नियमितं, श्रोत्रेन्द्रिये शब्द:, घ्राणेन्द्रिये गंध:, जिह्वेन्द्रिये रस:, स्पर्शनेन्द्रिये स्पर्श:, नोइन्द्रिये दृष्ट-श्रुतानुभूतार्था: नियमिता:। अभिमुखनियमितार्थेषु य: बोध: स: आभिनिबोध:, तदेव आभिनिबोधिकज्ञानं। अत्र ज्ञानं विशेष्यमाणं, तस्य सामान्यरूपत्वात्। आभिनिबोधिकं विशेषणं, अन्येभ्यो व्यवच्छेदकारित्वात्। तेन न पुनरुक्तदोष आगच्छति।
तच्च आभिनिबोधिकज्ञानं चतुर्विधं-अवग्रह: ईहा अवाय: धारणा च। विषयविषयिसंपातानंतरमाद्यं ग्रहणमवग्रह:। विषय: बाह्योऽर्थ:, विषयी-इन्द्रियाणि। तयो: द्वयोरपि संपातो नाम ज्ञानजननयोग्यावस्था, तदनंतरमुत्पन्नं ज्ञानमवग्रह:। सोऽपि अवग्रहो द्विविध:-अर्थावग्रहो व्यञ्जनावग्रहश्चेति। तत्र अप्राप्तार्थ-ग्रहणमर्थावग्रह:, यथा चक्षुरिन्द्रियेण। प्राप्तार्थग्रहणं व्यञ्जनावग्रह: यथा स्पर्शनेन्द्रियेण।
अवगृहीतार्थस्य विशेषाकांक्षणमीहा। यथा कमपि दृष्ट्वा किमयं भव्योऽभव्यो वा इति विशेषपरीक्षा सा ईहा। नेयं संदेहरूपा, विचारबुद्धे: संदेहविनाशोपलंभात्। संदेहात् उपरितना, अवायात् अधस्तना अन्तराले प्रवृत्ता विचारबुद्धि: ईहा नाम।
‘वितर्क: श्रुतम्’ इति वचनादीहा वितर्करूपत्वात् श्रुतज्ञानं इति चेत् ?
नैष दोष:, अवग्रहेण प्रतिगृहीतार्थावलंबनो वितर्क: ईहा, भिन्नार्थालंबनो वितर्क: श्रुतज्ञानमिति अभ्युपगमात्।
ईहितस्यार्थस्य संदेहापोहनमवाय:। पूर्वं किं भव्य: किमयं अभव्य: इति य: संदेहबुद्ध्या विषयीकृतो जीव: स एष: अभव्यो न भवति, भव्यश्चैव, भव्यत्वाविनाभाविसम्यग्ज्ञान-सम्यग्दर्शन-सम्यक्चारित्रा-णामुपलंभात्, इति उत्पन्नप्रत्ययोऽवाय: नाम।
अवग्रहावाययो: निर्णयत्वं प्रति भेदाभावात् एकत्वं किन्न भवति ?
भवतु तेन एकत्वं, किन्तु अवग्रहो नाम विषयविषयिसंन्निपातानंतरभावी प्रथम: बोधविशेष:, अवाय: पुन: ईहानंतरकालभावी उत्पन्नसंदेहाभावरूप:, तेन न द्वयोरेकत्वं।
निर्णीतस्यार्थस्य कालान्तरे अविस्मृतिर्धारणा। यस्मात् ज्ञानात् कालान्तरेऽपि अविस्मरणहेतुभूतो जीवे संस्कार: उत्पद्यते, तज्ज्ञानं धारणा नाम। न चावग्रहादिचतुर्णामपि ज्ञानानां सर्वत्र क्रमेण उत्पत्ति:, तथानुपलंभात्।
तत: कुत्रचित् अवग्रह एव, क्वचित् अवग्रह: ईहा च द्वे एव, क्वचिदपि अवग्रह:, ईहा अवायश्चैव त्रयो भवन्ति, क्वापि अवग्रह: ईहा अवाय: धारणा चेति चत्वारि ज्ञानानि अपि भवन्ति। तत्र बहु-बहुविध-क्षिप्रानि:सृतानुक्तध्रुवसेतरभेदेनैकैको द्वादशविध:। तत्र बहूनामेकवारेण ग्रहणं बहु-अवग्रह: एवं बहु-बहुविधादि भेदै: अवग्रह: द्वादशविध:। इत्थं ईहादीनामपि द्वादश भेदा: प्ररूपयितव्या:। चक्षुरिन्द्रिय-नोइन्द्रिययो: अष्टचत्वािंरशत् आभिनिबोधिकज्ञानविकल्पा: भवन्ति, एतेषां व्यञ्जनावग्रहाभावात्। शेषेन्द्रियाणां षष्टि: मतिज्ञानविकल्पा:, तत्र अर्थव्यञ्जनावग्रहयो: द्वयोरपि संभवात्। सर्वे मिलित्वा अस्य आभिनिबोधिकज्ञानस्य षट्िंत्रशदुत्तरत्रिशतानि भेदा: भवन्ति। एवंविधस्य ज्ञानस्य यदावरणं तदाभिनिबोधिकज्ञानावरणीयं।
श्रुतज्ञानस्य आवरणीयं श्रुतज्ञानावरणीयं। तत्र श्रुतज्ञानं नाम इन्द्रियै: गृहीतार्थात् तत: पृथग्भूतार्थग्रहणं, यथा शब्दात् घटादीनामुपलंभ:, धूमात् अग्नेरुपलंभो वा। तत्श्रुतज्ञानं विंशतिविधं-पर्याय: पर्यायसमास: अक्षरं अक्षरसमास: पदं पदसमास: संघात: संघातसमास: प्रतिपत्ति: प्रतिपत्तिसमास: अनियोग: अनियोगसमास: प्राभृतप्राभृत: प्राभृतप्राभृतसमास: प्राभृत: प्राभृतसमास: वस्तु वस्तुसमास: पूर्वं पूर्वसमासश्चेति।
क्षरणाभावात् अक्षरं केवलज्ञानं१। तस्यानन्तिम भाग: पर्याय: नाम मतिज्ञानं। तच्च केवलज्ञानमिव निरावरणमक्षरं च। एतस्मात् सूक्ष्मनिगोदलब्ध्यक्षरात् यदुत्पद्यते तदपि ज्ञानं पर्याय: उच्यते। अनंतभागवृद्धि: असंख्यातभागवृद्धि: संख्यातभागवृद्धि: संख्यातगुणवृद्धि: असंख्यातगुणवृद्धि: अनंतगुणवृद्धि: इति एषा एका षड्वृद्धि:।
एतादृश्य: असंख्यातलोकमात्रा: षड्वृद्धय: तासामुपरि गत्वा पर्यायसमासश्रुतज्ञानस्य अन्तिमो विकल्पो भवति। तदन्तिमविकल्पज्ञानं अनन्तै: रूपै: गुणिते अक्षरं नाम श्रुतज्ञानं भवति।
कथमेतस्य अक्षरव्यपदेश:?
नैतद् वक्तव्यं, द्रव्यश्रुतप्रतिबद्धैकाक्षरोत्पन्नस्य उपचारेण अक्षरव्यपदेशात्। अस्याक्षरश्रुतज्ञानस्योपरि एकैकाक्षरवृद्धिश्चैव भवति, अपरा: वृद्धयो न भवन्तीति आचार्यपरंपरागतोपदेशात्।
पुन: केचित् आचार्या ‘अक्षरश्रुतज्ञानमपि षड्विधया वृद्ध्या वर्धते’ इति भणंति, नेदं घटते, सकलश्रुतज्ञानस्य संख्यातभागात् अक्षरज्ञानादुपरि षड्वृद्धीनां संभवाभावात्।
 अक्षरश्रुतज्ञानादुपरितनानां पदश्रुतज्ञानादधस्तनानां संख्यातानां श्रुतज्ञानविकल्पानामक्षरसमास: इति संज्ञा।
तत: एकाक्षरज्ञाने वर्धिते पदं नाम श्रुतज्ञानं भवति।
कुत एतस्य पदसंज्ञा ?
‘षोडशशतचतुस्त्रिंशत्कोटय: त्र्यशीतिलक्षा: अष्टसप्ततिशतानि अष्टाशीति: अक्षराणि,’ एतानि अक्षराणि गृहीत्वा एकं द्रव्यश्रुतपदं भवति। एतेभ्य: उत्पन्न भावश्रुतमपि उपचारेण पदमिति उच्यते। एतस्य पदस्य श्रुतज्ञानस्योपरि एकाक्षरश्रुतज्ञाने वद्र्धिते पदसमास: नाम श्रुतज्ञानं भवति। एवमेकाक्षरादिक्रमेण पदसमासश्रुतज्ञानं वद्र्धमानं गच्छति यावत्संघात: इति।
संख्यातै: पदै: संघातो नाम श्रुतज्ञानं भवति। चतसृभि: गतिभि: मार्गणा भवति। तत्र यावद्भि: पदै: नरकगत्या: एकपृथिवी प्ररूप्यते, तावतां पदानां तेभ्य: उत्पन्नश्रुतज्ञानस्य च संघातसंज्ञा इति उक्तं भवति। एवं सर्वगती: सर्वमार्गणाश्चाश्रित्य वक्तव्यं।
अस्य संघातश्रुतज्ञानस्योपरि अक्षरश्रुतज्ञाने वद्र्धिते संघातसमासो नाम श्रुतज्ञानं भवति। एवं संघातसमासो वद्र्धमानो गच्छति यावत् एकाक्षरश्रुतज्ञानेनोन प्रतिपत्तिश्रुतज्ञानमिति।
यावद्भि: पदै: एकगति-इन्द्रिय-काय-योगादय: प्ररूपयिष्यन्ते तावत्पदानां प्रतिपत्तिसंज्ञा। प्रतिपत्या: उपरि एकाक्षरश्रुतज्ञाने वद्र्धिते प्रतिपत्तिसमासो नाम श्रुतज्ञानं भवति।
एवं प्रतिपत्ति समासश्चैव भूत्वा गच्छति यावत् एकाक्षरेणोननियोगद्वारश्रुतज्ञानमिति। यावत्पदै: चतुर्दशमार्गणानां प्रतिबद्धै: योऽर्थ: ज्ञायते तेषां पदानां तत्रोत्पन्नज्ञानस्य चानियोग: इति संज्ञा।
तस्योपरि एकाक्षरश्रुतज्ञाने वद्र्धिते अनियोगसमासो भवति। एवमनियोगसमासश्रुतज्ञानं एकैकाक्षरोत्तर-वृद्ध्या वद्र्धमानं गच्छति यावत् एकाक्षरेणोनप्राभृतप्राभृतमिति। तस्योपरि एकाक्षरश्रुतज्ञाने वद्र्धिते प्राभृतप्राभृतं भवति। संख्यातै: अनियोगश्रुतज्ञानै: एकं प्राभृत-प्राभृतं नाम श्रुतज्ञानं भवति। तस्योपरि एकाक्षरवद्र्धिते प्राभृतप्राभृतसमासो भवति।
तस्योपरि एकाक्षरादिवृद्धिक्रमेण प्राभृतप्राभृतसमासो गच्छति यावदेकाक्षरेणोन प्राभृतमिति। तस्योपरि एकाक्षरे वद्र्धिते प्राभृतश्रुतज्ञानं भवति। एतस्योपरि एकाक्षरे वद्र्धिते प्राभृतसमासो भवति। एवमैकैकाक्षर-वृद्धिक्रमेण प्राभृतसमासो गच्छति यावदेकाक्षरेणोनविंशतितमप्राभृतमिति। एतस्योपरि एकाक्षरे वद्र्धिते वस्तुश्रुतज्ञानं भवति। तस्योपरि एकाक्षरे वद्र्धिते वस्तुसमासो भवति। एवं वस्तुसमासो गच्छति यावदेकाक्षरेणोनान्तिमवस्तु इति। एतस्योपरि एकाक्षरे वद्र्धिते पूर्वं नाम श्रुतज्ञानं भवति। तस्योपरि एकाक्षरे वद्र्धिते पूर्वसमासो भवति। एवं पूर्वसमासो गच्छति यावत् लोकबिंदुसारचरमाक्षरं इति।
एतस्य श्रुतज्ञानस्य आवरणं श्रुतज्ञानावरणीयं नाम ज्ञानावरणस्य द्वितीयो भेद: कथ्यते।
पूर्वं सत्प्ररूपणायां पर्यायादिश्रुतज्ञानानां वर्णनं कृतं पुन: अत्र कथं क्रियते ?
नैष दोष:, पूर्वं श्रुतज्ञानस्य प्रकरणे गोम्मटसारग्रन्थाधारेण किंचित् विस्तरेण प्रोक्तमस्ति अत्र तु श्रुतज्ञानावरणस्य प्रकरणे श्रीवीरसेनाचार्यस्य वचनानुसारेण संक्षिप्तरूपेण कथितं मया स्वात्मनि श्रुतज्ञानक्षयोपशमवृद्धये इति।
‘‘श्रुतं मतिपूर्वं द्वयनेकद्वादशभेदं।।’’ इति सूत्रकथित द्वादशांगांगबाह्यादिनानाभेद-प्रभेदरूपश्रुतज्ञानस्य यावन्तो भेदा: तावन्त एव तस्य श्रुतज्ञानावरणस्य भेदा: अपि ज्ञातव्या: भवन्ति।
अवाग्धानादवधि:, अवधिश्च स ज्ञानं तत् अवधिज्ञानं। अथवा अवधिर्मर्यादा, अवधेज्र्ञानमवधिज्ञानं। तत्त्रिविधं-देशावधि: परमावधि: सर्वावधिश्चेति।
मर्यादासहितमवधिज्ञानं अतोऽस्य सावधित्वेन मतिश्रुतज्ञानाभ्यां भेदाभावात् पृथक्प्ररूपणं निरर्थकं इति चेत् ?
नैषदोष:, मतिश्रुतज्ञाने परोक्षे, अवधिज्ञानं पुन: प्रत्यक्षं, तेन ताभ्यां तस्य भेदोपलंभात्।
मतिज्ञानमपि प्रत्यक्षं दृश्यते ?
न, मतिज्ञानेन प्रत्यक्षं वस्तुनोऽनुपलंभात्। यत् प्रत्यक्षं उपलभ्यते, तत् वस्तुन: एकदेश:, अत: तत् वस्तु न भवति। यदपि वस्तु, तदपि न प्रत्यक्षेण उपलभ्यते, तस्य प्रत्यक्षाप्रत्यक्ष-परोक्षमतिज्ञानविषयत्वात्। तत: मतिज्ञानं प्रत्यक्षेण न वस्तुपरिच्छेदकं। अस्यायमर्थ:-मतिज्ञानं सिद्धान्तभाषया परोक्षं इन्द्रियानिद्रिंय-निमित्तत्वात्, न्यायग्रन्थानुसारेण सांव्यवहारिकप्रत्यक्षं इन्द्रियद्वारै: चक्षुषा वा वस्तुप्रत्यक्षीकरणात् अत: अत्र प्रत्यक्षाप्रत्यक्षपरोक्षं कथितं श्रीवीरसेनाचार्येणेति।
अन्यत्रापि उक्तं-‘‘प्रत्यक्षं विशदं ज्ञानं त्रिधा-इन्द्रियप्रत्यक्षं, अनिंद्रियप्रत्यक्षं, अतीन्द्रियप्रत्यक्षं।
प्रत्यक्षलक्षणं प्राहु: स्पष्टं साकारमञ्जसा।
द्रव्यपर्यायसामान्य-विशेषार्थात्मवेदनम्।।३।।
हिताहिताप्तिनिर्मुक्ति-क्षममिंद्रियानिर्मितम्।
यद्देशतोऽर्थज्ञानं तदिन्द्रियाध्यक्षमुच्यते।।४।।
सदसज्ज्ञानसंवादविसंवादविवेकत:।
सविकल्पाविनाभावी समक्षेतरसम्प्लव:।।५।।

अतो न मतिश्रुतज्ञानाभ्यां अवधिज्ञानस्य एकत्वं। अपूर्णस्य एकदेशात्मप्रत्यक्षस्य अवधिज्ञानस्य यदावारकं तदवधिज्ञानावरणीयं नाम ज्ञानावरणकर्मण: तृतीयो भेद: कथ्यते।
परकीयमनोगतोऽर्थ: मन:, तस्य पर्याया: विशेषा: मन:पर्यया:, तान् जानातीति मन:पर्ययज्ञानं। तच्च द्विविधं-ऋजुमति-विपुलमतिभेदेन। तत्र ऋजुमति: चिंतितमेव जानाति, नाचिंतितं, चिंतितमपि ज्ञायमानं ऋजुकेण चिंतितमेव जानाति न वव्रं चिंतितं। विपुलमति: पुन: चिंतितमचिंतितं वक्रचिंतितम-वक्रचिंतितमपि जानाति।
अवधिमन:पर्यययोज्र्ञानयो: किमन्तरम् ?
मन:पर्ययज्ञानं विशिष्टसंयमनिमित्तं, अवधिज्ञानं पुन: भवप्रत्ययं गुणप्रत्ययं च। मन:पर्ययज्ञानं मतिपूर्वकमेव, अवधिज्ञानं पुन: अवधिदर्शनपूर्वकं। एतद्द्वयोरन्तरम्। मन:पर्ययज्ञानस्यावरणं मन:पर्ययज्ञाना-वरणीयम्।
केवलमसहायमिन्द्रियालोकनिरपेक्षं त्रिकालगोचरानन्तपर्यायसमवेतानन्तवस्तुपरिच्छेदवंâ सर्वव्यापकम-सपत्नं केवलज्ञानं।
नष्टानुत्पन्नार्थानां कथं तत: केवलज्ञानात् परिच्छेद:?
न, केवलत्वात् सहायनिरपेक्षत्वात् बाह्यार्थापेक्षया विना नष्टानुत्पन्नपदार्थानां ज्ञानोत्पत्ते: विरोधाभावात्।
अस्य व्युत्पत्यर्थ:-श्रीपूज्यपादस्वामिना कृत:-‘‘बाह्येनाभ्यन्तरेण च तपसा यदर्थमर्थिनो केवन्ते सेवन्ते तत्केवलं। असहायमिति वा।’’
अस्य केवलज्ञानस्य आवरणं केवलज्ञानावरणीयं।
तात्पर्यमेतत्-द्रव्यश्रुतज्ञानबलेन भावश्रुतज्ञानं संप्राप्य तपश्चरणं कृत्वा केवलज्ञानं आविर्भावयितव्यम् भवद्भि:।
एवं तृतीयस्थले ज्ञानानां आवरणभेदकथनत्वेन द्वे सूत्रे गते।


अब ज्ञानावरणीय के पाँच भेद और उनके लक्षणों का प्रतिपादन करने के लिये दो सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

ज्ञानावरणीय कर्म की पाँच उत्तर प्रकृतियाँ हैं।।१३।।

आभिनिबोधिक ज्ञानावरणीय, श्रुतज्ञानावरणीय, अवधिज्ञानावरणीय, मन:पर्यय ज्ञानावरणीय और केवल ज्ञानावरणीय ये पाँच प्रकृतियाँ ज्ञानावरणीय कर्म की हैं।।१४।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-यहाँ पूर्व का सूत्र द्रव्यार्थिकनयानुसारी शिष्यों के अनुग्रह करने के लिये है और पिछला-द्वितीयसूत्र पर्यायार्थिकनय का अनुसरण करने वाले शिष्यों का अनुग्रहकारी है। इसलिये इन दोनों सूत्रों की सार्थकता है।

अभिमुख और नियमित अर्थ के अवबोध-ज्ञान को आभिनिबोध कहते हैं। स्थूल, वर्तमान और अनन्तरित-व्यवधान रहित अर्थों को अभिमुख कहते हैं। चक्षु इन्द्रिय में रूप नियमित है, श्रोत्र इंद्रिय में शब्द, घ्राण इन्द्रिय में गंध, जिह्वा इंद्रिय में रस, स्पर्शन इंद्रिय में स्पर्श और नो इन्द्रिय-मन के विषय में देखे गये, सुने गये और अनुभूत-अनुभव में आये हुए पदार्थ नियमित हैं। इन अभिमुख और नियमित पदार्थों में जो बोध होता है वह आभिनिबोध कहलाता है और वही ज्ञान आभिनिबोधिक ज्ञान है। यहाँ पर ‘ज्ञान’ यह विशेष्य पद है, क्योंकि वह सामान्यरूप है। ‘आभिनिबोधिक’ यह विशेषण है, क्योंकि वह अन्य ज्ञानों से व्यवच्छेद-भिन्न करता है, इसलिये यहाँ दोनों पदों के देने पर भी पुनरक्त दोष नहीं आता है। इस आभिनिबोधिकज्ञान के चार भेद हैं-अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा। विषय और विषयी के योग्य देश में प्राप्त होने के अनन्तर जो आद्य-प्रथम ग्रहण होता है वह ‘अवग्रह’ है। बाह्य पदार्थ को विषय कहते हैं और इन्द्रियाँ विषयी कहलाती हैं। इन दोनों का भी संपात-सम्बन्ध होना-ज्ञान को उत्पन्न करने के योग्य अवस्था का होना, इसी का नाम संपात है। विषय और विषयी के संपात के अनन्तर उत्पन्न होने वाला ज्ञान ‘अवग्रह’ कहलाता है।

इस अवग्रह के दो भेद हैं-अर्थावग्रह और व्यंजनावग्रह।

उनमें अप्राप्त-अस्पृष्ट अर्थ के ग्रहण को अर्थावग्रह कहते हैं, जैसे-चक्षुइन्द्रिय के द्वारा बिना स्पर्श किये ही रूप को ग्रहण किया जाता है। प्राप्त-स्पृष्ट पदार्थ को ग्रहण करना व्यंजनावग्रह है, जैसे-स्पर्शन इन्द्रिय के द्वारा स्पर्श को ग्रहण करना।

अवग्रह से ग्रहण किये गये अर्थ को विशेष जानने की आकांक्षा ‘ईहा’ है। जैसे-किसी पुरुष को देखकर यह भव्य है या अभव्य है, इस प्रकार की विशेष परीक्षा करने को ईहा ज्ञान कहते हैं। यह ईहाज्ञान संदेहरूप नहीं है, क्योंकि ईहात्मक विचार बुद्धि से संदेह का विनाश देखा जाता है। संदेह से उपरितन और अवायज्ञान से अधस्तन-अंतराल में प्रवृत्त होने वाली विचार बुद्धि का नाम ईहा है।

शंका-‘विशेष रूप से तर्क करना श्रुतज्ञान है’ इस सूत्र वचन के अनुसार ईहा वितर्करूप होने से श्रुतज्ञान है ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि अवग्रह से प्रतिगृहीत अर्थ के अवलम्बन करने वाले वितर्क को ईहा कहते हैं और भिन्न अर्थ का अवलम्बन करने वाला वितर्क श्रुतज्ञान है, ऐसा अर्थ स्वीकार किया गया है।

ईहाज्ञान से जाने गये पदार्थविषयक संदेह का दूर हो जाना ‘अवाय’ है। पहले ईहाज्ञान से ‘क्या यह भव्य है अथवा अभव्य’ इस प्रकार जो संदेहरूप बुद्धि के द्वारा विषय किया गया जीव है, सो यह अभव्य नहीं है, भव्य ही है, क्योंकि उसमें भव्यत्व के अविनाभावी सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन और सम्यक्चारित्र पाये जाते हैं, इस प्रकार से उत्पन्न हुये प्रत्यय-विश्वस्त ज्ञान का नाम ‘अवाय’ है।

शंका-अवग्रह और अवाय में निर्णयपने की अपेक्षा भेद नहीं है, तब इन दोनों में एकता क्यों नहीं है ?

