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026.नवधा भक्ति से आहार देना भी नित्यपूजा है

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नवधा भक्ति से आहार देना भी नित्यपूजा है

विहार में अनुभव- इस वापसी मार्ग में मुझे आहार में अंतरायें बहुत होती थी। आहार में कभी जरा सी रोटी खायी तो अंतराय आ गई, तो कभी आधे आहार के होने पर अंतराय आ जाती, तो कभी आहार प्रारंभ करते ही आ जाती। ‘‘सिद्धभक्ति के बाद आहार प्रारंभ करने पर हाथ में केश या मृतक चींटी आदि के आ जाने पर आहार छोड़ दिया जाता है। पानी भी नहीं पी सकते, फिर मात्र मुखशुद्धि-कुल्ला करके आ जाया जाता है, इसी का नाम अंतराय है। यह अंतराय व्यवस्था दिगम्बर मुनि, आर्यिका, क्षुल्लक, क्षुल्लिका और ब्रह्मचारी आदि व्रतिकों में ही है।’’ इधर वैशाख-ज्येष्ठ की गर्मी, उधर हर दूसरे-तीसरे दिन अंतराय और ऊपर से दोनों समय की १५-१६ मील से अधिक पैदल चलना। मेरा स्वास्थ्य बिगड़ गया। रास्ते में एक-एक फर्लांग पर मुझे बैठना पड़ता फिर उठ-उठ कर जैसे तैसे चलती थी। प्रायः सबके पहुुँचने के बाद देर से पहुँचती, कभी साधुओं के आहार तक हो जाते थे, ग्यारह बजे तक पहुँचकर, शुद्धि करके आहार को उठती, तो गर्मी की वजह से आहार लेना कठिन हो जाता। उस समय मीठे का मेरा त्याग था तथा घी, दूध की मार्ग में प्रायः व्यवस्था नहीं हो पाती। मैं कभी दलिया लेती तो कभी पानी से रोटी चूरकर खा लेती। पानी तो मेरे पेट में दस दिन में मुश्किल से चार-छह दिन पहुँचता था चूँकि अंतराय कर्म का उदय चल रहा था। इतनी कमजोर शारीरिक स्थिति होने पर भी मैं अपने मुख से किसी माताजी या किन्हीं महाराजों से कुछ भी नहीं कहती थी क्योंकि मैं मन ही मन सोचा करती-

‘‘मैंने स्वयं स्वरुचि से स्वात्मकल्याण के लिए ही दीक्षा ली है। यह शरीर तो नश्वर है-पर है, इसकी क्या चिंता करना? जितना हो सके, उतना इसे मार-ठोककर काम ले लेना ही अच्छा है।’’

उस समय कभी-कभी कोई साध्वी मेरी स्थिति को न समझकर प्रातः और सायं देर से पहुँचने पर ऐसा कह देती कि ‘‘यह तो संघ में सबसे छोटी है, अभी २२ वर्ष की उम्र है, फिर भी यह हम लोगों के बराबर क्यों नहीं चलती है?....उस समय यह सब सुनकर भी मैं कुछ उत्तर न देकर अपने वैराग्य को बढ़ाने का ही प्रयास करती थी। आज मैं सोचती हूँ कि उन दिनों आचार्यश्री से या आर्यिकाओं से अपना सुख-दुःख यदि मैं कहती रहती तो शायद उतना शारीरिक कष्ट भी न उठाना पड़ता किंतु मैं तो वैराग्य और सहनशीलता बढ़ाने का ही पुरुषार्थ किया करती थी और किसी ने मुझे यह बतलाया भी नहीं था कि तुम अपना सुख-दुख आचार्य महाराज से कहा करो। सायंकाल के समय कभी मैं जहाँ संघ पहुँच चुका है वहाँ नहीं पहुँच पाती और दिन छिप जाता तो मैं रास्ते में सड़क के एक तरफ किसी वृक्ष के नीचे या खुले में ही जमीन पर रात्रि बिता देती। ऐसे समय मेरे साथ कभी आर्यिका चंद्रमती जी या कभी आर्यिका पद्मावती जी रहती थीं। क्षुल्लिका जिनमती जल्दी चलने से प्रायः आगे सब आर्यिकाओं के साथ चली जाती थीं। जब रात्रि में मैं पीछे रह जाती, तब सेठ हीरालाल जी, ब्र. चिरंजीलाल या धर्मचंद्र आदि के हाथ से कमंडलु के लिए पानी भिजवा देते और उनसे समाचार मंगा लेते कि माताजी कितनी दूर हैं।

कई एक बार यदि पीछे कोई छोटा गाँव मिल जाता तो मैं पूर्व में गुरुदेव आचार्यश्री वीरसागरजी के कहे अनुसार वहाँ जाकर किसी न किसी गृहस्थ के मकान के बाहर या उनके आग्रह से उनके मकान में रात्रि में सो जाती और प्रातः चलकर देर-अबेर संघ में पहुँच जाती। इन सब परिस्थितियों के बावजूद भी मेरे निमित्त से कभी संघ को कहीं रुकना नहीं पड़ा। एक दो बार संघपति हीरालालजी ने आचार्यश्री से निवेदन भी किया कि-‘‘महाराजजी! आर्यिका ज्ञानमतीजी की अंतराय अधिक होने से वे काफी कमजोर हो गई हैं, आज भी उनकी अंतराय हो गई है तो आज आप लोग यहीं रुक जाइये अथवा एक टाइम चलने का रखिये, तो अच्छा रहेगा।’’

