ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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023. प्रथम महाधिकार - (षट्खण्डागम कर्ता का मंगलाचरण से मंगल निमित्त आदि छह अधिकार के नाम तक)

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प्रथम महाधिकार - ( षट्खण्डागम कर्ता का मंगलाचरण से मंगल निमित्त आदि छह अधिकार के नाम )

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भूमिका

अथ श्रीमद्भगवद्धरसेनगुरुमुखादुपलब्धज्ञानभव्यजनानां वितरणार्थं पंचमकालान्त्यवीरांगजमुनिपर्यंतं गमयितुकामेन पूर्वाचार्यव्यवहारपरंपरानुसारेण शिष्टाचारपरिपालनार्थं निर्विघ्नसिद्धान्तशास्त्रपरिसमाप्त्यादिहेतो: श्रीमत्पुष्पदन्ताचार्येण णमोकारमहामंत्रमंगलगाथासूत्रावतार: क्रियते-

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हिंदी अनुवाद

भूमिका

अब श्रीमत् भगवान् धरसेनाचार्य गुरु के मुख से उपलब्ध ज्ञान को भव्यजनों में वितरित करने के लिए पंचमकाल के अन्त में वीरांगज मुनि पर्यन्त इस ज्ञान को ले जाने की इच्छा से, पूर्वाचार्यों की व्यवहार परम्परा के अनुसार, शिष्टाचार का परिपालन करने के लिए, निर्विघ्न सिद्धान्त शास्त्र की परिसमाप्ति आदि हेतु को लक्ष्य में रखते हुए श्रीमत्पुष्पदन्ताचार्य के द्वारा णमोकार महामंत्र मंगल गाथा सूत्र का अवतार किया जाता है-

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मंगलाचरण

णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं।

णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्व-साहूणं।।१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-‘णमो’ इत्यादिपदखण्डनारूपेण व्याख्यानं क्रियते। णमो-नमस्कारोऽस्तु। केभ्य: ? अरिहंताणं-अर्हद्भ्य:। इत्यादि पंचपदेषु ज्ञातव्य:।

‘‘सर्वनमस्कारेष्वत्रतनसर्वलोकशब्दावन्त्यदीपकत्वादध्याहर्तव्यौ सकलक्षेत्रगतत्रिकालगो- चरार्हदादिदेवताप्रणमनार्थम्।’’[१] इति न्यायेन णमो अरिहंताणं अस्यार्थ: सार्धद्वयद्वीपेषु सप्तत्यधिकशत-कर्मभूमिषु संजातेभ्यस्रिकालगोचरेभ्योऽर्हद्भ्यो नम:। णमो सिद्धाणं सकलकर्मभूमिभ्य: सिद्धपदप्राप्तेभ्य: संहरणसिद्धापेक्षया सार्धद्वयद्वीपद्वयसमुद्रेभ्य: सिद्धपदप्राप्तेभ्यश्च त्रिकालगोचरेभ्य: सिद्धेभ्यो नम:। णमो आइरियाणं सकलकर्मभूमिषूत्पन्नेभ्यस्रिकालगोचरेभ्य आचार्येभ्यो नम:। णमो उवज्झायाणं अखिलकर्मधरासूत्पन्नेभ्यस्त्रिकालगोचरेभ्य उपाध्यायेभ्यो नम:। णमो लोए सव्वसाहूणं निखिलकर्म-मेदिनीषूत्पन्नेभ्यस्रिकालगोचरेभ्य: साधुभ्यो नम:।
इतो विस्तर:-

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हिंदी अनुवाद

भूमिका

अब श्रीमत् भगवान् धरसेनाचार्य गुरु के मुख से उपलब्ध ज्ञान को भव्यजनों में वितरित करने के लिए पंचमकाल के अन्त में वीरांगज मुनि पर्यन्त इस ज्ञान को ले जाने की इच्छा से, पूर्वाचार्यों की व्यवहार परम्परा के अनुसार, शिष्टाचार का परिपालन करने के लिए, निर्विघ्न सिद्धान्त शास्त्र की परिसमाप्ति आदि हेतु को लक्ष्य में रखते हुए श्रीमत्पुष्पदन्ताचार्य के द्वारा णमोकार महामंत्र मंगल गाथा सूत्र का अवतार किया जाता है-

णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं।
णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्व-साहूणं।।१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-‘‘णमो’’ इत्यादि पदखंडना रूप से व्याख्यान प्रारंभ किया जा रहा है। णमो-नमस्कार होवे। किन्हें नमस्कार हो ? अरिहंतों को। इसी प्रकार से पाँचों पदों में जानना चाहिए कि सिद्धों को, आचार्यों को, उपाध्यायों को, सर्वसाधुओं को नमस्कार हो।

सर्वनमस्कारों में यहाँ सर्व और लोक इन दो शब्दों को अन्त्यदीपक न्याय के अनुसार अध्याहार-अधिक रूप से ग्रहण कर लेना चाहिए जो सम्पूर्ण क्षेत्रगत तीनों कालों में होने वाले अर्हन्तादि देवताओं के प्रणमन के सूचक हैं। इस न्याय से ‘‘णमो अरिहंताणं’’ इस पद का अर्थ है कि ढाई द्वीपों की एक सौ सत्तर कर्मभूमियों में होने वाले भूत-भावि-वर्तमान संबंधी त्रैकालिक समस्त अर्हंत परमेष्ठियों को नमस्कार हो। ‘‘णमो सिद्धाणं’’ का अर्थ है कि समस्त कर्मभूमियों से सिद्ध पद प्राप्त निकल परमात्माओं को तथा संहरण सिद्ध की अपेक्षा से भी-उपसर्गादि से सिद्ध पद जिन्हें प्राप्त हुआ है ऐसे ढाईद्वीप और दो समुद्रों से तीनों कालों में जितने भी सिद्ध हुए हैं, हो रहे हैं, होंगे उन सभी सिद्ध परमेष्ठियों को नमस्कार हो।

‘‘णमो आइरियाणं’’ पद का भी यही अर्थ है कि सम्पूर्ण कर्मभूमियों में उत्पन्न त्रिकालगोचर समस्त आचार्य परमेष्ठियों को नमस्कार हो। ‘‘णमो उवज्झायाणं’’ का मतलब है कि समस्त कर्मभूमियों में तीनों कालों में उत्पन्न होने वाले सभी उपाध्याय परमेष्ठियों को नमस्कार हो। ‘‘णमो लोए सव्वसाहूणं’’ इस अंतिम पद का अर्थ है कि सभी कर्मभूमियों में उत्पन्न त्रिकालगोचर सम्पूर्ण साधु परमेष्ठियों को मेरा नमस्कार होवे।

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इदानीं देवतानमस्कारसूत्रस्यार्थ उच्यते-

नमोऽर्हदभ्य:-

अरिहननादरिहन्ता[२] अरिर्मोह:, मोहनीयकर्मान्तरेण शेषसप्तकर्माणि संसारे संसरणकारणानि न भवन्ति। अतस्तस्यारेर्हननादरिहन्ता। रजोहननाद्वा अरिहन्ता। ज्ञानदृगावरणानि रजांसीव रजांसि। मोहोऽपि रज:। तेषां ज्ञानावरणदर्शनावरणानां हननाद् अरिहंता। रहस्याभावाद्वा अरिहन्ता। रहस्यमन्तराय:, तस्य शेषघाति-त्रितयविनाशाविनाभाविनो हननादरिहन्ता।’’ मोहनीयज्ञानावरणदर्शनावरणान्तरायचतुर्घातिकर्मणां सप्तचत्वारिंशत्प्रकृतय: नरकतिर्यग्देवायुषां त्रिप्रकृतयो, नामकर्मणां नरकगतिनरकगत्यानुपूर्वी-तिर्यग्गति-गत्यानुपूर्वी-विकलत्रय-उद्योत-आतप-एकेन्द्रिय-साधारणसूक्ष्म-स्थावरा: त्रयोदशप्रकृतय: इति त्रिषष्टिप्रकृतिविनाशात् त्रयोदशमगुणस्थानवर्तिन: केवलिन: ‘अरिहन्ता’ भवन्ति।

अथवा ‘अरहंताणं’ इति पाठान्तरे ‘‘अतिशयपूजार्हत्वाद्वार्हन्त:[३]’’। स्वर्गावतरणादिपंचमहाकल्याणकेषु सौधर्मेन्द्रादिकृतानां पूजानामर्हत्वाद् योग्यत्वादर्हन्त:। चतुस्त्रिंशदतिशयाष्टमहाप्रातिहार्यानंतचतुष्टय-रूपषट्चत्वारिंशद्गुणसमन्विता अष्टादशदोषविरहिताश्च सर्वज्ञा: सर्वदर्शिनोऽर्हन्तो भगवन्तो भवन्ति। अथवा ‘अरुहंताणं’ इत्यपि पाठान्तरे ‘अरोहद्भय:’ अनुपजायमानेभ्य: क्षीणकर्मबीजत्वात्।[४]

आह च-

दग्धे बीजे यथात्यन्तं, प्रादुर्भवति नांकुर:।
कर्मबीजे तथा दग्धे, न रोहति भवांकुर:।।

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हिंदी अनुवाद

इसी का विस्तार करते हैं-

अब देवता नमस्कार सूत्र का अर्थ कहते हैं-

अरिहंतों को नमस्कार हो-अरि अर्थात् मोह कर्म, मोहनीय कर्म के बिना शेष सातों कर्म संसार में संसरण कराने में कारण नहीं होते हैं अत: उस मोहकर्म रूपी शत्रु का हनन करने वाले अरिहंत कहलाते हैं अथवा ‘रज’ अर्थात् आवरण कर्मों को नाश कर देने से ‘अरिहंत’ यह संज्ञा प्राप्त होती है। ज्ञानावरण और दर्शनावरण कर्म धूलि की तरह बाह्य और आभ्यन्तर दोनों गुणों को ढक लेते हैं इसलिए इन्हें रज कहा है। मोह को भी रज कहते हैं। उन ज्ञानावरण, दर्शनावरण कर्मों का नाश करने से अरिहंत हैं। अथवा ‘रहस्य’ के अभाव से भी अरिहंत होेते हैं। रहस्य अन्तराय कर्म को कहते हैं। अन्तराय कर्म का नाश शेष तीन घातिया कर्मों के नाश का अविनाभावी है, ऐसे अन्तराय कर्म के नाश से अरिहंत होते हैं। अर्थात् अन्तराय कर्म के साथ-साथ शेष ज्ञानावरण, दर्शनावरण और मोहनीय ये तीनों कर्म नियम से नष्ट होते ही हैं वे अघातिया कर्म भी भ्रष्ट बीज के समान शक्तिहीन हो जाते हैं।

मोहनीय कर्म, ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय इन चार घातिया कर्मों की सैंतालीस प्रकृतियाँ, नरकायु-तिर्यंचायु-देवायु ये आयुकर्म की तीन प्रकृतियाँ, नामकर्म की नरकगति-नरकगत्यानुपूर्वी, तिर्यंचगति-तिर्यंचगत्यानुपूर्वी, विकलत्रय (द्वीन्द्रिय-त्रीन्द्रिय-चतुरिन्द्रिय), उद्योत-आतप-एकेन्द्रिय-साधारण-सूक्ष्म-स्थावर ये तेरह प्रकृतियाँ इस प्रकार कुल त्रेसठ प्रकृतियों के विनाश से तेरहवें गुणस्थानवर्ती केवली भगवान अरिहंत परमेष्ठी होते हैं।

