ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.png
Whatsappicon.png
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें |


पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर २०१६- रविवार से सीधा प्रसारण चल रहा है | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

022. प्रथम महाधिकार - मंगलाचरण से समुदायपातनिका तक

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


विषय सूची

[सम्पादन]
षट्खण्डागम-ग्रन्थराज (प्रथम महाधिकार-मंगलाचरण से समुदायपातनिका तक)

San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
जीवस्थान-नाम-प्रथमखण्डागम:

अस्यापि प्रथमप्रकरण-सत्प्ररूपणाया:
सिद्धान्तचिन्तामणि: टीका
(गणिनी ज्ञानमती विरचिता)

[सम्पादन]
मंगलाचरणम्

1001.jpg
सिद्धान् सिद्ध्यर्थमानम्य, सर्वांस्रैलोक्यमूर्द्धगान्।

इष्ट: सर्वक्रियान्तेऽसौ, शान्तीशो हृदि धार्यते[१]।।१।।
त्रैकालिकार्हतोऽनन्तां-श्चतुर्विंशतितीर्थपान्।
सीमन्धरादितीर्थेशान्, नुम: सर्वार्थसिद्धये।।२।।
शान्ति कुन्थ्वरतीर्थेशां, हस्तिनागपुरीं स्तुम:।
गर्भजन्मतपोज्ञानै:, पूतां तांश्च विशुद्धये।।३।।
अष्टादशमहाभाषा, लघुसप्तशतान्विता।
द्वादशाङ्गमयी देवी, सा चित्ताब्जेऽवतार्यते[२]।।४।।
सर्वे वृषभसेनादि-वीरांगजान्त्यसाधव:।
तेभ्यो नमोऽस्तुनश्चामी, धर्मस्याक्षुण्णकारका:।।५।।
श्रीधरसेनमाचार्यं, श्रुताब्धे: पारगं नुम:।
सिद्धान्तज्ञानमद्यापि, यत्प्रसादाद्धि दृश्यते।।६।।
पुष्पदन्तगुरुं भक्त्या, सूरिं भूतबलिं नुम:।
षट्खण्डागमो याभ्यां, भुवि ग्रन्थोऽवतारित:।।७।।


[सम्पादन]
मंगलाचरण- हिन्दी अनुवाद

त्रैलोक्य शिखर-सिद्धशिला पर विराजमान अनन्त सिद्धपरमेष्ठियों को नमस्कार करके जो समस्त क्रियाओं के अन्त में इष्ट-विशेषरूप से मान्य-स्वीकार किए गये हैं ऐसे श्री शांतिनाथ भगवान को मैं अपने हृदय में धारण (विराजमान) करता हूँ।।१।।

विशेषार्थ-समस्त क्रियाओं के अन्त से यहाँ अभिप्राय यह है कि साधु और श्रावकों की प्रत्येक नित्य-नैमित्तिक क्रियाओं में शान्तिभक्ति करना आवश्यक होता है। श्रावकजन दैनिक पूजा के अंत में प्रतिदिन शांतिपाठ करते हैं और वृहत् पूजा विधानों के अन्त में भी शांतिभक्ति पढ़कर शांतिपाठ करने की विधि है। इसी प्रकार मुनि-आर्यिका आदि के लिए नित्य ही ‘‘अभिषेकवंदना क्रिया’’ में सिद्ध, चैत्य, पंचगुरु भक्ति के बाद शांतिभक्ति पढ़ने का विधान है तथा वृहत्सामायिक विधि से सामायिक करने पर उसमें शान्तिभक्ति करनी होती है |


इनके अतिरिक्त अष्टमी क्रिया, नन्दीश्वर क्रिया, वर्षायोग प्रतिष्ठापन-निष्ठापन क्रिया, पाक्षिक-चातुर्मासिक-सांवत्सरिक आदि प्रतिक्रमणों को करने में, साधु सल्लेखना, पंचकल्याणक आदि क्रियाओं के अंत में शांतिभक्ति आवश्यक रूप से पढ़ी जाती है। यह शांतिभक्ति भक्तों के मन में शांति प्रदान करे इसी अभिप्राय से चरणानुयोग ग्रंथों में आचार्यों ने प्रत्येक क्रिया के अन्त में शांतिभक्ति करने का विधान किया है। वही भाव दर्शाने के लिए पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी ने प्रथम मंगलाचरण श्लोक में श्री शांतिनाथ भगवान् को नमन करते हुए स्पष्ट किया है कि ‘‘जो समस्त क्रियाओं के अंत में इष्टरूप से स्वीकार किये गये हैं, ऐसे शांतिनाथ भगवान मेरे हृदय में विराजमान होवें।’’ यह भावना आत्मशान्ति की प्रतीक है। तीनों कालों में होने वाले समस्त अर्हंतों को, चौबीस तीर्थंकरों को तथा सीमंधर आदि विहरमाण बीस तीर्थंकरों की सर्व मनोरथों की सिद्धि हेतु हम वंदना करते हैं।।२।।

श्री शांतिनाथ,कुंथुनाथ, अरहनाथ तीर्थंकरों को तथा उनके गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान कल्याणकों से पवित्र हस्तिनापुर नगरी की हम आत्म विशुद्धि के लिए स्तुति करते हैं।।३।।

अठारह महाभाषा और सात सौ लघु भाषाओं से समन्वित द्वादशांगमयी जिनवाणी माता है उसको हम अपने चित्तरूपी कमल में अवतरित करते हैं।।४।।

श्री वृषभसेन गणधर मुनिराज को आदि में करके अवसर्पिणी काल के अंतिम वीरांगज नामक मुनिराज पर्यन्त समस्त मुनियों को हमारा नमोऽस्तु होवे, ये ही धर्मतीर्थ की अक्षुण्ण परम्परा को चलाने वाले हैं।।५।।

श्रुतसमुद्र के पारगामी श्री धरसेन आचार्य की हम वंदना करते हैं जिनकी कृपा प्रसाद से आज भी सिद्धान्त का ज्ञान दृष्टिगोचर हो रहा है।।६।।

जिनके द्वारा इस धरती पर षट्खण्डागम ग्रंथ का अवतार हुआ है ऐसे श्री पुष्पदंत एवं भूतबलि आचार्य गुरुवरों को हम भक्तिपूर्वक नमन करते हैं।।७।।

