ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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026.कूचा बुलाकी बेगम, साइकिल मार्केट-दिल्ली चातुर्मास-सन् १९८२

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कूचा बुलाकी बेगम, साइकिल मार्केट-दिल्ली चातुर्मास-सन् १९८२

समाहित विषयवस्तु

१. दिल्ली में ग्रीष्म की प्रचंडता।

२. चातुर्मास स्थापना।

३. आ.शांतिसागर पुण्यतिथि एवं अनेक आयोजन सम्पन्न।

४. माताजी के प्रवचन।

५. मंटोला पहाड़गंज-दिल्ली में इन्द्रध्वज विधान।

६. माताजी के चार बार प्रवचन।

७. अनेकानेक विधानों का संयोजन।

८. भोगल में मंदिर का शिलान्यास।

९. ज्ञानज्योति सेमिनार का आयोजन-राजीव गाँधी द्वारा उद्घाटन।

१०. जापानी विद्वान् ने भाग लिया।

११. शरदपूर्णिमा जन्मजयंती दिवस सम्पन्न।

१२. चातुर्मास निष्ठापित।

१३. दिल्ली से हस्तिनापुर के लिए विहार।

१४. हस्तिनापुर में अनेक निर्माण कार्य सम्पन्न।

१५. माताजी द्वारा श्रुताभ्यास एवं लेखन।

१६. तत्त्वार्थसूत्र पर आधारित शिक्षण शिविर।

१७. जम्बूद्वीप रचना की विद्वानों द्वारा भूरि-भूरि प्रशंसा।

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काव्य पद

धीरे-धीरे समय पुरुष ने, ग्रीष्मकाल संकेत किया।

जून माह के आते-आते, तीव्र-तपन का रूप लिया।।
निश-दिन तपने लगे भयंकर, कोई चैन न पाता था।
कूलर-पंखा आग उगलते, सब जग दुखी दिखाता था।।७३८।।

तभी देहली जैन जगत के, श्रेष्ठी जब मिलकर आये।
माताजी के चरण कमल में, पुन: पुन: मस्तक नाये।।
श्रीफल अर्पण कर चरणों में, बोले, हे माँ कृपा करें।
अगला चातुर्मास वहीं पर, स्थापन स्वीकार करें।।७३९।।

परम कृपालू माताजी ने, सब पूर्वापर किया विचार।
नगर देहली में ब्यासी का, चातुर्मास किया स्वीकार।।
हर्ष लहर दौड़ी जनता में, होने लगे मंगलाचार।
अंतर्मोद जताया सबने, कर माता के जय-जयकार।।७४०।।

पाँच जुलाई सन् था ब्यासी, आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशि को।
चातुर्मास हुआ स्थापित, जन-जन को मंगलमय हो।।
हुए महत्वपूर्ण आयोजन, यथा शांतिनिधि पुण्यतिथि।
आचार्यश्री को सकल जनों ने, भाव भरी श्रद्धांजलि दी।।७४१।।

परम पूज्य श्रीमाताजी ने, इस अवसर पर शब्द कहे।
यदपि आप श्री भौतिकतन से, इस भूतल पर नहीं रहे।।
तदपि आपसे धर्मक्षेत्र में, स्थापित जो उच्चादर्श।
बने रहेंगे मील के पत्थर, देने को जीवन उत्कर्ष।।७४२।।

जो शुभ कार्य किए गुरुवर ने, हम सब उन पर चलें सदा।
करें ग्रहीत व्रतों का पालन, लगेें नहीं अतिचार कदा।।
देव-शास्त्र-गुरु शीश नमाएँ, हो रत्नत्रय जीवन अंग।
संयम की डोरी से बँधकर, हों प्रशस्त सम्पूर्ण प्रसंग।।७४३।।

इन्द्रध्वज मंडल विधान का, हुआ मंटोला आयोजन।
इस अवसर पर मंगलकारी, हुए पूज्य माँ के प्रवचन।।
सन्तों के शुभ सन्निधान में, यह भी होता कभी-कभी।
होने लगती धर्म की वर्षा, प्रा-दो-सा-रा१ चार घड़ी।।७४४।।

सित.अक्टूबर के माहों में, दो-दो प्रा.दो. हुए विधान।
तीस-चौबीसी, इन्द्रध्वज को, मिला मातश्री का सन्निधान।।
छोटे-छोटे अन्य विधानों, का तो कोई हिसाब नहीं।
हुए बहुत से शाहदरा में, रक्खी कोई किताब नहीं।।७४५।।