अथवा ‘‘अरहंताणं’’ ऐसा पाठान्तर प्राप्त होने पर ‘‘सातिशय पूजा के योग्य होने से अर्हन्त होते हैं। स्वर्गावतरण-स्वर्ग से च्युत होकर माता के गर्भ में आने से लेकर पंच महाकल्याणकों में सौधर्मादि इन्द्रों के द्वारा की जाने वाली पूजा के योग्य होने से अर्हन्त संज्ञा भी सार्थक है।

चौंतीस अतिशय, अष्टमहाप्रातिहार्य, अनन्त चतुष्टयरूप छियालिस गुण समन्वित और अठारह दोष रहित सर्वज्ञ, सर्वदर्शी अर्हन्त भगवान् होते हैं। अथवा धवला ग्रंथ के टिप्पण में ‘अरुहंताणं’ यह पाठान्तर भी आया है जिसका अर्थ है.......पुन: उत्पन्न न होने वाले क्षीणशक्ति वाले बीज की तरह से जिनके कर्म भी अत्यन्त क्षीण हो गये हैं। कहा भी है-

श्लोकार्थ

जिस प्रकार बीज के जल जाने पर उसमें से पुन: अंकुर उत्पन्न नहीं होता है, उसी प्रकार कर्मरूपी बीज के भी दग्ध हो जाने पर भवरूपी अंकुर नहीं उगता है।

इसलिए जिनका पुनर्जन्म संसार में नहीं होगा, ऐसे अरहन्तों को अरुहन्त संज्ञा भी किन्हीं के द्वारा प्रदान की गई है।

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विशेषार्थ

श्री बुधजन कवि द्वारा वर्णित चौंतिस अतिशय जो प्रसिद्ध हैं ही, जो जन्म के १०, केवलज्ञान के १० और देवकृत १४ रूप जाने जाते हैं, किन्तु तिलोयपण्णत्ति ग्रंथ के आधार से इन अतिशयों में किंचित् भेद देखा जाता है। जैसे-

णिस्सेदत्तं णिम्मलगत्तत्तं दुद्धधवलरुहिरत्तं।
आदिमसंहडणत्तं, समचउरस्संगसंठाणं।।८९६।।
अणुवमरूवत्तं णव, पंचयवरसुरहिगंधधारित्तं।
अट्ठुत्तरवरलक्खण, सहस्सधरणं अणंतबलविरियं।।८९७।।
मिदहिदमधुरालाओ, साभाविय अदिसयं च दसभेदं।
एदं तित्थयराणं, जम्मग्गहणादिउप्पण्णं।।८९८।।

अर्थात्

१. स्वेदरहितता

२. निर्मलशरीर

३. दूध के समान धवल रुधिर

४. वज्रवृषभ नाराचसंहनन

५. समचतुरस्र संस्थान

६. अनुपम रूप

७. नवचम्पक की उत्तम गंध के समान गंध का धारण करना

८. एक हजार आठ उत्तम लक्षणों को धारण करना

९. अनन्तबल

१०. हितमित मधुर भाषण ये स्वाभाविक दस अतिशय तीर्थंकर पदधारी अर्हन्तों के जन्म ग्रहण से ही उत्पन्न हो जाते हैं।

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पुन: केवलज्ञान के ११ अतिशय कहे गये हैं-

१. अपने पास से चारों दिशाओं में एक सौ योजन तक सुभिक्षता

२. आकाशगमन

३. हिंसा का अभाव

४. भोजन का अभाव

५. उपसर्ग का अभाव

६. सबकी ओर मुख करके स्थित होना

७. छाया रहितता ८. निर्निमेष दृष्टि

९. विद्याओं की ईशता-स्वामीपना

१०. सजीव होते हुए भी नख और रोमों का समान रहना

११. अठारह महाभाषा,

सात सौ क्षुद्र भाषा तथा और भी जो संज्ञी जीवों की समस्त अक्षर-अनक्षरात्मक भाषाएँ हैं। उनमें तालु, दन्त, ओष्ठ और कण्ठ के व्यापार से रहित होकर एक ही समय भव्यजनों को दिव्य उपदेश देना। भगवान् जिनेन्द्र की स्वभावत: अस्खलित और अनुपम दिव्यध्वनि तीनों संध्याओं में नव मुहूर्तों तक निकलती है और एक योजन पर्यन्त जाती है। इसके अतिरिक्त गणधर देव, इन्द्र अथवा चक्रवर्ती के प्रश्नानुरूप अर्थ के निरूपणार्थ वह दिव्यध्वनि शेष समयों में भी निकलती है। यह दिव्यध्वनि भव्य जीवों को छह द्रव्य, नौ पदार्थ, पाँच अस्तिकाय और सात तत्त्वों का नाना प्रकार के हेतुओं द्वारा निरूपण करती है। इस प्रकार घातिया कर्मों के क्षय से उत्पन्न हुए ये महान आश्चर्यजनक ग्यारह अतिशय तीर्थंकरों को केवलज्ञान के उत्पन्न होने पर अर्हन्त अवस्था में प्रगट होते है

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अब देवकृत १३ अतिशय बताते हैं-

१. तीर्थंकरों के माहात्म्य से संख्यात योजनों तक वन असमय में ही पत्र, फूल और फलों की वृद्धि से संयुक्त हो जाता है|

२. कंटक और रेती आदि को दूर करती हुई सुखदायक वायु चलने लगती है,

३. जीव पूर्व वैर को छोड़कर मैत्रीभाव से रहने लगते हैंं,

४. उतनी भूमि दर्पण तल के सदृश स्वच्छ और रत्नमय हो जाती है,

५. सौधर्म इन्द्र की आज्ञा से मेघकुमार देव सुगंधित जल की वर्षा करता है,

६. देव विक्रिया से फलों के भार से नम्रीभूत शालि और जौ आदि सस्य को रचते हैं,

७. सब जीवों को नित्य आनन्द उत्पन्न होता है,

८. वायुकुमार देव विक्रिया से शीतल पवन चलाता है,

९. कूप और तालाब आदिक निर्मल जल से पूर्ण हो जाते हैं,

१०. आकाश धुआँ और उल्कापातादि से रहित होकर निर्मल हो जाता है,

११. सम्पूर्ण जीवों को रोगादि की बाधाएं नहीं होती हैं,

१२. यक्षेन्द्रों के मस्तकों पर स्थित और किरणों से उज्ज्वल ऐसे चार दिव्य धर्मचक्रों को देखकर जनों को आश्चर्य होता है,

१३. तीर्थंकरों के चारों दिशाओं में (विदिशाओं सहित) छप्पन सुवर्णकमल, एक पादपीठ और दिव्य एवं विविध प्रकार के पूजन द्रव्य होते हैं

इस प्रकार ये १०+११+१३=३४ अतिशय अर्हन्त भगवन्तों के होते हैं तथा अशोक वृक्ष, तीनछत्र, सिंहासन, दिव्यध्वनि, देवदुन्दुभि, पुष्पवृष्टि, प्रभामण्डल और चौंसठ चंवर ये आठ प्रातिहार्य भी उन जिनेन्द्रों के पाये जाते हैं।

जो उपर्युक्त चौंतीस अतिशयों को प्राप्त हैं, अष्टमहाप्रातिहार्यों से संयुक्त हैं, मोक्षमार्ग के प्रणेता हैं और तीनों लोकों के स्वामी हैं ऐसे अर्हन्त परमेष्ठी को मेरा मन, वचन, काय से नमस्कार होवे।

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नम: सिद्धेभ्य:-


सिद्धा: निष्ठिता: कृतकृत्या: सिद्धसाध्या: नष्टाष्टकर्माण:[५]
मोहनीयकर्मविनाशात् सम्यक्त्वं, ज्ञानावरणनिर्दहनात् ज्ञानं, दर्शनावरणविघातात् दर्शनं, अंतरायहननाद् वीर्यं, नामकर्मनिर्णाशात् सूक्ष्मत्वं, आयु:कर्माभावात् अवगाहनत्वं, गोत्रकर्मनाशादगुरुलघुत्वं, वेदनीयकर्मशातनादव्याबाधं इति एते अष्टकर्मविनिर्मुक्ता अष्टगुणसमन्विता: सिद्धा भवन्ति। उक्तं च-
सम्मत्तणाणदंसणवीरिय-सुहुमं तहेव अवगहणं।
अगुरुलहुमव्वावाहं, अट्ठगुणा होंति सिद्धाणं।।
यद्यपि अनन्तानन्तगुणपुञ्जा: सिद्धा: तथापि सामान्यतया अष्टगुणविशिष्टा एव गीयन्ते।

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सिद्धों को नमस्कार हो-

जो निष्ठित-पूर्णत: अपने स्वरूप में स्थित हैं, कृतकृत्य-समस्त कार्यों को पूर्ण कर चुके हैं, सिद्धसाध्य-अपने साध्य (लक्ष्य) को सिद्ध कर चुके हैं और आठों कर्मों को नष्ट कर चुके हैं, उन्हें सिद्ध कहते हैं।

मोहनीय कर्म के विनाश से सम्यक्त्व होता है, ज्ञानावरण के नष्ट होने पर अनन्त ज्ञान प्रगट होता है, दर्शनावरण के विघात से अनन्तदर्शन, अन्तराय के हनन से अनन्तवीर्य, नामकर्म के अत्यंत नाश से सूक्ष्मत्व गुण, आयुकर्म के अभाव से अवगाहन गुण, गोत्र कर्म के नाश से अगुरुलघु गुण, वेदनीय कर्म के शातन-अभाव से अव्याबाध। इस प्रकार इन आठ कर्मों से रहित और आठ गुणों से सहित सिद्ध परमेष्ठी होते हैं।

लघु सिद्धभक्ति में कहा भी है-

गाथार्थ-सम्यक्त्व, ज्ञान, दर्शन, वीर्य, सूक्ष्मत्व, अवगाहना, अगुरुलघु और अव्याबाध ये आठ गुण सिद्धों के होते हैं।

यद्यपि अनन्तानन्त गुणों के पुञ्जस्वरूप सिद्ध भगवान होते हैं फिर भी सामान्यतया आठ गुणों से विशिष्ट ही बताये गये हैं।

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नम: आचार्येभ्य:

पञ्चविधमाचारं चरति चारयतीत्याचार्य:, चतुर्दशविद्यास्थानपारग:, एकादशाङ्गधर: आचाराङ्गधरो वा तात्कालिकस्वसमय-परसमयपारगो वा[६]

