ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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028.जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर चातुर्मास-सन् १९८४

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जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर चातुर्मास-सन् १९८४

समाहित विषयवस्तु

१. माताजी उत्तम प्रकृति की नारी।

२. जम्बूद्वीप प्राण प्रतिष्ठा पूर्व सभी अपूर्ण कार्य पूर्ण हों।

३. जम्बूद्वीप में चातुर्मास स्थापना।

४. जम्बूद्वीप किसी को शूल, माताजी बरसातीं फूल।

५. चातुर्मास काल में नियमसार की स्याद्वादचन्द्रिका संस्कृत टीका पूर्ण की।

६. सरस्वती वंदना महोत्सव का आयोजन।

७. टीका का अर्थ-भाव प्रकट करना।

८. नई-नई कृतियों की रचना।

९. पंचकल्याणक प्रतिष्ठा।

१०. ज्ञानज्योति रथ का समापन।

११. माताजी को गणिनी पद से अलंकृत किया गया।

१२. माताजी ने असंभव कार्य को संभव कर दिखाया।

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काव्य पद

उत्तम-मध्यम-जघन रूप से, मानव होते तीन प्रकार।

विघ्नाक्रांत जघन न होते, कोई कार्य करने तैयार।।
मध्यम कार्य शुरू कर देते, आते विघ्न छोड़ते भाग।
पर विघ्नों से डरें न उत्तम, कार्य पूर्ण करते बड़भाग।।७७८।।

माताजी की प्रकृति है उत्तम, जम्बूद्वीप बनाया है।
गिरि सुमेरु-हिमवन-चैत्यालय, सब प्रत्यक्ष दिखाया है।।
थे सिद्धांत वैद पुस्तक में, उन्हें खुला वातास दिया।
महा अलौकिक, अतिशय अद्भुत, माताजी ने कार्य किया।।७७९।।

है अपूर्ण कुछ कार्य अभी भी, उसे पूर्णता देना है।
प्राण प्रतिष्ठा पहले-पहले, सब ही कुछ कर लेना है।।
अत: त्रिलोेक शोध संस्था-सह, समितियों के सदस्य आए।
हाथ जोड़, वंदामि करके, बोले वचन सुमन भाए।।७८०।।

पूज्या श्री आशीष चाहिए, रहे आपका यहीं प्रवास।
सन् चौरासी जम्बूद्वीप ही, हो माताजी चातुर्मास।।
मात्र आपके सन्निधान से, कार्य सहज हो जाएंगे।
कल्पवृक्ष की छाँव तले हम, सभी सफलता पायेंगे।।७८४१।।

पदाधिकारियों, सकल सदस्यों, के आग्रह पर किया विचार।
सुकरणीय प्रवास यहीं पर, संघ सदस्यों के अनुसार।।
अत: जुलाई बारह के दिन, महावीर जिन चरणों पास।
संघ सहित श्री माताजी ने, किया स्थापित चातुर्मास।।७८२।।

जम्बूद्वीप की अद्भुत रचना, अनुपम-भव्य-निराली है।
विद्वेषीजन की छाती में, आग लगाने वाली है।।
विघ्नानल भड़का देते थे, यदा-कदा ईष्र्यालू जन।
शांत स्वभावी तब माताजी, क्षमानीर से करें शमन।।७८३।।

चातुर्मासकाल माताजी, विशिष्ट संयमाचरण किया।
तत्त्वार्थसूत्र-सह दश धर्मों का, सकल जनों को ज्ञान दिया।।
प्रतिक्रमण-आवश्यक सब ही, यथासमय पाते आयाम।
अप्रमत्त चलते ही रहते, यथाकाल सा.-नि.-धा.१ काम।।७८४।।

कुन्दकुन्द आचार्यश्री की, नियमसार रचना का नाम।
स्याद्वादचंद्रिका टीका, संस्कृत दिया मात अंजाम।।
सन् अठहत्तर हुई न पूरी, सन् चौरासी पूर्ण करी।
जम्बूद्वीप के चतुर्मास में, यह पाई उपलब्धि बड़ी।।७८५।।

केवल साढ़े पाँच माह में, कार्य महत्तम पूर्ण हुआ।
अप्रत्यासित प्राप्त सफलता, पर माँ अतिशय हर्ष हुआ।।
सरस्वती वंदना रूप महोत्सव, यहाँ मनाया गया मुदा।
ग्रंथ पालकी विराजमान कर, जुलूस निकाला गया तदा।।७८६।।

टीका केवल अर्थ नहीं है, ग्रंथ पूर्णता देना है।
जैसे जुगनू के प्रकाश में, सूरज को भर देना है।।
माताजी ने नियमसार का, हार्द प्रकट कर दिखलाया।
जिज्ञासू, अल्पज्ञजनों, को भी सब भाव समझ आया।।७८७।।

जिसने पढ़ी, सराही सबने, आर्ष परम्परा को माना।
आचार्यों-गुरु-विद्वानों ने, माँ प्रतिभा को पहचाना।।
समयोचित उद्धरणों द्वारा, विषयवस्तु सारल्य दिया।
माताजी ने यह समाज का, अतिशय धर्मोपकार किया।।७८८।।

यह नर काया, मिट्टी माया, क्षण-क्षण होती क्षीण चली।
पिंजरे ऊपर चमड़ी लिपटी, चम-चम चमके लगे भली।।
किन्तु एक दिन आए ऐसा, मिट्टी में मिल जाना है।
गर असंयमित रही जिंदगी, शेष रहे पछताना है।।७८९।।