[सम्पादन]
श्लोक नं. ८ से १३ तक

वीरसेनमुनीन्द्रस्यो-पकारो केन वण्र्यते।

धवलाटीकया येन, भव्यान्त: धवलीकृतम्।।८।।
कलौ विंशशताब्दौ य:, प्रथमाचार्य इष्यते।
नुमश्चारित्रचक्रीशं, तं श्रीमत्शांतिसागरम्।।९।।
तस्य पट्टाधिपश्चाद्यो, गुरु: श्रीवीरसागर:।
ते नमो येन स्वल्पज्ञा, साहं ज्ञानमती कृता।।१०।।
ब्राह्मीश्रेष्ठाम्बिकादिभ्य:, सर्वश्रीसंयतान्त्यजा:।
भक्त्या वंदामहे सर्वा:, धर्मपुत्र्य इवार्यिका:।।११।।
एकादशाङ्गभृज्जाता, संयतिका सुलोचना।
नमामस्तां त्रिधा नित्यं, सिद्धान्तज्ञानलब्धये।।१२।।
षट्खण्डागमसिद्धान्तं, भक्त्यानम्य पुन: पुन:।
अस्मिन् प्रथमखण्डस्य, मया टीका विरच्यते।।१३।।

[सम्पादन]
हिन्दी अनुवाद

धवला टीका रच करके जिन्होंने भव्यों का अन्त:करण धवल-निर्मल किया है ऐसे श्री वीरसेन मुनीन्द्र के उपकार का वर्णन कौन कर सकता है ? अर्थात् उनके द्वारा किये गये परम उपकार को शब्दों में नहीं कहा जा सकता है।।८।।

इस कलिकाल की बीसवीं शताब्दी में प्रथम जैनाचार्य के रूप में प्रसिद्ध चारित्रचक्रवर्ती श्री शांतिसागर मुनिराज को हम नमस्कार करते हैं।।९।।

उन श्री शांतिसागर महाराज के प्रथम पट्टाधीश मुनिशिष्य आचार्यश्री वीरसागर गुरु को मेरा नमन है जिन्होंने मुझ अल्पज्ञानी को ‘ज्ञानमती’ नाम प्रदान किया था।।१०।।

भावार्थ - इस श्लोक में संस्कृत टीकाकर्त्री ‘गणिनी आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी’ ने अपने आर्यिका दीक्षा प्रदाता गुरुदेव को नमन किया है। सन् १९५६ में वैशाख कृष्णा द्वितीया को राजस्थान के माधोराजपुरा नगर में आचार्यश्री ने इन्हें आर्यिका दीक्षा देकर बीसवीं शताब्दी में बालब्रह्मचारिणी आर्यिकाओं की परम्परा को प्रारंभ किया था। तब से ही इस सदी में कुमारी कन्याओं ने त्यागमार्ग पर अपने कदम बढ़ाए हैं। इनसे पूर्व यह परम्परा नहीं थी। युग की आदि में जो ‘‘ब्राह्मी’’ नाम की प्रधान-गणिनी आदि आर्यिकाएँ हुई हैं तथा युग के अन्त में जो ‘‘सर्वश्री’’ नाम की संयतिका-आर्यिका होंगी, धर्मपुत्री के समान उन समस्त आर्यिकाओं की हम भक्तिपूर्वक वंदना करते हैं।।११।।

ग्यारह अंगरूप श्रुत को धारण करने वाली संयतिका आर्यिका सुलोचना को हम सिद्धान्त ज्ञान की प्राप्ति हेतु नित्य ही मन-वचन-काय पूर्वक वंदामि करते हैं।।१२।।

षट्खण्डागम सिद्धान्त ग्रंथ को पुन:-पुन: नमन करते हुए इसके प्रथमखण्ड की टीका मेरे द्वारा रची-लिखी जा रही है।।१३।।

[सम्पादन]
श्लोक नं. १४ से १७ तक

उद्धृत्योद्धृत्य टीकांशा-नाद्या या सत्प्ररूपणा।

सरलीक्रियते[३] सैषा, [४]ज्ञानद्र्धिप्राप्तयेऽचिरात्।।१४।।
ज्ञानवृद्धिं क्रियान्नित्य-मार्यिका चंदनामति:।
यस्या: प्रार्थनयेदानीं, टीका प्रारभ्यते मया।।१५।।
शारदे! तिष्ठ मच्चित्ते, यावन्न पूर्णमाप्नुयात्।
प्रारब्धकार्यमेतद्धि, तावच्छत्तिंकं च देहि मे।।१६।।
-इन्द्रवज्रा छंद-
सिद्धान्तचिंतामणिनामधेया, सिद्धान्तबोधामृतदानदक्षा।
टीका भवेत्स्वात्मपरात्मनोर्हि, वल्यलब्ध्यै खलु बीजभूता।।१७।।

[सम्पादन]
हिन्दी अनुवाद

इस ग्रंथ की टीका के अंशों को यथास्थान निकाल-निकालकर प्रथमखंड की जो सत्प्ररूपणा है, उस प्रकरण की सरल टीका मेरे द्वारा लिखी जा रही है यह शीघ्र ही मुझे ज्ञान ऋद्धि की प्राप्ति करावे।।१४।।

जिनकी प्रार्थना पर मैंने यह व्याख्या (टीका) प्रारंभ की है वे आर्यिका चन्दनामती नित्य ही ज्ञान की वृद्धि करें।।१५।।

हे सरस्वती मात:! मैंने नवीन टीका रचने का जो यह कार्य प्रारंभ किया है जब तक यह कार्य पूर्ण न होवे, तब तक आप मेरे हृदय में विराजमान रहें और मुझे शक्ति प्रदान करें ताकि यह कार्य निर्विघ्न सम्पन्न हो।।१६।।

सिद्धान्त ज्ञानरूपी अमृत को प्रदान करने में दक्ष-कुशल यह ‘‘सिद्धान्तचिंतामणि’’ नाम की टीका मुझे तथा पर-अन्य भव्यात्माओं को कैवल्य प्राप्ति के लिए बीजभूत होवे।।१७।। भावार्थ-टीकाकर्त्री ने षट्खंडागम ग्रंथ पर जिस संस्कृत टीका को रचने का संकल्प किया है उसका नाम ‘‘सिद्धान्तचिंतामणि’’ रखा है जो चिन्तामणि रत्न के समान सिद्धान्त के समस्त जिज्ञासुओं को सिद्धान्तज्ञान प्राप्त करवाने में सक्षम होगी।

[सम्पादन]
अथ पीठिका कथ्यते-



अथ सर्वेषामङ्गपूर्वाणामेकदेशज्ञानवत: श्रुतज्ञानस्याविच्छिन्नतां चिकीर्षो: महाकारुणिकस्य भगवत: श्रीधरसेनाचार्यस्य मुखकमलादधीत्य सिद्धान्ततत्त्वौ श्रीपुष्पदन्त-भूतबलि-आचार्यौ सिद्धान्तज्ञानप्राप्ति-रुचिशिष्यगण-प्रतिबोधनार्थं सिद्धपदप्रापणकारणभूत-करणानुयोगप्रमुख-सिद्धान्तविषयप्रतिपादनमुख्यत्वेन अग्रायणीयनामपूर्वस्य चयनलब्धिनामपञ्चमवस्तुन: कर्मप्रकृतिप्राभृतनामचतुर्थाधिकारान्निर्गतं जिनागमं षट्खण्डैर्विभज्य ‘‘षट्खण्डागम:’’ इत्यन्वर्थनाम कृत्वा सिद्धान्तसूत्ररूपेण लिपिबद्धं चक्रतु:।