आचार्यस्य षट्त्रिंशद्गुणा: सन्ति। उत्तं चानगारधर्मामृते-[७]
अष्टावाचारवत्त्वाद्यास्तपांसि द्वादश स्थिते:।
कल्पा दशाऽऽवश्यकानि, षट् षट्त्रिंशद् गुणा गणे:।।७६।।
आचारवत्त्वाद्या अष्टौ, तपांसि द्वादश, स्थितिकल्पा दश, आवश्यकानि षट्, इति षट्त्रिंशद्गुणा:। आचारवत्त्वादिनामान्याह-
आचारी सूरिराधारी, व्यवहारी प्रकारक:।
आयापायदिगुत्पीडोऽपरिस्रावी सुखावह:।।७७।।
तपांसि आवश्यकानि च ज्ञायन्ते। स्थितिकल्पा: उच्यंते-
आचेलक्यं, औद्देशिकपिण्डवर्जनं, शय्याधरपिण्डवर्जनं, राजकीयपिंडवर्जनं, कृतिकर्म, व्रतारोपणयोग्यत्वं, ज्येष्ठता, प्रतिक्रमणं, मासैकवासिता, वर्षायोगश्चेति दश भवन्ति।
अथवा द्वादश तपांसि, दश धर्मा:, पंचाचारा:, षडावश्यकानि, तिस्रो गुप्तयश्चेति षट्त्रिंशद्गुणा अपि भवन्ति। तथा संग्रहानुग्रहनिग्रहेषु कुशला:।

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हिंदी अनुवाद

आचार्यों को नमस्कार हो-

पाँच प्रकार के आचारों का जो स्वयं आचरण करते हैं तथा शिष्यों से आचरण कराते हैं, वे आचार्य परमेष्ठी कहलाते हैं। वे आचार्य चौदह विद्यास्थान (चौदह पूर्व) के पारगामी-ज्ञाता होते हैं। ग्यारह अंगरूप श्रुत के धारी अथवा आचारांग मात्र के धारक होते हैं अथवा तात्कालिक स्वसमय-जिनागम और परसमय-परमतों के शास्त्रों के पारगामी होते हैं।

आचार्य के छत्तीस गुण हैं। उनके बारे में अनगारधर्मामृत ग्रंथ में कहा है-

श्लोकार्थ-आचारवत्त्वादि आठ, बारह तप, दश स्थितिकल्प और षट् आवश्यक ये ३६ गुण आचार्य परमेष्ठी के होते हैं।।७६।।

आचारवत्त्वादि आठ गुण, बारह प्रकार का तपश्चरण, दस प्रकार का स्थितिकल्प और छह प्रकार के आवश्यक कर्तव्य ये ८+१२+१०+६·३६ मूलगुण आचार्य के होते हैं।

आचारवत्त्वादि के नाम बताते हैं-

श्लोकार्थ-आचार, आधार, व्यवहार, प्रकारक, आयापायदिव्, उत्पीड़न, अपरिस्रावी और सुखावह ये आचारवत्त्वादिक के आठ नाम हैं।।७७।।

तप और आवश्यक तो ज्ञात ही हैं, अब स्थितिकल्प के भेद बताते हैं-

आचेलक्य, औद्देशिकपिंडवर्जन, शय्याधरपिंडवर्जन, राजकीयपिण्डवर्जन, कृतिकर्म, व्रतारोेपणयोग्यता, ज्येष्ठता, प्रतिक्रमण, मासैकवासिता और वर्षायोग ये दश स्थितिकल्प होते हैं।

अथवा बारह तप, दश धर्म, पाँच आचार, छह आवश्यक और तीन गुप्तियाँ ये १२+१०+५+६+३·३६ गुण भी माने गये हैं तथा वे आचार्य शिष्यों के संग्रह-अनुग्रह-निग्रह में भी कुशल होते हैं।

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उक्तं च धवलाटीकाकारेण

संगह-णुग्गहकुसलो, सुत्तत्थ-विसारओ पहिय-कित्ती।

सारण-वारण-सोहण-किरियुज्जुत्तो हु आइरियो।।[८]
सारणं-आचरणं, वारणं-निषेध:, शोधनं-व्रतानां शुद्धि:, एतासु क्रियासु नित्योद्युक्त: आचार्यदेवो भवति।

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हिंदी अनुवाद

गाथार्थ-शिष्यों के संग्रह तथा अनुग्रह में कुशल, सूत्रोें (आर्षग्रन्थों) के अर्थ करने में विशारद हैं, जिनकी कीर्ति सब जगह फैल रही है तथा सारण-वारण-शोधन इन सभी क्रियाओं में आचार्य परमेष्ठी सदा उद्यमशील रहते हैं।

यहाँ सारण का मतलब आचरण, वारण-निषेध, शोधन-व्रतों की शुद्धि है। इन सभी क्रियाओं में उद्यमशील सूरिवर्य मुनिवर को आचार्य परमेष्ठी जानना चाहिए।

विशेषार्थ-मूलाचार, अनगार धर्मामृत आदि आचारग्रंथों के आधार से पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी ने ‘दिगम्बरमुनि’’ ग्रंथ में आचार्य के ३६ मूलगुणों का वर्णन किया है, उसी को यहाँ दर्शाया जा रहा है।

जो पाँच प्रकार के आचारों का स्वयं आचरण करते हैं और दूसरे साधुओं से आचरण कराते हैं वे ‘‘आचार्य’’ कहलाते हैं। जो चौदह विद्याओं के पारंगत, ग्यारह अंग के धारी अथवा आचारांगमात्र के धारी हैं अथवा तत्कालीन स्वसमय और परसमय में पारंगत हैं। मेरु के समान निश्चल, पृथ्वी के समान सहनशील, समुद्र के समान दोषों को बारह फैक देने वाले और सात प्रकार के भय से रहित हैं। देश, कुल और जाति से शुद्ध हैं, जो शिष्यों के संग्रह और उन पर अनुग्रह करने में कुशल हैं, सूत्र के अर्थ में विशारद हैं, यशस्वी हैं तथा सारण-आचरण, वारण-निषेध और शोधन-व्रतों की शुद्धि करने वाली क्रियाओं में उद्युक्त (उद्यमशील) हैं, वे ही आचार्य परमेष्ठी कहलाते हैं।’’

संघ के आचार्य स्वयं जब सल्लेखना ग्रहण के सम्मुख होते हैं तब वे अपने योग्य शिष्य को विधिवत् चतुर्विध संघ के समक्ष आचार्यपद देकर नूतन पिच्छिका समर्पित कर देते हैं और ऐसा कहते हैं कि ‘‘आज से प्रायश्चित्त शास्त्र का अध्ययन करके शिष्यों को दीक्षा, प्रायश्चित आदि आचार्य का कार्य तुम्हें करना है।’’ उस समय गुरु उस आचार्य को छत्तीस गुणों के पालन का उपदेश देते हैं।

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आचार्य के छत्तीस गुण

आचारवत्त्व आदि ८, १२ तप, १० स्थितिकल्प और ६ आवश्यक ये छत्तीस गुण होते हैं।

आचारवत्त्व आदि ८ गुण-आचारवत्त्व, आधारवत्त्व, व्यवहारपटुता, प्रकारकत्व, आयापायदर्शिता, उत्पीलन, अपरिस्रवण और सुखावहन।

आचारवत्त्व-आचार के पाँच भेद हैं-ज्ञानाचार, दर्शनाचार, चारित्राचार, तपाचार और वीर्याचार।

दर्शनाचार-जीवादि पदार्थों का श्रद्धान करना। अथवा सम्यक्त्व को पच्चीस मल दोष रहित-निर्दोष करना यह दर्शनाचार है। दर्शन शुद्धि के आठ भेद हैं-

नि:शंकित-तत्त्वों में शंका नहीं करना।

नि:कांक्षित-उभयलोक संबंधी भोगों की आकांक्षा नहीं करना।

निर्विचिकित्सा-अस्नानव्रत, नग्नता आदि में अरुचि नहीं करना।

अमूढ़दृष्टि-मूढ़ता या मिथ्या परिणामों से रहित होना।

उपगूहन-चतुर्विध संघ के दोषों का आच्छादन करना।

स्थितिकरण-रत्नत्रय से च्युत होने वाले को उपदेशादि द्वारा स्थिर करना।

वात्सल्य-साधर्मियों में अकृत्रिम स्नेह रखना।

प्रभावना-‘‘दान, पूजन, व्याख्यान, वाद, मंत्र, तंत्र आदि से मिथ्यामतों का निरसन कर अर्हंत के शासन को प्रकाशित करना।’’ ‘‘ये नि:शंकित आदि आठ गुण हैं इन्हें दर्शनशुद्धि कहते हैं। इनके विपरीत इतने ही अतिचार हो जाते हैं।

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ज्ञानाचार

जिससे आत्मा का यथार्थ स्वरूप जाना जाता है, जिससे मनोव्यापार रोका जाता है और जिससे आत्मा कर्ममल से रहित होती है वही सम्यग्ज्ञान है। उसको आठ भेद सहित पालन करना ज्ञानाचार है। ये भेद ज्ञान की आठ शुद्धिरूप हैं।

कालशुद्धि-स्वाध्याय की बेला में पठन, शास्त्रों का पुन:-पुन: वाचन, व्याख्यान आदि करना कालशुद्धि है।

विनयशुद्धि-मन, वचन, काय की शुद्धिपूर्वक अत्यर्थ विनय से श्रुत का पठन-पाठन करना।

उपधान शुद्धि-कुछ नियम लेकर अर्थात् ‘‘जब तक यह गं्रथ पूरा न हो तब तक मेरा दूध का त्याग है’’ इत्यादि नियम लेकर पढ़ना।

बहुमान शुद्धि-पूजा, सत्कारपूर्वक पठन आदि करना।

अनिह्नव शुद्धि-जिस गुरु से शास्त्र पढ़ा है उसका नाम प्रकाशित करना अथवा जिस ग्रंथ से ज्ञान हुआ है, उसको नहीं छिपाना।

व्यंजन शुद्धि-वर्ण, पद वाक्यों को शुद्ध पढ़ना।

अर्थ शुद्धि-पदों का अनेकांत रूप अर्थ करना।

तदुभय शुद्धि-शब्द और अर्थ को शुद्धिपूर्वक पढ़ना।

इस प्रकार कालादि शुद्धि के भेद से ज्ञानाचार के भी आठ भेद होते हैं।

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चारित्राचार

पाप क्रिया से निवृत्ति चारित्र है। उसके पाँच भेद हैं-प्राणिवध, असत्य, चोरी, अब्रह्म और परिग्रह इन पाँच पापों का सर्वथा त्याग कर देना ये पाँच चारित्राचार हैं।

‘‘पाँच महाव्रतों की रक्षा के लिए रात्रिभोजन का भी त्याग किया जाता है। इसे छठा अणुव्रत भी कहते हैं। अन्यत्र-साधुओं के प्रतिक्रमण में भी कहा है-‘‘रात्रिभोजन से विरक्त होना छठा अणुव्रत है।’’

अथवा पाँच समिति और तीन गुप्तिरूप आठ प्रकार का चारित्राचार है।

‘‘चंपापुरी, पावापुरी, गिरनार आदि तीर्थयात्रा हेतु, साधुओं के सन्यास निमित्त, देव, धर्म आदि के हेतु अथवा शास्त्रों को सुनने-सुनाने के लिए अथवा प्रतिक्रमण आदि सुनने-सुनाने के लिए अपररात्रिक स्वाध्याय, प्रतिक्रमण और देववंदना करके सूर्योदय हो जाने पर प्रासुकमार्ग में चार हाथ आगे जमीन देखते हुए गमन करना ईर्यासमिति है।’’ क्योंकि साधु किसी भी लौकिक कार्य के लिए या व्यर्थ गमन नहीं करते हैं। ऐसे ही शास्त्रानुकूल बोलना, आहार करना, कुछ वस्तु रखना, उठाना और प्रासुक स्थान में मलमूत्रादि विसर्जन करना ये पाँच समितियाँ हैं।