समाधान-निर्णय के निमित्त से एकता भले ही हो जावे, फिर भी दोनों भिन्न हैं। विषय और विषयी के सन्निपात के अनन्तर उत्पन्न होने वाला प्रथम ज्ञानविशेष अवग्रह है, और ईहा के अनन्तर काल में उत्पन्न होने वाले संदेह के अभावरूप अवायज्ञान होता है, इसलिये अवग्रह और अवाय, इन दोनों ज्ञानों में एकता नहीं है।

अवायज्ञान से निर्णय किये गये पदार्थ का कालान्तर में विस्मरण न होना ‘धारणा’ है। जिस ज्ञान से कालान्तर में भी अविस्मरण का कारणभूत संस्कार जीव में उत्पन्न होता है, उस ज्ञान का नाम धारणा है। इन चारों ही अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा ज्ञानों की सर्वत्र क्रम से ही उत्पत्ति हो ऐसा नहीं है, क्योंकि वैसा नहीं पाया जाता।

इसलिये कहीं तो केवल अवग्रह ज्ञान ही होता है, कहीं पर अवग्रह और ईहा दो होते हैं, कहीं पर अवग्रह, ईहा और अवाय ये तीन ही होते हैं और कहीं भी-किन्हीं जीव को अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा ये चारों ज्ञान भी होते हैं।

उनमें बहु, बहुविध, क्षिप्र, अनि:सृत, अनुक्त और ध्रुव और इनके प्रतिपक्षी-एक, एकविध, अक्षिप्र, नि:सृत, उक्त तथा अध्रुव ये बारह भेद हैं। इनमें अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा ये बहु, बहुविध आदि से प्रत्येक चारों ही बारह-बारह भेदरूप हो जाते हैं। उनमें बहुत वस्तुओं का एक साथ ग्रहण करना ‘बहु अवग्रह’ है। इसी प्रकार बहुविध आदि प्रकार से अवग्रह बारह भेदरूप हो जाता है। इसी तरह ‘ईहा’ आदि में भी बारह भेद प्ररूपित करना चाहिये।

ये चक्षु इंद्रिय और नोइंद्रिय के अड़तालिस आभिनिबोधिक ज्ञान सम्बन्धी विकल्प होते हैं, क्योंकि चक्षु और मन, इन दोनों के व्यंजनावग्रह का अभाव है। शेष चारों इंद्रियों के साठ मतिज्ञान सम्बन्धी भेद होते हैं, क्योंकि इनमें अर्थावग्रह और व्यंजनावग्रह दोनों ही संभव हैं। सभी मिलकर ये आभिनिबोधिक ज्ञान के तीन सौ छत्तीस भेद होते हैं। इस प्रकार के ज्ञान का जो आवरण है वह आभिनिबोधिक ज्ञानावरणीय कर्म है।

भावार्थ-बहु आदि १२ पदार्थों का अवग्रह आदि ४ प्रकार के ज्ञान, पाँच इन्द्रियाँ और मन इन छह की सहायता से होते हैं, इसलिए १२²४·४८²६·२८८ भेद हुए। इनमें व्यञ्जनावग्रह के १२²४·४८ भेद जोड़ने से कुल २८८²४८·३३६ मतिज्ञान के भेद हो जाते हैं।

श्रुतज्ञान के आवरण करने वाले कर्म को श्रुत ज्ञानावरणीय कहते हैं। उनमें इंद्रियों से ग्रहण किये गये पदार्थ से उससे पृथग्भूत पदार्थ का ग्रहण करना श्रुतज्ञान है, जैसे-शब्द से घट आदि पदार्थों का जानना अथवा धूम से अग्नि का ग्रहण करना। वह श्रुतज्ञान बीस प्रकार का है-

पर्याय, पर्याय समास, अक्षर, अक्षरसमास, पद, पदसमास, संघात, संघातसमास, प्रतिपत्ति, प्रतिपत्तिसमास, अनुयोग, अनुयोगसमास, प्राभृत-प्राभृत, प्राभृत-प्राभृतसमास, प्राभृत, प्राभृतसमास, वस्तु, वस्तुसमास, पूर्व और पूर्वसमास ये बीस भेद हैं।

क्षरण-विनाश का अभाव होने से केवलज्ञान ‘अक्षर’ कहलाता है। उसका अनन्तवां भाग ‘पर्याय’ नाम का मतिज्ञान है। वह पर्याय नाम का मतिज्ञान केवलज्ञान के समान निवारण और अक्षर-अविनाशी है। इस सूक्ष्म-निगोद लब्धि-अक्षर से जो श्रुतज्ञान उत्पन्न होता है वह भी ज्ञान कार्य में कारण के उपचार से ‘पर्याय’ कहलाता है।

अनंतभागवृद्धि, असंख्यातभागवृद्धि, संख्यातभागवृद्धि, संख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणवृद्धि और अनंतगुणवृद्धि, इन छहों वृद्धियों के समुदायात्मक यह एक षड्वृद्धि मानी गई है। इस प्रकार की संख्यात लोकप्रमाण षट्वृद्धियों के ऊपर जाकर ‘पर्यायसमास’ नाम के श्रुतज्ञान का अंतिम विकल्प-भेद होता है। उस अंतिम विकल्प को-भेदरूप ज्ञान को अनंत रूपों से गुणित करने पर ‘अक्षर’ नाम का श्रुतज्ञान होता है।

शंका-इस श्रुतज्ञान की ‘अक्षर’ यह संज्ञा कैसे हुई ?

समाधान-ऐसा नहीं कहना, क्योंकि द्रव्यश्रुत से प्रतिबद्ध एक अक्षर से उत्पन्न हुये ज्ञान की उत्पत्ति की अपेक्षा उपचार से ‘अक्षर’ यह संज्ञा है। इस अक्षर श्रुतज्ञान के ऊपर एक-एक अक्षर की ही वृद्धि होती है, अन्य वृद्धियाँ नहीं होती हैं। इस प्रकार आचार्य परम्परागत उपदेश पाया जाता है।

पुन: कितने ही आचार्य ऐसा कहते हैं कि अक्षर श्रुतज्ञान भी छह प्रकार की वृद्धियों से बढ़ता है किन्तु उनका यह कथन घटित नहीं होता है, क्योंकि समस्त श्रुतज्ञान के संख्यातवें भागरूप अक्षरज्ञान से ऊपर छह प्रकार की वृद्धियों का होना सम्भव नहीं है।

अक्षर श्रुतज्ञान के ऊपर और पदश्रुतज्ञान से अधस्तन श्रुतज्ञान संख्यात विकल्पों की ‘अक्षरसमास’ यह संख्या है। इस अक्षरसमास श्रुतज्ञान से ऊपर एक अक्षर के बढ़ने पर ‘पद’ नाम का श्रुतज्ञान होता है।

शंका-उक्त प्रकार के इस श्रुतज्ञान की ‘पद’ यह संज्ञा कैसे है ?

समाधान-सोलह सौ चौंतीस करोड़, तेरासी लाख, अठत्तर सौ अठासी (१६३४,८३,०७८८८) अक्षरों को लेकर द्रव्यश्रुत का एक ‘पद’ होता है। इन अक्षरों से उत्पन्न हुआ भावश्रुत भी उपचार से ‘पद’ ऐसा कहा जाता है।

इस ‘पद’ नाम के श्रुतज्ञान के ऊपर एक अक्षर प्रमित श्रुतज्ञान के बढ़ने पर ‘पदसमास’ नामक श्रुतज्ञान होता है। इस प्रकार एक-एक अक्षर आदि के क्रम से ‘पदसमास’ श्रुतज्ञान बढ़ता हुआ तब तक जाता है जब तक कि ‘संघात’ नाम का श्रुतज्ञान प्राप्त होता है। इस प्रकार संख्यात पदों के द्वारा ‘संघात’ नाम का श्रुतज्ञान होता है। चारों गतियों के द्वारा मार्गणा होती है। उनमें जितने पदों के द्वारा नरकगति की एक पृथिवी निरूपित की जाती है, उतने पदों की और उनसे उत्पन्न श्रुतज्ञान की ‘संघात’ ऐसी संज्ञा होती है। इसी प्रकार सर्वगतियों और सर्वमार्गणाओं का आश्रय करके कहना चाहिये।

इस संघात श्रुतज्ञान के ऊपर एक अक्षर प्रमाण, श्रुतज्ञान के बढ़ाने पर ‘संघातसमास’ नाम का श्रुतज्ञान होता है। इस प्रकार संघातसमास नामक श्रुतज्ञान तब तक बढ़ता हुआ जाता है जब तक कि एक अक्षर श्रुतज्ञान से कम प्रतिपत्ति नाम का श्रुतज्ञान उत्पन्न होता है। जितने पदों के द्वारा एक गति, इन्द्रिय, काय और योग आदि मार्गणा प्ररूपित की जाती है, उतने पदों की ‘प्रतिपत्ति’ यह संज्ञा है। प्रतिपत्ति नाम के श्रुतज्ञान के ऊपर एक अक्षरप्रमाण श्रुतज्ञान के बढ़ने पर ‘प्रतिपत्तिसमास’ नाम का श्रुतज्ञान उत्पन्न होता है। इस प्रकार प्रतिपत्ति समास श्रुतज्ञान ही बढ़ता हुआ तब तक चला जाता है जब तक कि एक अक्षर से कम अनुयोगद्वार नामक श्रुतज्ञान प्राप्त होता है।

चौदह मार्गणाओं से प्रतिबद्ध जितने पदों के द्वारा जो अर्थ जाना जाता है, उतने पदों की और उनसे उत्पन्न हुए श्रुतज्ञान की ‘अनुयोग’ यह संज्ञा है। उस अनुयोग श्रुतज्ञान से ऊपर एक अक्षर प्रमाण श्रुतज्ञान के बढ़ने पर ‘अनुयोगसमास’ नामक श्रुतज्ञान प्राप्त होता है। उसके ऊपर एक अक्षर प्रमाण श्रुतज्ञान के बढ़ने पर ‘प्राभृत-प्राभृत’ नाम का श्रुतज्ञान प्राप्त होता है। संख्यात अनुयोगश्रुतज्ञानों के द्वारा एक ‘प्राभृत-प्राभृत’ नाम का श्रुतज्ञान होता है। इसके ऊपर एक अक्षर प्रमाण श्रुतज्ञान के बढ़ने पर ‘प्राभृत-प्राभृतसमास’ नामक श्रुतज्ञान उत्पन्न होता है।

इसके ऊपर एक अक्षर आदि की वृद्धि के क्रम से ‘प्राभृत-प्राभृतसमास’ तब तक बढ़ता हुआ जाता है जब तक कि एक अक्षर से कम ‘प्राभृत’ नाम का श्रुतज्ञान प्राप्त होता है।

उसके ऊपर एक अक्षर के बढ़ने पर ‘प्राभृत’ नामक श्रुतज्ञान होता है। इसके ऊपर एक अक्षर के बढ़ने पर ‘प्राभृतसमास’ श्रुतज्ञान होता है। इस प्रकार एक-एक अक्षर की वृद्धि के क्रम से प्राभृतसमास श्रुतज्ञान तब तक बढ़ता जाता है कि जब तक एक अक्षर से कम बीसवां ‘वस्तु’ श्रुतज्ञान प्राप्त होता है।

इसके ऊपर एक अक्षर के बढ़ने पर ‘वस्तु’ नाम का श्रुतज्ञान प्राप्त होता है। उस वस्तु श्रुतज्ञान के ऊपर एक अक्षर की वृद्धि होने पर ‘वस्तुसमास’ श्रुतज्ञान होता है। इस प्रकार वस्तुसमास ज्ञान तब तक बढ़ता जाता है जब तक कि एक अक्षर से कम अंतिम वस्तु नामक श्रुतज्ञान उत्पन्न होता है। इस अंतिम ‘वस्तुसमास’ श्रुतज्ञान के ऊपर एक अक्षर की वृद्धि होने पर ‘पूर्व’ नाम का श्रुतज्ञान उत्पन्न होता है। इसके ऊपर एक अक्षर की वृद्धि होने पर ‘पूर्व समास’ श्रुतज्ञान होता है। इस प्रकार ‘पूर्व समास’ श्रुतज्ञान बढ़ता तब तक चला जाता है जब तक कि ‘लोकबिन्दुसार’ नामक चौदहवें पूर्व का अंतिम अक्षर उत्पन्न होता है।

इस प्रकार के श्रुतज्ञान का आवरण करने वाला कर्म ‘श्रुतज्ञानावरणीय’ कर्म कहलाता है। यह ज्ञानावरण कर्म का दूसरा भेद कहलाता है।

शंका-पहले सत्प्ररूपणा में (प्रथम पुस्तक में) पर्याय आदि श्रुतज्ञानों का वर्णन किया है पुन: यहाँ क्यों करते हैं ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि पहले श्रुतज्ञान के प्रकरण में गोम्मटसार ग्रन्थ के आधार से िंकचित् विस्तार से कहा है, किन्तु यहाँ श्रुत ज्ञानावरण के प्रकरण में ‘श्री वीरसेनाचार्य’ के वचनानुसार संक्षिप्त रूप से मैंने अपनी आत्मा में श्रुतज्ञान के क्षयोपशम की वृद्धि के लिये कहा है।

‘श्रुतज्ञान मतिज्ञानपूर्वक होता है और वह अंगबाह्य तथा अंग के दो भेदरूप है पुन: अंगबाह्य के अनेक भेद एवं अंग के बारह भेद हैं।’ इस प्रकार के तत्त्वार्थ सूत्र में कथित द्वादशांग और अंगबाह्य आदि नाना भेद-प्रभेदरूप श्रुतज्ञान के जितने भेद हैं, उतने ही उस श्रुतज्ञानावरण के भेद भी जानना योग्य हैं।

जो अवाग्धान-नीचे की ओर प्रवृत्त हो, उसे अवधि कहते हैं। जो अवधिरूप ज्ञान होता है वह अवधिज्ञान कहलाता है अथवा अवधि का नाम मर्यादा है, उस अवधि-मर्यादा को लिये जो ज्ञान होता है वह अवधिज्ञान है। उसके तीन भेद हैं-देशावधि, परमावधि और सर्वावधि।

शंका-मर्यादा सहित ज्ञान अवधिज्ञान है इसलिये इसके मर्यादा सहित होने से मतिज्ञान और श्रुतज्ञान से इसमें कोई भेद नहीं है अत: पृथक् प्ररूपण करना निरर्थक है ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि मतिज्ञान और श्रुतज्ञान परोक्षज्ञान हैं और अवधिज्ञान प्रत्यक्ष है, इसलिये इन दोनों से उसमें भेद की उपलब्धि पायी जाती है।

शंका-मतिज्ञान भी तो प्रत्यक्ष देखा जाता है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि मतिज्ञान से वस्तु की प्रत्यक्ष उपलब्धि नहीं होती। जो मतिज्ञान से प्रत्यक्ष माना जाता है वह वस्तु का एकदेश है और वस्तु का एकदेश संपूर्ण वस्तुरूप नहीं हो सकता है। जो भी वस्तु है वह भी मतिज्ञान के द्वारा प्रत्यक्ष रूप से नहीं जानी जाती है, क्योंकि वह प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप परोक्ष मतिज्ञान का विषय है। इसलिये यह सिद्ध हुआ कि मतिज्ञान प्रत्यक्ष रूप से वस्तु का जानने वाला नहीं है।

इसका अर्थ यह है कि-मतिज्ञान सिद्धान्त की भाषा से परोक्ष है, क्योंकि वह इंद्रिय और मन के निमित्त से होता है। न्यायग्रन्थों के अनुसार सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष है, क्योंकि इन्द्रियों के द्वारा अथवा चक्षु से वस्तु को प्रत्यक्ष करता है इसलिये यहाँ श्री वीरसेनाचार्य देव ने ‘प्रत्यक्षाप्रत्यक्षपरोक्ष’ कहा है, ऐसा समझना।

अन्यत्र-प्रमाणसंग्रह ग्रन्थ में भी कहा है-

प्रत्यक्ष विशद ज्ञान तीन प्रकार का है-इंद्रिय प्रत्यक्ष, अनिन्द्रिय प्रत्यक्ष और अतीन्द्रिय प्रत्यक्ष।

जो स्पष्ट और साकार है वह प्रत्यक्ष ज्ञान है। वह द्रव्य और पर्याय के सामान्य और विशेष को ग्रहण करने वाला है।।३।।

जो हित की प्राप्ति और अहित का परिहार कराने में समर्थ, इंद्रियों से उत्पन्न और एकदेश रूप से पदार्थों का ज्ञान है, वह इन्द्रिय-प्रत्यक्ष है।।४।।

जो सद्ज्ञान-असद्ज्ञान के संवाद व विसंवाद से भेदरूप है, सविकल्प के साथ अविनाभावी है, वह प्रत्यक्षाप्रत्यक्षरूप ज्ञान है।।५।।

इसलिये मतिज्ञान और श्रुतज्ञान से अवधिज्ञान में एकता नहीं है। अपूर्ण एकदेशात्मक प्रत्यक्ष ऐसे अवधिज्ञान का जो आवारक-आवरण करने वाला है वह अवधिज्ञानावरणीय नाम के ज्ञानावरण कर्म का तीसरा भेद है।

दूसरे व्यक्ति के मन में स्थित पदार्थ मन कहलाता है। उसकी पर्यायों को-विशेषों को मन:पर्यय कहते हैं। जो ज्ञान उनको जानता है वह मन:पर्यय ज्ञान है। उसके दो भेद हैं-ऋजुमति और विपुलमति। उसमें से ऋजुमति मन:पर्ययज्ञान मन में चिंतवन किये गये पदार्थ को ही जानता है, अचिंतित पदार्थ को नहीं, चिंतित को जानता हुआ भी सरलरूप से चिंतित पदार्थ को ही जानता है, वक्ररूप से चिंतित को नहीं। पुन: विपुलमति मन:पर्ययज्ञान चिंतित, अचिंतित पदार्थ को भी, तथा वक्र चिंतित और अवक्रचिंतित पदार्थ को भी जानता है।

शंका-अवधिज्ञान और मन:पर्यय ज्ञान में क्या अन्तर है ?

समाधान-मन:पर्यय ज्ञान विशिष्ट संयम के निमित्त से उत्पन्न होता है, किन्तु अवधिज्ञान भव के निमित्त से और गुणप्रत्यय क्षयोपशम के निमित्त से उत्पन्न होता है। मन:पर्ययज्ञान मतिज्ञानपूर्वक ही होता है, किन्तु अवधिज्ञान अवधिदर्शनपूर्वक होता है। यही इन दोनों में अन्तर है। ऐसे मन:पर्यय ज्ञान पर आवरण करने वाला कर्म मन:पर्यय ज्ञानावरणीय कहलाता है।

असहाय ज्ञान केवलज्ञान है। यह ज्ञान इंद्रिय और आलोक की अपेक्षा से रहित है, त्रिकालगोचर है, अनंत पर्यायों से समन्वित अनंत पदार्थों को जानने वाला है, सर्व व्यापक है और असपत्न-प्रतिपक्ष से रहित है।

शंका-जो पदार्थ नष्ट हो चुके हैं और जो अभी उत्पन्न ही नहीं हुये हैं, उनको केवलज्ञान से कैसे जाना जा सकता है ?

समाधान-ऐसा नहीं कहना, क्योंकि जो ज्ञान सहाय-पर की अपेक्षा से रहित है, बाह्य पदार्थों की अपेक्षा के बिना नष्ट और अनुत्पन्न पदार्थों के ज्ञान की उत्पत्ति में कोई विरोध नहीं है।

इसका व्युत्पत्ति अर्थ श्री पूज्यपादस्वामी ने किया है- बाह्य और आभ्यंतर तप के द्वारा अर्थीजन जिसके लिये सेवन करते हैं-तपश्चरण करते हैं उसका नाम केवलज्ञान है और असहाय-इंद्रियादि के सहयोग की अपेक्षा से रहित ज्ञान केवलज्ञान है। इस केवलज्ञान पर आवरण करने वाला कर्म केवलज्ञानावरणीय है।

यहाँ तात्पर्य यह है कि द्रव्य श्रुतज्ञान के बल से भावश्रुतज्ञान को प्राप्त करके पुन: तपश्चरण करके हमें और आपको अपने में केवलज्ञान को प्रगट करना चाहिये।

इस प्रकार तीसरे स्थल में ज्ञानों पर आवरण करने वालों के भेद को कहने वाले दो सूत्र पूर्ण हुये।

संप्रति दर्शनावरणस्य भेदलक्षणप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-