अत्रागमे जीवस्थान-क्षुद्रकबंध-बंधस्वामित्वविचय-वेदनाखण्ड-वर्गणाखण्ड-महाबंधाश्चेति नामानि सन्ति।

तेषु षष्ठखण्डमन्तरेण पंचखण्डेषु षट्सहस्राणि सूत्राणि, षष्ठखण्डे त्रिंशत्सहस्रसूत्राणि सन्तीति श्रुतावतारे१ कथितमस्ति।

अधुना मुद्रितषोडशपुस्तकेषु पंचखण्डसूत्राणां गणना:-षट्सहस्र अष्टशत-एकचत्वािंरशत्सूत्राणि सन्ति।

तत्र प्रथमखण्डे-द्विसहस्र-त्रयशत-पञ्चसप्ततिसूत्राणि, द्वितीयखण्डे-चतुर्नवत्यधिकपंचदशशतसूत्राणि, तृतीयखण्डे-चतुर्विंशत्यधिक-त्रिशतसूत्राणि, चतुर्थखंडे-पंचविंशत्यधिकपञ्चदशशतानि, पंचमखंडे त्रयो-विंशत्यधिकएकसहस्राणि सूत्राणि वर्तन्ते।

संप्रति सिद्धान्तचिंतामणिटीकासमन्वित षोडशपुस्तकेषु पंचखंडानि दर्शयन्ति-

षट्खण्डागमनामसिद्धान्तग्रन्थस्य सिद्धान्तचिंतामणि टीकासहितानि पुस्तकानि षोडश सन्ति। एषु षोडशपुस्तकेषु मध्ये प्रथमपुस्तकादारभ्य षष्ठपुस्तकपर्यंतेषु षट्पुस्तकेषु निबद्धानां अष्टानुयोगद्वारनवचूलिकानां प्रकरणं जीवस्थानं नाम प्रथमखण्डमस्ति।

सप्तमपुस्तके क्षुद्रकबंधनाम द्वितीयखंडं, अष्टमपुस्तके बंधस्वामित्वविचयनाम-तृतीयखंडं, नवम-पुस्तकादारभ्य द्वादशपुस्तकपर्यंतचतु:षु पुस्तकेषु वेदनाखंडनाम, चतुर्थखंडं, त्रयोदशपुस्तकादारभ्य षोडशपुस्तक-पर्यंतचतु:षु पुस्तकेषु वर्गणाखंडनाम पंचमखण्डं अस्ति। इति षोडशपुस्तकेषु विभक्तानि पंच खण्डानि ज्ञातव्यानि।

[सम्पादन]
सिद्धान्तचिन्तामणि टीका-हिन्दी अनुवाद

अब पीठिका का कथन किया जा रहा है-

सभी अंग-पूर्वों के एक देश ज्ञानधारी श्रुतज्ञान को अविच्छिन्न बनाने के इच्छुक महाकरुणावान् भगवान श्री धरसेनाचार्य के मुखकमल से जिन्होंने सिद्धान्ततत्त्व का अध्ययन किया है ऐसे श्री पुष्पदंत-भूतबली आचार्यों ने सिद्धान्त ज्ञान को प्राप्त करने की रुचि वाले शिष्यों के प्रतिबोधनार्थ-ज्ञान कराने हेतु सिद्धपद प्राप्त कराने में कारणभूत, करणानुयोग प्रमुख सिद्धान्त विषयों के प्रतिपादन की मुख्यता से ‘‘अग्रायणीय’’ नामक पूर्व की ‘‘चयन लब्धि’’ नामक पंचम वस्तु के ‘‘कर्मप्रकृतिप्राभृत’’ नामक चतुर्थ अधिकार से निकालकर जिनागम को छह खण्ड के द्वारा विभक्त करके ‘‘षट्खण्डागम’’ इस सार्थक नाम को देकर सिद्धान्तसूत्ररूप से लिपिबद्ध किया था।

यहाँ आगम में जीवस्थान, क्षुद्रकबंध, बन्धस्वामित्वविचय, वेदनाखण्ड, वर्गणाखण्ड और महाबंध ये छह खण्डों के अलग-अलग नाम हैं। उनमें छठे खण्ड को छोड़कर शेष पाँच खण्डों में छह हजार सूत्र हैं तथा छठे खण्ड (महाबंध) में तीस हजार सूत्र हैं ऐसा श्रुतावतार में कहा है। आजकल की मुद्रित-प्रकाशित सोलह पुस्तकों में पाँच खण्ड के सूत्रों की गणना छह हजार आठ सौ इकतालीस है।

उसमें प्रथम खंड में दो हजार तीन सौ पिचहत्तर सूत्र हैं, द्वितीय खंड में पन्द्रह सौ चौरानवे सूत्र हैं, तृतीय खण्ड में तीन सौ चौबिस सूत्र हैं, चतुर्थ खण्ड में पन्द्रह सौ पचीस सूत्र हैं और पंचम खण्ड में एक हजार तेईस सूत्र हैं। श्रुतावतार एवं मुद्रित प्रतियों में सूत्र गणना का यह अन्तर है।

[सम्पादन] अब सोलह पुस्तकों में पाँच खण्ड दिखाते हैं-

षट्खण्डागम नामक सिद्धान्त ग्रंथ की सिद्धान्तचिंतामणि टीका सहित सोलह पुस्तके हैं। इन सोलह पुस्तकों में प्रथम पुस्तक से आरंभ करके छठी पुस्तक पर्यन्त छह पुस्तकों में निबद्ध आठ अनुयोगद्वार और नवचूलिकाओं के प्रकरण सहित ‘‘जीवस्थान’’ नाम का प्रथम खण्ड है। पुन: सप्तम पुस्तक में क्षुद्रकबंध नाम का द्वितीय खण्ड है, आठवीं पुस्तक में बन्धस्वामित्वविचय नाम का तृतीय खण्ड है, नवमीं पुस्तक से लेकर बारहवीं पुस्तक तक चार पुस्तकों में वेदनाखंड नाम का चतुर्थ खण्ड है ।तेरहवीं पुस्तक से लेकर सोलहवीं पुस्तक पर्यन्त चार पुस्तकों में वर्गणा खण्ड नाम का पंचम खण्ड है। इस प्रकार सोलह पुस्तकों में विभक्त ये पाँच खण्ड जानना चाहिए।

