ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.png
Whatsappicon.png
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें |


पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर, रविवार से ११ दिसंबर २०१६, रविवार तक प्रातः ६ बजे से ७ बजे तक सीधा प्रसारण होगा | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

027.जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर चातुर्मास-सन् १९८३

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


[सम्पादन]
जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर चातुर्मास-सन् १९८३

[सम्पादन]
समाहित विषयवस्तु

१. रत्नमती आर्यिका की समाधि सन्निकट।

२. चातुर्मास की स्थापना।

३. तेरह-बीस आम्नायी पद्धतियों से सिद्धचक्र विधान।

४. माताजी ने जम्बूद्वीप की १०८ परिक्रमा की।

५. साधु समाज को बुलाने के लिए आमंत्रण।

६. इन्द्रध्वज विधान, माताजी का जन्म दिवस मनाया गया।

७. रत्नमती माताजी का अभिनंदन-अभिनंदन ग्रंथ समर्पित।

८. दहेज दो तो ऐसा दो।

९. ज्ञानज्योति रथ सनावद में आया।

[सम्पादन]
काव्य पद

चल अतीत को याद करें हम, दुहरायें पूरब इतिहास।

मैना छोड़ चली गृहपिंजरा, बोलो किसने पूरी आस।।
माता श्री मोहिनीदेवी, किया तदा उपकार महान।
उपकारों को नहीं भूलते, साधु पुरुष उत्तम विद्वान्।।७५८।।

तुम्हें छुड़ाती हूँ मैं गृह से, तुम भी मुझे छुड़ा लेना।
अंत समय में पड़ी भंवर में, नैया पार लगा देना।।
तब मैना ने वचन दिया था, ज्ञानमती निर्वाह किया।
गृहबंधन को तोड़ निकाला, संयम पथ आरूढ़ किया।।७५९।।

हुर्इं आर्यिका मोहिनी देवी, रत्नमती सुनाम पाया।
तेरह रत्नों की माता ने, तेरह व्रत को अपनाया।।
तेरहवर्ष साधना करते, बीते आया काल समाधि।
काय-कषाय किए कृश अपने, त्यागी मन से सकल उपाधि।।७६०।।

विहार कार्य असमर्थ जानकर, शिथिलगात लख माता का।
ज्ञानमती जी हस्तिनागपुर, किया विचार चौमासा का।।
जैन त्रिलोक शोध संस्था के, आये सभी सदस्य प्रधान।
श्रीफल अर्पित कर चरणों में, की अनुमोदन सह-बहुमान।।७६१।।

माताजी श्री ज्ञानमती की, दृष्टि समन्वयवादी है।
मैत्री भाव रहे साधर्मी, यही भावना भाती हैं।।
तेरह-बीस विधि दोनों से, हुए सिद्धचक्र विधान यहाँ।
माता सन्निधि, पर्व उठाई, गया मनाया खूब यहाँ।।७६२।।

तीर्थंकरों के न्हवन जल से, गिरि सुमेरु हुआ पावन।
हस्तिनागपुर जम्बुद्वीप में, बनी प्रतिकृति मनभावन।।
हुर्इं प्रतिष्ठित जिन प्रतिमाएँ, बने पुण्य के योग सभी।
एक शतक आठ वंदना, माताजी ने करी तभी।।७६३।।

तेइस जुलाई, वर्ष तेरासी, हुआ स्थापित चातुर्मास।
वाचन-पाठन-लेखन करना, माताजी का रहा प्रयास।।
ज्ञान-ध्यान-तप-लीन रहे जो, वही साधु कहलाता है।
क्रमश: कर्म निर्जरा करके, स्वर्ग-मोक्ष सुख पाता है।।७६४।।

जम्बूद्वीप, सुमेरू पर्वत, नहीं प्रतिकृति मात्र रही।
भारत के कोने-कोने से, आते दर्शक पूज्य मही।।
रंगाराव-मनुचंदा एस.के, शिक्षा शास्त्री वी.पी. धवन।
हुए प्रहर्षित छात्र तीन सौ, करके तीर्थक्षेत्र दर्शन।।७६५।।