-दंसणावरणीयस्स कम्मस्स णव पयडीओ।।१५।।

णिद्दाणिद्दा पयलापयला थीणगिद्धी णिद्दा पयला य, चक्खुदंसणा-वरणीयं अचक्खुदंसणावरणीयं ओहिदंसणावरणीयं केवलदंसणावरणीयं चेदि।।१६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रयोरर्थ: सुगमोऽस्ति। प्रथमं सूत्रं द्रव्यार्थिकनयमाश्रित्य स्थितं संगृहीताशेष-विशेषत्वात्।
संग्रहनयात् कथं विशेषो ज्ञायते ?
नैतत् वक्तव्यं, बीजबुद्धीनां शिष्याणां संग्रहनयात् विशेषावगमे विरोधाभावात्। पर्यायार्थिकनयानुग्रहार्थं उत्तरसूत्रमस्ति अनेन दर्शनावरणीयानां भेदा: सूचिता: सन्ति।
तत्र निद्रानिद्राया: तीव्रोदयेन वृक्षाग्रे विषमभूमौ यत्र तत्र वा देशे घुर्घुरायमानो वा निर्भरं स्वपिति। प्रचलाप्रचलाया: तीव्रोदयेन उपविष्टो वा उद्भूतो वा मुखेन गलन् लार: पुन: पुन: कंपमानशरीरशिर: निर्भरं स्वपिति। स्त्यानगृद्ध्या तीव्रोदयेन उत्थापितोऽपि पुन: शेते, सुप्तोऽपि किमपि कार्यं करोति, सुप्तोऽपि जल्पति, दन्तान् कटकटापयति।
निद्रायास्तीव्रोदयेन अल्पकालं स्वपिति, उत्थाप्यमान: शीघ्रं उत्तिष्ठति, अल्पशब्देनापि चेतति। प्रचलायास्तीव्रोदयेन बालुकाभरिते इव लोचने भवत:, गुरुभारोद्धृतमिव शिर: भवति, पुन: पुन: लोचने उन्मीलननिमीलने करोति, निद्राभरेण पतन्नपि लघु आत्मानं संधारयति, मनाक् मनाक् कम्पते, सावधानश्च स्वपिति।
एतेषां पञ्चानां कथं दर्शनावरणव्यपदेश:?
न, चेतनमपहरत: सर्वदर्शनविरोधिन: दर्शनावरणत्वं प्रति विरोधाभावात्।
किं दर्शनम् ?
ज्ञानोत्पादकप्रयत्नानुविद्धस्वसंवेद्यो दर्शनं आत्मविषयोपयोग: इत्यर्थ:। नात्र ज्ञानोत्पादकयत्नस्य तंत्रता, अन्यथा प्रयत्नरहितक्षीणावरणान्तरंगोपयोगस्य केवलिनो भगवत: अदर्शनत्वप्रसंगात्। तत्र चक्षुज्र्ञानोत्पादक-प्रयत्नानुविद्धस्वसंवेदने रूपदर्शनक्षमोऽहमिति संभावनाहेतुश्चक्षुर्दर्शनम्। एतदावृणोतीति चक्षुर्दर्शनावरणीयं। शेषेन्द्रियमनसां दर्शनमचक्षुर्दर्शनम्। तदावृणोतीति अचक्षुर्दर्शनावरणीयम्। अवधेर्दर्शनं अवधिदर्शनं। तदावृणोतीत्यवधिदर्शनावरणीयम्। केवलं असपत्नं केवलं च तद्दर्शनं च केवलदर्शनं। तस्य आवरणं केवलदर्शनावरणीयं।
बाह्यार्थसामान्यग्रहणं दर्शनमिति केचिदाचक्षते, तदत्र कथं न मन्यते ?
तन्नात्र सिद्धान्तग्रन्थे सिद्ध्यति, सामान्यग्रहणास्तित्वं प्रत्यविशेषत: श्रुतमन:पर्ययोरपि दर्शनस्यास्तित्व-प्रसंगात्, सामान्यग्रहणमन्तरेण विशेषग्रहणाभावत: संसारावस्थायां ज्ञानदर्शनयोरक्रमेण प्रवृत्तिप्रसंगात्। न क्रमप्रवृत्तिरपि, सामान्य-निर्लुठितविशेषाभावत: तत्रावस्तुनि ज्ञानस्य प्रवृत्तिविरोधात्। न च ज्ञानस्य प्रामाण्यं वस्त्वपरिच्छेदकत्वात्। न च विशेषमात्रं वस्तु, तस्यार्थक्रियाकर्तृत्वाभावात्। तत: सामान्यमात्मा, सकलार्थसाधारणत्वात्तद्विषय उपयोगो दर्शनमिति प्रत्येतव्यं।
केचिदाचक्षते-केवलज्ञानमेव आत्मार्थावभासकमिति केवलदर्शनस्याभावोऽस्ति ?
आचार्या:प्राहु:-एतन्न वक्तव्यं, पर्यायस्य केवलज्ञानस्य पर्यायाभावत: सामथ्र्यद्वयाभावात्। भावे वा अनवस्था न वैâश्चित् निवार्यते। तस्मादात्मा स्वपरावभासक: इति निश्चेतव्यम्। तत्र स्वावभास: केवलदर्शनम्, परावभास: केवलज्ञानम्।
तथा सति कथं केवलज्ञान-दर्शनयो: साम्यमिति चेत् ?
न, ज्ञेयप्रमाणज्ञानात्मकात्मानुभवस्य ज्ञानप्रमाणत्वाविरोधात्।
अत्र सूत्रे ‘इति’ शब्द: एतावदर्थे, दर्शनावरणीयस्य कर्मण: एतावत्य एव प्रकृतयो नाधिका: इत्यर्थ:।
एवं चतुर्थस्थले दर्शनावरणकर्मण: भेदस्वरूपप्रतिपादनत्वेन द्वे सूत्रे गते।
अधुना वेदनीयकर्मण: भेदलक्षणनिरूपणाय सूत्रद्वयमवतार्यते-वेदणीयस्स कम्मस्स दुवे पयडीओ।।१७।।
सादावेदणीयं चेव असादावेदणीयं चेव।।१८।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-द्वयो: सूत्रयोरर्थ: सुगमोऽस्ति। प्रथमं सूत्रं संग्रहनयापेक्षं, संगृहीताशेषविशेषत्वात्, एतन्मेधाधिजनानुग्रहार्थंं।
भेदसूचकं सूत्रं पर्यायार्थिकनयापेक्षां मंदबुद्धिजनानुग्रहार्थमिति ज्ञातव्यं।
‘सादं सुहं, तं वेदावेदि भुंजावेदि त्ति सादावेदणीयं। असादं दुक्खं, तं वेदावेदि भुंजावेदि त्ति असादावेदणीयं१।’
अत्र कश्चिदाह-यदि सुखदु:खे कर्मभ्य: भवत:, तर्हि कर्मसु विनष्टेषु सुखदु:खवर्जितेन जीवेन भवितव्यं, सुखदु:खनिबंधनकर्माभावात्। सुखदु:खविवर्जितश्चैव भवतीति चेत् ? न, जीवद्रव्यनि:-स्वभावत्वात् अभावप्रसंगात्। अथ यदि दु:खमेव कर्मजनितं, तर्हि सातावेदनीयकर्माभावो भवेत् तस्य फलाभावात् इति ?
अस्य परिहार: उच्यते-तद्यथा-यत् किमपि दु:खं नाम तदसातावेदनीयाद् भवति, तस्य जीवस्वरूपत्वाभावात्। भावे वा क्षीणकर्मणां अपि दु:खेण भवितव्यं, ज्ञानदर्शनयोरिव कर्मविनाशे दु:खस्य विनाशाभावात्। सुखं पुन: न कर्मण: उत्पद्यते, तस्य जीवस्वभावत्वात् फलाभावात्। न सातावेदनीयाभावोऽपि, दु:खोपशमहेतुसुद्रव्यसंपादने तस्य सातावेदनीयस्य व्यापारात्।
एवं सति सातावेदनीयस्य पुद्गलविपाकित्वं भवति इति चेत् ?
नैतदाशंकनीयं, दु:खोपशमेनोत्पन्न-स्वास्थ्यकणस्य दु:खाविनाभाविन: उपचारेणैव लब्धसुखसंज्ञस्य जीवादपृथग्भूतस्य हेतुत्वेन सूत्रे तस्य जीवविपाकित्वसुखहेतुत्वानामुपदेशात्।
तह्र्यपि सातावेदनीयस्य जीवविपाकित्वपुद्गलविपाकित्वे प्राप्नुत: इति चेत् ?
न, इष्टत्वात्।
तथोपदेशो नास्तीति चेत् ?
न, जीवस्यास्तित्वान्यथानुपपत्ते: तथोपदेशास्तित्वसिद्धे:। न च सुखदु:खहेतुद्रव्यसंपादकमन्यत् कर्मास्ति इति अनुपलंभात्।
उक्तं च- जस्सोदएण जीवो सुहं व दुक्खं व दुविहमणुभवइ।
तस्सोदयक्खएण दु सुहदुक्खविवज्जिओ होई।
न च एतया गाथया सह विरोध:, सातावेदनीयात् उत्पन्नसुखाभावं दृष्ट्वा तत्र सुखदु:खाभावोपदेशात्।
सूत्रे द्वयो: पदयो: एवकार: किमर्थं क्रियते ?
उत्तरोत्तरोत्तरप्रकृतीनामभावप्रतिपादनार्थं द्विवारं एवकार: कृत: इति नैष दोष:।
एवं पंचमस्थले वेदनीयस्य स्वरूपप्रतिपादनत्वेन द्वे सूत्रे गते।
मोहनीयकर्मण: भेदप्रतिपादनार्थं सूत्रद्वयमवतार्यते-मोहणीयस्स कम्मस्स अट्ठावीसं पयडीओ।।१९।।
जं तं मोहणीयं कम्मं तं दुविहं, दंसणमोहणीयं चेव चारित्तमोहणीयं चेव।।२०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-प्रथमं सूत्रं संग्रहनयापेक्षं संगृहीताशेषविशेषत्वात् मेधाविजनानुग्रहकारि। द्वितीयसूत्रं मध्यमबुद्धिजनानुग्रहार्थं वर्तते।
एतस्मात् द्वितीयसूत्रात् कथं मोहनीयस्य कर्मण: सर्वभेदा: अवगम्यन्ते ?
आचार्योपदेशात्। एतस्य सूत्रस्य एतावान् अर्थ:, तं सर्वमाचार्या: प्ररूपयन्ति। तं प्ररूप्यमाणमर्थं मेधाविनोऽवधारयन्ति।


अब दर्शनावरण के भेद और लक्षण का प्रतिपादन करने के लिये दो सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

दर्शनावरण कर्म की नव प्रकृतियां हैं।।१५।।

निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, स्त्यानगृद्धि, निद्रा और प्रचला तथा चक्षुदर्शनावरणीय, अचक्षुदर्शनावरणीय, अवधिदर्शनावरणीय और केवलदर्शनावरणीय ये नव दर्शनावरणीय कर्म की उत्तरप्रकृतियां हैं।।१६।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-दोनों सूत्रों का अर्थ सुगम है। इनमें प्रथम सूत्र द्रव्यार्थिकनय का आश्रय करके स्थित है, क्योंकि यह समस्त विषयों का संग्रह करने वाला है।

शंका-संग्रहनय से विशेष कैसे जाना जाता है ?

समाधान-ऐसा नहीं कहना, क्योंकि बीजबुद्धि वाले शिष्यों के संग्रहनय से विशेष का ज्ञान होने में कोई विरोध नहीं है।

पुन: पर्यायार्थिक नय वाले शिष्यों के अनुग्रह के लिये उत्तर-द्वितीय सूत्र है। इस सूत्र से दर्शनावरणीय कर्म के भेद सूचित किये गये हैं। उनमें निद्रानिद्रा प्रकृति के तीव्र उदय से जीव वृक्ष के अग्रभाग पर या विषम भूमि पर अथवा जिस किसी स्थान पर घुरघुराता हुआ या नहीं भी घुरघुराता हुआ गाढ़ निद्रा में सोता है। प्रचलाप्रचला प्रकृति के तीव्र उदय से बैठा हुआ या खड़ा हुआ ही सोता रहता है, उसके मुख से लार बहने लगती है, बार-बार शरीर और सिर को कंपाता हुआ गाढ़ निद्रा में सोता रहता है। स्त्यानगृद्धि नाम की निद्रा के तीव्र उदय से उठाया जाने पर भी जीव पुन: सो जाता है, सोता हुआ भी कुछ कार्य कर आता है तथा सोते हुए भी बड़बड़ करता रहता है, दाँतों को कड़कड़ाता रहता है। निद्रा के तीव्र उदय से अल्पकाल सोता है, उठाये जाने पर जल्दी से उठ जाता है, अल्प शब्द के द्वारा भी सचेत हो जाता है-जग जाता है। प्रचला प्रकृति के तीव्रोदय से नेत्र बालू से भरे हुए के समान हो जाते हैं। सिर भारी भार के उठाये हुए के समान भारी हो जाता है और नेत्र पुन: उन्मीलन एवं निमीलन करने लगते हैं, निद्रा के भार से गिरते हुए भी संभल जाता है, थोड़ा-थोड़ा कांपता रहता है और सावधान होकर सोता है।

शंका-इन पांचों निद्राओं के दर्शनावरण संज्ञा कैसे है ?

समाधान-ऐसा नहीं कहना, क्योंकि आत्मा के चेतन गुण को अपहरण करने वाले और सर्वदर्शन के विरोधी कर्म के दर्शनावरणत्व के प्रति कोई विरोध नहीं है।

शंका-दर्शन किसे कहते हैं ?

समाधान-ज्ञान के उत्पादक प्रयत्न से सम्बद्ध स्वसंवेदनरूप आत्मविषयक उपयोग को दर्शन कहते हैं। इस दर्शन में ज्ञान के उत्पादक प्रयत्न की पराधीनता नहीं है, अन्यथा प्रयत्नरहित, क्षीणावरण और अंतरंग उपयोग वाले केवली भगवान के अदर्शनत्व का प्रसंग आ जावेगा।

उनमें चक्षु इंद्रिय सम्बन्धी ज्ञान के उत्पन्न करने वाले प्रयत्न से संयुक्त स्वसंवेदन के होने पर ‘मैं रूप देखने में समर्थ हूँ’ इस प्रकार की सम्भावना के हेतु को चक्षुदर्शन कहते हैं। जो इस पर आवरण करे वह चक्षुदर्शनावरण है। चक्षु इंद्रिय से अतिरिक्त शेष-चार इंद्रियों के और मन के दर्शन को अचक्षुदर्शन कहते हैं, उसको जो आवृत करे वह अचक्षुदर्शनावरण है। अवधि के दर्शन को अवधिदर्शन कहते हैं, उस पर आवरण करने वाला अवधिदर्शनावरण है। केवल-असपत्न-प्रतिपक्ष रहित जो दर्शन है वह केवलदर्शन है, उस पर आवरण करने वाला केवलदर्शनावरण है।

शंका-बाह्य पदार्थ को सामान्य रूप से ग्रहण करना दर्शन है ऐसा कितने ही आचार्य कहते हैं, यहाँ ऐसा अर्थ ही क्यों नहीं मानते ?

समाधान-यह कथन यहाँ सिद्धान्त ग्रन्थ में सिद्ध नहीं होता है, क्योंकि सामान्य ग्रहण के अस्तित्व के प्रति कोई विशेषता न होने से श्रुतज्ञान और मन:पर्ययज्ञान, इन दोनों को भी दर्शन के अस्तित्व का प्रसंग आता है। अतएव सामान्य ग्रहण के बिना विशेष के ग्रहण का अभाव होने से संसार अवस्था में ज्ञान और दर्शन की युगपत् प्रवृत्ति का प्रसंग आता है तथा क्रम से प्रवृत्ति भी नहीं बन सकती, क्योंकि सामान्य से रहित विशेष कोई वस्तु नहीं है और अवस्तु में ज्ञान की प्रवृत्ति होने का विरोध है। यदि अवस्तु में ज्ञान की प्रवृत्ति मानी जायेगी तो ज्ञान के प्रमाणता नहीं हो सकती, क्योंकि वह वस्तु का परिच्छेदक-जानने वाला नहीं रहा।

केवल विशेष नाम से कोई वस्तु नहीं है, क्योंकि उसके अर्थक्रिया के करने का अभाव है। इसलिये ‘सामान्य’ नाम आत्मा का है, क्योंकि वह सकल पदार्थों में साधारणरूप से व्याप्त है, इस प्रकार सामान्यरूप आत्मा को विषय करने वाला उपयोग दर्शन है, ऐसा निश्चय करना चाहिये।

शंका-कोई कहते हैं कि-केवलज्ञान ही अपने आपका और अन्य पदार्थों का जानने वाला है, अत: केवलदर्शन का ‘अभाव’ है ?

समाधान-आचार्यदेव कहते हैं-आपका यह कथन संगत नहीं है, क्योंकि केवलज्ञान पर्याय है। उस पर्याय में दूसरी पर्याय का अभाव होने से उसमें दो प्रकार की सामथ्र्य नहीं है। यदि एक पर्याय में दूसरी पर्याय का सद्भाव मानेंगे तो अनवस्था दोष को किन्हीं के द्वारा रोका नहीं जा सकता। इसलिये आत्मा ही स्व और पर का जानने वाला है ऐसा निश्चय करना चाहिये। उसमें स्व-प्रतिभास का नाम केवलदर्शन है और पर पदार्थों का प्रतिभास-ज्ञान केवलज्ञान है।

शंका-ऐसी व्यवस्था मानने पर तो केवलज्ञान और केवलदर्शन में समानता कैसे रह सकेगी ?

समाधान-नहीं, क्योंकि ज्ञेयप्रमाण ज्ञानात्मक आत्मानुभव के ज्ञान के प्रमाण होने में कोई विरोध नहीं है।

इस सूत्र में ‘इति’ इस शब्द का प्रयोग ‘एतावत्’ अर्थ का वाचक है। इससे यह अर्थ होता है कि दर्शनावरणीय कर्म की इतनी ही-नव ही प्रकृतियां हैं अधिक नहीं हैं।

इस प्रकार चतुर्थ स्थल में दर्शनावरण कर्म के भेद और लक्षण का निरूपण करते हुए दो सूत्र पूर्ण हुये।

अब वेदनीय कर्म के भेद और लक्षण का निरूपण करने के लिये दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

वेदनीय कर्म की दो प्रकृतियाँ हैं।।१७।।

सातावेदनीय और असातावेदनीय ये दो ही प्रकृतियाँ हैं।।१८।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-इन दोनों सूत्रों का अर्थ यहाँ सुगम है। इनमें से प्रथम सूत्र तो संग्रहनय के आश्रित है, क्योंकि यह समस्त भेदों को अपने में संग्रहीत करने वाला है और यह बुद्धिमान शिष्यों के अनुग्रह के लिये है और दूसरा सूत्र भेद को सूचित करने वाला है, यह पर्यायार्थिक नय की अपेक्षा रखता है और यह मंदबुद्धि शिष्यों के लिये अनुग्रह करने वाला है, ऐसा जानना।

साता-सुख को कहते हैं। उस सुख का जो वेदन-अनुभवन कराता है वह ‘सातावेदनीय’ कर्म है। असाता नाम दु:ख का है जो उसका वेदन-अनुभवन कराता है वह ‘असातावेदनीय’ कर्म है।

यहाँ कोई कहता है-यदि सुख और दु:ख कर्मों से होते हैं, तब तो कर्मों के नष्ट हो जाने पर जीव को सुख-दु:ख से रहित हो जाना चाहिये, क्योंकि उसके सुख-दु:ख के कारणभूत ऐसे कर्मों का अभाव हो गया है। यदि कहा जाए कि कर्मों के नष्ट हो जाने से जीव सुख और दु:ख से रहित ही हो जाता है, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि जीवद्रव्य के नि:स्वभाव हो जाने से उस जीव का ही अभाव हो जावेगा। अथवा, यदि दु:ख ही कर्मजनित है, तब तो सातावेदनीय कर्म का अभाव हो जावेगा, क्योंकि फिर उसका कोई फल ही नहीं रहता है ?

अब आचार्यदेव इसका परिहार करते हैं-दु:ख नाम की जो कोई भी वस्तु है वह असातावेदनीय कर्म के उदय से होती है, क्योंकि यह जीव का स्वरूप-स्वभाव नहीं है। यदि जीव का स्वरूप माना जाये तो कर्मों से रहित जीवों के भी दु:ख होना चाहिये, क्योंकि ज्ञान और दर्शन के समान कर्म के विनाश होने पर भी दु:ख का विनाश नहीं हो सकेगा, किन्तु दु:ख का विनाश होता है अत: दु:ख जीव का स्वरूप नहीं है।

किन्तु सुख कर्म से उत्पन्न नहीं होता है, क्योंकि वह जीव का स्वभाव है और इसीलिये वह कर्म का फल नहीं है। इस प्रकार सुख को जीव का स्वभाव मानने पर सातावेदनीय का अभाव भी प्राप्त नहीं होता, क्योंकि, दु:ख-उपशमन के कारणभूत सुद्रव्यों के सम्पादन में सातावेदनीय कर्म का व्यापार होता है।

शंका-ऐसा मानने पर तो सातावेदनीय को पुद्गलविपाकी होने का प्रसंग आ जावेगा ?

समाधान-ऐसी आशंका नहीं करना, क्योंकि, दु:ख के उपशम से उत्पन्न हुए, दु:ख के अविनाभावी उपचार से ही सुख संज्ञा को प्राप्त और जीव से अप्रथग्भूत ऐसे स्वास्थ्य के कण का हेतु होने से सूत्र में सातावेदनीय कर्म के जीवविपाकीपना और सुख हेतुत्व का उपदेश दिया गया है।

शंका-यदि ऐसा है तो सातावेदनीय के जीवविपाकीपना और पुद्गलविपाकीपना दोनों ही प्राप्त हो जावेंगे ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि, यह तो हमें इष्ट ही है।

शंका-ऐसा उपदेश तो नहीं है ?

समाधान-ऐसा नहीं कहना, क्योंकि, जीव का अस्तित्व अन्यथा बन नहीं सकता, इसलिये उस प्रकार के उपदेश की सिद्धि हो जाती है। सुख और दु:ख के कारणभूत द्रव्यों का संपादन करने वाला दूसरा कोई कर्म नहीं है, क्योंकि वैसा कर्म कोई भी पाया नहीं जाता।

कहा भी है-जिसके उदय से जीव सुख और दु:ख, इन दोनों का अनुभव करता है, उसके उदय का क्षय हो जाने से वह सुख और दु:ख से रहित हो जाता है।

पूर्वोक्त व्यवस्था मानने पर इस गाथा के साथ विरोध भी नहीं आता क्योंकि सातावेदनीय कर्म के उदय से उत्पन्न होने वाले सुख के अभाव को देखकर वहाँ सांसारिक सुख नहीं है अत: उस सुख के अभाव की अपेक्षा उपर्युक्त गाथा में सुख और दु:ख के अभाव का उपदेश दिया है।

शंका-सूत्र में दोनों पदों पर ‘एवकार’ किसलिये किया है ?

समाधान-वेदनीय कर्म की उत्तरोत्तर उत्तर प्रकृतियों का अभाव बतलाने के लिये दो बार एवकार पद दिया है। इसलिये यहाँ कोई दोष नहीं है।

इस प्रकार पाँचवें स्थल में वेदनीय के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुये दो सूत्र पूर्ण हुये।

अब मोहनीय कर्म के भेदों का प्रतिपादन करने के लिये दो सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

मोहनीय कर्म की अट्ठाईस प्रकृतियां हैं।।१९।।

यह मोहनीय कर्म दो प्रकार का है-दर्शनमोहनीय और चारित्रमोहनीय ये दो ही हैं।।२०।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-प्रथम सूत्र संग्रहनय की अपेक्षा से है, क्योंकि यह समस्त विशेषों का संग्रह करने वाला है और बुद्धिमानजनों का अनुग्रहकारी है। और दूसरा सूत्र मध्यम बुद्धि वाले शिष्यों के अनुग्रह के लिये है।

शंका-इस द्वितीय सूत्र से मोहनीय कर्म के सभी भेद कैसे जाने जाते हैं ?

समाधान-आचार्यों के उपदेश से जाने जाते हैं। इस सूत्र का इतना अर्थ है, वह सभी आचार्य प्ररूपित करते हैं। उस प्ररूपित किये जाने वाले अर्थ को बुद्धिमान शिष्य अवधारण कर लेते हैं।

अधुना मंदबुद्धिजनानुग्रहार्थं दर्शनमोहनीयस्य भेदप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति

-जं तं दंसणमोहणीयं कम्मं तं बंधादो एयविहं तस्स संतकम्मं पुण तिविहं सम्मत्तं मिच्छत्तं सम्मामिच्छत्तं चेदि।।२१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-दर्शनं-आप्तागमपदार्थेषु रुचि: प्रत्यय: श्रद्धा स्पर्शनमिति एकार्थ:। तद् दर्शनं मोहयति विपरीतं करोति इति दर्शनमोहनीयं। यस्य कर्मण: उदयेन अनाप्ते आप्तबुद्धि:, अनागमे आगमबुद्धि:, अपदार्थे पदार्थबुद्धि, आप्तागमपदार्थेषु श्रद्धाया: अस्थिरत्वं, द्वयोरपि श्रद्धा भवति वा तद्दर्शनमोहनीयमिति। तद् बंधापेक्षया एकविधं, मिथ्यात्वादिप्रत्ययै: आगतानां दर्शनमोहनीयकर्मस्कधानामेकस्वभावानामुपलंभात्।
बंधेन एकविधमपि दर्शनमोहनीयं सत्त्वापेक्षया त्रिविधत्वं प्रतिपद्यते, यंत्रेण दल्यमानकोद्रवेषु कोद्रव-तंदुल-अर्धतंदुलानामिव दर्शनमोहनीयस्य अपूर्वादिकरणै: दलितस्य त्रिविधत्वोपलंभात्। तत्र आप्तागमपदार्थश्रद्धायां यस्योदयेन शिथिलत्वं भवति तत् सम्यक्त्वं नाम दर्शनमोहनीयभेदं भवति।
कथं तस्य सम्यक्त्वव्यपदेश: ?
सम्यक्त्वसहचरितोदयत्वात् उपचारेण सम्यक्त्वमिति उच्यते। यस्योदयेन आप्तागमपदार्थेषु अश्रद्धा भवति तद्मिथ्यात्वं नाम दर्शनमोहनीयभेदं। यस्योदयेन आप्तागमपदार्थेषु तत्प्रतिपक्षेषु चाक्रमेण श्रद्धा उत्पद्यते तत् सम्यग्मिथ्यात्वं नाम दर्शनमोहनीयं।
संदेह: कुतो जायते ?
सम्यक्त्वनाम दर्शनमोहनीयस्य उदयात् संदेहो भवति किंतु अयं सम्यग्दर्शनं न घातयति। सर्वसंदेहो मूढत्वं च मिथ्यात्वोदयात्।
दर्शनमोहनीयं सत्त्वात् त्रिविधं इति कुतो ज्ञायते ?
आगमात् अनुमानाच्च। विपरीतोऽभिनिवेशो मूढत्वं संदेहोऽपि मिथ्यात्वस्य चिन्हानि। आगमानागमयो: समभावो सम्यग्मिथ्यात्वचिन्हं। आप्तागमपदार्थश्रद्धायां शिथिलत्वं श्रद्धाहानिरपि सम्यक्त्वलिंगम्।
उत्तंâ चान्यत्रापि१-तदेव सम्यक्त्वं शुभपरिणामनिरुद्धस्वरसं यदौदासीन्येनावस्थितमात्मन: श्रद्धानं न निरुणद्धि, तद्वेदयमान: पुरुष: सम्यग्दृष्टिरित्यभिधीयते।
यस्योदयात्सर्वज्ञप्रणीतमार्गपराङ्मुखस्तत्त्वार्थश्रद्धाननिरुत्सुको हिताहितविचारासमर्थो मिथ्यादृष्टिर्भवति तन्मिथ्यात्वम्।
तदेव मिथ्यात्वं प्रक्षालनविशेषात् क्षीणाक्षीणमदशक्तिकोद्रववत्सामिद्धस्वरसं तदुभयमित्याख्यायते सम्यग्मिथ्यात्वमिति यावत्।
तात्पर्यमेतत्-अद्यत्वे क्षायोपशमिकसम्यग्दृष्टीनां सम्यक्त्वप्रकृत्युदयेन चलमलिनागाढदोषा: संभवन्ति इति ज्ञात्वा दोषहानये पुरुषार्थो विधेय: पुनश्च क्षायिकसम्यक्त्वप्राप्त्यर्थं भावना भावयितव्या।
संप्रति चारित्रमोहनीयस्य भेदसूचनाय सूत्रमवतरति-जं तं चारित्तमोहणीयं कम्मं तं दुविहं, कसायवेदणीयं चेव णोकसाय-वेदणीयं चेव।।२२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-पापक्रियानिवृत्तिश्चारित्रं। घातिकर्माणि पापं। तेषां क्रिया मिथ्यात्वासंयमकषाया:, तेषामभावश्चारित्रं।
उक्तं च द्रव्यसंग्रहे-
असुहादो विणिवित्ती, सुहे पवित्ती य जाण चारित्तं।
वदसमिदिगुत्तिरूवं ववहारणया दु जिणभणियं।।
तथा च-
बिंहभर किरियारोहो भवकारण पणासट्ठं।
णाणिस्सणं जिणुत्तं, तं परमं सम्मचारित्तं।।
तच्चारित्रं मोहयति आवारयति इति चारित्रमोहनीयं। तच्च द्विविधं-कषाय-नोकषायभेदेन, कषायनोकषायाभ्यां पृथग्भूततृतीयकार्यानुपलंभात् द्विविधत्वसिद्धे:। इदं संग्रहनयसूत्रं वर्तते।
संप्रति कषायवेदनीयस्य भेदप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-जं तं कसायवेदणीयं कम्मं तं सोलसविहं, अणंताणुबंधिकोहमाणमाया-लोहं, अपच्चक्खाणावरणीयकोहमाणमायालोहं, पच्चक्खाणावरणीय-कोहमाणमायालोहं, कोहसंजलणं, माणसंजलणं, मायासंजलणं लोहसंजलणं चेदि।।२३।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-दु:खशस्यं कर्मक्षेत्रं कृषन्ति फलवत्कुर्वन्तीति कषाया: क्रोध-मान-माया-लोभा:, क्रोधो रोष: संरम्भ इत्यनर्थान्तरम्। मानो गर्व: स्तब्धत्वमित्येकोऽर्थ:। माया निकृतिर्वञ्चना अनृजुत्वमिति पर्यायशब्दा:। लोभो गृद्धिरित्येकोऽर्थ:। अनन्तान् भवाननुबद्धशीलं येषां ते अनन्तानुबन्धिन:। यै: क्रोधमानमायालोभै: अविनष्टस्वरूपै: सह जीवोऽनन्ते भवे हिंडति, तेषां क्रोधमानमायालोभानां अनन्तानुबंधी संज्ञा इति उक्तं भवति।
एतेषामुदयकालोऽन्तर्मुहूर्तमात्रश्चैव, स्थिति: चत्वािंरशत्सागरोपमकोटाकोटिमात्रा चैव। अतएव एतेषां अनन्तभवानुबंधित्वं न युज्यते ?
नैष दोष:, एतैरेव कषायै: जीवे जनितसंस्कारस्य अनन्तेषु भवेषु अवस्थानाभ्युपगमात्। अथवा अनन्तोऽनुबंधो येषां क्रोधमानमायालोभानां ते अनन्तानुबंधिक्रोधमानमायालोभा:। एतेभ्यो वद्र्धितसंसारोऽनन्तेषु भवेषु अनुबंधं न त्यजति इति अनन्तानुबंध: संसार:। स येषां ते अनन्तानुबंधिनो क्रोधमानमायालोभा:। एते चत्वारोऽपि सम्यक्त्वचारित्रयोर्विरोधिन:, द्विविधशक्तिसंयुक्तत्वात्।
तत्कुतो ज्ञायते ?
गुरुपदेशात् युत्तेश्च।
कात्र युक्ति: ?
उच्यते-न तावद् इमे अनन्तानुबंधिन: कषाया: दर्शनमोहनीयरूपा:, सम्यक्त्वमिथ्यात्व-सम्यग्मिथ्यात्वैश्चैव आवृतस्य सम्यक्त्वस्य आवरणे फलाभावात्। न चारित्रमोहनीयस्वरूपा अपि अप्रत्याख्यानावरणादिभि: आवृतचारित्रस्य आवरणे फलाभावात्। तत एतेषामभाव एव सिद्ध्यति, किन्तु न चाभावो भवितुं अर्हति, सूत्रे एतेषामस्तित्वप्रतिपादनात्। तस्मात् एतेषामुदयेन सासादनगुण-स्थानोत्पत्तेरन्यथानुपपत्ते: सिद्धं सम्यक्त्वघातनशक्तिमद्दर्शनमोहनीयत्वं चारित्रघातनशक्तिमत्चारित्रमोहनीयत्वं च। न चानन्तानुबंधि-चतुष्कव्यापार: चारित्रे निष्फल:, अप्रत्याख्यानादि-अनन्तोदयप्रवाहकारणस्य निष्फलत्वविरोधात्।
प्रत्याख्यानं संयम:, न प्रत्याख्यानमप्रत्याख्यानमिति देशसंयम:।
कश्चिदाह-प्रत्याख्यानस्य अभावोऽसंयम: संयमासंयमोऽपि, तत्र असंयमं मुक्त्वा अप्रत्याख्यानशब्द: संयमासंयमे एव वर्तते इति कथं ज्ञायते ?
परिहार: उच्यते-आवरणशब्दप्रयोगात् ज्ञायते यत् अप्रत्याख्यानशब्द: केवलं संयमासंयमस्यार्थे वर्तते। न च कर्माभि: असंयम: आव्रियते, चारित्रावरणस्य कर्मण: अचारित्रावरणत्वप्रसंगात्। पारिशेषन्यायात् अप्रत्याख्यानशब्द: संयमासंयमश्चैव। अथवा नञ् अयमीषदर्थे वर्तते। तथा च न प्रत्याख्यानमित्यप्रत्याख्यानं संयमासंयम इति सिद्धम्। न च नञ: ईषदर्थे वृत्तिरसिद्धा, न रक्ता न श्वेता युवतिनखा ताम्रा: कुरवका इत्यत्रान्यथा स्ववचनविरोधप्रसंगात्। अनुदरी कुमारीत्यत्र उदराभावत: मरणप्रसंगात्।
अत्रोपयोगी श्लोक:-
प्रतिषेधयति समस्तं प्रसक्तमर्थं तु जगति नोशब्द:।
स पुनस्तदवयवे वा तस्मादर्थान्तरे वा स्यात्।।
अप्रत्याख्यानं संयमासंयम:। तमावृणोति इति अप्रत्याख्यानावरणीयम्। तच्चतुर्विधं क्रोधमानमाया-लोभभेदेन।
प्रत्याख्यानं संयम: महाव्रतानीति एकार्थ:। प्रत्याख्यानमावृणोतीति प्रत्याख्यानावरणीया: क्रोधमानमायालोभा:। सम्यक् ज्वलतीति संज्वलनम्।
अस्मिन् संज्वलनकषाये किं सम्यक्त्वं ?
चारित्रेण सह ज्वलनं एव अत्र सम्यक्त्वं। चारित्रमविनाशयन्त: उदयं कुर्वन्तीति उक्तं भवति।
चारित्रमविनाशयतां संज्वलनानां कथं चारित्रावरणत्वं युज्यते ?
न, संयमे मलोत्पादकं यथाख्यातचारित्रोत्पत्तिप्रतिबंधकानां चारित्रावरणत्वाविरोधात्। तेऽपि चत्वार: क्रोधमानमायालोभभेदेन।
शंका-क्रोधादिषु पादैकं संज्वलनशब्दोच्चारणं किमर्थं ?
समाधानं क्रियते-
प्रत्याख्यानाप्रत्याख्यानावरणानां इव संज्वलनानां बंधोदयाभावं प्रति प्रत्यासत्तिर्नास्तीति ज्ञापनार्थं।
उक्तं चान्यत्रापि-यदुदयात् देशविरतिं संयमासंयमाख्यामल्पां अपि कर्तुं न शक्नोति, ते देशप्रत्याख्यानमावृण्वन्तोऽप्रत्याख्यानावरणा: क्रोधमानमायालोभा:। यदुदयात् विरतिं कृत्स्नां संयमाख्यां न शक्नोति कर्तुं ते कृत्स्नं प्रत्याख्यानमावृण्वन्त: प्रत्याख्यानावरणा: क्रोधमानमायालोभा:।
समेकीभावे वर्तते, संयमेन सहावस्थानादेकीभूय ज्वलन्ति संयमो वा ज्वलत्येषु सत्स्वपि संज्वलना: क्रोधमानमायालोभा: इति।


अब मंदबुद्धि वाले शिष्यों के अनुग्रह के लिये दर्शनमोहनीय के भेदों का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र अवतार लेता है-

सूत्रार्थ-

जो वह दर्शनमोहनीय कर्म है वह बंध की अपेक्षा एक प्रकार का है, किन्तु वही सत्ता की अपेक्षा तीन प्रकार का है-सम्यक्त्व, मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व।।२१।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-‘दर्शन’ का अर्थ है-आप्त या आत्मा में आगम और पदार्थों में रुचि का होना। यहाँ रुचि, प्रत्यय, श्रद्धा और स्पर्शन ये सब एकार्थवाची हैं। ऐसे दर्शन को जो मोहित करता है-विपरीत करता है वह दर्शनमोहनीय कर्म है। जिस कर्म के उदय से अनाप्त-जो आप्त-सच्चे देव नहीं हैं उनमें आप्तबुद्धि, अनागम में आगमबुद्धि और अपदार्थों में पदार्थ बुद्धि होती है, अथवा आप्त, आगम और पदार्थों में श्रद्धा की अस्थिरता रहती है, अथवा दोनों में भी श्रद्धा होती है अर्थात् आप्त-अनाप्त में, आगम-अनागम में और पदार्थ-अपदार्थ में श्रद्धा होती है वह दर्शनमोहनीय कर्म है, यहाँ ऐसा कहा गया है। वह दर्शनमोहनीय बंध की अपेक्षा एक प्रकार का है, क्योंकि मिथ्यात्व आदि बंध कारणों के द्वारा आने वाले दर्शनमोहनीय कर्मस्कन्धों का एक स्वभाव पाया जाता है।

यह दर्शनमोहनीय कर्म बंध की अपेक्षा एक प्रकार का होते हुए भी सत्ता की अपेक्षा तीन प्रकार का है, क्योंकि जैसे यंत्र से-चक्की से दले गये कोदो में कोदो, तन्दुल और अद्र्धतन्दुल ऐसे तीन रूप हो जाते हैं, वैसे ही अपूर्वकरण आदि परिणामों के द्वारा दले गये दर्शनमोहनीय की तीन अवस्थायें हो जाती हैं। उनमें से जिनमें आप्त, आगम और पदार्थों की श्रद्धा में जिसके उदय से शिथिलता होती है वह ‘सम्यक्त्वप्रकृति’ नाम का दर्शनमोहनीय कर्म होता है।

शंका-उस प्रकृति का ‘सम्यक्त्व’ यह नाम कैसे हुआ ?

समाधान-सम्यग्दर्शन से सहचरित उदय के होने से उपचार से ‘सम्यक्त्व’ ऐसा नाम दिया है। जिस कर्म के उदय से आप्त, आगम और पदार्थ में अश्रद्धा होती है-विश्वास नहीं होता है, वह मिथ्यात्व प्रकृति है। जिस कर्म के उदय से आप्त, आगम और पदार्थों में तथा उनके प्रतिपक्षी-कुदेव, कुशास्त्र और कुतत्त्वों में युगपत् श्रद्धा होती है वह सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृति है।

शंका-आप्त, आगम और पदार्थों में संदेह किस कर्म के उदय से होता है ?

समाधान-सम्यक्त्व प्रकृति नाम की दर्शनमोहनीय के उदय से संदेह उत्पन्न होता है, किन्तु यह सम्यग्दर्शन का घात नहीं करता है और जो सर्वसंदेह तथा मूढ़ता होती है वह मिथ्यात्व के उदय से होती है।

शंका-दर्शनमोहनीय कर्म सत्ता की अपेक्षा तीन प्रकार का है, यह कैसे जाना जाता है ?

समाधान-आगम से और अनुमान से जाना जाता है। विपरीत अभिनिवेश अभिप्राय, मूढ़ता और संदेह भी मिथ्यात्व के चिन्ह हैं। आगम और अनागम में समभाव होना सम्यग्मिथ्यात्व का चिन्ह है। आप्त, आगम और पदार्थों में शिथिलता का होना, श्रद्धा की हानि का होना भी सम्यक्त्व का चिन्ह है।

सर्वार्थसिद्धि ग्रन्थ में भी कहा है- वही मिथ्यात्व तब सम्यक्त्व प्रकृतिरूप बन जाता है जब कि वह शुभ परिणामों के कारण अपने स्वरस-विपाक को रोक देता है और उदासीनरूप से अवस्थित रहकर आत्मा के श्रद्धान को नहीं रोकता है तब वह सम्यक्त्व कहलाता है। इसका वेदन करने वाला पुरुष सम्यग्दृष्टि कहा जाता है। जिसके उदय से यह जीव सर्वज्ञ प्रणीत मार्ग से विमुख, तत्त्वार्थों के श्रद्धान करने में निरुत्सुक, हित-अहित के विचार करने में असमर्थ ऐसा मिथ्यादृष्टि होता है वह मिथ्यात्व दर्शनमोहनीय है। वही मिथ्यात्व जब प्रक्षालन विशेष के कारण क्षीणाक्षीण मदशक्ति वाले कोदो के समान अर्धशुद्ध रस वाला होने पर तदुभय कहा जाता है, इसी का दूसरा नाम सम्यग्मिथ्यात्व है। इसके उदय से अद्र्धशुद्ध मदशक्ति वाले कोदो और ओदन के उपयोग से प्राप्त हुये मिश्र परिणाम के समान उभयात्मक परिणाम होता है।

यहाँ तात्पर्य यह है कि-आजकल इस पंचमकाल में क्षायोपशमिक सम्यग्दृष्टियों के सम्यक्त्व प्रकृति के उदय से चल, मलिन और अगाढ़ ये तीन दोष संभव हैं, ऐसा जानकर दोषों को दूर करने के लिये पुरुषार्थ करना चाहिये और पुन: क्षायिक सम्यक्त्व की प्राप्ति की भावना भाते रहना चाहिये।

अब चारित्रमोहनीय के भेद को सूचित करने के लिये सूत्र अवतार लेता है-

सूत्रार्थ-

जो चारित्रमोहनीय कर्म है वह दो प्रकार का है-कषायवेदनीय और नोकषाय-वेदनीय।।२२।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-पापरूप क्रियाओं से निवृत्ति होना चारित्र है। घातिया कर्मों को पाप कहते हैं। मिथ्यात्व, असंयम और कषाय, ये पाप की क्रियायें हैं। इनके अभाव का नाम ही चारित्र है।

द्रव्य संग्रह ग्रन्थ में कहा भी है-

अशुभ से निवृत्त होना-अशुभ क्रियाओं को छोड़ना और शुभ क्रियाओं में प्रवृत्ति करना यह चारित्र है। वह चारित्र व्यवहारनय से व्रत, समिति और गुप्तिरूप है ऐसा जिनेन्द्रदेव ने कहा है तथा निश्चयनय से जो चारित्र है वह बाह्य और आभ्यंतर दोनों प्रकार की क्रियाओं की निवृत्तिरूप है यह ज्ञानियों-महामुनियों का चारित्र परम चारित्र कहलाता है। यही चारित्र संसार के कारणों का नाश करने वाला है।। इस चारित्र को जो मोहित करता है, ढकता है वह चारित्रमोहनीय कर्म है। उसके दो भेद हैं-कषायवेदनीय और नोकषायवेदनीय, क्योंकि कषाय और नोकषाय से पृथग्भूत तीसरे कार्य की उपलब्धि नहीं पायी जाती अत: इसके ये दो भेद सिद्ध हैं। यह सूत्र संग्रह- नय के आश्रित है, क्योंकि समस्त विशेषों का संग्रह करने वाला है।

अब कषायवेदनीय के भेदों का प्रतिपादन करने के लिये आचार्यदेव सूत्र का अवतार करते हैं-

सूत्रार्थ-

जो कषायवेदनीय कर्म है वह सोलह प्रकार का है-अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ, अप्रत्याख्यानावरणीय क्रोध, मान, माया, लोभ, प्रत्याख्यानावरणीय क्रोध, मान, माया, लोभ, क्रोध संज्वलन, मान संज्वलन, माया संज्वलन और लोभ संज्वलन ये भेद हैं।।२३।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-जो दु:खरूपी धान्य को उत्पन्न करने वाली कर्मरूपी खेत को कर्षण करती हैं अर्थात् फल देने वाले करती हैं, वे कषाय कहलाती हैं, वे क्रोध, मान, माया और लोभ हैं। क्रोध, रोष और संरंभ, इनके अर्थ में कोई अन्तर नहीं है। मान, गर्व और स्तब्धता ये एकार्थवाची हैं। माया, निकृति, वंचना और अनृजुता-कुटिलता ये पर्यायवाची शब्द हैं। लोभ और गृद्धि ये एकार्थवाची शब्द हैं। अनन्त भवों को बांधना ही जिनका स्वभाव है वे अनंतानुबंधी कहलाती हैं। जो क्रोध, मान, माया और लोभ कषायें अविनष्ट स्वभाव वाली हैं, जिन कषायों के साथ जीव अनन्त भवों में भ्रमण करता है उन क्रोध, मान, माया, लोभ को अनंतानुबन्धी यह संज्ञा कही है।

शंका-इन अनंतानुबंधी कषायों का काल अन्तर्मुहूर्त मात्र ही है और स्थिति चालीस कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण है। अतएव इन कषायों के अनंतानुबंधिपना घटित नहीं होता है ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि इन कषायों के द्वारा जीव में उत्पन्न हुए संस्कार का अनंत भवों में संस्कार माना गया है अथवा जिन क्रोध, मान, माया, लोभों का अनुबंध (विपाक या सम्बन्ध) अनंत होता है वे अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ कहलाती हैं। इनके द्वारा वृद्धिंगत संसार अनंतों भवों में अनुबंध-सम्बन्ध-परम्परा को नहीं छोड़ता है, इसलिये ‘अनंतानुबंध’ यह नाम संसार का है। वह संसार स्वरूप अनंतानुबंध जिनके होता है वे अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ हैं। ये चारों ही कषायें सम्यक्त्व और चारित्र की विरोधी हैं, क्योंकि ये सम्यक्त्व और चारित्र इन दोनों की घातने वाली दो प्रकार की शक्तियों से संयुक्त हैं।

शंका-यह कैसे जाना जाता है ?

समाधान-गुरु के उपदेश से और युक्ति से जाना जाता है।

शंका-ये अनंतानुबंधी कषायें दो प्रकार की शक्ति वाली हैं, इस विषय में क्या युक्ति है ?

समाधान-इसका उत्तर देते हैं-ये अनंतानुबंधी कषायें न तो दर्शनमोहनीयरूप हैं, क्योंकि सम्यक्त्व, मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व के द्वारा ही आवरण किये जाने वाले सम्यग्दर्शन के आवरण करने में फल का अभाव है और न उन्हें चारित्रमोहनीय स्वरूप भी माना जा सकता है, क्योंकि अप्रत्याख्यानावरण आदि कषायों के द्वारा आवरण किये गये चारित्र के आवरण करने में फल का अभाव है। इसलिये उपर्युक्त प्रकार से अनंतानुबंधी कषायों का अभाव ही सिद्ध हो जावेगा, किन्तु ऐसा उनका अभाव होना उचित नहीं है क्योंकि सूत्र में इनका अस्तित्व माना गया है, इसलिये अनंतानुबंधी क्रोधादि कषायों के उदय से ‘सासादन’ भावरूप-गुणस्थान की उत्पत्ति अन्यथा हो नहीं सकती है। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि सम्यक्त्व को घात करने की शक्ति वाला दर्शनमोहनीय कर्म है और चारित्र को घात करने की शक्ति वाला चारित्रमोहनीय कर्म है तथा अनंतानुबंधी चतुष्क का व्यापार चारित्र में निष्फल भी नहीं है क्योंकि अप्रत्याख्यानादि के अनंत उदयरूप प्रवाह के कारणभूत अनंतानुबंधी कषाय के निष्फलत्व का विरोध है।

‘प्रत्याख्यान’ संयम को कहते हैं, जो प्रत्याख्यानरूप नहीं हैं वह अप्रत्याख्यान हैं। इस प्रकार यह ‘अप्रत्याख्यान’ देशसंयम का वाचक है। कोई यहाँ कहता है-प्रत्याख्यान का अभाव असंयम है और संयमासंयम (देशसंयम) भी है। उनमें असंयम को छोड़कर अप्रत्याख्यान शब्द केवल संयमासंयम में ही रहता है यह कैसे जाना जाता है ?

आचार्यदेव इसका परिहार करते हैं- आवरण शब्द के प्रयोग से जाना जाता है कि अप्रत्याख्यान शब्द केवल संयमासंयम के अर्थ में रहता है। कर्मों के द्वारा असंयम का आवरण तो किया नहीं जा सकता अन्यथा चारित्रावरण कर्म के अचारित्रावरणपने का प्रसंग आ जावेगा। अत: पारिशेषन्याय से अप्रत्याख्यान शब्द का अर्थ संयमासंयम ही है। अथवा ‘नञ्’ यह अव्यय पद ईषत् (अल्प) अर्थ में रहता है। इसलिये जो प्रत्याख्यान नहीं है वह अप्रत्याख्यान है यही ‘संयमासंयम’ है ऐसा सिद्ध हो गया। ‘नञ्’ पद की ईषत् अर्थ में वृत्ति असिद्ध भी नहीं है, क्योंकि ‘इस युवती के नख न लाल हैं, न सफेद हैं किन्तु ताम्र वर्ण वाले कुरवक के समान हैं’ इस प्रयोग में अन्यथा-स्ववचन विरोध का प्रसंग प्राप्त होगा, तथा ‘अनुदरी कुमारी’ यहाँ पर उदर के अभाव से कुमारी के मरण का प्रसंग प्राप्त होगा अत: यहाँ ईषत् अर्थ ग्रहीत है।

यहाँ उपयोगी श्लोक यह है-जगत में ‘न’ शब्द प्रसक्त समस्त अर्थ का तो प्रतिषेध करता है, किन्तु वह प्रसक्त अर्थ के अवयव- एकदेश में अथवा उससे भिन्न अर्थ में रहता है-उसका बोध कराता है।।

इससे सिद्ध हुआ अप्रत्याख्यान संयमासंयम का नाम है। उस अप्रत्याख्यान का जो आवरण करता है उसे अप्रत्याख्यानावरणीय कहते हैं। उसके क्रोध, मान, माया और लोभ से चार भेद हैं।

प्रत्याख्यान, संयम और महाव्रत, ये तीनों एक अर्थ वाले नाम हैं। प्रत्याख्यान पर जो आवरण करे वह प्रत्याख्यानावरणीय क्रोध, मान, माया, लोभ कषायें कहलाती हैं। जो सम्यक् प्रकार से प्रकाश देता रहे वह संज्वलन कषाय है।

शंका-इस संज्वलन कषाय में सम्यक्पना क्या है ?

समाधान-चारित्र के साथ जलना-देदीप्यमान रहना ही इसका सम्यक्पना है। चारित्र का विनाश नहीं करते हुए ये कषायें उदय को प्राप्त होती हैं, यहाँ ऐसा अर्थ कहा गया है।

शंका-चारित्र का विनाश नहीं करती हुई इन संज्वलन कषायों के चारित्रावरणपना कैसे घटित होता है ? समाधान-ऐसा नहीं है, क्योंकि, ये संज्वलन कषायें संयम में मल-दोष को उत्पन्न करने वाली हैं तथा यथाख्यात चारित्र-पूर्णचारित्र की उत्पत्ति की प्रतिबंधक हैं, इसीलिये इनमें चारित्रावरणपना मानने में कोई विरोध नहीं है। ये संज्वलन कषायें भी क्रोध, मान, माया और लोभ के भेद से चार प्रकार की हैं।

शंका-क्रोध आदि में प्रत्येक के साथ संज्वलन शब्द का उच्चारण किसलिये किया है ?