[सम्पादन]
इदानीं षट्पुस्तकेषु निबद्ध-प्रथमखंडस्य स्पष्टीकरणं क्रियते-

प्रथमतस्तावत्सूत्रसंख्या: निरूप्यंते-प्रथमजीवस्थाननाम्नि खंडे द्विसहस्र-त्रिशतपंचसप्ततिसूत्राणां मध्ये विशेषरीत्या पृथक्पृथक्करणे सति अष्टानुयोगद्वारेषु प्रथमसत्प्ररूपणायां सप्तसप्तत्यधिकशतसूत्राणि, द्वितीयद्रव्य-प्रमाणानुगमे द्विनवत्यधिक-शतसूत्राणि, तृतीयक्षेत्रानुगमे द्विनवतिसूत्राणि, चतुर्थस्पर्शनानुगमे पंचाशीत्युत्तरशतसूत्राणि, पंचमकालानुगमे द्वाचत्वािंरशदधिकत्रिशतसूत्राणि, षष्ठ-अन्तरानुगमे सप्तनवत्यधिकत्रिशतसूत्राणि, सप्तमभावानुगमे त्रिनवतिसूत्राणि, अष्टमाल्पबहुत्वानुगमे द्व्यशीत्यधिकत्रिशतसूत्राणि सन्तीति। पुनश्च नवचूलिकासु सूत्राणि विभज्यन्ते-प्रथम प्रकृतिसमुत्कीर्तनाचूलिकायां षट्चत्वारिंशत्सूत्राणि, द्वितीयस्थानसमुत्कीर्तनाचूलिकायां सप्तदशोत्तरशतानि, प्रथममहादण्डकनाम-तृतीयचूलिकायां द्वे सूत्रे, द्वितीयमहादण्डकनामचतुर्थचूलिकायां द्वे सूत्रे, तृतीयमहादण्डकनाम-पंचमचूलिकायां द्वे सूत्रे, उत्कृष्टस्थितिनामषष्ठचूलिकायां चतुश्चत्वारिंशत्, जघन्यस्थितिनामसप्तमचूलिकायां त्रिचत्वारिंशत्, सम्यक्त्वोत्पत्तिनाम-अष्टमचूलिकायां षोडशसूत्राणि, गत्यागतिनाम-नवमचूलिकायां त्रिचत्वािंरशदधिक-द्विशत-सूत्राणि इति अष्टानियोगद्वार-नवचूलिकानां समुदितानि द्विसहस्रत्रयशतपंचसप्ततिप्रमितानि सूत्राणि भवन्ति। संस्कृतटीकासहित षट्पुस्तकेषु मध्ये-प्रथमद्वितीययो: पुस्तकयो: सत्प्ररूपणा, तृतीयपुस्तके द्रव्यप्रमाणानुगम- क्षेत्रानुगमौ, चतुर्थपुस्तके स्पर्शन-कालानुगमौ, पंचमपुस्तके अन्तर-भाव-अल्पबहुत्वानुगमा:, षष्ठपुस्तके नवचूलिका: कथिता: सन्तीति ज्ञातव्यं भवति।

[सम्पादन]
सिद्धान्तचिन्तामणि टीका-हिन्दी अनुवाद

अब वर्तमान में छह पुस्तकों में निबद्ध प्रथम खण्ड का स्पष्टीकरण करते हैं- सबसे पहले उनके सूत्रों की संख्या निरूपित करते हैं-जीवस्थान नाम के प्रथम खण्ड में दो हजार तीन सौ पिचहत्तर सूत्रोें के मध्य में विशेष रीति से पृथक्-पृथक् करने पर आठ अनुयोग द्वारों में प्रथम सत्प्ररूपणा में एक सौ सतत्तर (१७७) सूत्र हैं, द्वितीय द्रव्यप्रमाणानुगम में एक सौ बानवे (१९२) सूत्र हैं, तृतीय क्षेत्रानुगम में बानवे (९२) सूत्र हैं, चतुर्थ स्पर्शनानुगम में एक सौ पिचासी (१८५) सूत्र हैं, पंचमकालानुगम में तीन सौ ब्यालीस (३४२) सूत्र हैं, छठे अन्तरानुगम में तीन सौ सत्तानवे (३९७) सूत्र हैं, सप्तम भावानुगम में तिरानवे (९३) सूत्र हैं, अष्टम अल्पबहुत्वानुगम में तीन सौ बयासी (३८२) सूत्र हैं। आगे पुन: नव चूलिकाओं में सूत्रों का विभाजन करते हैं- प्रथम ‘‘प्रकृति समुत्कीर्तना’’ नामक चूलिका में छियालीस (४६) सूत्र हैं, द्वितीय ‘‘स्थान समुत्कीर्तना’’ चूलिका में एक सौ सत्रह (११७) सूत्र हैं, ‘‘प्रथम महादण्डक’’ नाम की तृतीय चूलिका में दो सूत्र हैं, ‘‘द्वितीय महादण्डक’’ नाम की चतुर्थ चूलिका में दो सूत्र हैं, ‘‘तृतीय महादण्डक’’ नाम की पाँचवी चूलिका में दो सूत्र हैं, ‘‘उत्कृष्ट स्थिति’ नाम की छठी चूलिका में चवालीस (४४) सूत्र हैं, ‘‘जघन्यस्थिति’’ नाम की सातवीं चूलिका में तेतालिस (४३) सूत्र हैं, ‘‘सम्यक्त्वोत्पत्ति’’ नाम की आठवीं चूलिका में सोलह (१६) सूत्र हैं, ‘‘गत्यागति’’ नाम की नवमी चूलिका में दो सौ तेतालिस (२४३) सूत्र हैं। ये सब आठ अनुयोगद्वार एवं नौ चूलिका के कुल मिलाकर दो हजार तीन सौ पिचहत्तर (२३७५) कुल सूत्र होते हैं। संस्कृत टीका सहित छह पुस्तकों में क्रम से प्रथम और द्वितीय पुस्तक में सत्प्ररूपणा का वर्णन है, तृतीय पुस्तक में द्रव्यप्रमाणानुगम और क्षेत्रानुगम का, चतुर्थ पुस्तक में स्पर्शनानुगम व कालानुगम का, पंचम पुस्तक में अन्तरानुगम, भावानुगम और अल्पबहुत्वानुगम का एवं छठी पुस्तक में नवचूलिकाओं का वर्णन किया गया है, यह जानना चाहिए।

