ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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02. राम—सीता का विवाह

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राम—सीता का विवाह

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(६)

क्या समय रहा होगा वह भी, जब रचा स्वयंवर सीता का।
कितने ही विद्याधर आये, आया समूह राजाओं का ।।
पर रामचंद्र सा दिव्यपुरुष, उस राज्य सभा में कोई नहीं।

जो देवों से रक्षित—पूजित, वह धनुष तोड़ दे शक्ति नहीं।।
(७)

जो धनुष हिला न सके कोई, उसको रघुवर ने पलभर में।
हाथों में ऐसे उठा लिया,हो पुष्पमाल जैसे कर में।।
नभ से देवों ने पुष्पवृष्टि, करके उनका सम्मान किया।

सीता ने माला पहनाकर, उनको अपना वर मान लिया।।
(८)

लक्ष्मण ने भाई की आज्ञा से, दूसरा धनुष भी चढ़ा दिया ।
तब अठारह कन्याओं संग, उनका भी उस क्षणब्याह हुआ।।
यह दृश्य देखकर भ्रात भरत का, मुखमंडल कुछ म्लान हुआ ।

राजा दशरथ ने जब देखा, अगले दिन उनका ब्याह किया।।
(९)

तीनों भाई निज भार्यासंग, इस तरह सुशोभित होते थे।
सब देव—देवियाँ शरमाएँ, विद्याधर लज्जित होते थे।।
फिर मात पिता ने यथायोग्य,शिक्षा दे सबको विदा किया ।

श्री रामलखन के गुण गाकर, सबने निजपुर प्रस्थान किया।।
(१०)

अब सुनो हाल भामंडल का, सीता वियोग में डूबे थे।
सेना लेकर चल दिए युद्ध, करने को राम जहाँ पर थे।।
पर थोड़ी दूर चले ही थे, कुछ देख स्मरण हो आया।

मूच्र्छित होकर गिर पड़े वहीं, लेकिन जब होश उन्हें आया।।
(११)

पितु की गोदी में सिर रखकर, लज्जायुत होकर रुदन किया।
ये कैसा पाप हुआ मुझसे, जो बहन पे मैं आसक्त हुआ।।
फिर अपनी पिछली घटनायें, पितु के समक्ष दुहरायी थी।

कैसे मेरा अपहरण हुआ, कैसे दूजी माँ पायी थी।।
(१२)

जब सीता को ये पता चला, तब भ्रात मिलन को तड़प उठो।
श्री रामचंद्र ने समझाया, अब शोक करो मत वैदेही।।
हम सुप्रभात के होते ही, उससे मिलने को जायेंगे।

वह है उद्यान महेंद्रोदय, जहाँ भ्रात तुम्हारे आयेंगे ।।
(१३)

जब पहुंचे थे उस उपवन में, क्या देखा वहाँ नजारा था।
श्री चंद्रगति विद्याधर ने, मुनिवेष तुरत ही धारा था ।।
निजसुत के पिछले भव सुनकर, वैराग्य उन्हें हो आया था।

श्री सर्वभूतहित मुनिवर का ,तब संघ वहाँ पर आया था।।
(१४)

सीता भाई से लिपट गयी, अंखियों से अश्रूधार बही।
और तभी जनक राजा आये ,सुत को लक्ष्मण मूच्र्छित हुए वहीं।।
ये भ्रात—पुत्र का मिलन देख, सब जन का हृदय विभोर हुआ।

फिर भामंडल सबको लेकर, प्रस्थान पुरी की ओर किया ।।