किन्तु आचार्यश्री ने कहा- ‘‘भाई! आज संघ इनके लिए रुके तो कल किसी दूसरे के लिए भी रुकना पड़ेगा अतः एक के लिए रुकना ठीक नहीं है।’’ इस वातावरण में मुझे दोनों टाइम चलना होता था। कभी-कभी तो बहुत थक जाने से जब पैर नहीं उठते और गर्मी भड़कती तब मैं मन में नरक, तिर्यंच आदि के दुःखों का विचार कर सोचने लगती कि- ‘‘जब आज मैं इतना कष्ट नहीं झेल सकती हूँ तो भला शीत, उष्ण, क्षुधा, तृषा आदि परीषहों को कैसे सहन करूँगी? इस पर्याय में न सही, अगली पर्याय में.....जब तक इन परीषहों को सहन नहीं करेंगे तब तक भला कर्मनिर्जरा कैसे होगी? और मुक्ति की प्राप्ति कैसे होगी?.......’’ एक दिन प्रातः दस बजे के समय मैं बहुत दूर रह गई थी, मेरे साथ जिनमती जी चल रही थीं। मेरी स्थिति देख-देख कर वे रास्ते में रोने लगतीं किन्तु संघ में आकर किसी के भी समक्ष वे मार्ग की मेरी स्थिति नहीं कहतीं। शायद यह उनका संकोच ही था या अज्ञानता.....। इसी बीच सेठ हीरालाल जी साइकिल से आये, कमंडलु में पानी भर दिया और कुछ दूर तक मेरे साथ-साथ चले फिर भक्ति और वात्सल्य से बोले-

‘‘माताजी! पद में आप हमारी माता हैं और उम्र से आप मेरी पुत्री के समान हैं, आप मेरे कंधे पर बैठिये, मैं अभी आपको संघ में पहुँचा दूँगा। आपका आज पैदल चलना बहुत कठिन दिख रहा हैै।’’

उनकी वात्सल्यमयी वाणी को सुनकर मैंने हंसकर कहा-‘‘सेठ जी! यह मार्ग नहीं है, मेरे पद के प्रतिकूल है। आपने भक्ति भरे शब्दों से पुण्यबंध तो कर ही लिया अब आप चलो, संघ में सब साधुओं की आहार व्यवस्था संभालो, मैं धीरे-धीरे गिरते-पड़ते आ ही जाऊँगी।।’’ उस दिन मैं साढ़े ग्यारह बजे पहुँची, १५ मिनट आराम कर सामायिक करके आहार को उठी, भला ऐसी थकान में आहार क्या लिया जाता? जो कुछ ले पाई, लिया और आकर सो गई। तभी पुनः संघ के विहार का हल्ला मचा और उठकर चल पड़ी। इस मार्ग में कभी-कभी ब्र. राजमलजी मेरे साथ रहते और मेरी शारीरिक कमजोरी देखकर मेरा कमंडलु लेकर चलते। जब मैं पीछे रह जाती, तब वे आगे जाकर सेठ हीरालाल जी को समाचार दे देते थे।

ब्र. राजमल जी मेरी सहनशीलता व ज्ञानाराधना से बहुत ही प्रभावित रहते थे अतः वे हमारे प्रति बहुत ही भक्ति भावना किया करते थे तथा समय-समय पर मेरी आज्ञा का पालन करके संघ की व्यवस्था और भक्ति में तत्पर रहते थे।

मार्ग में ब्रह्मचारी-ब्रह्मचारिणियों की भक्ति-

रास्ते में ब्रह्मचारी, ब्रह्मचारिणियाँ,श्रावक और श्राविकाएँ अपने हाथ से सब काम करते थे। महिलाएँ अपने हाथ से आटा पीसतीं, पानी भरतीं और आहार के बाद बर्तन मांजतीं। इन कार्यों के लिए कोई नौकर नहीं थे। कई बार कुंआ दूर होने से बाइयाँ एक-एक मील से पानी भर कर शिर पर घड़ों को रख कर लातीं और सर्दी के दिनों में प्रायः उनके पैर सुन्न हो जाते तब आकर अग्नि के पास बैठकर सेकतीं।

कई बार सेठ हीरालाल जी आदि स्वयं पानी के लिए घड़ा लेकर बाइयों के साथ आगे हो जाते, जिससे कि बाइयों को अखरे नहीं। कई बार कपड़े नहीं सूख पाते, तो ब्रह्मचारिणियाँ आधे सूखे या गीले कपड़े पहन कर चौका बनातीं। सर्दी के दिनों में यह सर्वाधिक कष्ट था। एक बार किसी पर्व के दिन भगवान् के अभिषेक के समय दो-तीन ब्रह्मचारिणी आर्इं नित्य के समान जिन प्रतिमा का एक कलश से अभिषेक किया और एक-दो अर्घ्य चढ़ाकर जल्दी-जल्दी भागने लगीं। तभी एक माताजी ने कहा-‘‘अरे बाई! एक पूजा तो कर लो, तुमने तो एक कलश ढोला और अर्घ्य चढ़ाकर भगीं।’’ तब एक समझदार - विवेकशील ब्रह्मचारिणी ने जवाब दिया-‘‘माताजी! गुरुओं को आहार देना, इस समय हमारी यही सब से बड़ी पूजा है। देखो! दोनों टाइम साधु पैदल चल-चलकर आते हैं, समय से इनका निरंतराय आहार हो जाये, भला इससे बड़ी पूजा और क्या होगी?’’