समाधान-प्रत्याख्यानावरण और अप्रत्याख्यानावरण कषायों के समान संज्वलन कषायों के बन्ध और उदय के अभाव के प्रति प्रत्यासत्ति नहीं है, इस बात को बतलाने के लिये सूत्र में क्रोधादि प्रत्येक पद के साथ संज्वलन शब्द का प्रयोग किया है।

विशेषार्थ-जिस प्रकार चतुर्थ गुणस्थान में अप्रत्याख्यानावरण क्रोधादि चारों की एक साथ ही बंधव्युच्छित्ति और एक साथ ही उदयव्युच्छित्ति होती है तथा जिस प्रकार पंचमगुणस्थान में प्रत्याख्यानावरण क्रोधादि चारों की एक साथ ही बंधव्युच्छित्ति एवं एक साथ ही उदयव्युच्छित्ति होती है। उस प्रकार से नवमें गुणस्थान में क्रोधादि चारों संज्वलन कषायों की न तो एक साथ बंधव्युच्छित्ति ही होती है और न एक साथ उदयव्युच्छित्ति ही होती है। यही कारण है कि अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावरण के समान बंध और उदयव्युच्छित्ति की अपेक्षा चारों संज्वलन कषायों में प्रत्यासत्ति या समानता नहीं है, इसी विभिन्नता के स्पष्टीकरण के लिये सूत्रकार ने सूत्र में क्रोधादि प्रत्येक अलग-अलग पद के साथ संज्वलन शब्द का प्रयोग किया है।

जिनके उदय से जिसका दूसरा नाम संयमासंयम है, ऐसी देशविरति को यह जीव स्वल्प भी करने में समर्थ नहीं होता है वे देश प्रत्याख्यान को आवृत करने वाले अप्रत्याख्यान क्रोध, मान, माया और लोभ हैं। जिनके उदय से संयम नाम वाली परिपूर्ण विरति को यह जीव करने में समर्थ नहीं होता है वे सकल प्रत्याख्यान को आवृत करने वाले प्रत्याख्यान क्रोध, मान, माया और लोभ हैं। ‘सं’ एकीभाव अर्थ में रहता है। संयम के साथ अवस्थान होने में एक होकर जो ज्वलित होते हैं अर्थात् चमकते हैं या जिनके सद्भाव में संयम चमकता रहता है, वे संज्वलन क्रोध, मान, माया और लोभ हैं।

संप्रति नोकषायवेदनीयकर्मण: भेदलक्षणप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति

-जं तं णोकसायवेदणीयं कम्मं तं णवविहं, इत्थिवेदं पुरिसवेदं णवुंसयवेदं हस्स-रदि-अरदि-सोग-भय-दुगंछा चेदि।।२४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अत्र नोशब्द: देशप्रतिषेक: गृहीतव्य:, अन्यथा एतेषामकषायत्वप्रसंगात्।
भवतु चेत् ?
न, अकषायाणां चारित्रावरणत्वविरोधात्। ईषत्कषायो नोकषाय इति सिद्धं।
अत्रोपयोगी श्लोक:-
भावस्तत्परिणामो द्विप्रतिषेधस्तदैक्यगमनार्थ:।
नो तद्देशविशेष-प्रतिषेधोऽन्य: स्वपरयोगात् ।।
कषायेभ्यो नोकषायाणां कथं स्तोकत्वं ?
स्थितिभ्य: अनुभागात् उदयाच्च एषां अल्पत्वं।
उदयकाल: नोकषायाणां कषायेभ्यो बहुक: उपलभ्यते इति नोकषायेभ्य: कषायाणां स्तोकत्वं किन्न इष्यते ?
 न, उदयकालमहत्त्वेन चारित्रविनाशिकषायेभ्य: तन्मलफलकर्मणां महत्वानुपपत्ते:।
स्तृणाति छादयति दोषैरात्मानं परं चेति स्त्री। पुरुकर्मणि शेते प्रमादयति इति पुरुष:। न पुमान्न स्त्री नपुंसक:। अयं व्युत्पत्यर्थ:। एतस्याभिप्राय: येषां कर्मस्कंधानामुदयेन पुरुषे आकांक्षा उत्पद्यते तेषां स्त्रीवेद इति संज्ञा। येषां कर्मस्कंधानामुदयेन महिलानामुपरि आकांक्षा उत्पद्यते तेषां पुरुषवेद: इति संज्ञा। येषां कर्मस्कंधानामुदयेन इष्टिकापाकाग्निसदृशेन द्वयोरपि आकांक्षा उत्पद्यते, तेषां नपुंसकवेद इति संज्ञा।
हसनं हास:, यस्य कर्मस्कंधस्य उदयेन हास्यनिमित्तो जीवस्य राग: उत्पद्यते, तस्य कर्मस्कंधस्य हास्यमिति संज्ञा, कारणे कार्योपचारात्। रमणं रति:, रम्यते अनया इति वा रति:। येषां कर्मस्कंधानामुदयेन द्रव्यक्षेत्रकालभावेषु रति: समुत्पद्यते, तेषां रतिरिति संज्ञा। द्रव्यक्षेत्रकालभावेषु येषामुदयेन जीवस्यारति: समुत्पद्यते तेषामरतिरिति संज्ञा। शोचनं शोक:, शोचयतीति वा शोक:, येषां कर्मस्कंधानामुदयेन जीवस्य शोक: इति संज्ञा। भीतिर्भयं। यै: उदयागतै: कर्मस्कंधै: जीवस्य भयमुत्पद्यते तेषां भयमिति संज्ञा, कारणे कार्योपचारात्। जुगुप्सनं जुगुप्सा। येषां कर्मणां उदयेन जुगुप्सा-ग्लानिरुत्पद्यते तेषां जुगुप्सा इति संज्ञा।
एतेषां कर्मणामस्तित्वं कुतो ज्ञायते ?
प्रत्यक्षेण उपलभ्यमानानां अज्ञानादर्शनादिकार्याणां अन्यथानुपपत्ते: एव एषामस्तित्वं प्रतीयते।
तात्पर्यमेतत्-कषायवेदनीयै: सह अविनाभाविन: इमे नोकषाया: सन्ति। संयमज्ञानवैराग्यबलेन इमे क्रमश: ह्रासनीया: कृशीकर्तव्या: इति प्रत्यहं चिंतयितव्यम्।
एवं षष्ठस्थले मोहनीयकर्मण: भेदप्रभेदलक्षणादिकथनत्वेन सूत्रषट्कं गतम्।
अधुना आयुकर्मण: भेदलक्षणप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-आउगस्स कम्मस्स चत्तारि पयडीओ।।२५।।
णिरयाऊ तिरिक्खाऊ मणुस्साऊ देवाऊ चेदि।।२६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-पूर्वं द्रव्यार्थिकनयसूत्रं, पर्यायार्थिकनयसूत्रं पश्चिमं। येषां कर्मस्कंधानामुदयेन ऊध्र्वगमनस्वभावस्य जीवस्य नारकभवे अवस्थानं भवति तेषां ‘नरकायु:’ इति संज्ञा। एवमेव तिर्यग्मनुष्यदेवायुषामपि वक्तव्यं।
यथा घट्पटस्तंभादीनां पर्यायाणां वैस्रसिकमेवावस्थानं तथैव नरकभवादिपर्यायाणां अपि वैस्रसिकेऽवस्थाने जाते को दोष ?
न, अकारणेऽवस्थाने सति नियमविरोधात्। देवनारकयोर्जघन्यमवस्थानं दशवर्षसहस्राणि, उत्कृष्टभवावस्थानं त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमानि। तिर्यग्मनुष्ययो: जघन्यमन्तर्मुहूर्तं, उत्कृष्टं त्रीणि पल्योपमानि। वैस्रसिकेऽवस्थाने एष नियमो न युज्यते, प्रत्युत पुद्गलानामिव अनियमेनवास्थानं भवेत्।
कथं पुद्गलानामनियमेनावस्थानं ?
एकद्वित्रिसमयमादिं कृत्वा उत्कृष्टेन मेरुपर्वतादिषु अनादि-अपर्यवसितस्वरूपेण संस्थानावस्थानोपलंभात्। तस्मात् भवावस्थानेन सहेतुकेन भवितव्यं, अन्यथा शरीरान्तरं गतानामपि नरकगते: उदयप्रसंगात्।
एवं सप्तमस्थले आयुषां लक्षणप्रतिपादनत्वेन सूत्रद्वयं गतम्।
अधुना नामकर्मण: पिण्डप्रकृतिसंख्यासंज्ञाप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-णामस्स कम्मस्स वादालीसं पिंडपयडीणामाइं।।२७।।
गदिणामं जादिणामं सरीरणामं सरीरबंधणणामं सरीरसंघादणामं सरीरसंठाणणामं सरीरअंगोवंगणामं सरीरसंघडणणामंं वण्णणामं गंधणामं रसणामं फासणामं आणुपुव्वीणामं अगुरुअ-लहुवणामं उवघादणामं परघादणामं उस्सासणामं आदावणामं उज्जोवणामं विहायगदिणामं तसणामं थावरणामं बादरणामं सुहुमणामं पज्जत्तणामं अपज्जत्तणामं पत्तेयसरीरणामं साधारणसरीरणामं थिरणामं अथिरणामं सुहणामं असुहणामं सुभगणामं दुभगणामं सुस्सरणामं दुस्सरणामं आदेज्जणामं अणादेज्जणामं जसकित्तिणामं अजसकित्तिणामं णिमिणणामं तित्थयरणामं चेदि।।२८।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-द्वयो: सूत्रयोरर्थ: सुगम:। गतिर्भव: संसार: इत्यर्थ:। यदि गतिनामकर्म न स्यात् अगतिर्जीव: स्यात्। यस्मिन् जीवभावे आयु:कर्मण: लब्धावस्थाने सति शरीरादीनि कर्माणि उदयं गच्छन्ति स: भाव: यस्य पुद्गलस्कंधस्य मिथ्यात्वादिकारणै: प्राप्तस्य कर्मभावस्य उदयात् भवति तस्य कर्मस्कंधस्य गतिरिति संज्ञा। जातिर्जीवानां सदृशपरिणाम:। यदि जातिनामकर्म न स्यात् मत्कुणा मत्कुणै:, वृश्चिका वृश्चि:, पिपीलिका: पिपीलिकाभि:, ब्रीहयो ब्रीहिभि:, शालय: शालिभि: समाना न जायेरन्। दृश्यते च सादृश्यं तत: यस्मात् कर्मस्कंधात् जीवानां भूय: सदृशत्वमुत्पद्यते, स: कर्मस्कंध: कारणे कार्योपचारात् जातिरिति भण्यते। यथा गंगावालुकानां पृथिवीकायिकनामकर्मोदयेन सदृशपरिणाम-त्वोभ्युपगमात्।
यदि जीवानां सदृशपरिणाम: कर्मायत्तो न भवेत्, तर्हि चतुरिन्द्रिया: जीवा: अश्वहस्तिव्याघ्रादिसंस्थाना: भवेयु:, पंचेन्द्रिया: अपि भ्रमर-मत्कुण-शलभ-इन्द्रगोप क्षुल्लकाक्षवृक्षसंस्थाना भवेयु:। न चैवं अनुपलंभात्, प्रतिनियतसदृशपरिणामेषु अवस्थितवृक्षादीनां उपलंभाच्च। तत: न पारिणामिको जीवानां सदृशपरिणाम: इति सिद्धं।
यस्य कर्मण: उदयेन आहारवर्गणाया: पुद्गलस्कंधा: तैजस-कार्मणवर्गणापुद्गलस्कंधा: च शरीरयोग्यपरिणामै: परिणता: सन्त: जीवेन संबध्यन्ते तस्य कर्मस्कंधस्य शरीरमिति संज्ञा। यदि शरीरनामकर्म जीवस्य न भवेत् तर्हि तस्य अशरीरत्वं प्रसज्यते। अशरीरत्वात् अमूत्र्तस्य जीवस्य न कर्माणि, विमुक्तमूर्तानां-आत्मनां पुद्गलानां संबंधाभावात्।
भवतु चेत् ?
न, सर्वजीवानां सिद्धसमानत्वापत्ते: संसाराभावप्रसंगात्।
शरीरार्थमागतानां पुद्गलस्कंधानां जीवसंबद्धानां यै: पुद्गलै: जीवसंबद्धै: प्राप्तोदयै: परस्परं बंध: क्रियते तेषां पुद्गलस्कंधानां शरीरबंधनसंज्ञा, कारणे कार्योपचारात्। कर्तृनिर्देशाद् वा। यै: कर्मस्कंधै: उदयप्राप्तै: बंधननामकर्मोदयेन बंधमागतानां शरीरपुद्गलस्कंधानां मृष्टत्वं-छिद्ररहितसंश्लेष: क्रियते तेषां शरीरसंघातसंज्ञा। येषां कर्मस्कंधानां उदयेन जातिकर्मोदयपरतंत्रेण शरीरस्य संस्थानं तत् शरीरसंस्थानं नाम।
यस्य कर्मस्कंधस्योदयेन शरीरस्यांगोपांगनिष्पत्तिर्भवेत् तस्य कर्मस्कंधस्य शरीरांगोपांगं नाम। एतस्य कर्मणोऽभावे अष्टांगानामुपांगानां च अभावो भवेत्। न चैवं, तथानुपलंभात्।
उक्तं च- णलया बाहू य तहा णियंब पुट्ठी उरो य सीसं च।
अट्ठेव दु अंगाइं देहण्णाइं उवंगाइं।।
शिरसि तावदुपांगानि मूद्र्ध-करोटि-मस्तक-ललाट-शंख-भ्रू-कर्ण-नासिका-नयनाक्षि-कूट-हनु-कपोल-उत्तराधरोष्ठ-सृक्वणी-तालु-जिह्वादीनि।
यस्य कर्मण: उदयेन शरीरे अस्थि-संधीनां निष्पत्तिर्भवेत्, तस्य कर्मण: संहननमिति संज्ञा। एतस्य कर्मणोऽभावे शरीरमसंहननं भवेत् देवशरीरमिव।
भवतु चेत् ?
न, तिर्यग्मनुष्यशरीरेषु अस्थिकलापोपलंभात्।
यस्य कर्मण: उदयेन जीवशरीरे वर्णनिष्पत्तिर्भवति तस्य कर्मस्कंधस्य वर्णसंज्ञा। यस्य कर्मस्कंधस्योदयेन जीवशरीरे जातिं प्रतिनियतो गंध: उत्पद्यते, तस्य कर्मस्कंधस्य गंधसंज्ञा, कारणे कार्योपचारात्। यस्य कर्मस्कंधस्योदयेन जीवशरीरे जातिप्रतिनियत: तिक्तादिरसो भवेत् तस्य कर्मस्कंधस्य रससंज्ञा, निंबाम्रजंबीरादिषु नियतरसस्योपलंभात्। यस्य कर्मस्कंधस्योदयेन जीवशरीरे जातिप्रतिनियत: स्पर्श: उत्पद्यते तस्य कर्मस्कंधस्य स्पर्शसंज्ञा, कारणे कार्योपचारात्। स्वपुष्पफलकमलनालादिषु नियतस्पर्शोपलंभात्।
पूर्वोत्तरशरीराणामन्तरे एकद्वित्रिसमये वर्तमानजीवस्य यस्य कर्मोदयेन जीवप्रदेशानां विशिष्ट: संस्थानविशेषो भवति तस्य आनुपूर्वी इति संज्ञा।
संस्थाननामकर्मण: संस्थानं भवति अत: आनुपूर्वि-परिकल्पना निरर्थिका इति चेत् ?
तस्य शरीरगृहीतप्रथमसमयादुपरि उदयं आगच्छत: विग्रहकाले उदयाभावात्। यदि आनुपूर्विकर्म न भवेत् तर्हि विग्रहकाले अनियतसंस्थानो जीवो भवेत्। न च एवं, जातिप्रतिनियतसंस्थानस्य तत्रोपलंभात्।
पूर्वशरीरं त्यक्त्वा शरीरान्तरं अनादाय स्थितजीवस्य इच्छितगतिगमनं कुत: भवति ?
आनुपूव्र्या: भवति।
विहायोगते: किन्न भवति ?
न, तस्य त्रयाणां शरीराणामुदयेन विना उदयाभावात्।
विग्रहगतौ संस्थानविशेष: इच्छितगतिगमनहेतुश्च आनुपूव्र्या फलद्वयं वर्तते।
अनंतानंतै: पुद्गलै: आपूरितस्य जीवस्य यै: कर्मस्कंधै: अगुरुकलघुकत्वं भवति, तेषां अगुरुकलघुकं इति संज्ञा। कारणे कार्योपचारात्। यदि इदं नामकर्म न भवेत् तर्हि जीव: लोहगोलक इव गुरुक:, अर्कतूलवत् लघुको वा भवेत् किंतु न चैवं, अनुपलंभात्।
अगुरुकलघुकत्वं नाम जीवस्य स्वाभाविकमस्ति इति चेत् ?
न, संसारावस्थायां कर्मपरतन्त्रे तस्याभावात्। अत्र जीवस्य अगुरुलघुत्वं न कर्मणा क्रियते, किन्तु जीवे भरितो य: पुद्गलस्कंध:, स: यस्य कर्मण: उदयेन जीवस्य गुरुक: लघुको वा इति न क्रियते तदगुरुकलघुकं विवक्षितं। अतोऽत्र जीवविषयक-अगुरुलघुगुणस्य ग्रहणं नास्ति।
उपेत्य घात: उपघात: आत्मघात इत्यर्थ:। यत्कर्म जीवपीडाहेतु-अवयवान् करोति, जीवपीडाहेतुद्रव्याणि वा विषासिपाशादीनि जीवस्य प्रापयति तदुपघातं। ते महाशृंगलंबस्तनतुंदोदरादय: जीवपीडाकार्यावयवा: सन्ति। यदि उपघातकर्म न भवेत्, जीवस्य न भवेत्, तर्हि शरीरात् वातपित्त-सिंघाणकदूषितात् जीवस्य पीडा न भवेत् किन्तु एतत् दृश्यते एव।
जीवस्य दु:खोत्पादने असातावेदनीयस्य व्यापारश्चेत् ?
भवतु तस्य तत्र व्यापार:, किन्तु उपघातकर्मापि तस्य सहकारिकारणं भवति, तदुदयनिमित्तपुद्गल-द्रव्यसंपादनात्।
परेषां घात: परघात:। यस्य कर्मण: उदयेन शरीरे परघातहेतुपुद्गला: निष्पद्यन्ते, तत्कर्म परघात नाम। यथा सर्पदंष्ट्रासु विषं, वृश्चिकपुंछे परदु:खहेतुपुद्गलोपचय: सिंहव्याघ्रादिषु नखदन्ता: शृंगिवत्स्यनाभिधत्तूरकादय: च परघातोत्पादका:।
उच्छ्वसनमुच्छ्वास:। यस्य कर्मण: उदयेन जीव: उच्छ्वासनिश्वासकार्योत्पादनक्षमो भवति तस्य उच्छ्वास इति संज्ञा, कारणे कार्योपचारात्।
आतपनं आतप:, यदि आतपनामकर्म न भवेत् तर्हि सूर्यमण्डले पृथिवीकायिकशरीरे आतपाभावो भवेत्, सोष्ण: प्रकाश: आतप: इत्येकार्थ:।
उद्योतनं उद्योत:। यदि इदं नामकर्म जीवस्य न भवेत्, तर्हि चन्द्रनक्षत्रताराखद्योतादिषु शरीराणां उद्योतो न भवेत्, न चैवं अनुपलंभात्।
विहाय आकाशमित्यर्थ:। विहायसि गति: विहायोगति:। येषां कर्मस्कंधानामुदयेन जीवस्य आकाशे गमनं भवति तेषां विहायोगतिरिति संज्ञा।
तिर्यग्मनुष्ययो: भूमौ गमनं कस्य कर्मण उदयेन ?
विहायोगतिनामकर्मण:। १विहस्तिमात्रपादजीवप्रदेशै: भूमिं व्याप्य सकलजीवप्रदेशानामाकाशे गमनोपलंभात्।
येषां त्रसादि-अयश:कीर्तिनामकर्मणां उदयेन जीवा: त्रसादिपर्यायत्वं प्राप्नुवन्ति तेषां त्रसादिसंज्ञा भवति। इमे त्रस-स्थावर-बादर-सूक्ष्म-पर्याप्त-अपर्याप्त-प्रत्येकशरीर-साधारणशरीर-स्थिर-अस्थिर-शुभ-अशुभ-सुभग-दुर्भग-सुस्वर-दु:स्वर-आदेय-अनादेय-यश:कीर्ति-अयश:कीर्तिनामा इमा: विंशतिनाम-कर्मप्रकृतय: सन्ति।
अत्र कासाञ्चित् प्रकृतीनां विशेष: कथ्यते-स्थिरनामकर्मण: उदयेन जीवस्य रसरुधिरमेदमज्जा-स्थिमांसशुक्राणां स्थिरत्वमविनाश: अगलनं भवति, हानिवृद्धिभ्यां बिना अवस्थानदर्शनात्। अस्थिरनामकर्मण: उदयेन जीवस्य एषां रसरुधिरादिसप्तधातूनां परिणमनं भवति।
‘‘अत्रोपयोगी श्लोक:-
रसाद् रक्तं ततो मांसं, मांसान्मेद: प्रवर्तते।
मेदसोऽस्थि ततो मज्जा मज्झ: शुकं तत: प्रजा।।
पंचदशाक्षिनिमेषा काष्ठा। त्रिंशत्काष्ठा कला, विंशतिकलो मुहूर्त:, कलाया दशमभागश्च त्रिंशन्मुहूर्तं च भवत्यहोरात्रम्। पंचदश अहोरात्राणि पक्ष:। पंचवीसकलासयाइं चउरसीदिकलाओ च तिहि-सत्तभागेहि पदिहीणणवकट्ठाओ च रसो रससरूवेण अच्छिय रुहिरं होदि। तं हि तत्तियं चेव कालं तत्थच्छिय मांससरूवेण परिणमइ। एवं सेसधादूणं पि वत्तव्वं। एवं मासेण रसो सुक्करुवेण परिणमइ। एवं जस्स कम्मस्स उदऐण धादूणं कमेण परिणामो होदि तमथिरमिदि उत्तं होदि।’’
अस्यास्थिरनामकर्मणोऽभावे क्रमनियमो न भवेत्, न च एवं अनवस्थानात्। सप्तधातुहेतुकर्माणि वक्तव्यानि ?
न, तेषां शरीरनामकर्मण: उत्पत्ते:।
सप्तधातुविरहितविग्रहगतौ अपि स्थिरास्थिरयो: उदयदर्शनात् न अनयो: तत्र व्यापार: इति ?
नैतद् आशंकनीयं, सयोगिकेवलिभगवतां परघातस्य इव तत्र स्थिरास्थिरयो: अव्यक्तोदयेन अवस्थानात्।
स्त्रीपुरुषयो: सौभाग्यनिर्वर्तकं सुभगं, तद्विपरीतं दुर्भगं।
एकेन्द्रियादिषु अव्यक्तचेष्टेसु कथं सुभगदुर्भगभावौ ज्ञायेते ?
न, तत्रापि तेषां अव्यक्तानां आगमेन अस्तित्वसिद्धे:।
यश: गुण:, तस्य उद्भावनं कीर्ति:। यस्य कर्मण: उदयेन सतामसतां वा गुणानां उद्भावनं कीर्तनं लोकै: क्रियते, तस्य कर्मण: यश:कीर्तिसंज्ञा। तद्विपरीतस्य अयश:कीर्तिसंज्ञा।
नियतं मानं निमानं, तद्द्विविधं-प्रमाणनिमानं संस्थाननिमानं इति। यस्य कर्मण: उदयेन जीवानां द्वे अपि निमाने भवत:, तस्य कर्मण: निमानमिति संज्ञा। यदि प्रमाणनिमानं न भवेत्, तर्हि जंघा-बाहु-शिर:-नासिकादीनां विस्तारायामा: लोकांतविसर्पिणो भवेयु:। न चैवं, अनुपलंभात्। तत: कालं जातिं चाश्रित्य जीवानां प्रमाणनिर्वर्तकं कर्म प्रमाणनिमानं नाम। यदि संस्थाननिमाननामकर्म न भवेत्, तर्हि अंगोपांगप्रत्यंगानि संकरव्यतिकरस्वरूपेण भवेत्। न चैवं, अनुपलंभात्। तत: कर्णनयननासिकादीनां स्वजाति-अनुरूपेण स्वस्वात्मन: स्थाने यन्नियामकं कर्म, तत्संस्थाननिमानमिति।
यस्य कर्मण: उदयेन जीवस्य त्रिलोकपूजा भवति तत् तीर्थकरनामकर्म भवतीति।
तात्पर्यमेतत्-एता: नामकर्मप्रकृती: ज्ञात्वा अशुभनामकर्माणि तेषां कारणाणि च त्यक्त्वा शुभकर्मसु तेषां कारणेषु च प्रयत्नो विधेय:। तीर्थकरप्रकृतिबंधकर्तृणां पंचकल्याणकप्राप्तानां भगवतां अर्हतां भक्ति: विधातव्या भवद्भि: इति। एवं नामकर्मणां द्विचत्वािंरशत् पिंडप्रकृतीनां नामकथनं संक्षिप्तलक्षणं च प्रतिपादितं भवति।


अब नोकषायवेदनीय कर्म के भेद और उनके लक्षण का प्रतिपादन करने के लिये सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

जो नोकषायवेदनीय कर्म है वह नव प्रकार का है-स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपुंसकवेद, हास्य, रति, अरति, शोक, भय और जुगुप्सा।।२४।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-यहाँ ‘नो’ शब्द एकदेश का प्रतिषेध करने वाला है ऐसा ग्रहण करना, अन्यथा इन स्त्रीवेद आदि नवों कषायों के अकषायपने का प्रसंग प्राप्त हो जावेगा।

शंका-होने दो, क्या हानि है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि अकषायों के चारित्रावरण-चारित्र पर आवरण करने का विरोध है, इसलिये ईषत् अर्थ में नो शब्द का प्रयोग होने से ईषत्कषाय को नोकषाय कहते हैं यह सिद्ध हो गया।

यहाँ उपयोगी श्लोक देते हैं-

‘‘भाव वस्तु के परिणाम को कहते हैं और दो बार प्रतिषेध उसी वस्तु की एकता का ज्ञान कराता है। ‘नो’ यह शब्द स्व और पर के योग से विवक्षित वस्तु के एकदेश का प्रतिषेधक और विधायक होता है।।’’

शंका-कषायों से नोकषायों में अल्पपना कैसे है ?