जम्बूद्वीप-सुमेरू पर्वत, उभय पूर्णता पाई है।
जिन प्रतिमाओं प्राणप्रतिष्ठा, काललब्धि अब आई है।।
अत: एक प्रतिनिधि मंडल को, भेजा साधु-संघ के पास।
किया निवेदन सन्निधान दें, पूर्ण करें भविजन की आश।।७६६।।

आचार्यश्री धर्मसागर जी, उपाध्याय श्री अजित निधि।
दयानिधि-अभिनंदन सागर, किया निवेदन यथाविधि।।
राजस्थानी दस नगरों में, जहाँ विराजे थे मुनिराज।
प्रतिनिधि मंडल किया निवेदन, सन्निधान देने इस काज।।७६७।।

आचार्य श्री विमलसागर जी, औरंगाबाद विराजे थे।
समन्तभद्र जी, विद्यानंद जी, श्री कुंभोज में राजे थे।।
प्रतिनिधि मंडल किया निवेदन, पंचकल्याणक होना है।
पूज्यश्री के सन्निधान से, उत्सव शोभा होना है।।७६८।।

साधु समाज ने माताजी की, बारम्बार प्रशंसा की।
आशीर्वाद दिया दोनों कर, सकल कार्य अनुशंसा की।।
ज्ञानमती जी पुरुषार्थी हैं, दृढ़ संकल्पी, उपकारी।
कार्य अप्रतिम किये उन्होंने, धर्म-समाज है आभारी।।७६९।।

प्रतिनिधि मंडल गया साधु संघ, ज्ञानज्योति रथ करे भ्रमण।
इन्द्रध्वज मंडल विधान के, हुए गजपुर में आयोजन।।
शरदपूर्णिमा का दिन आया, माताजी का जन्मदिवस।
कहा सभी ने सन्निधान माँ, मिले निरंतर सहस बरस।।७७०।।

चातुर्मास तेरासी सन् का, रहा महा गौरवशाली।
रत्नमती माता की जीवनी, है अति ही महिमाशाली।।
पुत्री-भगिनी-गृहिणी-माता, सभी रूप आदर्श महान।
सब कुछ होकर सब कुछ त्यागा, दीक्षा धारी हित कल्याण।।७७१।।

ऐसी महत्तमा नारी का, किया गया अभिनंदन है।
त्याग-तपस्या की मूरत को, कवि का सादर वंदन है।।
ज्ञानमती जी कहा सभी से, दो दहेज तो ऐसा दो।
जिससे जीवन बने धार्मिक, मरण पंडितों जैसा हो।।७७२।।

सन् चौदह महमूदाबाद में, सुखपालदास लाला के घर।
जन्मी कन्या मोहिनी देवी, छोटेलाल बने थे वर।।
पद्मनंदिपंचविंशतिका, ग्रंथ दहेज के रूप दिया।
पढ़ पुत्री आजन्म शील धर, पर्व मास ब्रह्मचर्य लिया।।७७३।।

उनकी पुत्री ज्ञानमती मैं, हूँ उत्तम दहेज का फल।
वही मोहिनी रत्नमती ये, त्याग-साधना युक्त सकल।।
अत: सभी जन शिक्षा लेवें, दो दहेज तो ऐसा दो।
जिससे जीवन बने धार्मिक, मरण पंडितों जैसा हो।।७७४।।

पूज्य आर्यिका रत्नमती का, बहु अभिनंदन किया गया।
और साथ ही ग्रंथ अभिनंदन, उन्हें भेंट में दिया गया।।
निस्पृहभाववती माताजी, अतिशय हुर्इं भाव विह्वल।
प्रत्युत्तर में दिया सभी को, माताजी आशीष विमल।।७७५।।

यह गौरव की बात कि इनकी, धार्मिक हैं सब सन्तानें।
कुछ संलग्ना मोक्षमार्ग में, कुछ हैं गृहस्थ धर्म मानें।।
देव-शास्त्र-गुरु की उपासना, स्वाध्यायरुचि लिए हुए।
जो हैं, जहाँ हैं, अपने पथ पर, पूर्ण रूप से लगे हुए।।७७६।।

ज्ञानज्योतिरथ देश भ्रमण कर, नगर सनावद में आया।
बहु दिग्गज विद्वान् पधारे, मोती अमृत बरसाया।।
अनेकानेक संस्थाओं के, हुए सफलतम अधिवेशन।
अल्प विराम के साथ यहीं पर, माताजी को करें नमन।।७७७।।