ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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022.तारंगा सिद्धक्षेत्र दर्शन

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तारंगा सिद्धक्षेत्र दर्शन

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क्रम-क्रम से चलते हुए संघ तारंगा पहुँचा। वहाँ किसी कारणवश सामान की ट्रक व बस बाहर ही रह गई। साधुवर्ग तो पदविहारी थे यथासमय तारंगा क्षेत्र के मंदिर में पहुँच गये। जिनप्रतिमाओं का दर्शन कर धर्मशाला में विश्राम करने लगे किन्तु समय पर श्रावकगण नहीं आ पाये। धीरे-धीरे कुछ ब्रह्मचारी, ब्रह्मचारिणियाँ अपने-अपने सिर पर कुछ सामान लेकर आये। वहाँ धर्मशाला में चौका लगाया। मध्याह्न सामायिक के अनंतर लगभग तीन बजे साधु साध्वियाँ आहार को निकले तब एक-एक व्यक्ति ने दो-दो, तीन-तीन साधुओं को एक साथ आहार दिया। सभी के मन में सिद्धक्षेत्र की वंदना की उमंग थी अतः किन्हीं ने भी इसे दुःखद नहीं माना, सभी प्रसन्नचित्त ही रहे। वहाँ छोटे से पर्वत पर चढ़कर सिद्धभूमि की वंदना की। जीवन में साधुओं की साधना का पथ यही है, ऐसा प्रतीत हुआ।

तारंगा सिद्धक्षेत्र-

‘‘वरदत्तो य वरंगो, सायरदत्तो य तारवरणयरे।
आहुट्ठयकोडीओ, णिव्वाणगया णमो तेसिं।।’’

इस तारवर नगर से वरदत्त, वरांग, सागरदत्त आदि साढ़े तीन करोड़ मुनियों ने निर्वाण प्राप्त किया है, उन सबको मेरा नमस्कार होवे। इस नगर के तारानगर, तारापुर, तारागढ़ और तारंगा आदि नाम मिलते हैं। भट्टारक ज्ञानसागर, देवेंद्रकीर्ति और सुमतिसागर ने अपने स्तोत्र आदि में तारंगा के ऊपर कोटिशिला होने का उल्लेख किया है। वर्तमान में एक पहाड़ का नाम यहाँ कोटिशिला है। कोटिशिला से अभिप्रेत वह कोटिशिला शायद यह नहीं है। जिसे नारायण उठाते हैं। वह तो कलिंग देश में मानी है।

तारंगा पर्वत की तलहटी मेें एक कोट बना हुआ है, जिसके भीतर दिगम्बर जैन धर्मशाला, मंदिर और कार्यालय है। धर्मशाला के पृष्ठ भाग में कोटिशिला पर्वत पर जाने के लिए पक्का मार्ग है। यहाँ से जाकर कोटिशिला के टोंकों की वंदना करके उतरकर कुंड पर होते हुये तारंगा के दूसरे पर्वत सिद्धशिला पर चढ़ते हैं। इन दोनों पर्वतों पर लगभग ९०० वर्ष प्राचीन प्रतिमायें विद्यमान हैं। नीचे तलहटी में दिगम्बर जैन मंदिर १३ हैं तथा १ मानस्तंभ है।

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गिरनार सिद्ध क्षेत्र-

यहाँ से विहार करके संघ फाल्गुन सुदी में गिरनार पहुँच गया तब सभी के हर्ष का पार नहीं रहा। जिनके दर्शनों के लिए तीन महीने लगातार पद विहार करते हुए हम लोग चल रहे थे आज यहाँ आकर मनोकामना सिद्ध हो गई। गिरनार विहार के समय आचार्यश्री ने एक मंत्र दिया था। साथ ही सभी साधुओं को कहा था कि मार्ग में चलते समय प्रतिदिन निर्विघ्न यात्रा की भावना से ‘ॐ ह्रीं श्री अरिष्टनेमिनाथाय नमः’ यह मंत्र जपते रहो। गुरु की आज्ञानुसार मैंने यह मंत्र सवालाख से भी अधिक जपा था। रास्ता चलते समय प्रायः इस मंत्र को मन-मन में जपती ही रहती थी। सिद्ध क्षेत्र गिरनार पर्वत की वंदना करने तक मैंने नमक का त्याग कर दिया था और भी कई वस्तुएँ त्याग कर दी थीं। वास्तव में साधु के पास आहार में कुछ रसादि के त्याग के सिवाय और त्याग करने के लिए है ही क्या?