अशुभ मन, वचन और काय का गोपन करना अर्थात् मन, वचन, काय की अशुभ प्रवृत्ति का त्याग करना गुप्ति है। अथवा स्वाध्याय और ध्यान में तत्पर हुए मुनि के जो मन, वचन, काय का संवरण होता है उसी का नाम गुप्ति है। इसके मन, वचन, काय की अपेक्षा तीन भेद हो जाते हैं।

इन्हें ‘‘अष्टप्रवचनमातृका’’ भी कहते हैं। क्योंकि ये मुनियों के रत्नत्रय की रक्षा करती हैं जैसे कि माता अपने पुत्र की रक्षा करती है।’’

पाँच महाव्रत, पाँच समिति और तीन गुप्तिरूप तेरह प्रकार का चारित्र भी माना है इनका पालन करना-कराना ही चारित्राचार है।

‘‘पाँच महाव्रतों की रक्षा के लिए रात्रिभोजन निवृत्तिरूप छठा अणुव्रत, आठ प्रवचन मातृकाएँ और पच्चीस भावनाएँ मानी गयी हैं।’’

उसमें से सभी का लक्षण स्पष्ट है। अब पाँच व्रतों की पच्चीस भावनाओं को कहते हैं-

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भावना

व्रतों की पूर्णता हेतु या स्थिरता हेतु जो पुन:-पुन: भावित की जाती हैं, पाली जाती हैं वे भावनाएँ हैं। पाँच व्रतों में प्रत्येक की पाँच-पाँच भावनाएँ होने से पच्चीस भावनाएँ हो जाती हैं।

अहिंसा व्रत की ५ भावनाअहिंसा व्रत की ५ भावना-एषणासमिति, आदाननिक्षेपणसमिति, ईर्यासमिति, मनोगुप्ति और आलोकितपानभोजन ये पाँच भावनाएँ हैं। इनको भाने वाला साधु जीवदया का प्रतिपालन करता है अर्थात् प्रथम महाव्रत परिपूर्ण होता है। इसलिए अहिंसा महाव्रत की साधनरूप ये भावनाएँ हैं, ऐसा समझो। इसमें से चार का लक्षण आ चुका है। आलोकितपानभोजन में सूर्य के प्रकाश में चक्षु इन्द्रिय से देखकर आगम के ज्ञानपूर्वक भोजनपान करना चाहिए।

सत्यव्रत की ५ भावनाक्रोध, लोभ, भय और हास्य का त्याग करना तथा अनुवीचि-सूत्र के अनुकूल वचन बोलना ये पाँच भावनाएँ सत्यव्रत की पूर्णता हेतु हैं।

अचौर्य व्रत की ५ भावना किसी वस्तु, पुस्तक आदि को उनसे माँग कर लेना ‘‘याचना’’ है, किसी की वस्तु उनकी अनुमति से ग्रहण करना और परोक्ष में लेने पर उन्हें कह देना ‘‘समनुज्ञापना’’ है, ग्रहण की हुई परवस्तु में आत्मभाव नहीं करना ‘‘अनन्यभाव’’ है, त्यक्त प्रतिसेवा और सहधर्मी साधुओं के उपकरण-पुस्तक, पिच्छी आदि सूत्रानुकूल सेवन करना इस प्रकार यांचा, समनुज्ञापना, अनन्यभाव, त्यक्त प्रतिसेवी और साधर्मी के उपकरण का अनुवीचि सेवन ये पाँच भावनाएँ अचौर्यव्रत को पूर्ण करने वाली हैं।

ब्रह्मचर्यव्रत की ५ भावना -महिलाओं को कामविकार से नहीं देखना, पूर्व में भोगे हुए भोगों का स्मरण नहीं करना, रागभाव के कारणभूत पदार्थों से संसक्त वसतिका में नहीं रहना अथवा असंयमी लोगों के साथ नहीं रहना, शृँगारिक कथा-विकथा आदि नहीं करना, बल और दर्प उत्पन्न करने वाले रसों का सेवन नहीं करना। ये पाँच भावनाएँ ब्रह्मचर्यव्रत को पूर्ण करने वाली हैं।

परिग्रहत्यागव्रत की ५ भावना पंच इन्द्रियों के प्रिय और अप्रिय विषय जो कि शब्द, रस, स्पर्श, रूप और गंध में परिग्रह रहित मुनि रागद्वेष नहीं करते हैं। इसलिए इन पाँच भावनाओं से अपरिग्रहमहाव्रत पूर्ण होता है।

‘‘इन पच्चीस भावनाओं की भावना करने वाला साधु सोता हुआ भी अथवा मूच्र्छा को प्राप्त हुआ भी अपने सभी व्रतों में किंचित् मात्र भी पीड़ा-विराधना को नहीं करता है पुन: सावधान रहते हुए-जागृत रहते हुए की बात ही क्या है ? वह साधु स्वप्न में भी इन भावनाओं को ही देखता है किन्तु व्रतों की विराधना को नहीं देखता है।’’

तप आचार-‘‘जो शरीर और इन्द्रियों को तपाता है-दहन करता है, वह तप है।’’ यह कर्मों को दहन करने में समर्थ है। इसके दो भेद है-बाह्य और अभ्यन्तर। इन दोनों के भी छह-छह भेद होने से बारह भेद हो जाते हैं। इन बारह प्रकार के तपों का अनुष्ठान करना तप आचार है।

वीर्याचार-अपने बल और वीर्य को न छिपाकर जो साधु यथोक्त आचरण में अर्थात् प्राणिसंयम-इन्द्रियसंयम के पालन और तपश्चरण में अपने आपको लगाते हैं। कायरता प्रगट न करके हमेशा चारित्र के आचरण में और तप में उत्साहित रहते हैं, यही वीर्याचार है। इन पाँच आचारों का पालन करना-कराना ही आचारवत्त्व है।

२. आधारवत्त्व-जिस श्रुतज्ञानरूपी संपत्ति की कोई तुलना नहीं कर सकता उसको अथवा नौ पूर्व, दशपूर्व या चौदह पूर्व तक के श्रुतज्ञान को अथवा कल्पव्यवहार के धारण करने को आधारवत्त्व कहते हैं।

३. व्यवहारपटुता-व्यवहार नाम प्रायश्चित का है, वह पाँच प्रकार का है। इसकी कुशलता ही व्यवहारपटुता है। जिन्होंने अनेक बार प्रायश्चित्त देते हुए देखा है, स्वयं ग्रहण किया है, दूसरों को दिलवाया है वे ही व्यवहारपटु हैं।

व्यवहार-प्रायश्चित्त के ५ भेद-आगम, श्रुत, आज्ञा, धारणा और जीत।

ग्यारह अंग शास्त्रों में प्रायश्चित्त वर्णित है अथवा उनके आधार से जो प्रायश्चित्त दिया जाता है उसको आगम कहते हैं।

चौदहपूर्व में बताये हुए या तदनुसार दिये हुए को श्रुत कहते हैं। कोई आचार्य समाधिमरण के लिए उद्युक्त हैं, उनकी जंघा का बल घट गया-वे दूर तक विहार नहीं कर सकते, वे आचार्य किसी योग्य आचार्य के पास अपने योग्य ज्येष्ठ शिष्य को भेजकर उसके द्वारा ही अपने दोषों की आलोचना कराकर प्रायश्चित्त मंगाकर ग्रहण करते हैं, उसको आज्ञा कहते हैं।

कोई आचार्य उपर्युक्त स्थिति में हैं और उनके पास शिष्यादि भी नहीं हैं तो वे स्वयं अपने दोषों की आलोचना कर पहले के अवधारित (जाने हुए) प्रायश्चित्त को ग्रहण करते हैं वह धारणा प्रायश्चित्त है।

बहत्तर पुरुषों की अपेक्षा जो प्रायश्चित्त बताया गया है, उसको जीत कहते हैं। इनमें निष्णात आचार्य व्यवहारपटु कहलाते हैं।

४. प्रकारकत्व-जो समाधिमरण कराने में या उसकी वैयावृत्य करने में कुशल हैं उन्हें परिचारी अथवा प्रकारी कहते हैं, यह गुण प्रकारकत्व कहलाता है।

५. आयापायदर्शिता-आलोचना करने के लिए उद्यत हुए क्षपक (समाधिमरण करने वाले साधु) के गुण और दोषों के प्रकाशित करने को आयापायदर्शिता अथवा गुणदोषप्रवत्तृता कहते हैं।

'६. उत्पीलन'-कोई साधु या क्षपक यदि दोषों को पूर्णतया नहीं निकालता है तो उसके दोषों को युक्ति और बल से बाहर निकाल देना उत्पीलन गुण है।

७. अपरिस्रवण-शिष्य के गोप्य दोष को सुनकर जो प्रकट नहीं करते हैं उनके अपरिस्रवण गुण होता है।

'८. सुखावहन'क्षुधादि से पीड़ित साधु को उत्तम कथा आदि के द्वारा शांत करके सुखी करते हैं वे सुखावह गुण के धारी हैं।

इस प्रकार इन आठ गुण के धारी आचार्य आचारी, आधारी, व्यवहारी, प्रकारक, आयापायदिक्, उत्पीडक, अपरिस्रावी और सुखावह होते हैं।

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स्थितिकल्प के दस भेद

आचेलक्य, औद्देशिकपिंडत्याग, शैयाधरपिंडत्याग, राजकीयपिंडत्याग, कृतिकर्म, व्रतारोपण योग्यता, ज्येष्ठता, प्रतिक्रमण, मासैकवासिता और योग इस प्रकार स्थितिकल्पगुण दश हैं।

१. आचेलक्य-वस्त्रादि संपूर्ण परिग्रह के अभाव को अथवा नग्नता को आचेलक्य कहते हैं। नग्न दिगम्बर साधु लंगोटीमात्र को भी नहीं रखते हैं चूँकि उसे धोना, सुखाना, संभालना, फटने पर याचना करना आदि अनेक आकुलताएँ होती हैं, जिससे ध्यान-अध्ययन की पूर्णतया सिद्धि असंभव है तथा तीर्थंकरों के आचरण का अनुसरण भी नग्नता से ही होता है।

२. औद्देशिकपिंड त्याग-जो मुनियों के उद्देश्य से तैयार किया गया है, ऐसे भोजन, पान आदि द्रव्य को ग्रहण नहीं करना औद्देशिक पिंड-आहार का त्याग गुण होता है।

३. शैयाधरपिंड त्याग-वसतिका बनवाने वाला, उसका संस्कार करने वाला और वहाँ पर व्यवस्था आदि करने वाला ये तीनों ही शैयाधर शब्द से कहे जाते हैं। इनके आहार, उपकरण आदि न लेने को शैयाधर पिंड त्याग कहते हैं। अभिप्राय यह है कि किसी ने वसतिका दान किया, साधु वहाँ ठहरे पुन: ‘‘यदि मैं आहार नहीं दूँगा तो लोग क्या कहेंगे कि इसने साधु को ठहरा तो लिया किन्तु उन्हें आहार नहीं दिया’’ इत्यादि भावना से संक्लिष्ट परिणाम करके आहार देने से दोषास्पद है। यदि कोई गृहस्थ मान कषाय या भय, संकोच आदि रहित होकर मात्र पात्रदान की भावना से वसतिका दान देकर आहारदान भी देता है, तो उसमें कोई दोष नहीं है।