भोगल में माँ सन्निधान में, मंदिर का शिलान्यास हुआ।
ज्ञानज्योति के सेमिनार का, सुंदर-सफल प्रयास हुआ।।
सांसद श्री राजीव गाँधी ने, उद्घाटन कर शब्द कहे।
अति आवश्यक धर्म हमारा, राजनीति से अलग रहे।।७४६।।

इस पर प्रवचन में माताजी, अति ही सुंदर बात कही।
राजनीति में धर्म नीति हो, रहे देश में शांति तभी।।
जापानी विद्वान् भी आया, सेमिनार में लेने भाग।
सत्रान्त में माताजी के, प्रवचन का मिलता सौभाग्य।।७४७।।

एक नवम्बर सन् ब्यासी को, आई शरद पूर्णिमा जब।
जन्म दिवस श्रीमाताजी का, सकल समाज मनाया तब।।
दिन हों वर्ष हजार के माता, ऐसे होवेंं वर्ष हजार।
श्री माताजी करें साधना, करती रहें स्व-पर उपकार।।७४८।।

चातुर्मास हुआ निष्ठापित, हुआ पिच्छिका परिवर्तन।
परम पूज्य श्रीमाताजी का, इंद्रप्रस्थ से हुआ गमन।।
नगर-ग्राम सब हुए उपकृत, रत्न-ज्ञान के पा उपदेश।
स्वागत को तैयार खड़ी थीं, हस्तिनागपुर गली अशेष।।७४९।।

परम पूज्य श्रीमाताजी का, ज्यों गजपुर आगमन हुआ।
त्यों ही रौनक लौटी चहुँदिशि, हस्तिनागपुर चमन हुआ।।
हस्तिनागपुर मेला आया, पूनम तिथि कार्तिक के मास।
जीवनतीर्थ के दर्शन करने, जन सैलाब था उमड़ा खास।।७५०।।

जम्बूद्वीप-सुमेरू पर्वत, षोडश-चैत्यालय दर्शन।
जीवन धन्य किया जनता ने, बना रहा मन आकर्षण।।
तीन मूर्ति मंदिर की रचना, निलय-रत्नत्रय का निर्माण।
देख-देख हर्षित होते जन, मन:-शुद्धि करते कल्याण।।७५१।।

अभीक्ष्ण ज्ञान योगिनी माता, करती रहतीं श्रुत अभ्यास।
त्रिलोकसार, श्लोकवार्तिक, शुरू किया कार्तिक के मास।।
पढ़तीं स्वयं, पढ़ातीं सबको, निज-पर का करतीं कल्याण।
किया सृजन नूतन कृतियों का, रही लेखिनी भी गतिमान।।७५२।।

इन्हीं दिनों माता की सन्निधि, हुए अनेकानेक विधान।
निलय रत्नत्रय, भोजनशाला, के सम्पन्न हुए निर्माण।।
जम्बूद्वीप के हिमवनादि का, चलता रहा कार्य द्रुति रूप।
सिद्धांतों को पाषाणों में, दी अभिव्यक्ति ग्रंथ अनुरूप।।७५३।।

तत्त्वार्थसूत्र-धर्म आधारित, हुआ आयोजित एक शिविर।
कुलपति का पद किया अलंकृत, विद्वत् पन्नालाल प्रवर।।
लगभग पंचाशत विद्वानों ने, पाया तदा ज्ञान का धन।
ऐसी माँ ने ज्योति जगाई, भूल नहीं पाते हैं जन।।७५४।।

जम्बूद्वीप जिनालय षोडश, विद्वानों ने दर्श किये।
कुलपति पन्नालाल प्रवर ने, मनोभाव यों व्यक्त किये।।
अति ही अद्भुत-अनुपम-उत्तम, अद्वितीय है माँ का काम।
जग महत्व आंकेगा इसका, हम सब करते उन्हें प्रणाम।।७५५।।

किसी माई के लाल ने अब तक, कर न दिखाया ऐसा काम।
सिद्धांत लिखे हैं बस ग्रंथों में, नहीं प्रकट पोत आयाम।।
मनुजजाति में ज्ञानमती का, कार्य अनन्वय-नम्बर एक।
अचरज में पड़ जाते नर हैं, जम्बूद्वीप रचना को देख।।७५६।।

समय नहीं है किसी के वश में, वह स्वतंत्र सम्राट महान्।
नहीं जोहता वाट किसी की, सदा-सदा रहता गतिमान।।
रहट घटी ज्यों रहे बदलता, पतझड़ से आता मधुमास।
समय ग्रीष्म का बीत गया जब, पुन: आ गया चातुर्मास।।७५७।।