फाल्गुन शु.७ को पहली वंदना हम लोगों ने की। सभी सीढ़ियों को पार कर क्रम-क्रम से भगवान नेमिनाथ के चरणों के निकट पहुँचे। वहाँ पर बैठकर विधिवत् सिद्धभक्ति, चारित्रभक्ति, श्रुतभक्ति, निर्वाणभक्ति और शांतिभक्ति पढ़कर प्रभु के चरणों में बार-बार वंदन किया और सिद्धपद की याचना करते हुये अंत में समाधिभक्ति पढ़कर पुनः वंदना की आशा लिये हुये हम लोग नीचे धर्मशाला में आये। उस दिन मध्यान्ह में ३-४ बजे के लगभग आहार हुआ। इतनी थकान महसूस हुई कि अगले दिन वंदना के लिए ऊपर चढ़ने की हिम्मत नहीं हो पाई। पुनः सभी साधुओं के साहस को देखकर तीसरे दिन फिर चढ़ी, तब मैंने यह निश्चय कर लिया कि कुछ भी हो आज चौथी टोंक पर चढ़ना ही है। चौथी टोंक पर चढ़ने के लिए प्रायः सभी डरते थे और दूसरों को डर भी दिखाते थे। कुछ साधु नीचे से किसी का सहारा लेते, कुछ ऊपर से हाथ पकड़ते, तभी चढ़ते बनता था। मैंने भी भगवान् का नाम स्मरण करते हुए, साहस कर बिना किसी के सहारे ही जिस-तिस किसी पत्थरों को पकड़कर चढ़ने का उपक्रम किया और सफल भी हो गई। तब मेरी खुशी का पार नहीं रहा पुनः मैंने साहस कर ऊपर से ही आर्यिका वीरमती माताजी का हाथ पकड़कर खींचकर उन्हें ऊपर चढ़ा लिया पुनः आर्यिका सिद्धमती, क्षुल्लिका चंद्रमती, क्षुल्लिका पद्मावती आदि को भी चढ़ा लिया। सबने वहाँ वंदना कर अपने जीवन को धन्य माना। इस तरह आष्टान्हिका में प्रतिदिन मैंने उस गिरिराज की वंदना की। मैंने चौथी टोंक सहित सात वंदनाएं, कीं प्रथम वंदना चौथी टोंक की छोड़कर की थी।