कोई आचार्य इसको शैयागृहपिंड त्याग कहकर इसका ऐसा अर्थ करते हैं कि विहार करते हुए मार्ग में रात्रि को जिस गृह या वसति में ठहरें या शयन आदि करें वहाँ दूसरे दिन आहार नहीं लेना। अथवा वसतिका संबंधी द्रव्य के निमित्त से जो भोजन तैयार किया गया हो, उसको नहीं लेना यह ‘शैयागृहपिंडोज्झा’ गुण है।

४. राजकीय पिंड त्याग-इक्ष्वाकु कुल आदि में जन्में अथवा अन्य राजाओं के यहाँ आहार नहीं लेना राजकीयपिंडत्याग गुण है। अभिप्राय यह है कि ऐसे घरों में भयंकर कुत्ते आदि जन्तु अपघात कर सकते हैं या पशु-गाय, भैंस आदि या गर्विष्ठ नौकर-चाकर आदि अपमान कर सकते हैं इत्यादि बाधक कारणों के प्रसंग से राजाओं के यहाँ का आहार नहीं लेना चाहिए। उपर्युक्त दोषों से रहित यदि होवे तो लेने में कोई दोष नहीं है। भरतसम्राट आदि महाराजाओं के यहाँ तो आहार होते ही थे।

५. कृतिकर्म-विधिवत् आवश्यकों का पालन करना अथवा गुरुजनों का विनयकर्म करना कृतिकर्म है।

६. व्रतारोपणयोग्यता-शिष्यों में व्रतों के आरोपण करने की योग्यता होना यह छठा गुण है।

७. ज्येष्ठता-जो जाति, कुल, वैभव, प्रताप और कीर्ति की अपेक्षा गृहस्थों में महान् रहे हैं, जो ज्ञान और चर्या आदि में उपाध्याय और आर्यिका आदि से भी महान हैं, क्रियाकर्म के अनुष्ठान में भी श्रेष्ठ हैं उनके यह सातवाँ गुण होता है।

८. प्रतिक्रमण-प्रतिक्रमण के नाना भेदों को समझने वाले और विधिवत् करने-कराने वाले आचार्य इस गुण के धारी होते हैं।

९. मासैकवासिता-जिनके तीस दिन-रात्रि तक एक ही स्थान में या ग्राम में रहने का व्रत हो उनके यह मासैकवासिता गुण होता हैै। चूँकि अधिक दिन एक जगह रहने से उद्गम आदि, क्षेत्र में ममता, गौरव में कमी, आलस, शरीर में सुकुमारता, भावना का अभाव, ज्ञातभिक्षा का ग्रहण आदि दोष होने लगते हैं।

मूलाराधना में इसका ऐसा अर्थ किया है कि ‘‘चातुर्मास के एक महीने पहले और पीछे उसी ग्राम में रहना।’’

१०. योग-वर्षाकाल में चार महीने एक जगह रहना। चूँकि वृष्टि के निमित्त से त्रस-स्थावर जीवों की बहुलता हो जाती है, इससे विहार में असंयम होगा, वृष्टि से ठंडी हवा चलने से आत्मविराधना-शरीर में कष्ट, व्याधि, मरण आदि आ जावेंगे। जल, कीचड़ आदि के निमित्त से गिर जाना आदि संभव है। इत्यादि कारणों से चातुर्मास में एक सौ बीस दिन तक एक ग्राम में रहना यह उत्सर्ग (उत्कृष्ट) मार्ग है। अपवाद मार्ग की अपेक्षा विशेष कारण उपस्थित होने पर अधिक अथवा कम दिन भी निवास किया जा सकता है। अधिक में आषाढ़ शुक्ला दशमी से कार्तिक शुक्ला पूर्णिमा के ऊपर तीस दिन तक निवास किया जा सकता है। अत्यधिक जलवृष्टि, श्रुत का विशेष लाभ, शक्ति का अभाव और किसी की वैयावृत्ति आदि के विशेष प्रसंग आ जाने पर, इन प्रयोजनों के उद्देश्य से एक स्थान में अधिक दिन निवास किया जा सकता है। यह उत्कृष्ट काल का प्रमाण है।

इस प्रकार से आचार्य के ये स्थितिकल्प नाम के दश गुण बताये हैं।

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आवश्यक के छह भेद

जो अवश-जितेन्द्रिय मुनि का कर्तव्य है वह आवश्यक कहलाता है। उसके छह भेद हैं-समता, स्तुति, वंदना, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान और कायोत्सर्ग।

समता-‘‘जीवन-मरण, लाभ-अलाभ, सुख-दुख आदि में हर्ष विषाद नहीं करना, समान भाव रखना समता है। इसे ही सामायिक कहते हैं। त्रिकाल में देववंदना करना यह भी सामायिकव्रत है।’’ प्रात:, मध्यान्ह और सायंकाल में विधिवत् कम से कम एक मुहूर्त-४८ मिनट तक सामायिक करना होता है।

स्तुति-वृषभ आदि चौबीस तीर्थंकरों की स्तुति करना स्तव नाम का आवश्यक है।

वंदना-अर्हंतों को, सिद्धों को, उनकी प्रतिमाओं को, जिनवाणी को और गुरुओं को कृतिकर्मपूर्वक नमस्कार करना वंदना है।

प्रतिक्रमण-अहिंसादि व्रतों में जो अतीचार आदि दोष उत्पन्न होते हैं, उनका निंदा-गर्हापूर्वक शोधन करना-दूर करना प्रतिक्रमण है। इसके ऐर्यापथिक, दैवसिक आदि सात भेद हैं।

प्रत्याख्यान-मन, वचन, काय से भविष्य के दोषों का त्याग करना प्रत्याख्यान है। आहार ग्रहण के अनंतर गुरु के पास अगले दिन आहार ग्रहण करने तक के लिए जो चतुराहार का त्याग किया जाता है, वह प्रत्याख्यान कहलाता है।

‘‘अतीतकाल के दोष का निराकरण करना प्रतिक्रमण है। अनागत और वर्तमानकाल में द्रव्यादि दोष का परिहार करना प्रत्याख्यान है। यही इन दोनों में अंतर है। तप के लिए निर्दोष वस्तु का त्याग करना भी प्रत्याख्यान है। किन्तु प्रतिक्रमण दोषों के निराकरण हेतु ही है।’’

कायोत्सर्ग-दैवसिक, रात्रिक आदि क्रियाओं में पच्चीस या सत्ताईस उच्छ्वास प्रमाण से तथा चौवन, एक सौ आठ आदि श्वासोच्छ्वासपूर्वक णमोकार मंत्र का स्मरण करना। काय-शरीर का उत्सर्ग-त्याग अर्थात् काय से ममत्व का त्याग करना कायोत्सर्ग है।

इस प्रकार आचारवत्त्वादि ८+तपश्चरण १२+ स्थितिकल्प १०+और आवश्यक ६·३६ गुणों को पालन करने वाले आचार्य परमेष्ठी होते हैं।

अन्यत्र अन्य प्रकार से भी बताये हैं। यथा-‘‘१२ तप, १० धर्म, ५ आचार, ६ आवश्यक और तीन गुप्ति ये आचार्य के ३६ गुण होते हैं।’’ १२ तप आदि का वर्णन किया जा चुका है।

दशधर्म का वर्णन-

उत्तमक्षमा-आहार के लिए अथवा विहार के लिए साधु भ्रमण करते हैं, उस समय कोई दुष्टजन अपशब्द, उपहास अथवा तिरस्कार कर देते हैं या मारपीट देते हैं तो भी मन में कलुषता का न होना उत्तम क्षमा है।

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नम: उपाध्यायेभ्य:


चतुर्दशविद्यास्थानव्याख्यातार: [९]उपाध्याया: तात्कालिकप्रवचनव्याख्यातारो वा। अत्र चतुर्दशविद्यास्थानेन चतुर्दशपूर्वाणि एव ज्ञातव्य:। उक्तं च-
‘‘एदेसिं चोद्दसविज्जाट्ठाणाणं विसयपरूवणा जाणिय कायव्वा।’’
चोद्दसपुव्वमहोयहि-महिगम्म सिवत्थिओ सिवत्थीणं।
सीलंधराण वत्ता, होइ मुणी सो उवज्झायो।।[१०]
य: चतुर्दशपूर्वमहोदधिमवगाह्य मोक्षमार्गे स्वयं स्थित: सन् मोक्षार्थिनां शीलव्रतधारिणां वक्ता उपदेशक: अध्यापकोऽसौ उपाध्यायो भवति।
अस्योपाध्यायस्य एकादशाङ्गचतुर्दशपूर्वज्ञानापेक्षया पंचविंशतिगुणा: भवन्ति।

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हिंदी अनुवाद

उत्तम मार्दव-जाति, कुल, विद्या आदि का घमंड नहीं करना उत्तम मार्दव है।
उत्तम आर्जव-मन, वचन और काय को सरल रखना आर्जव है।
उत्तम शौच-प्रकर्ष प्राप्त लोभ का त्याग करना उत्तम शौच है।
उत्तम सत्य-अच्छे पुरुषों के साथ साधु वचन बोलना।
उत्तम संयम-प्राणियों की हिंसा और इन्द्रियों के विषयों का परिहार करना।
उत्तम तप-कर्मक्षय हेतु बारह प्रकार का तपश्चरण करना।
उत्तम त्याग-संयत के योग्य ज्ञान आदि का दान करना।
उत्तम आकिंचन्य-जो शरीर आदि हैं उनमें भी संस्कार को दूर करने के लिए ‘‘यह मेरा है’’ इस प्रकार के अभिप्राय का त्याग करना।
उत्तम ब्रह्मचर्य-स्त्रीमात्र का त्याग करना ‘‘अथवा स्वतंत्रवृत्ति का त्याग करने के लिए गुरुकुल में निवास करना ब्रह्मचर्य है।’’

ख्याति, पूजा आदि की अपेक्षा बिना आत्मविशुद्धि हेतु इन धर्मों को पालने के लिए ही इनमें उत्तम विशेषण लगाया गया है। यहाँ तक आचार्य के ३६ गुणों का वर्णन दो प्रकार से हो चुका है।

उपाध्यायों को नमस्कार हो-चौदह विद्यास्थान (चौदह पूर्व) के व्याख्यान करने वाले उपाध्याय होते हैं अथवा तत्कालीन प्रवचन-परमागम के व्याख्यान करने वाले भी उपाध्याय होते हैं। यहाँ चौदह विद्यास्थान से चौदह पूर्व ही जानना चाहिए। क्योंकि कषायपाहुड़ में पृ. २६ पर कहा है-‘‘इन चौदह विद्यास्थानों के विषय का प्ररूपण जानकर करना चाहिए।

गाथार्थ-जो साधु चौदह पूर्व रूपी समुद्र में प्रवेश करके अर्थात् परमागम का अभ्यास करके मोक्षमार्ग में स्थित हैं तथा मोक्ष के इच्छुक शीलंधरों-मुनियों को उपदेश देते हैं, उन मुनीश्वरों को उपाध्याय परमेष्ठी कहते हैं।