समाधान-स्थितियों की अपेक्षा, अनुभाग की अपेक्षा और उदय की अपेक्षा कषायों से नोकषायों में अल्पता पायी जाती है।

शंका-नोकषायों का उदयकाल कषायों की अपेक्षा बहुत पाया जाता है, इसलिये नोकषायों की अपेक्षा कषायों के अल्पपना क्यों नहीं मान लेते ?

समाधान-ऐसा नहीं है, क्योंकि, उदयकाल की अधिकता होने से चारित्रविनाशक कषायों की अपेक्षा चारित्र में मल को उत्पन्न करनेरूप फलवाले कर्मों के महत्ता नहीं बन सकती।

अब इन नोकषायों की व्याख्या करते हैं- जो दोषों के द्वारा अपने को और पर को आच्छादित करती है वह ‘स्त्री’ कहलाती है। जो पुरु-श्रेष्ठ कर्मों में ‘शेते’-सोता है, प्रमाद करता है वह ‘पुरुष’ कहलाता है। जो न पुरुष हो, न स्त्री हो वह नपुंसक कहा जाता है। इस उपर्युक्त कथन का अभिप्राय यह है कि-जिन कर्मस्कन्धों के उदय से पुरुष में आकांक्षा उत्पन्न होती है उन कर्मस्कंधों की ‘स्त्रीवेद’ यह संज्ञा है। जिन कर्मस्कंधों के उदय से स्त्री के प्रति आकांक्षा उत्पन्न होती है उसकी ‘पुरुषवेद’ यह संज्ञा है। जिन कर्मस्कन्धों के उदय से स्त्री-पुरुष दोनों पर भी आकांक्षा उत्पन्न होती है उनकी ‘नपुंसकवेद’ यह संज्ञा है। हंसने को हास्य कहते हैं। जिस कर्मस्कंध के उदय से जीव के हास्यनिमित्तक राग उत्पन्न होता है उस कर्मस्कंध की कारण में कार्य के उपचार से ‘हास्य’ यह संज्ञा है। रमने का नाम ‘रति’ है अथवा जिसके द्वारा जीव रमता है उसे रति कहते हैं। जिन कर्मस्कन्धों के उदय से द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावों में रागभाव उत्पन्न होता है, उसकी ‘रति’ यह संज्ञा है। जिन कर्मस्कन्धों के उदय से द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावों में जीव के अरुचि उत्पन्न होती है उनकी ‘अरति’ संज्ञा है। सोच करने को शोक कहते हैं अथवा जो विषाद उत्पन्न करता है, उनकी ‘शोक’ संज्ञा है। भीति को भय कहते हैं, उदय में आये हुए जिन कर्मस्कन्धों के द्वारा जीव को ‘भय’ उत्पन्न होता है उनकी कारण में कार्य के उपचार से ‘भय’ संज्ञा है। ग्लानि करने को जुगुप्सा कहते हैं, जिन कर्मों के उदय से जुगुप्सा-ग्लानि उत्पन्न होती है उन्हें ‘जुगुप्सा’ यह संज्ञा है।

शंका-इन कर्मों का अस्तित्व कैसे पाया जाता है ?

समाधान-प्रत्यक्ष के द्वारा पाये जाने वाले अज्ञान, अदर्शन आदि कार्यों की उत्पत्ति अन्यथा हो नहीं सकती, इस ‘अन्यथानुपपत्ति’ से उक्त कर्मों का अस्तित्व जाना जाता है।

यहाँ तात्पर्य यह है कि-कषायवेदनीय-क्रोधादि कषायों के साथ अविनाभावी ये नव नोकषाय हैं। संयम, ज्ञान और वैराग्य के बल से इनको क्रम से घटाना चाहिये-कृश करना चाहिये, ऐसा हमें और आपको प्रतिदिन चिन्तन करते रहना चाहिये।

इस प्रकार छठे स्थल में मोहनीय कर्म के भेद-प्रभेद और लक्षणादि के कहने रूप से छह सूत्र पूर्ण हुये हैं।

अब आयु कर्म के भेद और लक्षण का प्रतिपादन करने के लिये दो सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

आयु कर्म की चार प्रकृतियां हैं।।२५।।

नरकायु, तिर्यंचायु, मनुष्यायु और देवायु, ये आयु कर्म की चार प्रकृतियां हैं।।२६।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-प्रथम सूत्र तो द्रव्यार्थिकनय का आश्रय लेने वाला है और दूसरा सूत्र भेद का प्रतिपादक होने से पर्यायार्थिकनय के आश्रित है। जिन कर्मस्कन्धों के उदय से ऊध्र्वगमन स्वभाव वाले भी जीव का नारक भव में अवस्थान होता है, उस कर्मस्कंधों की ‘नरकायु’ यह संज्ञा है। इसी प्रकार से तिर्यंच, मनुष्य और देव इन आयुकर्मों की व्याख्या करना चाहिये।

शंका-जैसे घट, पट और स्तम्भ आदि पर्यायों का अवस्थान वैस्रसिक-स्वाभाविक होता है, वैसे ही नरक भव आदि पर्यायों के भी वैस्रसिक अवस्थान होने पर क्या दोष है ?

समाधाननहीं, क्योंकि अकारण अवस्थान मानने पर नियम में विरोध आता है। देव और नारकियों का जघन्य भव अवस्थान दस हजार वर्ष है और उत्कृष्ट अवस्थान तेतीस सागरोपम है। तिर्यंच और मनुष्यों का जघन्य अवस्थान अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट भव अवस्थान तीन पल्योपम है। वैस्रसिक अवस्थान में यह नियम नहीं बनेगा, प्रत्युत् इस नियम के अभाव में पुद्गलों के समान ही अनियम से अवस्थान कैसे प्राप्त होगा।

शंका-पुद्गलों का अनियम से अवस्थान कैसे है ?

समाधान-पुद्गलों का एक, दो, तीन समय से लेकर उत्कृष्ट से मेरु पर्वत आदि में अनादि-अनंत स्वरूप से एक ही आकार का अवस्थान पाया जाता है।

इसलिये भवसम्बन्धी अवस्थान-स्थिति को सहेतुक होना चाहिये, अन्यथा अन्य शरीर को प्राप्त करने वाले जीवों के भी नरकगति के उदय का प्रसंग प्राप्त होगा। परन्तु ऐसा होता नहीं है।

इस प्रकार सातवें स्थल में आयु के लक्षण का प्रतिपादन करते हुए दो सूत्र पूर्ण हुये।

अब नाम कर्म की पिंड प्रकृतियों की संख्या और संज्ञा का प्रतिपादन करने के लिये दो सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

नामकर्म की पिंड प्रकृतियां बयालीस हैं।।२७।।

गति नामकर्म, जाति नामकर्म, शरीर नामकर्म, शरीरबंधन नामकर्म, शरीरसंघात नामकर्म, शरीरसंस्थान नामकर्म, शरीर अंगोपांग नामकर्म, शरीरसंहनन नामकर्म, वर्ण नामकर्म, गंध नामकर्म, रस नामकर्म, स्पर्श नामकर्म, आनुपूर्वी नामकर्म, अगुरुलघु नामकर्म, उपघात नामकर्म, परघात नामकर्म, उच्छ्वास नामकर्म, आतप नामकर्म, उद्योत नामकर्म, विहायोगति नामकर्म, त्रस नामकर्म, स्थावर नामकर्म, बादर नामकर्म, सूक्ष्म नामकर्म, पर्याप्त नामकर्म, अपर्याप्त नामकर्म, प्रत्येक शरीर नामकर्म, साधारण शरीर नामकर्म, स्थिर नामकर्म, अस्थिर नामकर्म, शुभ नामकर्म, अशुभ नामकर्म, सुभग नामकर्म, दुर्भग नामकर्म, सुस्वर नामकर्म, दु:स्वर नामकर्म, आदेय नामकर्म, अनादेय नामकर्म, यश:कीर्ति नामकर्म, अयश:कीर्ति नामकर्म, निर्माण नामकर्म और तीर्थंकर नामकर्म, ये नाम कर्म की बयालीस िंपड प्रकृतियां हैं।।२८।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-इन दोनों सूत्रों का अर्थ सुगम है। गति, भव और संसार ये एकार्थवाची हैं। यदि गति नामकर्म न हो तो जीव गतिरहित हो जाए। जिस जीवभाव में आयुकर्म से अवस्थान के प्राप्त करने पर शरीर आदि कर्म उदय को प्राप्त होते हैं वह भाव मिथ्यात्व आदि कारणों के द्वारा कर्मभाव को प्राप्त जिस पुद्गल स्कंध के उदय से होता है, उस कर्मस्कंध की ‘गति’ यह संज्ञा है। जीवों के सदृश परिणाम को ‘जाति’ कहते हैं। यदि जाति नामकर्म न हो तो खटमल-खटमलों के साथ, बिच्छू-बिच्छुओं के साथ, चीटियां चीटियों के साथ, धान्य धान्य के साथ और शालि-शालि के साथ समान नहीं हो सकेगे किन्तु इन सबमें परस्पर में सदृशता दिखायी देती है अत: जिस कर्मस्कंध से जीवों के अत्यन्त सदृशता उत्पन्न होती है, वह कर्मस्कंध कारण में कार्य के उपचार से ‘जाति’ इस नाम को प्राप्त करता है। जैसे कि गंगा नदी की बालुका आदि के पृथ्वीकायिक नामकर्म के उदय से सदृश परिणाम स्वीकार किया गया है।

यदि जीवों का सदृश परिणाम कर्म के आधीन न होवे तो चतुरिन्द्रिय जीव घोड़ा, हाथी, भेड़िया, बाघ आदि आकार के हो जावेंगे तथा पंचेन्द्रिय जीव भी भ्रमर, खटमल, पतंगे-शलभ, इन्द्रगोप, क्षुद्र कौड़ी, वृक्ष आदि आकार के हो जावेंगे, किन्तु ऐसा तो है नहीं, क्योंकि इस प्रकार से वे पाये नहीं जाते, प्रत्युत् प्रतिनियत-अपने-अपने निश्चित सदृश परिणामों में अवस्थित ही वृक्ष आदि पाये जाते हैं, इसलिये जीवों का सदृश परिणाम पारिणामिक नहीं है, यह सिद्ध हो गया।

जिस कर्म के उदय से आहारवर्गणा के पुद्गलस्कंध तथा तैजस और कार्मणवर्गणा के पुद्गलस्कंध शरीर योग्य परिणामों के द्वारा परिणत होते हुए जीव के साथ संबद्ध होते हैं, उस कर्मस्कंध की ‘शरीर’ यह संज्ञा है। यदि जीव के शरीर नामकर्म न होवे, तो जीव के अशरीरता का प्रसंग प्राप्त हो जावेगा। पुन: शरीर रहित होने से जीव अमूर्तिक हो जावेगा और अमूर्तिक जीव के कर्मों का होना भी संभव नहीं है, क्योंकि मूर्तिकतारहित आत्मा के पुद्गलों के सम्बन्ध का भी अभाव है।

शंका-अमूर्त आत्मा का पुद्गल के साथ सम्बन्ध न हो, तो न सही, क्या हानि है ?

समाधान-ऐसा नहीं है, क्योंकि सभी जीवों के सिद्धों के साथ समानता हो जाने से संसार का ही अभाव हो जावेगा, किन्तु ऐसा सम्भव नहीं है।

शरीर के लिये आये हुये, शरीर सम्बद्ध पुद्गलस्कंधों का जिन जीव संबद्ध और उदय प्राप्त पुद्गलों के साथ परस्पर बंध किया जाता है उन पुद्गल स्कंधों की ‘शरीर बंधन’ यह संज्ञा कारण में कार्य के उपचार से अथवा कर्ता के निर्देश से होती है।

उदय को प्राप्त जिन कर्मस्कंधों के द्वारा बंधन नामकर्म के उदय से बंध के लिये आये हुए शरीर सम्बन्धी पुद्गलस्कंधों का मृष्टत्व-छिद्ररहित संश्लेष किया जाता है, उन पुद्गल स्कंधों की ‘शरीर संघात’ यह संज्ञा है। जाति नामकर्म के उदय से परतन्त्र जिन कर्मस्कंधों के उदय से शरीर का संस्थान-आकार बनता है वह ‘शरीर संस्थान’ नामकर्म है।

जिस कर्मस्कंध के उदय से शरीर के अंग-उपांगों की निष्पत्ति-रचना बनती है, उस कर्मस्कंध की ‘शरीर अंगोपांग’ यह संज्ञा है। इस कर्म के अभाव में आठ अंग और उपांगों का अभाव हो जावेगा किन्तु ऐसा है नहीं, इन अंगों और उपांगों का अभाव माना नहीं जा सकता।

कहा भी है-शरीर में दो पैर, दो हाथ, नितम्ब, पीठ, हृदय और मस्तक ये आठ अंग होते हैं, शेष आंख, नाक, कान आदि उपांग हैं।।

सिर में मूर्धा, कपाल, मस्तक, ललाट, शंख, भौंह, कान, नाक, आँख, अक्षिवूâट, हनु (ठुड्डी), कपोल, ऊपर और नीचे के ओष्ठ, सृक्वणी (चाप), तालु और जीभ आदि उपांग होते हैं।

जिस कर्म के उदय से शरीर में हड्डी और उसकी संधियों-संयोग स्थानों की निष्पत्ति-रचना होती है उस कर्म को ‘संहनन’ कहते हैं। इस कर्म के अभाव में शरीर देवों के शरीर के समान संहननरहित हो जावेगा।

शंका-हो जावे, क्या हानि है ?

समाधान-ऐसा नहीं है, क्योंकि तिर्यंच और मनुष्य के शरीरों में हड्डियों का समूह देखा जाता है। जिस कर्म के उदय से जीव के शरीर में वर्ण की उत्पत्ति होती है उस कर्मस्कंध की ‘वर्ण’ यह संज्ञा है। जिस कर्मस्कंध के उदय से जीव के शरीर में जाति के प्रतिनियत गंध उत्पन्न होता है उस कर्मस्कंध की ‘गंध’ यह संज्ञा है, क्योंकि यहाँ कारण में कार्य का उपचार है। जिस कर्मस्कंध के उदय से जीव के शरीर में जाति के प्रतिनियत तिक्त आदि रस होते हैं उस कर्मस्कंध की ‘रस’ यह संज्ञा है, क्योंकि नीम, आम और नींबू आदि में नियत रस पाया जाता है। जिस कर्मस्कंध के उदय से जीव के शरीर में जाति प्रतिनियत स्पर्श उत्पन्न होता है, उस कर्मस्कंध की ‘स्पर्श’ यह संज्ञा है, यहाँ भी कारण में कार्य का उपचार है क्योंकि अपने-अपने पुष्प, फल, कमलनाल आदि में नियत स्पर्श पाया जाता है।

पूर्व और उत्तर शरीरों अंतरालवर्ती एक, दो और तीन समय में वर्तमान जीव के जिस कर्म के उदय से जीव प्रदेशों का विशिष्ट आकार विशेष होता है, उस कर्म की ‘आनुपूर्वी’ यह संज्ञा है।

शंका-संस्थान नाम कर्म से संस्थान-आकार विशेष होता है, इसलिये आनुपूर्वी कर्म की कल्पना निरर्थक है ?

समाधान-ऐसा नहीं कहना, क्योंकि शरीर ग्रहण के प्रथम समय से ऊपर उदय में आने वाले उस संस्थान नामकर्म का विग्रह गति के काल में उदय का अभाव पाया जाता है। यदि आनुपूर्वी कर्म न हो, तो विग्रहगति के काल में जीव अनियत संस्थान वाला हो जावेगा, किन्तु ऐसा है नहीं, क्योंकि जाति प्रतिनियत संस्थान-आकार विग्रहगति के काल में पाया जाता है।

शंका-पूर्व शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर को नहीं ग्रहण करके स्थित जीव का इच्छित गति में गमन किस कर्म से होता है ?

समाधान-आनुपूर्वी नामकर्म से इच्छित गति में गमन होता है।

शंका-विहायोगति से क्यों नहीं होता है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि विहायोगति नामकर्म का औदारिक आदि तीनों शरीरों के उदय के बिना उदय नहीं होता। विग्रहगति में आकार विशेष को बनाये रखना और इच्छित गति में गमन कराना ये दोनों ही कार्य आनुपूर्वी नामकर्म के हैं। अनंतानंत पुद्गलों से आपूर्ण-भरपूर जीव के जिन कर्मस्कंधों के द्वारा ‘अगुरुलघुपना’ होता है, उन पुद्गलस्कधों की ‘अगुरुलघुक’ यह संज्ञा है, क्योंकि कारण में कार्य का उपचार है। यदि यह नामकर्म न होवे, तो जीव लोहे के गोले के समान भारी हो जावेगा या आक की तूल-रुई के समान हल्का हो जावेगा, किन्तु ऐसा है नहीं, क्योेंकि ऐसा पाया नहीं जाता।

शंका-अगुरुलघुक तो जीव का स्वाभाविक गुण है पुन: उसे यहाँ कर्म प्रकृतियों में क्यों लिया ?

समाधान-ऐसा नहीं है, क्योंकि संसार अवस्था में कर्मपरतंत्र जीव में उस अगुरुलघुत्व-स्वाभाविक गुण का अभाव है। यहाँ जीव का वह अगुरुलघुत्व कर्म के द्वारा नहीं किया जाता है किन्तु जीव में भरा हुआ जो पुद्गलस्कंध है, वह जिस कर्म के उदय से जीव के हल्का या भारीपना प्राप्त नहीं होता है वह अगुरुलघुक कर्म यहाँ विवक्षित है, अतएव यहाँ पर जीवविषयक अगुरुलघु गुण का ग्रहण नहीं है।

स्वयं प्राप्त होने वाले घात को उपघात कहते हैं-आत्मघात कहते हैं। जो कर्म जीव के लिये पीड़ा को करने वाले ऐसे अवयवों को बनाता है अथवा जीव के पीड़ा के लिये कारण ऐसे विष, खड्ग, पाश आदि द्रव्यों को प्राप्त कराता है वह ‘उपघात’ नामकर्म है। ये अवयव महाशृंग-बड़े-बड़े सींग, लम्बे स्तन, विशाल तोंदवाला पेट आदि होते हैं। यदि उपघात नामकर्म न होवे तो वात, पित्त, कफ से दूषित शरीर से जीव को पीड़ा नहीं हो सकेगी, किन्तु ऐसा देखा जाता है।

शंका-जीव को दु:ख उत्पन्न करने में असातावेदनीय कर्म का व्यापार होता है पुन: उपघातकर्म को यहाँ कैसे कहा ?

समाधान-जीव के दु:ख में असातावेदनीय कर्म का व्यापार होवे, वह तो है ही, किन्तु उपघातकर्म भी उसमें सहकारी कारण होता है, क्योंकि उसके उदय के निमित्त से दु:खकर पुद्गल द्रव्य का संपादन-समागम होता है।

पर जीवों के घात को परघात कहते हैं। जिस कर्म के उदय से शरीर में पर के घात करने में कारणभूत पुद्गल निष्पन्न होते हैं, वह ‘परघात’ नामकर्म है। जैसे सांप के दाढ़ों में विष, बिच्छू के पूँछ में विष, पर दु:ख के कारणभूत पुद्गलों का संचय, सिंह, व्याघ्र आदि में तीक्ष्ण नख, दाँत तथा सिंगी, वत्स्यनाभि, धतूरा आदि विषैले वृक्ष पर का घात करने वाले हैं।

श्वास लेने को उच्छ्वास कहते हैं। जिस कर्म के उदय से जीव उच्छ्वास और नि:श्वास को करने में समर्थ होता है, उस कर्म की ‘उच्छ्वास’ यह संज्ञा है, यहाँ कारण में कार्य का उपचार है।

तपने को ‘आतप’ कहते हैं। यदि आतप नामकर्म न हो तो सूर्य के मण्डल में पृथ्वीकायिक जीव के शरीर में आतप-तपन का अभाव हो जावेगा। उष्णता, प्रकाश और आतप ये एकार्थवाची हैंं।

उद्योतन-चमकने का नाम उद्योत है। यदि यह नामकर्म न होवे तो चन्द्रमा, नक्षत्र, तारा और जुगनू आदि के शरीरों में उद्योत- प्रकाश नहीं हो सकेगा, किन्तु ऐसा नहीं है, इनमें प्रकाश पाया जाता है।

‘विहायस्’ नाम आकाश का है। आकाश में गमन को विहायोगति कहते हैं। जिन कर्मस्कंधों के उदय से जीव का आकाश में गमन होता है उनकी ‘विहायोगति’ यह संज्ञा है।

शंका-तिर्यंच और मनुष्यों का भूमि में गमन किस कर्म के उदय से होता है ?