वास्तव में ये बाइयाँ पिछली रात्रि में तीन बजे से उठकर स्तोत्र, पाठ, सामायिक आदि करके अपने कार्यों में लग जाती थीं। एक-एक बाइयाँ एक-एक चौके में प्रायः चार-पाँच साधु तक को पड़गाहन कर आहार देती थीं, अनंतर दो तीन ब्रह्मचारियों को भोजन कराकर स्वयं भोजन करती थीं। उस ब्रह्मचारिणी के ऐसे गुरुभक्ति के उत्तर पर मेरे मस्तिष्क में वे महापुराण की पंक्तियाँ उभर आर्इं कि-

‘‘अर्हंत भगवान् की पूजा के चार भेद हैं - सदार्चन (नित्यमह), चतुर्मुख, कल्पद्रुम और आष्टान्हिक। प्रतिदिन अपने घर से गंध, अक्षत, पुष्प आदि ले जाकर जिनमंदिर में श्री जिनेन्द्रदेव की पूजा करना सदार्चन-नित्यमह कहलाता है अथवा भक्तिपूर्वक अर्हंतदेव की प्रतिमा और मंदिर का निर्माण कराना तथा दानपत्र लिखकर ग्राम, खेत आदि का दान भी नित्यमह कहलाता है। इसके सिवाय अपनी शक्ति के अनुसार नित्यदान देते हुए महामुनियों की जो पूजा की जाती है उसे भी नित्यमह कहते हैं। यथा-

‘‘या च पूजा मुनीन्द्राणां, नित्यदानानुषंगिणी।

स च नित्यमहो ज्ञेयो, यथा शक्त्युपकल्पितः१।।२९।।’’

आचार्यरत्न देशभूषण जी महाराज भी कहा करते थे कि- ‘‘भगवान् की पूजा से मात्र पूजक को ही लाभ है भगवान् को नहीं, क्योंकि वे तो पूर्ण कृतकृत्य सिद्ध हो चुके हैं किन्तु मुनियों को दान देते हुए जो उनकी पूजा की जाती है उसमें दोनों तरफ से दोनों को लाभ है। मुनिगण शरीर से रत्नत्रय की साधना करके मुक्ति प्राप्त करते हैं यह उनके प्रति उपकार हुआ और दातार आहारदान के पुण्य से महान् अभ्युदय को प्राप्त कर परंपरा से मोक्षसुख भी प्राप्त करते हैं। दूसरी बात यह है कि-मुनियों को आहार दान दिये बगैर मोक्षमार्ग ही नहीं चल सकता। तीसरी बात धर्म दो ही हैं-मुनिधर्म और श्रावक धर्म। मुनि तो आहार लेते हैं और श्रावक देते हैं। श्रावक सप्तमप्रतिमाधारी तक आहार देते हैं और यदि नहीं देते हैं तो वे न मुनि हैं न श्रावक ही, वे दोनों पद से भ्रष्ट ‘इतो भ्रष्टः ततो भ्रष्टः, जैसी स्थिति में ही हैं।’’

इन संघस्थ ब्रह्मचारिणियों की आहारदान भक्ति को देख-देखकर मैं मन ही मन उनके गुणों की प्रशंसा करते हुए उनके प्रति बहुत वात्सल्य भाव रखती थी। कई एक बार ब्र. सूरजमलजी, ब्र. कजोड़मलजी, ब्र. राजमलजी आदि भी चौका बनाकर बहुत ही विनय भक्ति से मेरा पड़गाहन कर आहार देते थे। इस प्रकार आहारदान की महत्ता को प्रदर्शित करते हुये संघस्थ ब्रह्मचारी और ब्रह्मचारिणियाँ बड़े भक्तिभाव से संघ की व्यवस्था में लगे रहते थे।

ब्यावर आगमन-

इस निर्वाणक्षेत्र की वंदना कर वापस विहार करते हुये संघ सकुशल ब्यावर आ गया। यहाँ की जैन समाज ने संघ का अच्छा स्वागत किया। आचार्यश्री सर्वमुनियों सहित यहाँ सेठ चंपालालजी की नशिया में ठहरे थे। वहीं पर मंदिर के निकट बने हुये ‘‘श्री ऐलक पन्नालाल जी सरस्वती भवन’ में आर्यिकायें ठहरी हुई थीं। संघ में स्वाध्याय आदि क्रियायें समुचित चल रही थीं।