जो चौदह पूर्व रूपी महासमुद्र में अवगाहन करके मोक्षमार्ग में स्वयं स्थित होते हुए मोक्षार्थी शील व्रतों के धारी मुनियों के वक्ता हैं, उपदेशक हैं, अध्यापक हैं, वे उपाध्याय परमेष्ठी होते हैं।

इन उपाध्याय गुरु के ग्यारह अंग-चौदह पूर्व ज्ञान की अपेक्षा पच्चीस गुण होते हैं।

विशेषार्थ-उपाध्याय परमेष्ठी केवल पठन-पाठन में ही लगे रहते हैं।


नम: सर्वसाधुभ्य:-

अनन्तज्ञानादिशुद्धात्मस्वरूपं साधयन्तीति साधव:। पञ्चमहाव्रतधरास्त्रिगुप्तिगुप्ता: अष्टादशशीलसहस्र-धराश्चतुरशीति-शतसहस्रगुणधराश्च साधव:।[११]
ये अष्टाविंशतिमूलगुणान्विता जिनमुद्राधारिणो दिगम्बरा: संयमोपकरण-मयूरपिच्छपिच्छिका-शौचोपकरणकाष्ठकमण्डलुधारिणस्ते नग्नवेषधरा मुनयो एवात्र गृह्यन्ते। तथा च आचार्या उपाध्याया: अपि अष्टाविंशतिमूलगुणसहिता एव।
के ते मूलगुणा: ? इत्युच्यंते-
वदसमिदिंदियरोधो, लोचो आवासयमचेलमण्हाणं।
खिदिसयणमदंतवणं, ठिदिभोयणमेयभत्तं च।।
एदे खलु मूलगुणा, समणाणं जिणवरेहिं पण्णत्ता।।[१२]

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हिंदी अनुवाद

बाकी शिष्यों का संग्रह करना, उन्हें दीक्षा देना, प्रायश्चित देना, उनका संरक्षण करना, संघ की व्यवस्था संभालना आदि कार्य आचार्य के हैं सो ये नहीं करते हैं।

अन्यत्र उपाध्याय के मुख्य पच्चीस गुण माने हैं-

‘‘ग्यारह अंग और चौदह पूर्व को आप पढ़ते हैं और अन्य को पढ़ाते हैं। ये पच्चीस गुण उपाध्याय परमेष्ठी के होते हैं।’’

ग्यारह अंग-१. आचारांग २. सूत्रकृतांग ३. स्थानांग ४. समवायांग ५. व्याख्याप्रज्ञप्ति ६. ज्ञातृकथांग ७. उपासकाध्ययनांग ८. अंत:कृद्दशांग ९. अनुत्तरोत्पाददशांग १०. प्रश्नव्याकरणाांग ११. विपाकसूत्रांग।

चौदह पूर्व-१. उत्पादपूर्व २. अग्रायणीयपूर्व ३. वीर्यानुवादपूर्व ४. अस्तिनास्तिप्रवादपूर्व ५. ज्ञानप्रवादपूर्व ६. कर्मप्रवादपूर्व ७. सत्यप्रवादपूर्व ८. आत्मप्रवादपूर्व ९. प्रत्याख्यानपूर्व १०. विद्यानुवादपूर्व ११. कल्याणवादपूर्व १२. प्राणावायपूर्व १३. क्रियाविशालपूर्व और १४. लोकविंदुसारपूर्व।

आज इन अंगपूर्वों का ज्ञान न रहते हुए भी उनके कुछ अंशरूप षट्खण्डागम, कसायपाहुड़ आदि ग्रंथ तथा उन्हीं की परम्परा से आगत समयसार, मूलाचार आदि ग्रंथ विद्यमान हैं। तत्कालीन सभी ग्रंथों के पढ़ने-पढ़ाने वाले भी उपाध्याय परमेष्ठी हो सकते हैं। ‘‘धवला’’ में ‘‘तात्कालिकप्रवचनव्याख्यातारो वा’’ इस पद से स्पष्ट किया है।

सर्वसाधुओं को नमस्कार हो-जो अनन्तज्ञानादि रूप शुद्ध आत्मा के स्वरूप की साधना करते हैं उन्हें साधु कहते हैं। पाँच महाव्रत के धारी, तीन गुप्तियों से गुप्त-रक्षित, अठारह हजार शील के धारक और चौरासी लाख उत्तर गुणों का पालन करने वाले साधुपरमेष्ठी कहलाते हैं।

जो अट्ठाईस मूलगुणों से सहित, जिनमुद्राधारी-दिगम्बर, संयम का उपकरण मयूर पंख की पिच्छिका तथा शौच का उपकरण काष्ठ कमंडलु धारण करते हैं उन नग्नवेषधारी मुनिराजों को ही यहाँ ग्रहण किया गया है तथा आचार्य उपाध्याय भी अट्ठाईस मूलगुणों से सहित ही होते हैं।

वे मूलगुण कौन से हैं ? उनके नाम बताते हैं-

गाथार्थ-५ महाव्रत, ५ समिति, पंचेन्द्रियनिरोध, छह आवश्यक, केशलोंच, अचेलक, अस्नान, क्षितिशयन, अदन्तधावन, खड़े होकर भोजन करना और एक बार भोजन करना ये सब श्रमणों के ५±५±५±६±७·२८ मूलगुण जिनेन्द्र भगवान ने बताए हैं।


अत्राचार्योपाध्यायसाधव एते त्रयोऽपि भावलिंगिनो मुनय एव गृहीतव्या:, किंच त्रिसंख्योननवकोटि-मुनीश्वराणां संख्यायां षष्ठगुणस्थानादारभ्य अयोगकेवलिपर्यन्तमुनय: संगृहीता: सन्ति। अतो ज्ञायतेऽत्र पंचनमस्कारमंत्रे द्रव्यलिंगिन: साधवोऽन्यवेषधारिणो वा न गृहीतव्या भवन्तीति। प्रत्युत षष्ठगुणस्थानादारभ्य द्वादशमगुणस्थानवर्तिपर्यन्तमुनयो ज्ञातव्या:, किंच त्रयोदशम-चतुर्दशमगुणस्थानवर्तिन: अर्हत्सु अंतर्भवन्तीति।

अस्मिन् महामंत्रे पंचपरमेष्ठिनां नमस्कारो विहित:। क्रमापेक्षया कश्चिदाह-
अर्हत् सिद्धयो: क्रम:-
‘‘विगताशेषलेपेषु सिद्धेषु सत्स्वर्हतां सलेपानामादौ किमिति नमस्कार: क्रियते इति चेन्नैष दोष:, गुणाधिकसिद्धेषु श्रद्धाधिक्यनिबंधनत्वात् असत्यर्हति आप्तागमपदार्थावगमो न भवेदस्मदादीनां संजातश्चैतत्प्रसादादित्युपकारापेक्षया वादावर्हन्नमस्क्रियते। न पक्षपातो दोषाय, शुभपक्षवृत्ते: श्रेयोहेतुत्वात्।’’

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हिंदी अनुवाद

भावार्थ-सामान्यत: २८ मूलगुण तो आचार्य-उपाध्याय-साधु सभी के होते ही हैं क्योंकि सर्वप्रथम मुनिदीक्षा में इन २८ मूलगुणों का आरोपण ही किया जाता है पुन: आगे की श्रेणियाँ तो बाद में योग्यतानुसार प्राप्त होती हैं तब उन-उन पदों के अनुसार भी मूलगुणों का पालन करना होता है किन्तु समाधि के समय अन्तकाल में भी समस्त पदों का त्याग कर सामान्य साधु के रूप में २८ मूलगुणों का पालन ही आवश्यक होता है, तभी निर्दोषरीत्या सल्लेखनामरण संभव है।

यहाँ आचार्य, उपाध्याय, साधु इन तीनों से भावलिंगी मुनियों को ही ग्रहण करना चाहिए और तो क्या तीन कम नव करोड़ मुनीश्वरों की संख्या में छठे गुणस्थान से लेकर अयोगकेवली नामक चौदहवें गुणस्थानपर्यंत समस्त मुनियों का संग्रह हो जाता है। अत: यहाँ यह जानना चाहिए कि इस पंच नमस्कार मंत्र में द्रव्यलिंगी मिथ्यादृष्टि साधु अथवा जिनमुद्रा के अतिरिक्त वेषधारी अन्य साधुओं को भी ग्रहण नहीं किया गया है। बल्कि छठे गुणस्थान से लेकर बारहवें गुणस्थान पर्यंत मुनियों को ही उनमें जानना चाहिए क्योंकि तेरहवें-चौदहवें गुणस्थानवर्ती साधु अर्हन्तों में अन्तर्भूत हो जाते हैं।

इस महामंत्र में पंचपरमेष्ठियों को नमस्कार किया गया है। अब क्रम की अपेक्षा से कोई कहते हैं-

अरिहंत और सिद्ध का क्रम-यहाँ पर शंकाकार की शंका है कि ‘‘सर्वप्रकार के कर्म लेप से रहित सिद्ध परमेष्ठी के विद्यमान रहते हुए अघातिया कर्मों के लेप से युक्त अरिहंतों को आदि में नमस्कार क्यों किया जाता है ?’’ इसका समाधान करते हुए कहा है-

यह कोई दोष नहीं है। क्योंकि सबसे अधिक गुणवाले सिद्धों में श्रद्धा की अधिकता के कारण अरिहंत परमेष्ठी ही हैं अर्थात् अरिहंत परमेष्ठी के निमित्त से ही अधिक गुण वाले सिद्धों में सबसे अधिक श्रद्धा उत्पन्न होती है। अथवा यदि अरिहंत परमेष्ठी न होते तो हम लोगों को आप्त, आगम और पदार्थ का परिज्ञान नहीं हो सकता था। किन्तु अरिहंत परमेष्ठी के प्रसाद से हमें इस बोध की प्राप्ति हुई है। इसलिए उपकार की अपेक्षा भी आदि में अरिहंतों को नमस्कार किया जाता है।

यदि कोई कहे कि इस प्रकार आदि में अरिहंतों को नमस्कार करना तो पक्षपात है ? इस पर आचार्य उत्तर देते हैं कि ऐसा पक्षपात दोषोत्पादक नहीं है किन्तु शुभ पक्ष में रहने से वह कल्याण का ही कारण है।