[सम्पादन]
इदानीं जीवस्थाननाम-प्रथमखंडस्य विषयविभाजनं क्रियते-

प्रथमपुस्तके तावत्सत्प्ररूपणायां-श्रीपुष्पदंताचार्यगुरुणा चतुर्दशगुणस्थानानि चतुर्दशमार्गणा-स्थानानि च वर्णयित्वा प्रत्येकमार्गणासु गुणस्थानापेक्षया विशेषविवरणं कृतं। अस्या: धवलाटीकायां मंगलगाथासूत्र-णमोकारमहामंत्रस्य विवेचनं, द्वादशांगश्रुतज्ञानस्योत्पत्त्यादीनां कथनं, अर्थकर्तृ-ग्रन्थकतर्¸णां सुष्ठुतया प्रतिपादनं च दृश्यते। षट्खंडागमग्रन्थस्योत्पत्तिकथानकमपि विशदरूपेण वर्तते। द्रव्यस्त्रीनपुंसकानां मोक्षाभावो भावस्त्रीवेदि-भावनपुंसकवेदिनां मोक्षोऽस्ति इति स्पष्टीकरणमपि श्रीवीरसेनाचार्येण कृतं वर्तते, सिद्धान्तापेक्षया दर्शनज्ञानयोर्लक्षणं विस्तृतमस्ति।

द्वितीयपुस्तके ‘‘गुणजीवापज्जत्ती’’ इत्यादिगाथानुसारेण विंशतिप्ररूपणाया: विवेचनं कृत्वा श्रीटीकाकारेणैव गुणस्थानेषु मार्गणास्वपि विंशतिप्ररूपणा दर्शिता: सन्ति।
तृतीयपुस्तके श्रीभूतबलिभट्टारकेन कृतानि अत: प्रभृतिसूत्राणि सन्ति। अस्मिन् द्रव्यप्रमाणानुगमे जीवानां संख्या गुणस्थानेषु मार्गणासु अपि अस्ति। पुनश्च अलौकिकगणितमध्ये बीजगणितापेक्षया विस्तृतविवेचनं दृश्यते।
क्षेत्रानुगमे त्रिलोकानां वर्णनं, शंख-भ्रमर-महामत्स्यादीनां उत्कृष्टावगाहना-क्षेत्रफलादिकं कथितं, देवनारकाणां च शरीरावगाहनादीनां विवेचनं कृतं वर्तते। क्षेत्रस्य वर्तमाननिवासस्यापेक्षया गुणस्थानेषु मार्गणासु विस्तृतकथनमस्ति।
चतुर्थपुस्तके स्पर्शनानुगमे गुणस्थानमार्गणासु जीवानां त्रिकालापेक्षया स्पर्शनं कथितं, अत्र प्रकरणे ज्योतिर्लोकस्य विशदविवेचनं दृश्यते।
कालानुगमे जीवानां कस्मिन् कस्मिन् गुणस्थाने कियत्कियत्कालमवस्थानं इति प्रतिपादितं अस्ति। कस्यां कस्यां मार्गणायां कियत्कियत्कालमवस्थानं वर्तते इत्यपि विवेचितमस्ति।
पंचमपुस्तके अन्तरानुगमे जीवानामन्तरं विरहकालं गुणस्थानापेक्षया विवेचितं, पुनश्च मार्गणास्वपि अन्तरं दर्शितं अस्ति।
भावानुगमे औपशमिकादिपंचभावानां प्रतिपादनं गुणस्थानेषु मार्गणास्वपि च वर्तते।
अल्पबहुत्वानुगमे जीवानां गुणस्थान-मार्गणापेक्षयाल्पबहुत्वकथनमस्ति यथा-उपशमश्रेण्यारोहका: त्रयगुणस्थानवर्तिन: सर्वत: स्तोका:, एषामधिका उपशांतगुणस्थानवर्तिन: इत्यादय:।
षष्ठपुस्तके नवचूलिकासु-प्रथमत: कर्मप्रकृतीनां कथनं, पुन: जीवेषु कर्मप्रकृतीनां बंधस्थानानि दर्शितानि। तत: प्रथमोपशमसम्यक्त्वाभिमुखजीवा: का: का: प्रकृती: बध्नन्ति इत्यादि कथनं। तत्पश्चात् कर्मणां उत्कृष्टस्थिति: जघन्यस्थितिश्च वर्णितास्ति। तदनु जीवानां सम्यक्त्वस्य योग्यता कदा भवति ? इति समाधानरूपेण विस्तृतविवेचनं वर्तते। पुनश्च सम्यक्त्वोत्पत्ते: जिनबिंबदर्शनादीनि बाह्यकारणानि प्रतिपादितानि सन्ति। तदनन्तरं जीवा: कस्या: गते: निर्गत्य का: का: गती: गंतुं शक्नुवन्तीति गत्यागतिचूलिका: कथिता: सन्ति। इत्यादिरूपेण जीवस्थाननाम्न: प्रथमखंडस्य विषयोऽत्र दिङ्मात्रं दर्शित:। विशेषेण तत्तत्स्थाने द्रष्टव्यं भवद्भि: इत्यलमत्र विस्तरेण।

[सम्पादन]
हिन्दी अनुवाद

अब जीवस्थान नाम के प्रथम खण्ड का विषय विभाजन किया जाता है- प्रथम पुस्तक धवला टीका की सत्प्ररूपणा में-श्रीपुष्पदन्ताचार्य ने चौदह गुणस्थान और चौदह मार्गणास्थानों का वर्णन करके प्रत्येक मार्गणाओं में गुणस्थान की अपेक्षा विशेष विवरण किया है। इसकी ‘धवला’ टीका में मंगलगाथासूत्र के अन्तर्गत णमोकार महामंत्र का विवेचन है, द्वादशांग श्रुतज्ञान की उत्पत्ति आदि का कथन है, इसमें अर्थकर्ता, ग्रंथकर्ता का सुन्दर प्रतिपादन भी देखा जाता है। षट्खण्डागम ग्रंथ की उत्पत्ति का कथानक भी विशद रूप से है। ‘‘द्रव्य स्त्री और नपुंसकवेदियों के मोक्ष का अभाव, भाव स्त्रीवेदी और भावनपुंसक वेदियों के मोक्ष होता है’’ यह कथन भी श्रीवीरसेनाचार्य ने किया है, सिद्धान्त की अपेक्षा से दर्शन और ज्ञान का विस्तृत लक्षण भी इसमें है। धवला की द्वितीय पुस्तक में ‘‘गुणजीवापज्जत्ती’’ इत्यादि गाथा के अनुसार बीस प्ररूपणाओं का विवेचन करके श्री टीकाकार देव ने ही गुणस्थानों में, मार्गणाओं में भी बीस प्ररूपणाएँ दिखाई हैं। धवला की तृतीय पुस्तक में श्री भूतबली भट्टारक के द्वारा बनाए गए सूत्र प्रारंभ हुए हैं। अर्थात् यहाँ से सूत्रों की रचना श्री भूतबली भट्टारक ने की है, ऐसा समझना चाहिए। इस द्रव्यप्रमाणानुगम में जीवों की संख्या गुणस्थानों और मार्गणाओं में कही गई है। पुन: अलौकिक गणित में बीजगणित की अपेक्षा विस्तृत विवेचन देखा जाता है। क्षेत्रानुगम में तीन लोक का वर्णन है तथा शंख, भ्रमर, महामत्स्य आदि की उत्कृष्ट अवगाहना, क्षेत्रफल आदि का कथन है और देव-नारकियों के शरीर की अवगाहना आदि का विवेचन किया है। क्षेत्र का वर्तमान निवास की अपेक्षा से गुणस्थानों में, मार्गणाओं में विस्तृतरूप से कथन किया है।