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दीक्षायें संपन्न-

तारंगा से निकलते ही आचार्यश्री शिवसागरजी ने मुझसे कई बार कहा था कि- ‘‘ज्ञानमतीजी! मैं गिरनार सिद्धक्षेत्र पर सर्वप्रथम बाल ब्रह्मचारियों को दीक्षा देना चाहता हूँ अतः आप ब्र.राजमलजी को तैयार करो और क्षुल्लिका जिनमती जी को तैयार करो। अथवा इन दोनों में से किसी एक को तो तैयार कर ही दो।’’ ब्र. राजमलजी प्रायः मेरी विनय भक्ति विशेष करते थे। अनेक बार धीरे-धीरे मार्ग में चलने से ये कभी-कभी मेरे साथ कमंडलु लेकर चला करते थे। गिरनार क्षेत्र की यात्रा के समय आचार्यश्री महावीरकीर्तिजी ने इनसे कहा था कि ब्रह्मचारी जी! मार्ग में तुम ज्ञानमती माताजी की व्यवस्था में ध्यान रखना। यही कारण था कि आचार्यश्री शिवसागरजी ने इनको दीक्षा की प्रेरणा देने के लिए मुझसे कई बार कहा था। आचार्यश्री की इच्छानुसार मैंने दोनों को पृथक-पृथक बहुत ही समझाया किन्तु न ब्र. राजमलजी ही तैयार हुये और न क्षुल्लिका जिनमती ही। ब्रह्मचारी जी तो बार-बार यही कहते- ‘‘माताजी! मेरे गुरुदेव आचार्यश्री वीरसागरजी महाराज तो चले गये। अब मैं किसी से दीक्षा लेकर किसी को गुरु नहीं बनाऊँगा।’’ जिनमती जी प्रायः केशलोच से हिचकिचा रही थीं। ब्र. राजमलजी से बार-बार आचार्य महाराज भी कहते मुनि श्रुतसागरजी आदि भी कहते, अन्य आर्यिकायें भी कहतीं किन्तु वे हंसकर टाल देते थे। परन्तु जिनमती जी को बार-बार प्रेरणा देने से वे उद्विग्न हो उठतीं, अतः उनसे पुनः-पुनः कहना छोड़ दिया गया। क्षुल्लिका चन्द्रमती जी और क्षुल्लिका पद्मावती जी आर्यिका दीक्षा लेना चाहती थीं। उन्हीं दोनों की दीक्षा का निर्णय लिया गया। इसी बीच एक ब्रह्मचारी जी भी मुनि दीक्षा चाहते थे किन्तु आपस की परामर्श के अनुसार उन्हें योग्य पात्र नहीं समझा गया क्योंकि वे प्रायः नौकरों की संगति में अधिक बैठते थे। इन दोनों क्षुल्लिकाओं की आर्यिका दीक्षायें हुर्इं तथा ब्र. रूपाबाई की क्षुल्लिका दीक्षा हुई, उनका नाम राजुलमती रखा गया। मैं गिरनार पर्वत की वंदना के मध्य दो-तीन बार रात्रि में ऊपर मंदिर में भी ठहरी थी। मेरे साथ क्षुल्लिका चंद्रमती, पद्मावती आदि रही थीं। आहार के बाद सामायिक करके ऊपर जाकर मंदिर में विश्राम करती, प्रातः उठकर पूरी वंदना करके नीचे आ जाती। इसमें थकान कम होती| गिरनार क्षेत्र के दर्शन में तीन बातें विशेष स्मरणीय रही थीं।

१. भगवान् नेमिनाथ द्वारा पशुओं का बंधन छुड़ाकर वैराग्य।

२. श्रीधरसेनाचार्य के द्वारा श्रुतपरम्परा को अविच्छिन्न रखने हेतु श्री पुष्पदंत-भूतबलि मुनियों को पढ़ाया जाना।

३. श्री कुन्दकुन्ददेव की वंदना में विवाद होने पर अंबिका देवी का बोलना।

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भगवान् नेमिनाथ-

भगवान् नेमिकुमार राजीमती को ब्याहने के लिए आये थे। उस समय बड़े-बड़े मंडलेश्वर राजाओं के पुत्रों से घिरे हुए भगवान् चित्रा नाम की पालकी में आरूढ़ होकर दिशाओं का अवलोकन करने के लिए निकले। वहाँ उन्होंने घोर करुण स्वर से चिल्ला-चिल्ला कर इधर-उधर दौड़ते, प्यासे, दीनदृष्टि से युक्त तथा भय से व्याकुल पशुओं को एक बाड़े में घिरे हुए देखकर परम करुणा से आद्र्र हो रक्षकों से पूछा- ‘‘यह पशुसमुदाय यहाँ किसलिए रोका गया है?’’ उत्तर में रक्षकों ने हाथ जोड़कर कहा- ‘‘हे देव! आपके विवाहोत्सव में इनका वध करने के लिए इन्हें यहाँ बुलाया गया है।’’ यह सुनते ही भगवान् नेमिनाथ विचार करने लगे- ‘‘अहो! ये पशु जंगल में रहते हैं, तृण खाते हैं और कभी किसी का कुछ बिगाड़ नहीं करते, फिर भी लोग अपने भोग के लिए इन्हें पीड़ा पहुँचाते हैं। ऐसे लोगों को धिक्कार हो।’’ पुनः भगवान् ने अपने अवधिज्ञान से सारे रहस्य को जान लिया और तत्क्षण ही विरक्त हो वापस लौट पड़े। उसी समय स्वर्गों में घंटा, नाद आदि से लौकांतिक देव प्रभु का तप कल्याणक समय समझ कर आ गये और स्तुति करते हुए उनके वैराग्य की प्रशंसा करने लगे। तदनंतर सौधर्म इन्द्र आदि देवगण आ गये। प्रभु को देवकुरु पालकी में विराजमान कर सहस्राम्रवन में ले गये। वहाँ भगवान् ने श्रावण शुक्ला षष्ठी के दिन सायंकाल में एक हजार राजाओं के साथ जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण कर ली। तब प्रभु ने तेला का नियम लिया था। दीक्षा लेते ही प्रभु को मनःपर्ययज्ञान प्रगट हो गया। जिस प्रकार संध्या सूर्य के पीछे-पीछे अस्ताचल पर चली जाती है उसी प्रकार राजीमती भी उनके पीछे-पीछे तपश्चरण के लिए चली गई। सो ठीक ही है-क्योंकि शरीर की बात तो दूर रही, वचनमात्र से भी दी गई कुल कन्याओं का यही न्याय है।