बचपन-यौवन आते-जाते, जरा न आकर जाती है।
जब जाती है तब वह तन को, स्वयं साथ ले जाती है।।
अत: चाहिए विज्ञजनों को, तन का सत् उपयोग करें।
धर्मक्षेत्र में बोकर इस को, मोक्षगमन उद्योग करें।।७९०।।

श्री मोहिनीदेवी जी ने, अतिविवेक से काम लिया।
भव-तन-भोग विरक्ति साध कर, संयम पथ स्वीकार किया।।
पूज्य आर्यिका ज्ञानमती से, पंचमहाव्रत धारण कर।
किया आत्मकल्याण आपने, माता रत्नमती बनकर।।७९१।।

तेरहवर्षों करी साधना, निरतिचार चर्या पाली।
अन्त समय तक अप्रमत्त रह, की पद-व्रत की रखवाली।।
सूरज डूबे इसके पहले, विधि सल्लेखन अपनाई।
मोह शत्रु को किया पराजित, दशा वीतरागता पाई।।७९२।।

पूज्य आर्यिका ज्ञानमती ने, निर्यापक का कार्य किया।
भाव विशुाद्धि रहे क्षपक की, इस पर पूरा ध्यान दिया।।
माह जनवरी, दिनाँक पंचदश, सन् पिच्चासी आया है।
नमस्कार मंत्र को सुनते, रत्न स्वर्ग पद पाया है।।७९३।।

दिवस आज के धर्मक्षेत्र में, एक नया इतिहास रचा।
माता ने पद लिया क्षपक का, निर्यापक पद रही सुता।।
स्मृतियाँ आ जातीं मन में, माताजी की बारम्बार।
पर सँभाल लेती थीं खुद को, योग-वियोग जान अनिवार।।७९४।।

जिसका साथ रहा हो वर्षों, उसे भुलाना नहीं सरल।
फिर माँ जिससे खून का रिश्ता, स्मृतियाँ आतीं अविरल।।
सन्तोेंं के भी मन के ऊपर, योग-वियोग का पड़े प्रभाव।
वे भी तो समाज में रहते, संवेदन का नहीं अभाव।।।७९५।।

ऐसे अवसर जब भी आए, तत्त्वज्ञान की शरण गहें।
ज्ञान-विराग बढ़ाने वाले, पौराणिक आख्यान पढ़ें।।
अश्रु बहाकर मूर्ख कर्म की, साँकल और बढ़ाते हैं।
किन्तु विवेकी साम्यभाव रख, आत्मशक्ति को पाते हैं।।७९६।।

पूज्य आर्यिका ज्ञानमती ने, निज विवेक उपयोग किया।
परचिन्ता से ध्यान हटाकर, निजात्म चिन्तना ध्यान दिया।।
जम्बूद्वीप - हस्तिनागपुर - आदिनाथ पूजाएँ रचीं।
धर्मध्यान में ध्यान लगाने, नई-नई कृतियाँ विरचीं।।७९७।।

अट्ठाईस अप्रैल से लेकर, दो-क मई पिच्यासी तक।
हुए निर्विघ्न पंचकल्याणक, किए सभी ने कार्य अथक।।
आचार्य श्री धर्मसागर का, संघ सहित सान्निध्य मिला।
एन.डी.तिवारी, सी.ए. यू.पी., जम्बूद्वीपी कमल खिला।।७९८।।

ज्ञानज्योति रथ कार्य प्रवर्तन, हुआ समापन पहले दिन।
पी.वी.नरसिंहराव ने किया, अखंड ज्योति का स्थापन।।
हुई प्रभावना जैन धर्म की, शब्द वर्णनातीत रही।
माताजी सादर वन्दामि, सबने एक ही बात कही।।७९९।।

व्रती नारियों में सर्वोत्तम, पूज्य आर्यिका माताजी।
उनमें भी उत्तम गणिनी हैं, जिनवाणी महिमा आती।।
एक मई सन् पिच्चासी को, केवलज्ञान कल्याणक दिन।
पूज्य आर्यिका ज्ञानमती जी, भूषित गणिनी अलंकरण।।८००।।

नूतन पिच्छी तथा कमण्डलु, गणिनी जी को दिये गये।
शास्त्र-समर्पणपूर्वक माँ के, जय-जयकारे किये गये।।
सकल आर्यिका की वंदामि, श्रावक-श्राविका नमन किये।
गणिनी माता ज्ञानमती ने, सब को शुभ आशीष दिए।।८०१।।

अचलयंत्र पर प्रतिमाओं का, स्थापन सम्पन्न हुआ।
हुआ समापन रथयात्रा से, कोई न लेश विपन्न हुआ।।
चंद्र-रवि के श्रम स्वेद से, बीज वृक्ष बन फलित हुआ।
जो भी रोड़े बनकर आये, चूर्ण हुए मद गलित हुआ।।८०२।।

अगर ठान ले कोई मन में, नहीं असंभव कोई काम।
नारी होकर माताजी ने, सिद्ध कर दिया कथन ललाम।।
जब तक जम्बूद्वीप धरा पर, है सुमेरु नभ को थामे।
तब तक गणिनी ज्ञानमती का, नर-सुर मिलकर यश गावें।।८०३।।