समाधान-विहायोगति नामकर्म के उदय से, क्योंकि ‘वितस्तिमात्र’ पांव वाले जीव प्रदेशों के द्वारा भूमि को व्याप्त करके जीव के समस्त प्रदेशों का आकाश में गमन पाया जाता है।

जिन त्रस आदि से लेकर अयशर्कीित पर्यंत नामकर्मों के उदय से जीव त्रस आदि पर्यायों को प्राप्त करते हैं, उनकी ‘त्रस’ आदि संज्ञायें हैं। त्रस-स्थावर, बादर-सूक्ष्म, पर्याप्त-अपर्याप्त, प्रत्येकशरीर-साधारण शरीर, स्थिर-अस्थिर, शुभ-अशुभ, सुभग-दुर्भग, सुस्वर-दु:स्वर, आदेय-अनादेय, यशकीर्ति-अयशकीर्ति ये बीस प्रकृतियां नामकर्म की हैं। इनमें से किन्हीं-किन्हीं प्रकृतियों का विशेष अर्थ यहाँ कहते हैं-

स्थिर नामकर्म के उदय से जीव के रस, रुधिर, मेदा, मज्जा, अस्थि, मांस और शुक्र इन सात धातुओं की स्थिरता-अविनाश व अगलन होता है अर्थात् गलन नहीं होता है वह स्थिर नामकर्म है, क्योंकि हानि और वृद्धि के बिना इन धातुओं का अवस्थान देखा जाता है। अस्थिर नामकर्म के उदय से जीव के इन रस, रुधिर आदि सातों धातुओं का परिणमन होता है। यहाँ उपयोगी श्लोक दिखाते हैं-

रस से रक्त बनता है, रक्त से मांस, मांस से मेदा, मेदा से हड्डी, हड्डी से मज्जा और मज्जा से शुक्र उत्पन्न होता है तथा शुक्र से प्रजा-संतान उत्पन्न होती है।।

पन्द्रह नयन-निमेषों की एक काष्ठा होती है, तीस काष्ठा की एक कला होती है, बीस कला का एक मुहूर्त होता है, तीस मुहूर्त और कला के दसवें भाग कलाप्रमाण एक अहोरात्र-दिन-रात होता है। पन्द्रह अहोरात्रों का एक पक्ष होता है।

पच्चीस सौ चौरासी कला प्रमाण तथा तीन बटे सात भागों से परिहीन नौ काष्ठा प्रमाण (२५८४ कला, ८-४/७ का) काल तक रस रसस्वरूप से रहकर रुधिररूप परिणत होता है। वह रुधिर भी उतने ही काल तक रुधिररूप से रहकर मांसरूप से परिणत होता है। इसी प्रकार शेष धातुओं का भी परिणमन काल कहना चाहिये। इस प्रकार एक महीने के द्वारा रस शुक्र रूप से परिणत होता है। इस तरह जिस कर्म के उदय से धातुओं का क्रम से परिणमन होता है, वह अस्थिर नामकर्म कहा जाता है। इस अस्थिर नामकर्म के अभाव में धातुओं के क्रमश: परिवर्तन का नियम न रहेगा, किन्तु ऐसा है नहीं, क्योंकि वैसा मानने पर अनवस्था प्राप्त होगी।

शंका-इन सातों धातुओं के कारणभूत पृथक्-पृथक् कर्म कहना चाहिये ?

समाधान-नहीं, क्योंकि इन सातों धातुओं की शरीर नामकर्म से उत्पत्ति होती है।

शंका-सात धातुओं से रहित विग्रहगति में भी स्थिर-अस्थिर दोनों प्रकृतियों का उदय देखा जाता है, इसलिये इनका वहाँ पर व्यापार नहीं मानना चाहिये ?

समाधान-ऐसी आशंका नहीं करना चाहिये, क्योंकि विग्रहगति में उन प्रकृतियों का अव्यक्त उदयरूप से अवस्थान है, जैसे कि सयोगकेवली भगवान के परघात प्रकृति का अव्यक्तोदय स्वरूप से अवस्थान है।

स्त्री और पुरुषों के सौभाग्य को उत्पन्न करने वाला सुभग नामकर्म है। उन स्त्री-पुरुषों के ही दौर्भाग्य को उत्पन्न करने वाला दुर्भग नामकर्म है।

शंका-पुन: अव्यक्त चेष्टा वाले एकेन्द्रिय आदि जीवों में ये सुभग भाव और दुर्भग भाव कैसे जाने जायेंगे ?

समाधान-ऐसा नहीं कहना, क्योंकि उनमें भी अव्यक्तरूप से विद्यमान उन भावों का आगम से अस्तित्व सिद्ध है।

यश नाम गुण का है, उसके उद्भावन-प्रकटीकरण को कीर्ति कहते हैं। जिस कर्म के उदय से विद्यमान या अविद्यमान गुणों का उद्भावन लोगों द्वारा किया जाता है, उस कर्म को ‘यश:कीर्ति’ यह नाम है। जिस कर्म के उदय से विद्यमान या अविद्यमान अवगुणों का उद्भावन-कथन लोगों द्वारा किया जाता है वह ‘अयश:कीर्ति’ नामकर्म है।

नियत मान को निमान-निर्माण कहते हैं, इसके दो भेद हैं-प्रमाण निर्माण और संस्थान निर्माण। जिस कर्म के उदय से जीवों के दोनों ही प्रकार के निर्माण होते हैं, उस कर्म की ‘निमान’-निर्माण यह संज्ञा है। यदि प्रमाणनिर्माण कर्म न होवे तो जंघा, बाहु, शिर और नासिका आदि का विस्तार और आयाम लोक के अन्त तक फैलने वाले हो जावेंगे, किन्तु ऐसा है नहीं, क्योंकि वैसा पाया नहीं जाता। इसलिये काल का और जाति का आश्रय करके जीवों के प्रमाण को निर्माण करने वाला-बनाने वाला ‘प्रमाण निर्माण’ नामकर्म है। यदि संस्थाननिर्माण नामकर्म नहीं होगा, तो अंग, उपांग और प्रत्यंग संकर और व्यतिकररूप से हो जावेंगे, किन्तु ऐसा है नहीं, क्योंकि वैसा पाया नहीं जाता। इसलिये कान, नेत्र, नाक आदि अंगों का अपनी जाति के अनुरूप अपने-अपने स्थान पर जो नियामक कर्म है, वह ‘संस्थान निर्माण’ नामकर्म कहलाता है।

जिस कर्म के उदय से जीव को तीन लोकों में पूजा प्राप्त होती है वह ‘तीर्थंकर’ नामकर्म कहलाता है।

यहाँ तात्पर्य यह समझना इन सभी नामकर्म की प्रकृतियों को जानकर अशुभ नाम कर्मों को और उनके कारणों को छोड़कर शुभ कर्मों में और उनके कारणों में प्रयत्न करना चाहिये। तथा च-तीर्थंकर प्रकृति के बंध के कर्ता, पंचकल्याणक पूजा को प्राप्त ऐसे अर्हंत भगवन्तों की हमें और आपको भक्ति करना चाहिये।

इस प्रकार नामकर्मों की बयालीस िंपडप्रकृतियों के नाम का कथन और संक्षिप्त लक्षण का यहाँ प्रतिपादन किया गया है।

अधुना गतिजातिकर्मणो: भेदप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते

अधुना गतिजातिकर्मणो: भेदप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-जं तं गदिणामकम्मं तं चउव्विहं, णिरयगदिणामं तिरिक्खगदिणामं मणुसगदिणामं देवगदिणामं चेदि।।२९।।

जं तं जादिणामकम्मं तं पंचविहं, एइंदियजादिणामकम्मं वीइंदिय-जादिणामकम्मं तीइंदियजादिणामकम्मं चउिंरदियजादिणामकम्मं पंचिंदियजादिणामकम्मं चेदि।।३०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यस्य कर्मण: उदयेन नारकभावो जीवानां भवति, तत्कर्म नरकगतिरिति उच्यते, कारणे कार्योपचारात्। एवं शेषगतीनामपि ज्ञातव्यं।
एकेन्द्रियाणां एकेन्द्रियै: सह एकेन्द्रियभावेन यस्य कर्मण: उदयेन सदृशत्वं भवति, तत्कर्म एकेन्द्रियजातिनाम। तदपि अनेकप्रकारं, अन्यथा जंबू-निंब-आम्र-जंभीर-कदम्ब-आमलक-शालि-व्रीहि-यवगोधूमादिजातीनां भेदानुपपत्ते:। एवं द्वीन्द्रियादीनां अपि ज्ञातव्यं भवति, किंच प्रत्येकं जातीनां जीवानां अनेक प्रकाराणि सन्ति।
अधुना औदारिकादिशरीर-बंधन-संघातानां भेदप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-जं तं सरीरणामकम्मं तं पंचविहं, ओरालियसरीरणामं वेउव्वियसरीरणामं आहार सरीरणामं तेयासरीरणामं कम्मइयसरीरणामं चेदि।।३१।।
जं तं सरीरवंधणणामकम्मं तं पंचविहं, ओरालियसरीरबंधणणामं वेउव्वियसरीर-बंधणणामं आहारसरीरबंधणणामं तेयासरीरबंधणणामं कम्मइयसरीरबंधणणामं चेदि।।३२।।
जं तं सरीरसंघादणामकम्मं तं पंचविहं, ओरालियसरीरसंघादणामं वेउव्वियसरीर-संघादणामं आहारसरीरसंघादणामं तेयासरीरसंघादणामं कम्मइयसरीरसंघादणामं चेदि।।३३।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यस्य कर्मण: उदयेन आहारवर्गणाया: पुद्गलस्कंकंधा: जीवेनावगाढदेशस्थिता: रसरुधिरमांसमेदास्थिमज्जाशुक्रस्वभावौदारिकशरीरस्वरूपेण परिणमन्ति तस्यौदारिकशरीरसंज्ञा। यस्य यस्य कर्मण: उदयेन आहारवर्गणाया: स्कंधा: अणिमाद्यष्टगुणोपलक्षित शुभाशुभात्मकवैक्रियिकशरीरस्वरूपेण परिणमन्ति तस्य वैक्रियिकशरीरमिति संज्ञा। यस्य कर्मण: उदयेन आहारवर्गणास्कंधा: आहारशरीरस्वरूपेण परिणमन्ति तस्य आहारशरीरमिति संज्ञा। यस्य कर्मण: उदयेन तैजसवर्गणास्कंधा: नि:सरणानि:सरण-प्रशस्ताप्रशस्त-तैजसशरीरस्वरूपेण परिणमन्ति तत् तैजसशरीरं नाम, कारणे कार्योपचारात्। यस्य कर्मण उदय: कूष्माण्डफलस्य वृंत्तमिव सर्वकर्माश्रयभूत: तस्य कार्मणशरीरमिति संज्ञा।
यस्य कर्मण: उदयेन औदारिकशरीरपरमाणव: अन्योऽन्येन बंधमागच्छन्ति तदौदारिकशरीरबंधनं नाम। एवं शेषशरीरबंधनानां लक्षणं ज्ञातव्यं।
यस्य कर्मण: उदयेन औदारिकशरीरस्कंधानां शरीरभावमुपगतानां बंधननामकर्मोदयेन एकबंधनबद्धानां छिद्रराहित्यं-मृष्टत्वं भवति तदौदारिकसंघातं नाम। एवं शेषशरीरसंघातानामपि अर्थो वक्तव्य:।
संप्रति संस्थानस्य सभेदलक्षणप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-जं तं सरीरसंठाणणामकम्मं तं छव्विहं, समचउरसरीरसंठाणणामं णग्गोहपरिमंडल सरीरसंठाणणामं सादियसरीरसंठाणणामं खुज्जसरीर-संठाणणामं वामणसरीरसंठाणणामं हुंडसरीरसंठाणणामं चेदि।।३४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-समं चतुरस्रं समचतुरस्रं समविभक्तमित्यर्थ: न्यग्रोधो वटवृक्ष: तस्य परिमंडलमिव न्यग्रोधपरिमंडलसंस्थानं, आयतवृत्तमित्यर्थ:। स्वातिर्वल्मीक: शाल्मलिर्वा तस्य संस्थानमिव, अधो विशालं उपरि हीनमिति स्वातिसंस्थानं। कुब्जस्य शरीरं कुब्जशरीरं तस्य संस्थानमिव। यस्य कर्मण: उदयेन शाखानां दीर्घत्वं मध्यभागस्य ह्रस्वत्वं च भवति तत् कुब्जशरीरसंस्थानं। वामनस्य शरीरं, वामनशरीरस्य संस्थानमिव संस्थानं यस्य तद् वामनशरीरसंस्थानं। विषमपाषाणभरितमशक इव विषम:। विषमं हुंडं, तस्य संस्थानमिव यस्य शरीरस्य तद् हुंडसंस्थानं शरीरं। यस्य कर्मण: उदयेन पूर्वोक्तपंचसंस्थानेभ्य: व्यतिरिक्तमन्यसंस्थानं उत्पद्यते एकत्रिंशद्भेदभिन्नं तद् हुंडसंस्थानसंज्ञितं भवति।
इमानि षडपि संस्थानानि स्वस्वकर्मणां उदयेन भवन्ति। उत्तमंं संस्थानं तु प्रथममेव। चान्यत्रापि-‘‘तत्रोध्र्वाधोमध्येषु समप्रविभागेन शरीरावयवसंनिवेशव्यवस्थापनं कुशलशिल्पिनिर्वर्तितसमस्थितिचक्रवत् अवस्थानकरं समचतुरस्रसंस्थाननाम।’’ हुंडशरीरसंस्थानस्य एकत्रिंशद्भेदा: कथ्यन्ते-
अग्रे स्थानसमुत्कीर्तनचूलिकायां धवलाटीकाकारेण कथितं-‘‘सव्वावयवेसु णियदसरूवपंचसंठाणेसु वे-तिण्णि-चदु-पंचसंठाणाणं संजोगेणं हुंडसंठाणमणेयभेदभिण्णमुप्पज्जदि।’’ अस्यायमर्थ:-द्विसंयोगिभंगा: पंच, त्रिसंयोगिभंगा: दश, चतु:संयोगि दश, पंचसंयोगि पंच, षट्संयोगिभंग: एक:, सर्वे मिलित्वा हुंडसंस्थानस्य एकत्रिंशद्भंगा: भवन्ति।
अधुना अंगोपांगनामकर्मण: भेदप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-जं तं सरीरअंगोवंगणामकम्मं तं तिविहं ओरालियसरीरअंगोवंगणामं वेउव्वियसरीर-अंगोवंगणामं आहारसरीरअंगोवंगणामं चेदि।।३५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रस्यार्थ: सुगम:। तैजस-कार्मणशरीरयो: अंगोपांगानि न सन्ति, तयो: करचरणग्रीवाद्यवयवाभावात्।
संप्रति शरीरसंहनन भेदप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-जं तं सरीरसंघडणणामकम्मं तं छव्विहं, वज्जरिसहवइरणारायण-सरीरसंघडणणामं वज्जणारायणसरीरसंघडणणामं णारायण-सरीरसंघडणणामं अद्धणारायण-सरीरसंघडणणामं खीलियसरीर-संघडणणामं असंपत्तसेवट्ट-सरीरसंघडणणामं।।३६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-संहननमस्थिसंचय:, ऋषभो वेष्टनम् वङ्कावदभेद्यत्वाद्वङ्काऋषभ:। वङ्कावन्नाराच: वङ्कानाराच:, तौ द्वावपि यस्मिन् वङ्काशरीरसंहनने तद्वङ्काऋषभवङ्कानाराचशरीरसंहननं। अस्य उदयेन वङ्काास्थीनि वङ्कावेष्टनेन वेष्टितानि वङ्कानाराचेन कीलितानि च भवन्ति तदिदं संहननं प्रथमं। एषश्चैवास्थिबंध: वङ्काऋषभवर्जित: यस्य कर्मण: उदयेन भवति तत्कर्म वङ्कानाराचशरीरसंहननमिति। यस्य कर्मण: उदयेन वङ्काविशेषणरहितनाराचेन कीलिता: अस्थिसंधय: भवन्ति तत् नाराचशरीरसंहननं नाम। यस्य कर्मण: उदयेन अस्थिसंधय: नाराचेन अद्र्धविद्धा: भवन्ति तदर्धनाराचशरीरसंहननं नाम। यस्य कर्मण:उदयेन वङ्कारहितास्थीनि कीलितानि भवन्ति तत् कीलितशरीरसंहननं नाम। यस्य कर्मण: उदयेन अन्योऽन्यमसंप्राप्तानि सरीसृप-अस्थीनि इव शिराबद्धानि अस्थीनि भवन्ति तदसंप्राप्तसृपाटिकाशरीरसंहननं नाम। इमानि षट्संहननानि भवन्ति।

अब गति और जाति कर्र्मों के भेदों का प्रतिपादन करने के लिये दो सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

जो गति नामकर्म है वह चार भेदरूप है-नरकगति नामकर्म, तिर्यंचगति नामकर्म, मनुष्यगति नामकर्म और देवगति नामकर्म।।२९।।

जो जातिनामकर्म है वह पाँच भेदरूप है-एकेन्द्रिय जाति नामकर्म, द्वीन्द्रियजाति नामकर्म, त्रीन्द्रियजाति नामकर्म, चतुरिन्द्रियजाति नामकर्म और पंचेन्द्रियजाति नामकर्म।।३०।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-जिस कर्म के उदय से जीवों के नारक भाव होता है, वह कर्म ‘नरकगति’ कहलाता है क्योेंकि कारण में कार्य का उपचार है। इसी प्रकार शेष गतियों की व्याख्या भी जानना चाहिये।

जिस कर्म के उदय से एकेन्द्रिय जीवों की एकेन्द्रिय जीवों के साथ एकेन्द्रिय भाव से सदृशता होती है वह कर्म एकेन्द्रिय जाति नाम से कहा जाता है। वह भी अनेक प्रकार का है, अन्यथा जामुन, नीम, आम, नींबू, कदम्ब, इमली, शालि, ब्रीहि, जौ, गेहूँ आदि जातियों का भेद नहीं हो सकेगा। इसी प्रकार द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय आदि जीवों का भी जानना चाहिये, क्योंकि प्रत्येक जाति के जीवों में अनेक प्रकार होते हैं।

अब औदारिक शरीर आदि एवं औदारिक बंधन-संघातादि के भेदों के प्रतिपादन करने के लिये तीन सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

जो शरीर नामकर्म है वह पाँच प्रकार का है-औदारिक शरीर नामकर्म, वैक्रियकशरीर नामकर्म, आहारकशरीर नामकर्म, तैजसशरीर नामकर्म और कार्मणशरीर नामकर्म।।३१।।

जो शरीरबंधन नामकर्म है वह पाँच प्रकार का है-औदारिकशरीरबंधन नामकर्म, वैक्रियकशरीरबंधन नामकर्म, आहारकशरीरबंधन नामकर्म, तैजसशरीरबंधन नामकर्म और कार्मणशरीरबंधन नामकर्म।।३२।।

जो शरीरसंघात नामकर्म है वह पाँच प्रकार का है-औदारिकशरीरसंघात नामकर्म, वैक्रियकशरीरसंघात नामकर्म, आहारकशरीरसंघात नामकर्म, तैजसशरीरसंघात नामकर्म और कार्मणशरीरसंघात नामकर्म।।३३।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-जिस कर्म के उदय से जीव के द्वारा अवगाहित-अधिष्ठित देश में स्थित आहारवर्गणा के पुद्गलस्कंध रस, रुधिर, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा और शुक्रस्वभाव वाले औदारिक शरीर स्वरूप से परिणत होते हैं, उस कर्म की ‘औदारिक शरीर’ यह संज्ञा है। जिस कर्म के उदय से आहार वर्गणा के स्कंध अणिमा, महिमा आदि आठ गुणों से उपलक्षित शुभ और अशुभरूप वैक्रियकशरीरस्वरूप से परिणत होते हैं उस कर्म की ‘वैक्रियकशरीर’ यह संज्ञा है। जिस कर्म के उदय से आहारवर्गणा के स्कंध आहारकशरीरस्वरूप से परिणत होते हैं उस कर्म की ‘आहारकशरीर’ यह संज्ञा है। जिस कर्म के उदय से तैजसवर्गणा के स्कंध नि:सरण-अनि:सरण रूप अर्थात् बाहर निकलने और नहीं निकलने रूप तथा प्रशस्त या अप्रशस्त स्वरूप तैजस शरीर स्वरूप से परिणत होते हैं, वह ‘तैजसशरीर’ नामकर्म कहलाता है क्योंकि यहाँ कारण में कार्य का उपचार किया जाता है।

जिस कर्म का उदय कूष्माण्ड फल के वेंट (डंठल) के समान सर्व कर्मों के आश्रयभूत हो उस कर्म की ‘कार्मण शरीर’ यह संज्ञा है।

जिस कर्म के उदय से औदारिकशरीर के परमाणु परस्पर में बंध को प्राप्त होते हैं, उसे औदारिक शरीरबंधन नामकर्म कहते हैं। इसी प्रकार शेष शरीर सम्बन्धी बन्धनों का भी अर्थ कहना चाहिये।

जिस कर्म के उदय से औदारिक शरीर के स्कंध, जो शरीर भाव को प्राप्त हुये हैं तथा जो बंधन नामकर्म के उदय से एकबंधन से बद्ध हैं उनका छिद्ररहितपने से मिलना हो जाता है, उनको ‘औदारिकशरीरसंघात’ नामकर्म कहते हैं। इसी प्रकार से शेष सभी शरीरसंघातों के भी अर्थ को जानना चाहिये।

अब संस्थान के भेद और लक्षण को प्रतिपादित करने के लिये सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

जो शरीर संस्थान नामकर्म है वह छह प्रकार का है-समचतुरस्रशरीरसंस्थान नामकर्म, न्यग्रोध परिमंडलशरीरसंस्थान नामकर्म, स्वातिशरीरसंस्थान नामकर्म, कुब्जकशरीरसंस्थान नामकर्म, वामनशरीरसंस्थान नामकर्म और हुण्डकशरीरसंस्थान नामकर्म।।३४।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-समान चतुरस्र-समविभक्त को ‘समचतुरस्र’ कहते हैं। न्यग्रोध वटवृक्ष को कहते हैं, उसके परिमण्डल के समान परिमण्डल जिस शरीर का होता है उसे न्यग्रोधपरिमण्डल कहते हैं ऐसा जो शरीर का संस्थान वह ‘न्यग्रोधपरिमण्डलसंस्थान’ है, अर्थात् आयतवृत्त शरीर संस्थान होता है।

स्वाति नाम ‘बल्मीक’ या शाल्मलि वृक्ष का है, उसके समान आकार जिनका हो, यह शरीर नाभि से नीचे विशाल और ऊपर सूक्ष्म या हीन होता है, वह ‘स्वातिसंस्थान’ नामकर्म है।

कुबड़े शरीर को कुब्ज शरीर कहते हैं उस आकार के समान आकार वाला ‘कुब्जशरीरसंस्थान’ है। जिस कर्म के उदय से शाखाओं के दीर्घता और मध्यभाग के ह्रस्वता होती है उसकी ‘कुब्जशरीरसंस्थान’ यह संज्ञा है।

बौने के शरीर को ‘वामन’ कहते हैं। वामन शरीर के आकार के समान जिनका संस्थान हो वह ‘वामनशरीरसंस्थान’ कहलाता है।

जिसमें विषम-अनेक आकार वाले पाषाणों से भरी हुई मशक के समान सब ओर से विषम आकार हो वह ‘हुण्ड’ है। हुण्ड के शरीर को हुण्ड शरीर कहते हैं, उसके आकार के समान आकार वाले को ‘हुण्डशरीरसंस्थान’ कहते हैं।

जिस कर्म के उदय से पूर्वोक्त पाँचों संस्थानों से अतिरिक्त, इकतीस भेदयुक्त अन्य संस्थान-आकार उत्पन्न होता है वह ‘हुण्डसंस्थान’ इस संज्ञा को प्राप्त है।

ये छहों ही संस्थान अपने-अपने कर्मों के उदय से होते हैं। इनमें से उत्तमसंस्थान पहला ही है।

तत्त्वार्थराजवार्तिक ग्रन्थ में कहा भी है- ऊध्र्व, अधो और मध्य में समान विभक्तरूप से शरीर के अवयवों की रचना की व्यवस्था जिसमें कुशल शिल्पी से बनाये गये समान स्थिति वाले चक्र के समान अवस्थानरूप होती है वह समचतुरस्रसंस्थान नामकर्म कहलाता है।