‘संध्येव भानुमस्ताद्रावनु राजीमतिश्च तम् ।

ययौ वाचापि दत्तानां न्यायोऽयं कुलयोषिताम्१’।।१७२।।

आचार्य कहते हैं-देखो! अन्य मनुष्य तो अपने ऊपर दुःख आने पर भी विरक्त नहीं हो पाते हैं, पर जो सज्जन पुरुष होते हैं वे दूसरे के दुःख से ही विरक्त हो महाविभूति का त्याग कर देते हैं। प्रभु की दीक्षा के बाद बलभद्र, श्रीकृष्ण, सौधर्म इंद्र आदि देवगण तथा प्रमुख राजागण आदि सभी लोग अनेक स्तवनों से भगवान् की स्तुति कर अपने-अपने स्थान पर चले गये। तेला के बाद भगवान् ने द्वारावती में प्रवेश किया। वहाँ के राजा वरदत्त ने भगवान् को पड़गाहन कर नवधाभक्ति से उन्हें आहारदान दिया। ‘तभी देवों ने वहाँ बारह करोड़ रत्न बरसाए, फूल बरसाए, मंद सुगंध हवा चलने लगी, दुंदुभि बाजे बजने लगे और आपने बहुत अच्छा दान दिया है।’ ऐसी घोषणा होने लगी। इस प्रकार देवों द्वारा पंचाश्चर्यवृष्टि की गई। इस प्रकार तपस्या करते हुए भगवान् ने छप्पन दिन बिताकर रैवतक-गिरनार पर्वत पर तेला का नियम लेकर किसी बड़े से बांस वृक्ष के नीचे ध्यान लगाया और आश्विन शुक्ला एकम के दिन उन्हें केवलज्ञान प्रगट हो गया।

उसी क्षण कुबेर द्वारा निर्मित समवसरण में भगवान् अधर विराजमान हो गये। उनकी सभा में वरदत्त आदि ग्यारह गणधर थे, सब मिलाकर अठारह हजार मुनि थे। राजीमती आदि चालीस हजार आर्यिकायें थीं, एक लाख श्रावक और तीन लाख श्राविकायें थीं। असंख्यातों देव-देवियाँ और संख्यातें तिर्यंच उपस्थित होकर प्रभु का उपदेश सुनते थे। अनंतर छह सौ निन्यानवें वर्ष, नौ माह, चार दिन, विहार कर भट्टारक नेमिनाथ ने इसी गिरनार पर्वत से आषाढ़ शुक्ला सप्तमी के दिन रात्रि के प्रारंभ में मोक्ष प्राप्त कर लिया। यही कारण है कि आज भी यह गिरनार पर्वत इंद्रों द्वारा भी पूज्य है।