उत्तं च-

जस्संतियं धम्मपहं णिगच्छे, तस्संतियं वेणइयं पउंजे।
सक्कारए तं सिर-पंचएण[१३], काएण वाया मणसा य णिच्चं।।[१४]
आचार्योपाध्यायसाधूनामपि देवत्वं पूज्यत्वं च-
पुनरपि कश्चिदाह-
घातिकर्मरहितानां सकलपरमात्मनां अर्हतां अघातिकर्मविप्रमुक्तनिष्कलपरमात्मनां सिद्धानां च त्रैलोक्याधिपतिदेवानां नमस्कारो युक्त:, नाचार्यादीनामष्टकर्मसहितानां तेषां देवत्वाभावादिति न, देवो हि नाम त्रीणि रत्नानि स्वभेदतोऽनन्तभेदभिन्नानि, तद्विशिष्टो जीवोऽपि देव:, अन्यथाशेषजीवानामपि देवत्वापत्ते:। तत् आचार्यादयोऽपि देवा:, रत्नत्रयास्तित्वं प्रत्यविशेषात्।
सम्पूर्णरत्नानि देवो न तदेकदेश इति चेन्न, रत्नैकदेशस्य देवत्वाभावे समस्तस्यापि तदसत्त्वापत्ते:। न चाचार्यादिस्थितरत्नानि कृत्स्नकर्मक्षयकतर्¸णि, रत्नैकदेशत्वादिति चेन्न, अग्निसमूहकार्यस्य पलालराशिदाहस्य तत्कणादप्युपलम्भात्। तस्मादाचार्यादयोऽपि देवा इति स्थितम्१[१५]। अस्मिन् मंत्रे अनादिनिधनपंचपरमेष्ठिनां नमस्कारो विहित:।
णमोकारमहामंत्रस्याक्षरपदमात्रादयो वण्र्यन्ते-
अस्मिन् महामंत्रे पंचत्रिंशदक्षरा:, पंच पदानि, चतुस्त्रिंशत् स्वरा: त्रिंशद् व्यंजनानि सन्ति। अत्र सर्वे वर्णा: अजन्ता:, तर्हि पंचत्रिंशदक्षरेषु चतुस्त्रिंशत्स्वरा: कथमिति चेत्, उच्यन्ते-‘णमो अरिहंताणं’ अस्मिन् पदे सप्ताक्षरा: षट् स्वरा: ज्ञातव्या:। मंत्रशास्त्रस्य व्याकरणानुसारेण ‘अरिहंताणं’ अस्याकारस्य लोप: भवति। प्राकृतव्याकरणे ‘‘एङ:’’ नेत्यनुवर्तते। एङित्येदोतौ। एदोतो: संस्कृतोक्त: सन्धि: प्राकृते तु न भवति। यथा-देवो अहिणंदणो, अहो अच्चरिअं, इत्यादि। उपर्युक्तसूत्रानुसारेण सन्धिर्न भवत्यत: अकारस्यास्तित्वं यथावत् दृश्यते, अकारस्य लोप: खंडाकारो वा नास्ति। किन्तु मंत्रशास्त्रे ‘बहुलम्’ इति सूत्रानुसारेण ‘स्वरयोरव्यवधाने प्रकृतिभावो लोपो वैकस्य’ इति नियमेन ‘अ लोपो’ विकल्पेनात: अस्मिन् पदे षडेव स्वरा:। इति न्यायेन चतुस्त्रिंशत्स्वरा भवन्ति।[१६]
तथैव अष्टपंचाशन्मात्रा: सन्ति। तावदष्टपंचाशन्मात्रा दर्शयन्ति-
। ऽ । । ऽ ऽ ऽ । ऽ । ऽ ऽ । ऽ ऽ । । ऽ ऽ
णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं णमो आइरियाणं।
। ऽ । ऽ ऽ ऽ ऽ । ऽ ऽ ऽ ऽ । ऽ ऽ ऽ
णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।।

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कहा भी है- श्लोकार्थ-जिसके समीप धर्ममार्ग प्राप्त करे, उसके समीप विनय युक्त होकर प्रवृत्ति करनी चाहिए तथा उसका शिरपंचक अर्थात् मस्तक, दोनों हाथ और दोनों घुटने इन पंचांगों से एवं काय, वचन, मन से निरन्तर सत्कार-नमस्कार करना चाहिए। आचार्य, उपाध्याय और साधुओं के भी देवपना तथा पूज्यपना है।

पुनरपि कोई कहते हैं-

शंका-घातिकर्म से रहित सकल परमात्मा अर्हंतों को तथा अघातिया कर्मों से रहित निकल परमात्मा सिद्धों को तो तीन लोक के अधिपति परम देव मानकर नमस्कार करना ठीक है, किन्तु आचार्य आदि जो अष्टकर्मों से युक्त हैं उन्हें नमस्कार नहीं करना चाहिए क्योंकि इनमें देवत्व का अभाव है ?

समाधान-ऐसा नहीं है, क्योंकि अपने-अपने भेदों से अनन्त भेदरूप रत्नत्रय ही देव है, अतएव रत्नत्रय से युक्त जीव भी देव हैं अन्यथा यदि रत्नत्रय की अपेक्षा देवपना न माना जाये तो सम्पूर्ण जीवों को देवपना प्राप्त होने की आपत्ति आ जाएगी। इसलिए यह सिद्ध हुआ है कि आचार्यादिक भी रत्नत्रय के यथायोग्य धारक होने से देव हैं।

शंका-सम्पूर्ण रत्न अर्थात् पूर्णता को प्राप्त रत्नत्रय ही देव हैं, रत्नों का एक देश देव नहीं हो सकता है?

समाधान-ऐसा कहना भी ठीक नहीं है क्योंकि रत्नत्रय के एक देश में देवपने का अभाव होने पर उसकी समग्रता में भी देवपना नहीं बन सकता है। अर्थात् जो कार्य जिसके एक देश में नहीं देखा जाता है वह उसकी पूर्णता में कहाँ से आ सकता है ?

यहाँ पुन: शंकाकार कहता है कि ‘‘आचार्यादिक में स्थित रत्नत्रय समस्त कर्मों का क्षय करने में समर्थ नहीं हो सकते हैं क्योंकि उनमें एक देशपना ही है, पूर्णता नहीं है ? इसका समाधान करते हुए श्री वीरसेन स्वामी ने कहा है-

तुम्हारा यह कथन भी समुचित नहीं है क्योंकि जिस प्रकार पलाल राशि-घास के ढेर का दाहरूप अग्नि समूह का कार्य अग्नि के एक कण से भी होता देखा जाता है, उसी प्रकार यहाँ पर भी आचार्यादिक के विषय में भी समझना चाहिए कि वे आचार्य, उपाध्याय, साधु सभी देव हैं यह बात निश्चित हो जाती है। इस मंत्र में अनादि निधन पंचपरमेष्ठियों को नमस्कार किया गया है।

णमोकार महामंत्र के अक्षर-पद-मात्रा आदि का वर्णन करते हैं-

इस महामंत्र में ३५ अक्षर हैं, पाँच पद हैं, चौंतीस स्वर हैं और तीस व्यंजन हैं। यहाँ सभी वर्ण अजन्त हैं तब पैंतीस अक्षरों में चौंतीस स्वर वैâसे हो सकते हैं ? ऐसा प्रश्न होने पर उत्तर देते हैं-

‘‘णमो अरिहंताणं’’ इस प्रथम पद में कुल सात अक्षर हैं जिनमें ६ स्वर जानना चाहिए। मंत्र व्याकरण शास्त्र के अनुसार ‘अरिहंताणं’ पद के अकार का लोप हो जाता है।

प्राकृत व्याकरण में ‘‘एङ:’’-नेत्यनुवर्तते। एङित्येदोतौ। एदोतो: संस्कृतोक्त: सन्धि: प्राकृते तु न भवति। यथा देवो अहिणंदणो, अहो अच्चरिअं। इत्यादि सूत्र के अनुसार संधि नहीं होती है अत: अकार का अस्तित्व ज्यों का त्यों रहता है, अकार का लोप अथवा खंडाकार (ऽ) नहीं होता है। किन्तु मंत्रशास्त्र में ‘‘बहुलम्’’ इस सूत्र के अनुसार ‘स्वरयोरव्यवधाने प्रकृतिभावो लोपो वैकस्य’ इस नियम से ‘अ’ का लोप विकल्प से हो जाता है, अत: ‘णमो अरिहंताणं’ इस पद में छह स्वर ही माने गये हैं। इस न्याय से पूरे णमोकार मंत्र में चौंतीस स्वर होते हैं। इसी प्रकार से उसमें अट्ठावन मात्रा हैं। उन अट्ठावन मात्राओं का दिग्दर्शन कराते हैं- । ऽ । । ऽ ऽ ऽ । ऽ । ऽ ऽ । ऽ ऽ । । ऽ ऽ णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं णमो आइरियाणं। । ऽ । ऽ ऽ ऽ ऽ । ऽ ऽ ऽ ऽ । ऽ ऽ ऽ णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।।


अस्मिन् मंत्रे प्रथमपदे एकादश (११) द्वितीयपदे अष्टौ (८) तृतीय पदे एकादश (११) चतुर्थपदे द्वादश (१२) पंचमपदे षोडश (१६) मात्रा गण्यन्ते (५८) अथवा ‘अरिहंताणं’ अस्य अकारलोपस्य मात्राभावे ‘सिद्धाणं’ इति पदे संयुक्ताक्षरस्य पूर्वो दीर्घ: इति नियमेनापि अष्टपंचाशन्मात्रा: सन्तीति ज्ञातव्यं।


अत्र मंत्रस्य विश्लेषणे कृते सति-

ण्+अ+म्+ओ+अ+र्+इ+ह्+अं+त्+आ+ण्+अं।
ण्+अ+म्+ओ+स्+इ+द्+ध्+आ+ण्+अं।
ण्+अ+म्+ओ+आ+इ+र्+इ+य्+आ+ण्+अं।
ण्+अ+म्+ओ+उ+व्+अ+ज्+झ्+आ+य्+आ+ण्+अं।
ण्+अ+म्+ओ+ल्+ओ+ए+स्+अ+व्+व्+अ+स्+आ+ह्+ऊ+ण्+अं।
एषु स्वरव्यञ्जनानां पृथक्करणे चतुस्त्रिंशत्स्वरा: त्रिंशद्व्यञ्जनानि इति चतु:षष्टि: वर्णा: भवन्ति।

किं च-‘द्धा ज्झा व्व’ इति संयुक्ताक्षराणां त्रय एव वर्णा गृहीता अत्र। पुनरत्र ‘‘अ, इ, उ, ए’’, ‘‘ज, झ, ण, त, द, ध, य, र, ल, व, स, ह’’ इति मूलस्वरव्यञ्जनानि समाहितानि भवन्ति। तथा च मूलवर्णा अपि चतु:षष्टिरेव। अतएव अस्मिन् महामंत्रे द्वादशांग: समाहितोऽस्ति-

‘‘चउसट्ठिपदं विरलिय, दुगं च दाऊण संगुणं किच्चा।
  रूऊणं च कए पुण, सुदणाणस्सक्खरा होंति।।’’
इति नियमेन गुणकारे कृते सति-

एकट्ठ च च य छस्सत्तयं च च य सुण्णसत्ततियसत्ता।
सुण्णं णव पण पंच य, एक्कं छक्केक्कगो य पणयं च।।

इति गाथासूत्रेण-

‘‘१८४४६७४४०७३७०९५५१६१५’’ समस्तद्वादशांगश्रुतज्ञानस्याक्षरा: भवन्ति। अतएव णमोकारमहामंत्रे सर्वं द्वादशांगश्रुतज्ञानं समाहितं वर्तते।,[१७] अथवायं मंत्रो द्वादशांगश्रुतज्ञानरूप एव। सर्वमंत्राणामाकरश्च वर्तते। अस्य माहात्म्यं शारदापि वर्णयितुं न शक्नोति। उत्तंकं च श्रीमदुमास्वामिना-

एकत्र पंचगुरु मंत्रपदाक्षराणि, विश्वत्रयं पुनरनन्तगुणं परत्र।
यो धारयेत्किल तुलानुगतं तथापि, वंदे महागुरुतरं परमेष्ठिमंत्रम्।।