यहाँ पर अंतिम हुण्डकसंस्थान के इकतीस भेद कहते हैं- आगे धवलाटीकाकार श्रीवीरसेनाचार्य ने स्थान समुत्कीर्तन चूलिका में कहा है- सर्व अवयवों में नियत स्वरूप वाले पाँच संस्थानों में से दो, तीन, चार व पाँच संस्थानों के संयोग से हुण्डक संस्थान के अनेक भेद उत्पन्न होते हैं। इस निर्देश के अनुसार हुण्डक संस्थान के द्विसंयोगी आदि इकतीस भंग होते हैं। इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है- द्विसंयोगी भंग ५, त्रिसंयोगी भंग १०, चतु:संयोगी भंग १०, पंचसंयोगी भंग ५, षट् संयोगीभंग १, ऐसे सब मिलकर हुंडकसंस्थान के ३१ भंग होते हैं। विशेषार्थ-द्विसंयोगी भंग हैं। त्रिसंयोगी भंग हैं। चतु:संयोगी भंग हैं। पंचसंयोगी भंग और छहसंयोगी भंग हैं। इस प्रकार हुण्डकसंस्थान के समस्त संयोगी भंग-५ ± १० ± १० ± ५ ± १ · ३१ होते हैं।

अब अंगोपांग नामकर्म के भेद का प्रतिपादन करने के लिये सूत्र अवतार लेता है-

सूत्रार्थ-

जो शरीर अंगोपांग नामकर्म है वह तीन प्रकार का है-औदारिक शरीरअंगोपांग नामकर्म, वैक्रियकशरीरअंगोपांग नामकर्म और आहारकशरीरअंगोपांग नामकर्म।।३५।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-सूत्र का अर्थ सुगम है। तैजस और कार्मण शरीर में अंगोपांग नहीं हैं, क्योंकि इनमें हाथ, पैर, ग्रीवा आदि अवयवों का अभाव है।

अब शरीर के संहनन के भेद का प्रतिपादन करने के लिये सूत्र अवतार लेता है-

सूत्रार्थ-

जो शरीरसंहनन नामकर्म है वह छह प्रकार का है-वङ्काऋषभवङ्कानाराचशरीरसंहनन नामकर्म, वङ्कानाराचशरीरसंहनन नामकर्म, नाराचशरीरसंहनन नामकर्म, अर्धनाराचशरीर-संहनन नामकर्म, कीलकशरीरसंहनन नामकर्म और असंप्राप्तसृपाटिकाशरीरसंहनन नामकर्म।।३६।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-‘संहनन’ नाम हड्डियों के संचय का है। वेष्टन को ‘ऋषभ’ कहते हैं। वङ्का के समान अभेद्य होने से ‘वङ्काऋषभ’ कहलाता है। वङ्का के समान जो ‘नाराच’ है वह ‘वङ्कानाराच’ है। ये दोनों ही-वङ्काऋषभ और वङ्कानाराच जिस वङ्काशरीर संहनन में होते हैं वह ‘वङ्काऋषभवङ्कानाराचशरीरसंहनन’ है। जिस कर्म के उदय से वङ्कामय हड्डियाँ वङ्कामय वेष्टन से वेष्टित और वङ्कामय नाराच से कीलित होती हैं, वह ‘वङ्काऋषभवङ्कानाराचशरीरसंहनन’ है, यह प्रथम संहनन है। यह पूर्वोक्त ही हड्डियों का बंध जिस कर्म के उदय से वङ्काऋषभ से रहित होता है, वह कर्म ‘वङ्कानाराचशरीरसंहनन’ है। जिस कर्म के उदय से हड्डियों की संधियाँ वङ्का विशेषण से रहित नाराच से कीलित हों, वह नाराचशरीरसंहनन नामकर्म है। जिस कर्म के उदय से हड्डियों की संधियाँ नाराच से आधी बिंधी हुई होती हैं वह अर्धनाराचशरीरसंहनन नामकर्म है। जिस कर्म के उदय से वङ्कारहित हड्डियाँ और कीलें होती हैं वह कीलकशरीरसंहनन नामकर्म है। जिस कर्म के उदय से सरीसृप-सर्प की हड्डियों के समान परस्पर में असंप्राप्त और शिराबद्ध हड्डियाँ होती हैं वह असंप्राप्तसृपाटिका शरीरसंहनन नामकर्म है। ये छह संहनन होते हैं।

संप्रति वर्णगंधरसस्पर्शनामकर्मणां भेदसूचनाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते

जं तं वण्णणामकम्मं तं पंचविहं, किण्हवण्णणामं णीलवण्णणामं रुहिरवण्णणामं हालिद्दवण्णणामं सुक्किलवण्णणामं चेदि।।३७।।

जं तं गंधणामकम्मं तं दुविहं, सुरहिगंधं दुरहिगंधं चेदि।।३८।।
जं तं रसणामकम्मं तं पंचविहं, तित्तणामं कडुवणामं कसायणामं अंबणामं महुरणामं चेदि।।३९।।
जं तं पासणामकम्मं तं अट्ठविहं, कक्खडणामं मउवणामं गुरुअणामं लहुअणामं णिद्धणामं लुक्खणामं सीदणामं उसुणणामं चेदि।।४०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यस्य कर्मण: उदयेन शरीरपुद्गलानां: कृष्णवर्ण उत्पद्यते तत्कृष्णवर्णं नाम। एवं शेषवर्णानां अपि वक्तव्यं। सुगंधदुर्गन्धयोज्र्ञातव्यं, रसस्पर्शानामपि च मन्तव्यमिति।
संप्रति आनुपूर्वीणां भेदप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-जं तं आणुपुव्वीणामकम्मं तं चउव्विहं, णिरयगदिपाओग्गाणुपुव्वीणामं तिरिक्ख-गदिपाओग्गाणुपुव्वीणामं मणुसगदिपाओग्गाणुपुव्वीणामं देवगदिपाओग्गाणुपुव्वीणामं चेदि।।४१।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यस्य कर्मण: उदयेन निरयगतिं गतस्य जीवस्य विग्रहगतौ वर्तमानस्य नरकगतिप्रायोग्यसंस्थानं भवति तन्नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वीनाम। एवं शेषानुपूर्वीणाम् अपि अर्थो ज्ञातव्य:।
आसां लक्षणं अन्यत्रापि कथितं-‘‘यदा छिन्नायुर्मनुष्यस्तिर्यग्वा पूर्वेण शरीरेण वियुज्यते तदैव नरकभवं प्रत्यभिमुखस्य तस्य पूर्वशरीरसंस्थानानिवृत्तिकारणं विग्रहगतावुदेति तन्नरकगतिप्रायोग्यानुव्र्यंनाम।’’
संप्रति अगुरुलघु आदिप्रकृतीनां नामकथनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-अगुरुअ-लहुअणामं उवघादणामं परघादणामं उस्सासणामं आदावणामं उज्जोवणामं।।४२।।
जं तं विहायगदिणामकम्मं तं दुविहं, पसत्थविहायगदी अप्पसत्थ-विहायगदी चेदि।।४३।।
तसणामं थावरणामं बादरणामं सुहुमणामं पज्जत्तणामं, एवं जाव णिमिण-तित्थयरणामं चेदि।।४४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीकासूत्राणामर्थ: सुगमो वर्तते। उपर्युक्तकथिता: प्रकृतय: द्वाचत्वािंरशत्पिंडप्रकृतय: आसन्। इमा: अगुरुलघ्वादिभेदरहिता: एतासां पिंडप्रकृतित्वाभावात्। यस्य कर्मण: उदयेन जीवानां सिंहकुंजरवृषभाणां इव प्रशस्ता गतिर्भवेत् सा प्रशस्तविहायोगति:। तद्विपरीता: खरोष्ट्रशृगालानां इव अप्रशस्ता गतिर्भवेत् सा अप्रशस्तविहायोगति:। शेषाणामर्थ: ज्ञात एव।
एवं अष्टमस्थले नामकर्मणां पिंडापिंडप्रकृतीनां नामकथनमुख्यत्वेन अष्टादश सूत्राणि गतानि।
अधुना गोत्रकर्मभेदप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-गोदस्स कम्मस्स दुवे पयडीओ, उच्चागोदं चेव णीचागोदं चेव।।४५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-गोत्रं कुलं वंश: संतानमित्येकोऽर्थ:। ‘यस्योदयाल्लोकपूजितेषु कुलेषु जन्म तदुच्चैर्गोत्रम्। यदुदयाद् गर्हितेषु कुलेषु जन्मतन्नीचैर्गोत्रम्।’’
एवं नवमस्थले गोत्रकर्मभेदप्रतिपादनत्वेन सूत्रमेकं गतम्।
अन्तरायकर्मण: भेदप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-अंतराइयस्स कम्मस्स पंच पयडीओ, दाणंतराइयं लाहंतराइयं भोगंतराइयं परिभोगंतराइयं वीरियंतराइयं चेदि।।४६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यस्य कर्मण: उदयेन दानं ददानस्य विघ्नं भवति तद् दानान्तरायं। यस्योदयेन लाभं विघ्नं भवति तल्लाभांतरायं। यस्योदयेन भोगस्य विघ्नं भवति तद् भोगान्तरायं। सकृद् भुज्यते इति भोग: तांबूल-अशनपानादि:। यस्योदयेन परिभोगस्य विघ्नं भवति तत्परिभोगान्तरायं। पुन: पुन: परिभुज्यते इति परिभोग:, स्त्रीवस्त्राभरणादि:। यस्य कर्मण: उदयेन वीर्यस्य विघ्नं भवति तद्वीर्यान्तरायं नाम। वीर्यं बलं शक्तिरित्येकोऽर्थ:।
अन्यत्र च-‘‘यदुदयात् दातुकामोऽपि न प्रयच्छति, लब्धुकामोऽपि न लभते, भोत्तुमिच्छन्नपि न भुंक्ते, उपभोत्तुमभिवांछन्नपि नोपभुंत्ते, उत्सहितुकामोऽपि नोत्सहते, त एते अन्तरायस्य पंच भेदा: भवन्ति।’’
इत्थं अष्टविधकर्मणां अष्टचत्वािंरशत् अधिक-शतानि भेदा: भवन्ति।उक्तं च-‘‘तं पुण अट्ठविहं वा अडदालसयंअसंखलोगं वा।’’
अत्र प्रकृतिसमुत्कीर्तनचूलिकायां अष्टचत्वािंरशत्अधिकशतभेदा: वर्णिता: सन्ति। एतेषां प्रत्येककर्मणां असंख्यातलोकप्रमाणा भेदा: भवितुं शक्नुवन्ति इति ज्ञातव्यं।
एवं दशमस्थले अन्तरायकर्मभेदकथनत्वेन एकं सूत्रं गतम्।
एतानि सर्वाणि कर्माणि यै: निर्मूलितानि शुक्लध्यानकुठारेण अस्मिन् पावागिरिसिद्धक्षेत्रे पावनपर्वतमस्तके, ताभ्यां अष्टमबलभद्ररामचन्द्रमहापुरुषस्य पट्टमहिषी महासतीसीताया: पुत्राभ्यां अनंगलवण-मदनांकुशाभ्यां लाडनरेन्द्रादिपंचकोटिप्रमितमहासाधुभ्यश्च अस्माकं कोटिश: नमोनमोऽस्तु।
रामसुआ वेण्णिजणा लाडणिंरदाण पंचकोडीओ।
पावागिरिवरसिहरे णिव्वाणगया णमो तेसिं।।
अत्र पावागढनिर्वाणक्षेत्रे मार्गशीर्षशुक्लाष्टम्यां घोषितनवनिर्माणरचनायां निर्माधीना: चतुर्विंशति-तीर्थंकरसमन्वितह्रीं प्रतिमा श्रीऋषभदेव-महावीरस्वामिप्रतिमे द्वे सिद्धार्थक्षुल्लकेन अध्ययनरतौ लवकुशबालकौ महासती सीता चान्या अपि प्रदर्शिन्यादय: सर्वजगति मंगलं कुर्वन्तु आकर्षणकेन्द्रं च भवन्तु इदं पावनक्षेत्रं सर्वेषां क्षेमाय भवतु इति।
इति श्रीमद्भगवत् पुष्पदन्तभूतबलिप्रणीतषट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डे षष्ठ ग्रन्थे श्रीमद्भूतबलिसूरि-विरचितायां जीवस्थाने चूलिकायां श्रीमद्वीरसेनाचार्यकृतधवलाटीकाप्रमुखनानाग्रन्था-धारेण विरचितायां विंशतितमे शताब्दौ प्रथमाचार्यचारित्रचक्रवर्तीश्रीशांतिसागरस्य प्रथमपट्टाधीश: श्रीवीरसागराचार्य: तस्य शिष्या जंबूद्वीपरचनाप्रेरिका गणिनीज्ञानमतीकृतसिद्धान्तचिंतामणिटीकायां प्रकृति-समुत्कीर्तननाम प्रथमोऽधिकार: समाप्त:।


अब वर्ण, गंध, रस, स्पर्श नामकर्मों के भेदों को सूचित करने के लिये चार सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

जो वर्ण नामकर्म है वह पाँच प्रकार का है-कृष्णवर्ण नामकर्म, नीलवर्ण नामकर्म, रुधिरवर्ण नामकर्म, हारिद्रवर्ण नामकर्म और शुक्लवर्ण नामकर्म।।३७।।

जो गंध नामकर्म है वह दो प्रकार का है-सुरभिगंध और दुरभिगंध।।३८।।

जो रस नामकर्म है वह पाँच प्रकार का है-तिक्त नामकर्म, कटुक नामकर्म, कषाय नामकर्म, आम्ल नामकर्म और मधुर नामकर्म।।३९।।

जो स्पर्श नामकर्म है वह आठ प्रकार का है-कर्कश नामकर्म, मृदु नामकर्म, गुरुक नामकर्म, लघुक नामकर्म, स्निग्ध नामकर्म, रूक्ष नामकर्म, शीत नामकर्म और उष्ण नामकर्म।।४०।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-जिस कर्म के उदय से शरीर के पुद्गलों का वर्ण काला उत्पन्न होता है वह कृष्णवर्ण नामकर्म है। इसी प्रकार शेष वर्णों के भी जानना चाहिये। सुगंध और दुर्गन्ध कर्म के भेद भी ऐसे ही जानना और रस तथा स्पर्श के भेद भी ऐसे ही मानना चाहिये।

अब आनुपूर्वी के भेदों का प्रतिपादन करने के लिये सूत्र अवतार लेता है-

सूत्रार्थ-

जो आनुपूर्वी नामकर्म है वह चार प्रकार का है-नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी नामकर्म, तिर्यंचगतिप्रायोग्यानुपूर्वी नामकर्म, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी नामकर्म और देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी नामकर्म।।४१।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-जिस कर्म के उदय से नरकगति को प्राप्त हुये जीव के विग्रहगति में वर्तमान अवस्था में नरकगति के योग्य संस्थान होता है वह नरकगति प्रायोग्यानुपूर्वी नामकर्म है। इसी प्रकार शेष आनुपूर्वी कर्मों का भी अर्थ कहना चाहिये। इनका लक्षण अन्यत्र-तत्त्वार्थवार्तिक ग्रन्थ में भी कहा है-जिस समय मनुष्य या तिर्यंच अपनी आयु को समाप्त करके पूर्व शरीर को छोड़कर नरकगति के अभिमुख होता है उस समय विग्रहगति में उसके उदय तो नरकगत्यानुपूर्वी का होता है, परन्तु नये शरीर के ग्रहण करने के पूर्व तक उस समय विग्रहगति में आत्मा के प्रदेशों का आकार पूर्व शरीर के अनुसार मनुष्य या तिर्यंच का बना रहता है, यह नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी नामकर्म है।

अब अगुरुलघु आदि प्रकृतियों के नाम को कहने के लिये तीन सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

अगुरुलघु नामकर्म, उपघात नामकर्म, परघात नामकर्म, उच्छ्वास नामकर्म, आतप नामकर्म और उद्योत नामकर्म।।४२।।

जो विहायोगति नामकर्म है वह दो प्रकार का है-प्रशस्तविहायोगति नामकर्म और अप्रशस्तविहायोगति नामकर्म।।४३।।

त्रस नामकर्म, स्थावर नामकर्म, बादर नामकर्म, सूक्ष्म नामकर्म, पर्याप्त नामकर्म इनको आदि लेकर निर्माण और तीर्थंकर नामकर्म तक नामकर्म की प्रकृतियाँ हैं।।४४।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-इन सूत्रों का अर्थ सुगम है। उपर्युक्त ‘कथित प्रकृतियाँ बयालीसपिंड प्रकृतियाँ हैं’। ये अगुरुलघु आदि प्रकृतियाँ भेद रहित हैं क्योंकि इनमेंपिंड प्रकृतिपने का अभाव है।

जिस कर्म के उदय से जीवों की सिंह, हाथी, बैल आदि के समान प्रशस्त गति होती है वह प्रशस्तविहायोगति नामकर्म है। इससे विपरीत जिनकी गर्दभ, ऊँट और सियार के समान अप्रशस्तगति होती है वह अप्रशस्त विहायोगति नामकर्म है। शेष प्रकृतियों का अर्थ ज्ञात ही है।

विशेषार्थ-जो ४४वें सूत्र में ‘पर्याप्त’ नामकर्म तक कहकर आदि शब्द लिखा है उससे अपर्याप्त, प्रत्येकशरीर, साधारण शरीर, स्थिर-अस्थिर, शुभ-अशुभ, सुभग-दुर्भग, सुस्वर-दु:स्वर, आदेय-अनादेय, यश:कीर्ति और अयश:कीर्ति प्रकृतियों को लेना है। पूर्व में २८वें सूत्र में इन सभी प्रकृतियों के नाम आ चुके हैं फिर भी यहां कहने से पुनरुक्त दोष नहीं आता है क्योंकि ये सूत्रकथित प्रकृतियांपिंड प्रकृतियां भी हैं, ऐसा समझना चाहिये।

सूत्र २८ में पिंड प्रकृतियां बयालीस मानी हैं। पुन: सूत्र २९ से लेकर सूत्र ४४ तक गति आदि प्रकृतियों के भेद को कहते हुए नामकर्म के तिरानवे (९३) भेद कहे हैं अत: भेद न करने से-पिंडरूप से कहने से बयालीस प्रकृतियां हैं तथा भेद करने से तिरानवे प्रकृतियां हैं।

इस प्रकार आठवें स्थल में नामकर्म की पिंड-अपिंड प्रकृतियों के नाम कथन की मुख्यता से अठारह सूत्र पूर्ण हुये हैं।

अब गोत्रकर्म के भेदों का कथन करने के लिये सूत्र अवतार लेता है-

सूत्रार्थ-

गोत्रकर्म की दो प्रकृतियां हैं-उच्चगोत्र और नीचगोत्र।।४५।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-गोत्र, कुल, वंश और संतान ये पर्यायवाची शब्द हैं। जिस कर्म के उदय से लोक पूजित कुलों में जन्म होता है वह उच्चगोत्र है। जिस कर्म के उदय से लोकगर्हित कुलों में जन्म होता है वह नीचगोत्र है। ऐसा सर्वार्थसिद्धि ग्रन्थ में पूज्यपाद स्वामी ने कहा है।

इस प्रकार नवमें स्थल में गोत्रकर्म के भेद का प्रतिपादन करते हुये एक सूत्र पूर्ण हुआ।

अब अंतराय कर्म के भेद का प्रतिपादन करने के लिये सूत्र अवतार लेता है-

सूत्रार्थ-

अन्तरायकर्म की पांच प्रकृतियां हैं-दानान्तराय, लाभान्तराय, भोगान्तराय, परिभोगान्तराय और वीर्यान्तराय कर्म।।४६।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-जिस कर्म के उदय से दान को देते हुये जीव के विघ्न होता है वह दानान्तराय कर्म है। जिस कर्म के उदय से लाभ में विघ्न आ जाता है वह लाभान्तराय कर्म है। जिस कर्म के उदय से भोग में विघ्न आ जाता है वह भोगान्तराय कर्म है। जो वस्तु एक बार भोग में आती है वह भोग है जैसे तांबूल, भोजन, पान आदि। जिस कर्म के उदय से परिभोग में विघ्न आ जाता है वह ‘परिभोगान्तराय कर्म’ है। जो वस्तु पुन:-पुन: भोग में काम आती है वह परिभोग है जैसे-स्त्री, वस्त्र, आभूषण आदि। जिस कर्म के उदय से वीर्य में विघ्न आता है वह वीर्यान्तराय कर्म है। यहाँ वीर्य, बल और शक्ति ये एकार्थवाची हैं।

अन्यत्र-सर्वार्थसिद्धि में श्री पूज्यपादस्वामी ने भी कहा है-

जिसके उदय से यह जीव देने की इच्छा रखते हुये भी नहीं दे पाता है, लाभ लेने की इच्छा होते हुये भी नहीं लाभ मिलता है, भोगने की इच्छा-खाने आदि की इच्छा होते हुये नहीं भोग कर पाता है, उपभोग की इच्छा होते हुये भी उपभोग नहीं कर पाता है, उत्साह रखते हुये भी उत्साहित नहीं हो पाता है, ये सब अन्तराय के पाँच भेद होते हैं।

इस तरह आठ प्रकार के कर्मों के एक सौ अड़तालीस भेद होते हैं।

कहा भी है-वह कर्म आठ भेदरूप है अथवा एक सौ अड़तालीस भेदरूप है, अथवा असंख्यात लोकप्रमाण भेदरूप होते हैं।

यहाँ प्रकृतिसमुत्कीर्तन चूलिका में एक सौ अड़तालीस भेद वर्णित किये गये हैं। इन प्रत्येक कर्मों में असंख्यात लोकप्रमाण भेद हो सकते हैं, ऐसा जानना चाहिये।

इस प्रकार दसवें स्थल में अन्तराय कर्म के भेद को कहते हुये एक सूत्र पूर्ण हुआ।

इस अधिकार का अन्त्यमंगल -

इस पावागिरि सिद्धक्षेत्र के पावन पर्वत के मस्तक पर-अग्र भाग पर जिन्होंने शुक्लध्यानरूपी कुठार के द्वारा इन सभी कर्मों को निर्मूल किया है, उन आठवें बलभद्र श्री रामचन्द्र महापुरुष की पट्टरानी महासती सीता के पुत्र-अनंगलवण और मदनांकुश को तथा लाडनरेन्द्र आदि पांच करोड़ प्रमाण महामुनियों को हमारा कोटि-कोटि नमस्कार हो, नमस्कार हो।

प्राकृत निर्वाण भक्ति में कहा है-श्री रामचन्द्र के दो पुत्र और लाडनरेन्द्र आदि पांच करोड़ महामुनियों ने पावागिरिवर शिखर से निर्वाण को प्राप्त किया है। उन सबको हमारा नमस्कार होवे।।

वर्तमान में ‘पावागढ़’ नाम से प्रसिद्ध इस निर्वाण क्षेत्र पर आकर दर्शन करके मैंने मगसिर शुक्ला अष्टमी के दिन घोषित किया था कि यहाँ पर चौबीसों तीर्थंकर से समन्वित ‘ह्रीं’ प्रतिमा विराजमान होंगी (जोकि वहाँ विराजमान की जा चुकी हैं) तथा भगवान ऋषभदेव एवं भगवान महावीर स्वामी की दो प्रतिमायें विराजमान हों और महासती सीता के पुत्र लवण, अंकुश इनको अध्ययन कराते हुये सिद्धार्थ क्षुल्लक आदि अन्य भी प्रदर्शनी बनायी जावें। यह तीर्थ और ये प्रतिमायें सर्वजगत् में मंगल करें, आकर्षण का केन्द्र बनें। पुनरपि यह पावन तीर्थक्षेत्र सभी के क्षेम-कल्याण के लिये होवे, यही मेरी भावना है।

इस प्रकार श्रीमद् भगवान पुष्पदन्त-भूतबलि प्रणीत षट्खण्डागम के प्रथम खण्ड में श्रीमान भूतबलि आचार्य द्वारा विरचित जीवस्थान चूलिका में श्रीमान् वीरसेनाचार्य कृत धवलाटीकाप्रमुख अनेक ग्रन्थों के आधार से, बीसवीं सदी के प्रथमाचार्य चारित्रचक्रवर्ती श्री शांतिसागर गुरुदेव के प्रथम पट्टाधीश श्री वीरसागराचार्य, उनकी शिष्या जम्बूद्वीप रचना की प्रेरिका मुझ गणिनी ज्ञानमतीकृत सिद्धान्तचिंतामणि टीका में प्रकृतिसमुत्कीर्तन नाम का यह प्रथम अधिकार पूर्ण हुआ।