धवला की चतुर्थ पुस्तक के स्पशर्नानुगम में जीवों का तीनों काल की अपेक्षा गुणस्थान तथा मार्गणाओं में स्पर्शन कहा है, इस प्रकरण में ज्योतिर्लोक का विशद विवेचन देखा जाता है।

कालानुगम में जीवों का किस-किस गुणस्थान में कितने-कितने काल तक अवस्थान रहता है यह प्रतिपादित किया है। किस-किस मार्गणा में कितने-कितने काल तक अवस्थान होता है यह विवेचन भी इसमें आता है।

धवला की पाँचवी पुस्तक के अन्तरानुगम में जीवों का अन्तर-उसका विरहकाल गुणस्थान की अपेक्षा से बताया गया है, पुन: मार्गणाओं में भी यह अन्तर दिखाया गया है।

भावानुगम में औपशमिक आदि पाँच भावों का प्रतिपादन गुणस्थान और मार्गणाओं में भी बताया है। अल्पबहुत्वानुगम में जीवों का गुणस्थान और मार्गणा की अपेक्षा से अल्पबहुत्व का कथन है। जैसे-उपशम श्रेणी चढ़ने वाले तीन गुणस्थानवर्ती सबसे कम हैं और उनसे अधिक उपशांतगुणस्थानवर्ती जीव हैं.........इत्यादि कथन इसमें किया गया है।

धवला की छठी पुस्तक की नव चूलिकाओं में-सबसे पहले कर्मप्रकृतियों का कथन है, पुन: जीवों में कर्मप्रकृतियोें के बंधस्थानों को दिखाया है। उसके बाद प्रथमोपशम सम्यक्त्व के अभिमुख जीव किन-किन प्रकृतियों का बंध करते हैं इत्यादि कथन है। तत्पश्चात् कर्मों की उत्कृष्ट स्थिति और जघन्य स्थिति का वर्णन है। उसके बाद जीवों के सम्यक्त्व की योग्यता कब होती है ? ऐसा समाधानरूप से विस्तृत विवेचन है। पुन: सम्यक्त्व की उत्पत्ति में जिनबिंब दर्शन आदि बाह्य कारणों का प्रतिपादन है। तदनन्तर जीव किस गति से निकलकर किन-किन गतियों में जा सकते हैं ऐसी गत्यागति चूलिकाएँ कही गई हैं। इत्यादि रूप से जीवस्थान नाम के प्रथम खण्ड का विषय यहाँ दिशा मात्र-संक्षेप में दिखाया गया है। विशेषरूप से आप लोगों को उन-उन स्थानों पर समस्त विषय देखना चाहिए, यही यहाँ कहने का अभिप्राय है।

[सम्पादन]
टीकाकर्त्री की भावना

संप्रति जीवस्थानस्य टीकां कर्तुं मम भावना संजाता, अत्रापि अधुना केवलं सत्प्ररूपणाया: टीकाकरणायैव मया प्रतिज्ञायते।

अस्य षट्खण्डागमग्रन्थराजस्य षट्टीका: श्रूयन्ते, परं तु वर्तमानकाले एका धवलाख्या एव टीका उपलभ्यते। अस्या: टीकाया आधारेणैव विशेषतया स्वस्य ज्ञातुमर्हाणि प्रकरणान्युद्धृत्योद्धृृत्य क्वचित्प्राकृत- पंक्ती: क्वचित्प्राकृतपंक्तीनां संस्कृतछायां कृत्वा क्वचित् विषयान् संक्षिप्य क्वचित्प्रसंगोपात्तविषयान् सरलीकर्तुं अन्येषामपि ग्रन्थानां विशेषोद्धरणानि अपि संगृह्य मयेयं ‘‘सिद्धान्तचिंतामणि’’-र्नामधेया टीका लिख्यते। वीराब्दे एकविंशत्यधिकपंचविंशतिशततमे शरदपूर्णिमायां तिथौ (खिष्टाब्दे अष्टमे दिनाँके दशममासे पंचनवत्यधिवैâकोन-विंशतिशततमे) अत्र हस्तिनापुरक्षेत्रे जम्बूद्वीपस्थले द्वितीयस्य जंबूद्वीपमहामहोत्सवस्य मंगलावसरे सति ‘‘सिद्धान् सिद्ध्यर्थमानम्य, श्रीशान्तिनाथभगवन्तं स्वस्या: हृदयकमले स्थापयित्वा’’ एषा टीका प्रारब्धा इयं निर्विघ्नतया पूर्णतां लभेतेति भाव्यते मया।
यथा चिंतितफलदाने प्रसिद्धा चिंतामणिस्तथैव मम चिंतितविषया सिद्धान्तज्ञानस्योपलब्धिस्तां दातुं सक्षमा इयं चिंतामणि: टीका भूयादिति भावना भाव्यते पुन: पुन:। नायं मम प्रयास: स्वविद्वत्ताप्रदर्शनार्थं, प्रत्युत स्वज्ञानावरणकर्मक्षयोपशमवृद्ध्यर्थं सिद्धान्तसूत्रग्रंथे प्रवेशकरणार्थं स्वात्मनि परमाल्हादमुत्पादयितुं चायं उपक्रम: क्रियते। अस्या: टीकारचनाया: निमित्तं चंदनामती आर्यिकाया: प्रार्थनाप्यस्ति।