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इस मंत्र के प्रथम पद में ग्यारह मात्राएँ हैं, द्वितीय पद में आठ, तृतीय पद में ग्यारह, चतुर्थ पद में बारह और पंचम पद में सोलह मात्राएँ ऐसे कुल मिलाकर ११+८+११+१२+१६·५८ मात्राएँ हैं। अथवा अरिहंताणं के अकार का लोप हो जाने पर एक मात्रा का वहाँ अभाव हो गया और ‘‘सिद्धाणं’’ इस पद में ‘‘संयुक्ताक्षर के पूर्व का अक्षर दीर्घ हो जाता है’’ इस नियम से भी अट्ठावन मात्राएँ हो जाती हैं।

भावार्थ-यहाँ त्रिविक्रम प्राकृत व्याकरण के अनुसार नियम बताया है कि एकार और ओकार से अवर्ण के आने पर संधि नही होती है इसीलिए णमो अरिहंताणं में ओ के बाद अ ज्यों का त्यों रखा गया है किन्तु मंत्र शास्त्र के विधान से अ का लोप कर देने पर णमो अरिहंताणं पद में १० मात्राएँ ही रह जाती हैं और इसी प्रकार से ५८ मात्राओं का जोड़ भी समुचित बैठता है। तब १०+९+११+१२+१६·५८ का योग बन जाता है।

इस मंत्र का विश्लेषण करने पर-

ण्+अ+म्+ओ+अ+र्+इ+ह्+अं+त्+आ+ण्+अं।

ण्+अ+म्+ओ+स्+इ+द्+ध्+आ+ण्+अं।

ण्+अ+म्+ओ+आ+इ+र्+इ+य्+आ+ण्+अं।

ण्+अ+म्+ओ+उ+व्+अ+ज्+झ्+आ+य्+आ+ण्+अं।

ण्+अ+म्+ओ+ल्+ओ+ए+स्+अ+व्+व्+अ+स्+आ+ह्+ऊ+ण्+अं।

इन सभी वर्णों में स्वर और व्यंजन पृथक् करने पर चौंतीस स्वर और तीस व्यंजन इस प्रकार चौंसठ वर्ण होते हैं। क्योंकि यहाँ ‘‘द्धा ज्झा व्व’’ इन संयुक्ताक्षरों के तीन वर्ण (व्यंजन) ही ग्रहण किए हैं न कि छह, पुन: यहाँ ‘‘अ इ उ ए’’ ‘‘ज झ ण त द ध य र ल व स ह’’ ये स्वर व्यंजन ही मूलरूप से इस मंत्र में समाहित हैं तथा मूलवर्ण भी चौंसठ ही होते हैं।

भावार्थ-इस महामंत्र में समस्त स्वर-व्यंजनों के अक्षर जोड़ने पर तो ६७ वर्ण होते हैं किन्तु जहाँ इसकी व्याख्या मिलती है वहाँ ६४ अक्षर ही माने गये हैं किन्तु कहीं खुलासा नहीं आया कि कौन से वर्णोें को इसमें नहीं जोड़ा गया है। अत: संस्कृत टीकाकत्र्री विदुषी आर्यिका पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी ने उपर्युक्त तीन वर्णों के संयुक्ताक्षरों में एक-एक व्यंजन हटा कर ६४ मूलवर्णों की संख्या का दिग्दर्शन कराया है जो समुचित ही प्रतीत होता है।

अतएव इस महामंत्र में सम्पूर्ण द्वादशांग श्रुत समाहित है, ऐसा जानना चाहिए।

गाथार्थ-उक्त चौंसठ अक्षरों को अलग-अलग लिखकर (विरलन करके) प्रत्येक के ऊपर दो का अंक देकर परस्पर में सम्पूर्ण दो के अंकों का गुणा करने से लब्ध-प्राप्त हुई राशि-संख्या में एक घटा देने से जो प्रमाण रहता है उतने ही श्रुतज्ञान के अक्षर होते हैं।

इस नियम से गुणकार करने पर-

गाथार्थ-एक, आठ, चार, चार, छह, सात, चार, चार, शून्य, सात, तीन, सात, शून्य, नौ, पाँच, पाँच, एक, छह, एक, पाँच यह संख्या आती है।

इस गाथा सूत्र के अनुसार-१८४४६७४४०७३७०९५५१६१५ ये समस्त द्वादशांग रूप श्रुतज्ञान के अक्षर होते हैं। अतएव णमोकार महामंत्र में द्वादशांगरूप समस्त-सम्पूर्ण श्रुतज्ञान समाहित है ऐसा जानना चाहिए अथवा यह मंत्र बारह अंगमयी श्रुतज्ञान रूप ही है, समस्त मंत्रों की यह खानि है अर्थात् इस मंत्र से ही सभी मंत्र उत्पन्न होते हैं अत: ८४ लाख मंत्रों का उद्भव इस णमोकार मंत्र से ही माना जाता है। इसका माहात्म्य-अतिशय शारदा माता-साक्षात् सरस्वती देवी भी वर्णन करने में समर्थ नहीं है।

श्री उमास्वामी आचार्यवर्य ने कहा भी है-

श्लोकार्थ-यदि कोई व्यक्ति तराजू के एक पलड़े पर पंचपरमेष्ठी के णमोकार के पद और अक्षरों को और दूसरे पलड़े पर अनन्तगुणात्मक तीनों लोकोें को रखकर तुलना करें तो भी वह णमोकार मंत्र वाले पलड़े को ही अधिक भारी (वजनदार) अनुभव करेगा, उस महान गौरवशाली णमोकार मंत्र को मैं नमस्कार करता हूँ।

भावार्थ-णमोकार मंत्र पूजन की जयमाला में भी टीकाकर्त्री श्री ज्ञानमती माताजी ने श्री उमास्वामी के इन्हीं भावों को दर्शाते हुए लिखा है कि-


अत्रपर्यन्तं णमोकारमहामंगलगाथासूत्रस्य संक्षिप्तार्थ: कृत:। अधुना निमित्तहेत्वादयो व्याख्यातव्य:।

अत्र मंगलनिमित्तादय: षडधिकारा: वक्तव्या भवन्ति।
उत्तं च श्रीवीरसेनाचार्येण-
मंगल-णिमित्त हेऊ, परिमाणं णाम तह य कत्तारं।
वागरिय छप्पि पच्छा, वक्खाणउ सत्थमाइरिओ।।[१८]
शास्त्रस्यादौ मंगल-निमित्त-हेतु-परिमाण-नाम-कर्तार: इमे षडधिकारा: व्याख्यातव्या: शास्त्ररचनाकारेण। तत्र धातु-निक्षेप-नय-एकार्थ-निरुक्ति-अनुयोगद्वारै: मंगलादयो ज्ञातव्या:। किं च शब्दानां मूलकारणभूता धातव:। अधुना एतत्षड्भिद्र्वारै: मंगलशब्दो व्याख्यायते। ‘मगि’ इति अनेन धातुना निष्पन्नो मंगलशब्द:। य: किंस्मश्चिदेकस्मिन् निश्चये निर्णये वा क्षिपति सो निक्षेप:। निक्षेपस्य नामस्थापनाद्रव्यक्षेत्रकालभावा: षड्भेदा भवन्ति। नयस्य कोऽर्थ:-

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शेर छंद-

इक ओर तराजू पे अखिल गुण को चढ़ाऊँ।

इक ओर महामंत्र अक्षरों को धराऊँ।।
इस मंत्र के पलड़े को उठा ना सके कोई।
महिमा अनन्त यह धरे न इस सदृश कोई।।

तात्पर्य यह है कि यह पंचनमस्कार मंत्र तीनों लोकों में सारभूत-महान है, इसके चिन्तन, मनन और ध्यान से परमेष्ठी पदों की प्राप्ति तो परम्परा से होती ही है तथा यह संसार में भी लौकिक सम्पदाओं को प्रदान कराता है। पुराण ग्रंथों में अनेकों उदाहरण मिलते हैं कि इस मंत्र को तिर्यंच प्राणियों को भी मरणासन्न अवस्था में सुनाने से उनको देवगति प्राप्त हो गई। इसका माहात्म्य जानकर योगीजन भी जीवन के अन्तकाल तक इस महामंत्र का आश्रय लेकर अपने समाधिमरण की सिद्धि करते हैं।

इस षट्खण्डागम ग्रंथ में आचार्यश्री पुष्पदंत-भूतबली भगवन्तों ने प्रारंभिक मंगलाचरण में ही इस महामंत्र को निबद्ध कर इसके अतिशय को और भी वृद्धिंगत कर दिया है।


यहाँ तक णमोकार महामंगलगाथासूत्र का संक्षिप्त अर्थ किया है। अब निमित्त, हेतु आदि का व्याख्यान करना चाहिए। मंंगल निमित्त आदि छह अधिकार कहे जा रहे हैं-

श्री वीरसेनाचार्य ने कहा भी है-

गाथार्थ-मंगल, निमित्त, हेतु, परिमाण, नाम और कर्ता इन छह अधिकारों का व्याख्यान करने के पश्चात् आचार्य (शास्त्र रचने वाले ग्रंथकार) शास्त्र का व्याख्यान करें।

शास्त्र की आदि में मंगल, निमित्त, हेतु, परिमाण, नाम, कत्र्ता इन छह अधिकारों का ग्रंथकारों को व्याख्यान करना चाहिए। उनमें धातु-निक्षेप-नय-एकार्थ-निरुक्ति और अनुयोग के द्वारा मंगलादि को जानना चाहिए। क्योंकि शब्दों के मूलकारणभूत धातु हैं अर्थात् धातु से ही शब्दों की निष्पत्ति होती है। अब इन छह अनुयोगद्वारों से मंगल शब्द की व्याख्या की जा रही है।

‘‘मगि’’ इस धातु से मंगल शब्द निष्पन्न होता है-बनता है। जो किसी एक निश्चय या निर्णय में क्षेपण करता है अर्थात् निर्णीत वस्तु का उसके नामादिक के द्वारा निर्णय कराता है उसे ‘‘निक्षेप’’ कहते हैं। निक्षेप के छह भेद हैं-नाम, स्थापना, द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव।


[सम्पादन] टिप्पणी

  1. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. ५३।
  2. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. ४३।
  3. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १,पृ. ४५।
  4. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. ४६, टिप्पणियाँ।
  5. षट्खण्डागम (धवलाटीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. ४७।
  6. . षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. ४९।
  7. अनगारधर्मामृत, अध्याय ९।
  8. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. ५०।
  9. कसायपाहुड़ में चौदह पूर्वों के नाम देकर इन्हें ‘‘चौदह विद्यास्थान’’ कहा है।
  10. षट्खण्डागम पु. १, पृ. ५१
  11. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. ५२।
  12. दैवसिक प्रतिक्रमण पाठ।
  13. पंचमेण इति पाठान्तरं।
  14. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. ५५।
  15. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. ५४।
  16. ‘मंगलमंत्र णमोकार-एक अनुचिन्तन’ पुस्तक, पृ. ४३।
  17. ‘मंगलमंत्र णमोकार’ : एक अनुचिन्तन पुस्तक, पृ. ४४।
  18. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. ८।