ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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024.शत्रुंजय क्षेत्र दर्शन व क्षेत्र परिचय

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शत्रुंजय क्षेत्र दर्शन व क्षेत्र परिचय

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शत्रुंजयक्षेत्र दर्शन- संघ वहाँ से विहार कर शत्रुुंजय सिद्धक्षेत्र पर आ गया। यहाँ की पावनभूमि की वंदना करके भी महान् आनन्द हुआ। यहाँ पर स्मरणीय विषय यह रहा कि एक दिन मैं पर्वत पर चढ़ रही थी, मेरे साथ कुछ आर्यिकायें, क्षुल्लिकायें थीं एवं मेरे बराबर से ही कई श्वेतांबरी साध्वियाँ भी चढ़ रही थीं। उनमें दो साध्वियाँ बहुत छोटी उम्र की मेरे जैसी ही थीं। वे दो बड़े-बड़े घड़े पानी से भरे हुए लेकर चढ़ रही थींं। इसलिए वे खूब ही थकान महसूस कर रही थीं। साथ ही मैं भी धीरे-धीरे ही कहीं बैठकर, कहीं खड़े रहकर, श्रम घटाते हुए चढ़ रही थी। उन दोनों साध्वियों ने धीरे-धीरे मेरा परिचय पूछा, चर्या पूछी। मैंने भी उनका परिचय पूछा, चर्या समझी, पुनः मैंने पूछा- ‘‘आप ये दो-दो घड़े लेकर क्योें चढ़ रही हो? वास्तव में पहले तो पर्वत पर चढ़ने से ही श्रम होता है पुनः इतने बड़े भार को लेकर चढ़ना तो बहुत ही श्रमसाध्य है।’’ तब उन्होंने कहा-

‘‘बात यह है कि हम लोगों को प्यास तो लगती ही है, बार-बार पानी पीना रहता है, तो पर्वत के रास्ते में या ऊपर भी जल नहीं मिल पाता है।’’ उनमें से एक लघुवयस्का साध्वी ने यह भी कहा- ‘‘मुझे तो आपकी चर्या बहुत अच्छी लगी, वास्तव में राजमार्ग तो यही है, मोक्षमार्ग भी यही है, इस मेरे अपवाद मार्ग से मोक्ष प्राप्त होगा या नहीं? कौन जाने?’’ अस्तु, इन पारस्परिक, सांप्रदायिक चर्चाओं को करते हुए हम लोग ऊपर पहुँच गये। वहाँ देखा, इतने सारे श्वेतांबर मंदिरों के बीच में एक दिगम्बर जिनमंदिर है, वह ऐसा प्रतिभासित होता है जैसे कि ‘बत्तीस दांतों के बीच एक जीभ।’ हम सभी साधु-साध्वियों ने दो-चार दिन वहाँ बिताये। चैत्र सुदी एकम, जिसे कि महाराष्ट्र में ‘गुड़ी पाड़वा’ कहते हैं, यह विक्रम संवत् का प्रथम दिवस यहीं पर आया था, तब मैंने देखा संघस्थ सभी ब्रह्मचारिणियों ने प्रातःकाल भगवान् के सामने खरबूजा चढ़ाया।

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शत्रुंजय गिरि का परिचय-

यह शत्रुुंजय गिरि निर्वाण क्षेत्र है। जैसा कि निर्वाणकांड में लिखा है-

‘‘पंडुसुआ तिण्णिजणा, दविडणरिंदाण अट्ठकोडीओ।

सत्तुंजयगिरिसिहरे, णिव्वाणगया णमो तेसिं।।’’

पांडुराजा के तीन पुत्र-युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन ये तीन पांडव तथा आठ करोड़ द्रविड़ राजा आदि इस शत्रुंजय पर्वत के शिखर से निर्वाण गये हैं, उन सबको मेरा नमस्कार हो। पालीताना शहर से शत्रुंजय गिरि की तलहटी एक मील दूर है। पालीताना शहर में एक दिगम्बर जैन मंदिर है। यहाँ से पहाड़ की तलहटी तक के लिए सवारियाँ मिलती हैं। पर्वत की सम्पूर्ण चढ़ाई लगभग ४ किमी. है। पत्थर की सड़क तथा सीढ़ियाँ बनी हुई हैं।

यह पर्वत एक प्रकार से जैन मंदिरों का गढ़ है। पर्वत के ऊपर श्वेतांबर समाज के लगभग ३५०० मंदिर और मंदरियाँ हैं। इन श्वेतांबर मंदिरों के मध्य माला में मणि के समान एक दिगम्बर जैन मंदिर शोभायमान है। इस पर्वत पर मुख्य दो टोंके हैं। प्रथम टोंक पर कोई दिगम्बर मंदिर नहीं है। दूसरी टोंक पर श्वेतांबर मंदिरों के केन्द्र में परकोटे के भीतर एक प्राचीन दिगम्बर जैन मंदिर है। इसमें नौ वेदियां बनी हुई हैं। मुख्य वेदी में भगवान् शांतिनाथ विराजमान हैं, इसी में तीन पाण्डवों के चरणचिन्ह विराजमान हैं। नगर के मध्य में एक दिगम्बर जैन मंदिर बना हुआ है। पालीताना नगर का नाम है। तथा शत्रुंजय पर्वत का नाम है। पालीताना नगर के भैरवपुरा मुहल्ले में दिगम्बर जैन धर्मशाला बनी हुई है।

श्वेतांबर संप्रदाय में शत्रुंजय तीर्थ की मान्यता अन्य सभी तीर्थों से अधिक है। यहाँ तक कि इनके यहाँ सम्मेदशिखर की अपेक्षा भी इस तीर्थ को अधिक महत्त्व दिया है। यही कारण है कि यहाँ पर श्वेताम्बर साधु-साध्वियाँ हजारों की संख्या में रहा करते हैं।