ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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02. संज्ञा

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संज्ञा

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सुमित्र - पिताजी! आज मैंने मुनि महाराज जी के उपदेश में सुना है कि संसारी जीवों को चार संज्ञारूपी ज्वर चढ़ा हुआ है। सो ये संज्ञायें क्या हैं?

पिताजी - बेटा! जिनसे संक्लेशित होकर और जिनके विषय का सेवन करके यह जीव दोनों जन्म में दु:ख उठाता है, उन्हें संज्ञा कहते हैं। ये चार हैं-आहार, भय, मैथुन और परिग्रह।

असाता वेदनीय के तीव्र उदय या उदीरणा होने से इस जीव को जो भोजन की वांछा होती है, वह आहार संज्ञा है। भय कर्म का तीव्र उदय या उदीरणा से जो भाग जाने, छिपने आदि की इच्छा होती है, वह भय संज्ञा है। वेद कर्म का तीव्र उदय या उदीरणा आदि से तथा विट पुरुषों की संगति आदि से जो काम सेवन की इच्छा होती है, वह मैथुन संज्ञा है। लोभ कर्म के तीव्र उदय या उदीरणा से वस्त्र, स्त्री, धन, धान्य आदि परिग्रह को ग्रहण करने की व उनके अर्जन आदि की इच्छा है या उनमें जो ममत्व परिणाम है, वह परिग्रह संज्ञा है।

सुमित्र - ये संज्ञाएँ हम लोगों में तो हैं किन्तु एकेन्द्रिय जीवों में नहीं दिखती हैं, इसलिए वे जीव तो हम लोगों की अपेक्षा बहुत सुखी होंगे?

पिताजी - नहीं बेटा! उनमें भी ये चारों संज्ञाएं हैं। देखो, वृक्ष में भोजन की इच्छा है। यदि खाद, पानी, हवा आदि न मिले तो वे सूख जाते हैं अर्थात् मर जाते हैं। भय भी है, लाजवंती का झाड़ छूते ही सिकुड़ जाता है। यदि वृक्ष की जड़ के पास धन गाड़ दिया जावे तो जड़ उसी तरफ को अधिक फैल जाती है। ये बातें शास्त्र में लिखी हैं। इसके अतिरिक्त एकेन्द्रिय जीवों का दु:ख आदि हमें दिखता नहीं है, फिर भी हम लोगों की अपेक्षा उनको बहुत अधिक दु:ख होता है, ऐसा शास्त्रों मेें जिनेन्द्र भगवान ने कहा है। मनुष्यों की संज्ञाएं नष्ट हो सकती हैं और वे महापुरुष भगवान् बन सकते हैं। हमें भी इन संज्ञाओं को घटाने का प्रयत्न करना चाहिए।