[सम्पादन]
हिन्दी अनुवाद

अब जीवस्थान की टीका करने की मेरी भावना उत्पन्न हुई है, उसमें भी अभी केवल ‘‘सत्प्ररूपणा’’ की टीका करने के लिए ही मैंने प्रतिज्ञा की है। इस षट्खण्डागम ग्रंथराज की छह टीका सुनी जाती हैं, परन्तु वर्तमान काल में एक धवला टीका ही उपलब्ध हो रही है। इस टीका के आधार से ही विशेषतया अपने लिए जानने योग्य अनेक प्रकरणों को उद्धृत कर करके कुछ प्राकृत पंक्तियों को तथा कुछ प्राकृत पंक्तियों की संस्कृत छाया करके, कुछ विषयों को संक्षिप्त करके, कुछ प्रसंगोपात्त विषयों को सरल करने के लिए अन्य ग्रंथों के भी विशेष उद्धरणों को ग्रहण करके मैं यह ‘‘सिद्धान्तचिंतामणि’’-नाम की टीका लिख रही हूँ। वीर निर्वाणसंवत् पचीस सौ इक्कीस की शरदपूर्णिमा-आश्विन शुक्ला पूर्णिमा तिथि (ईसवी सन् १९९५, ८ अक्टूबर सन् १९९५) को हस्तिनापुर तीर्थ पर जम्बूद्वीप के द्वितीय महामहोत्सव के अवसर पर ‘‘समस्त सिद्धों को नमस्कार करके श्री शांतिनाथ भगवान को अपने हृदय कमल में स्थापित करके मैंने यह टीका प्रारंभ की है, यह मेरी टीका निर्विघ्नतया पूर्ण हो, ऐसी मेरी भावना है। जैसे चिन्तित फल को प्रदान करने में प्रसिद्ध चिन्तामणिरत्न है, उसी प्रकार मेरा चिन्तित विषय है-सिद्धान्त ज्ञान की उपलब्धि करना, उसे देने में सक्षम यह चिन्तामणि टीका प्रसिद्ध होवे, यह भावना पुन:-पुन: मेरे द्वारा भाई जा रही है। मेरा यह प्रयास अपनी विद्वत्ता प्रदर्शन के लिए नहीं है, प्रत्युत् अपने ज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशम की वृद्धि के लिए, सिद्धान्त सूत्र ग्रंथ में प्रवेश करने के लिए और स्वात्मा में परम आल्हाद उत्पन्न कराने के लिए ही मेरा यह उपक्रम है। इस टीका की रचना में आर्यिका चन्दनामती की प्रार्थना भी निमित्त है।

[सम्पादन]
टीकाकर्त्री का लघुताप्रदर्शन

क्वायं द्वादशांगांशमहार्णव: सिद्धान्तागम: ? क्व च मम लवमात्रज्ञानधारिणी अल्पबुद्धि: ? अस्मिन् कार्ये ममेदं साहसं केवलं जलसंस्थितचन्द्रबिम्बं ग्रहीतुमनसो बालस्येव। तथापि ममासौ टीका भव्यान् सिद्धान्तग्रन्थे प्रवेशयितुं सहकारिणी स्वात्मनि हर्षोत्पादिनी च भविष्यति।

जिनेन्द्रदेवमुखकमलविनिर्गत-गौतमस्वामिमुखकुण्डावतरित-पुष्पदंताचार्यादिविस्तारितगंगाया: जलसदृशं ‘‘नद्या नवघटे भृतं जलमिव’’ इयं टीका सर्वजनमनांसि संतर्पिष्यत्येवेति मया विश्वस्यते।
अथाधुना श्रीमत्पुष्पदन्ताचार्यदेवविनिर्मिते गुणस्थानादिविंशतिप्ररूपणान्तर्गर्भितसत्प्ररूपणानाम ग्रन्थे अधिकारशुद्धिपूर्वकत्वेन पातनिका व्याख्यानं विधीयते। तत्रादौ ‘णमो अरिहंताणं’ इति पंचनमस्कारगाथामादिं कृत्वा सूत्रपाठक्रमेण गुणस्थानमार्गणा-प्रतिपादनसूचकत्वेन ‘एत्तो इमेसिं’ इत्यादिसूत्रसप्तकं। तत: चतुर्दशगुणस्थाननिरूपणपरत्वेन ‘‘संतपरूवणदाए’’ इत्यादि-षोडशसूत्राणि। तत: परं चतुर्दशमार्गणासु गुणस्थानव्यवस्था-व्यवस्थापन-मुख्यत्वेन ‘‘आदेसेण गदियाणुवादेण’’ इत्यादिना चतु:पञ्चाशदधिक-एकशतसूत्राणि सन्ति। एवं अनेकान्तरस्थलगर्भित-सप्त-सप्तत्यधिक-एकशतसूत्रै: एते त्रयो महाधिकारा भवन्तीति सत्प्ररूपणाया: व्याख्याने समुदायपातनिका भवति।

अत्रापि प्रथममहाधिकारे ‘णमो’ इत्यादि मंगलाचरणरूपेण प्रथमस्थले गाथासूत्रमेकं। ततो गुणस्थानमार्गणाकथनप्रतिज्ञारूपेण द्वितीयस्थले ‘‘एत्तो’’ इत्यादि सूत्रमेकम्। ततश्च चतुर्दशमार्गणानां नामनिरूपणरूपेण तृतीयस्थले सूत्रद्वयं। तत: परं गुणस्थानप्रतिपादनार्थं अष्टानुयोगनामसूचनपरत्वेन चतुर्थस्थले ‘‘एदेसिं’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। एवं षट्खण्डागमग्रन्थराजस्य सत्प्ररूपणाया: पीठिकाधिकारे चतुर्भिरन्तरस्थलै: सप्तसूत्रै: समुदायपातनिका सूचितास्ति।

[सम्पादन]
हिन्दी अनुवाद

कहाँ तो द्वादशांग के अंश का यह महासमुद्ररूपी सिद्धान्तग्रंथ और कहाँ मेरी लवमात्रज्ञान को धारण करने वाली छोटी सी बुद्धि ? इस कार्य को करने में मेरा यह साहस केवल जल में स्थित चन्द्र बिम्ब को पकड़ने वाले बालक के समान ही है। फिर भी मेरी यह टीका भव्यों को सिद्धान्त ग्रंथ में प्रवेश कराने के लिए सहयोगी और आत्मा में हर्ष को उत्पन्न कराने वाली होगी।

जिनेन्द्रदेव के मुखकमल से निकलकर जो गौतम स्वामी के मुखरूपी कुण्ड में अवतरित-गिरी है तथा पुष्पदन्त आचार्य आदि के द्वारा विस्तारित गंगाजल के समान ‘‘नदी से भरे हुए नये घड़े के जल सदृश’’ यह टीका सभी प्राणियों के मन को संतृप्त करेगी, ऐसा मेरा विश्वास है।
अब यहाँ श्रीमान् पुष्पदंत आचार्यदेव द्वारा रचित गुणस्थान आदि बीस प्ररूपणाओं में अन्तर्गर्भित इस सत्प्ररूपणा नामक ग्रंथ में अधिकार शुद्धिपूर्वक पातनिका का व्याख्यान किया जाता है। उसमें सबसे पहले ‘‘णमो अरिहंताणं’’ इत्यादि इस पंचनमस्कार गाथा को आदि में करके सूत्र पाठ के क्रम से गुणस्थान, मार्गणा के प्रतिपादन की सूचना देने वाले ‘‘एत्तो इमेसिं’’ इत्यादि सात सूत्र हैं। उसके बाद चौदह गुणस्थानों के निरूपण की मुख्यता से ‘‘ओघेण अत्थि’’ इत्यादि सोलह सूत्र हैं। पुन: आगे चौदह मार्गणाओं में गुणस्थान व्यवस्था की मुख्यता से ‘‘आदेसेण गदियाणुवादेण’’ इत्यादि एक सौ चौव्वन (१५४) सूत्र हैं। इस प्रकार अनेक अन्तस्र्थलों से गर्भित एक सौ सतत्तर (१७७) सूत्रों के द्वारा ये तीन महाधिकार हो गये हैं। सत्प्ररूपणा के व्याख्यान में यह समुदायपातनिका हुई।