हरिवंश पुराण में बतलाया है कि- ‘‘भगवान् के दीक्षा ले लेने पर राजीमती कन्या अपने परिजनों के बीच रोया करती थी। छप्पन दिन बाद भगवान् को केवलज्ञान हो जाने पर समवसरण की सभा में राजा वरदत्त ने जैनेश्वरी दीक्षा लेकर प्रथम गणधर का पद प्राप्त कर लिया। उसी समय राजीमती ने छह हजार रानियों के साथ आर्यिका दीक्षा ले ली और आर्यिकाओं में प्रमुख गणिनी बन गई।’’ जैसाकि कहा है-

षट्सहस्रनृपस्त्रीभिः, सह राजीमती तदा।

प्रव्रज्याग्रेसरी जाता, सार्यिकाणां गणस्य तु२।।१४६।।

आजकल जो नेमि-राजुल संवाद बनाये जाते हैं, वे अपनी दिगम्बर परंपरा के विरुद्ध हैं क्योंकि भगवान् को वैराग्य होते ही देवों का समूह आ गया, उस समय राजीमती ने आकर भगवान् से कोई वार्तालाप नहीं किया। हाँ! मोह के उदय से होनहार तीर्थंकर पति के आकस्मिक वियोग से अत्यधिक शोकाकुल होकर उनका रोना गलत नहीं कहा जा सकता। फिर भी अनंतर उन्होंने दीक्षा लेकर बहुत बड़ा आदर्श उपस्थित किया है।

मुझे बचपन से ही राजुल के विलाप के भजनों को सुनने की अरुचि रही है पुनः एक बार क्षुल्लिका विशालमती जी ने ऐसे ही अरुचि व्यक्त की थी तब से और भी चिढ़ सी बन गई थी। वहाँ राजुल की गुफा में प्रवेश कर पूज्य गणिनी महा आर्यिका श्री राजुलमती जी के चरणों की परोक्ष में वंदना कर बार-बार मैंने यही याचना की कि- ‘‘हे मातः! आप जैसी कठोर तपश्चर्या करने की शक्ति मुझे भी प्राप्त हो और इस भव में सम्यक्त्व के प्रभाव से स्त्री पर्याय को छेदकर आगे दो-तीन भवों में मोक्ष की प्राप्ति हो, अब मुझे बार-बार जन्म-मरण के दुःख न उठाना पड़े, यही प्रार्थना है।’’

उन दिनों मेरे मन में बहुत कुछ निर्भीकता रहती थी अतः एक दिन मैंने गिरनार पर्वत की चौथी टोंक पर रात्रि में रहने की इच्छा आचार्यश्री के सन्मुख व्यक्त की। तब आचार्यश्री ने तो मना किया ही, सभी साधुओं ने एक स्वर से निषेध किया और मेरी हंसी भी खूब उड़ाई। तब मैं मन ही मन सोचने लगी-‘‘भगवन् ! ऐसे पर्वत के शिखरों पर बैठकर आत्मध्यान करने का अवसर मुझे कब प्राप्त होगा?.....प्रभो! ऐसी शक्ति और ऐसा दिन मुझे शीघ्र ही प्राप्त हो, ऐसा वरदान दीजिये।’’ बचपन में पद्मनंदिपंचविंशतिका पढ़कर मैंने ‘यतिभावनाष्टक’ याद किया था, उसका एक श्लोक प्रायः पढ़ा करती थी-

‘‘ग्रीष्मे भूधरमस्तकाश्रितशिलां मूलं तरोः प्रावृषि।

प्रोद्भूते शिशिरे चतुष्पथपदं प्राप्ताः स्थितिं कुर्वते।।
ये तेषां यमिनां यथोक्ततपसां ध्यानप्रशांतात्मनां।
मार्गे संचरतः मम प्रशमिनः कालः सदा यास्यति।।’’

हे भगवन् ! ग्रीष्मकाल में पर्वत की चोटी पर, पत्थर की शिला पर, बैठकर मैं ध्यान करूँ। वर्षाऋतु में वृक्ष के नीचे और शीतकाल में खुले मैदान में बैठकर ध्यान करूँ। हे नाथ! आगम के अनुकूल उत्कृष्ट तप करते हुए और ध्यान से अपनी आत्मा में शांति का अनुभव करने वाले, ऐसे महामुनियों के मार्ग में चलने का अवसर मुझे कब प्राप्त होगा?