यहाँ भी प्रथम महाधिकार में ‘‘णमो’’ इत्यादि मंगलाचरण रूप से प्रथम स्थल में एक गाथा सूत्र है। पुन: द्वितीय स्थल में गुणस्थान-मार्गणा के कथन की प्रतिज्ञारूप से ‘‘एत्तो’’ इत्यादि एक सूत्र है और उसके बाद चौदह मार्गणाओं के नाम निरूपण रूप से तृतीय स्थल में दो सूत्र हैं। उसके आगे गुणस्थानों के प्रतिपादन हेतु आठ अनुयोग के नाम सूचना की मुख्यता से चतुर्थ स्थल में ‘‘एदेसिं’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं।

इस प्रकार षट्खण्डागम ग्रंथराज की सत्प्ररूपणा के पीठिका अधिकार में चार अन्तरस्थलों के द्वारा सात सूत्रों में समुदायपातनिका सूचित-प्रदर्शित की गई है।

[सम्पादन]
विशेषार्थ

पूज्य माताजी ने ऊपर की पंक्तियों में मेरी प्रार्थना का उल्लेख किया है सो यह मेरा परम सौभाग्यहै। यद्यपि माताजी की अतिशय पूर्ण लेखनी से अष्टसहस्री, कातंत्ररूपमाला, समयसार, नियमसार, कल्पद्रुम, सर्वतोभद्र, इन्द्रध्वज आदि बृहत् पूजा काव्यग्रंथ, उपन्यास साहित्य, बालसाहित्य आदि सब मिलाकर दो सौ ग्रंथ लिखे जा चुके थे। पुन: सन् १९९५ में एक दिन मैंने पूज्य माताजी से निवेदन किया कि आपके द्वारा प्राय: चारों अनुयोगों पर साहित्य रचना हो चुकी है, आपने मूलाचार के समान ‘‘आराधना’’ नामक संस्कृत श्लोक ग्रंथ लिखा है, अनेक संस्कृत स्तोत्रों की रचना की है, नियमसार की ‘‘स्याद्वादचन्द्रिका’’ नामक संस्कृत टीका लिखी है पुन: अब आपके करकमलों से षट्खण्डागम ग्रंथ की सरल संस्कृत टीका भी यदि हो जाये तो कितना अच्छा हो! मेरे इतने से निवेदन पर माताजी ने ८ अक्टूबर १९९५, शरदपूर्णिमा के दिन से यह टीका रचना प्रारंभ की, जिसका हिन्दी अनुवाद मुझे करने का आदेश मिला, यह भी मैं अपना पुण्य समझती हूँ।

इस धरती पर आज अंग-पूर्व के ज्ञाता आचार्य धरसेन स्वामी नहीं हैं और न ही उनसे ज्ञानप्राप्त करके षट्खण्डागम सूत्रों के रचयिता श्री पुष्पदन्त-भूतबली मुनिराज व धवला टीकाकार श्री वीरसेन स्वामी के ही दर्शन हो सकते हैं, क्योंकि वे तो अपनी अमूल्य कृतियाँ हमें प्रदान करके स्वर्गधाम चले गये। किन्तु आज उनकी परम्परा को वृद्धिंगत करने वाली बीसवीं सदी की प्रथम बाल ब्रह्मचारिणी परमपूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी जिन्होंने सिद्धान्त ग्रंथ पर यह दुरूह टीका कार्य करने का उपक्रम किया है उनके दर्शन करके हमें अपने चर्मचक्षुओं को सफल करना चाहिए।
इनके विशद ज्ञान एवं साहित्य सृजन से प्रभावित होकर उत्तरप्रदेश के फैजाबाद के ‘‘डॉ. राममनोहर लोहिया विश्वविद्यालय’’ ने ५ फरवरी १९९५ को एक दीक्षान्त समारोह आयोजित करके इन्हें डी.लिट् (डाक्टर ऑफ लेटर्स) ‘‘साहित्यवारिधि’’ की मानद् उपाधि से अलंकृत करके अपने विश्वविद्यालय को गौरवान्वित अनुभव किया था।

पूज्य माताजी के विस्तृत कार्यकलापों की ओर जब दृष्टि डालती हूँ तब वास्तव में लगता है कि इन्होंने पूर्व जन्म में निश्चित ही खूब विद्यादान दिया होगा, जिसके कारण इस भव में ये साक्षात् सरस्वती के रूप में अवतरित हुई हैं।

वर्तमान में गृहस्थ नाते से मुझे इनकी लघु बहिन कहलाने का जो सुयोग मिला है, वह भी मेरे लिए प्रसन्नता की बात है। इनके अभीक्ष्णज्ञान के कुछ रजकण मुझे भी इस भव में प्राप्त हों, मेरा रत्नत्रय दिन- प्रतिदिन वृद्धिंगत हो तथा अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति में स्त्रीलिंग का छेद हो यह जिनवर और गुरुवर के आशीर्वाद की अभिलाषा है एवं अगले भवों में (स्वर्ग से मनुष्यगति में आकर) मुझे इनके लघुभ्राता के रूप में जन्म लेकर युगल चारणऋद्धिधारी मुनिराज की पर्याय से मोक्षपद की प्राप्ति हो, हे जिनेन्द्र! आपके श्रीचरणों में मेरी यही प्रार्थना है।

[सम्पादन] टिप्पणी

  1. अस्माभि: इति कर्ता अध्याह्रियते।
  2. अस्माभि: इति कर्ता अध्याह्रियते।
  3. ‘मया’ इति कर्ता अध्याह्रियते।
  4. एवमभिष्टुवतो मे ज्ञानानि समस्तलोकचक्षूंषि। लघु भवताज्ज्ञानद्र्धिज्र्ञानफलं सौख्यमच्यवनम्।।
    (श्रुतभक्ति-श्रीपूज्यपादस्वामिकृत)
Blomst097.gif
San343434 copy.jpg