ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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03.इन्द्रिय मार्गणा अधिकार

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इन्द्रिय मार्गणा अधिकार

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अथ इन्द्रियमार्गणाधिकार:

मंगलाचरणम्
सिद्धार्थस्यात्मजं वीरं वंदेहं भक्तिभावतः।
सर्वधर्मेषु प्राधान्यं शासनं यस्य वर्तते।।१।।
द्वादशांगांगबाह्यैर्या निर्मिता सा सरस्वती।
सदेहा चाप्यदेहास्ति वीरास्यजा जयत्विह।।२।।
षट्खण्डागमग्रन्थेन यैः ख्याता श्रुतपञ्चमी।
तं गुरुं ग्रन्थकर्तारौ ग्रन्थं च ज्ञप्तये नुमः।।३।।
अथ जंबूद्वीपे भरतक्षेत्रस्यार्यखंडे भारतदेशस्य राजधानी-‘दिल्ली’ नाममहानगरे प्रीतविहार ‘कालोनी’ मध्ये श्रीनाभिरायमण्डपे विराजमानाः प्रतिष्ठेयप्रतिमाः चतुर्विंशतिकल्पद्रुममहाविधानावसरे समवसरणमण्डलेषु विराजमानक्रियमाणाश्चतुर्विंशतितीर्थंकराणां चतुश्चतुर्जिनप्रतिमाश्च याः षण्णवतयो मूलनायकश्रीऋषभदेव-जिनप्रतिमा अन्याश्च या सर्वा अपि पंचकल्याणकप्रतिष्ठां प्र्राप्स्यन्ति। ताः सर्वाः प्रतिष्ठिता भूत्वा इह लोके जयन्तु मंगलं कल्याणमारोग्यं च सर्वेभ्यो भाक्तिकेभ्यो वितरन्तुतराम्।
अथ षट्खण्डागमस्य द्वितीयखंडे क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयाधिकारे एकजीवापेक्षया कालानुगमे पंचभिरन्तरस्थलैः इन्द्रियमार्गणाधिकारः प्ररूप्यते त्रयस्त्रिंशत्सूत्रैरिति। तत्र तावत् प्रथमस्थले सामान्येन एकेन्द्रियाणां कालनिरूपणत्वेन ‘‘इन्दियाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। ततः परं द्वितीयस्थले बादरैकेन्द्रियाणां कालप्रतिपादनत्वेन ‘‘बादरेइंदिया’’ इत्यादिना नव सूत्राणि। तत्पश्चात् तृतीयस्थले सूक्ष्मैकेन्द्रियाणां कालकथन-मुख्यत्वेन ‘‘सुहुमेइंदिया’’ इत्यादिनवसूत्राणि। पुनः चतुर्थस्थले विकलत्रयाणां कालप्रतिपादनत्वेन ‘‘बीइंदिया’’ इत्यादिसूत्रषट्कं। पुनश्च पंचमस्थले पंचेन्द्रियाणां कालनिरूपणत्वेन ‘‘पंचिंदिय’’ इत्यादिना षट्सूत्राणि इति समुुदायपातनिका कथिता भवति।
अधुना एकेन्द्रियाणां जीवानां सामान्येन कालप्ररूपणाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
इंदियाणुवादेण एइंदिया केवचिरं कालादो होंति ?।।३९।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।४०।।
उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियट्टं।।४१।।
सद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थः सुगमोऽस्ति। अविवक्षितेन्द्रियजीवेभ्यः आगत्य कश्चिद् जीवः एकेन्द्रियेषु उत्पद्य कदलीघातेन घातितक्षुद्रभवग्रहणमात्रकालं स्थित्वा अन्यद्वीन्द्रियादिषु गतस्ततस्तत् क्षुद्रभवग्रहणकालमात्रं कालं जघन्येन भवति।
उत्कर्षेण अविवक्षितेन्द्रियजीवेभ्यः एकेन्द्रियेषु उत्पद्य आवलिकायाः असंख्यातभागमात्रपुद्गलपरिवर्तने कुंभकारचक्रमिव परिवत्र्य अविवक्षितद्वीन्द्रियादिषु गतस्य तदुपलंभात्।
एवं प्रथमस्थले सामान्यैकेन्द्रियाणां कालनिरूपणत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।
संप्रति बादरैकेन्द्रियाणां कालनिरूपणाय सूत्रनवकमवतार्यते-
बादरेइंदिया केवचिरं कालादो होंति ?।।४२।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।४३।।
उक्कस्सेण अंगुलस्स असंखेज्जदिभागो असंखेज्जासंखेज्जाओ ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीओ।।४४।।
बादरएइंदियपज्जत्ता केवचिरं कालादो होंति ?।।४५।।
जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।४६।।
उक्कस्सेण संखेज्जाणि वाससहस्साणि।।४७।।
बादरेइंदियअपज्जत्ता केवचिरं कालादो होंति ?।।४८।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।४९।।
उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं।।५०।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थः सुगमोऽस्ति। सामान्येन कश्चिद् जीवः अविवक्षितेन्द्रियेभ्यः आगत्य बादरैकेन्द्रियेषु उत्पद्य अंगुलस्य असंख्यातभागमात्रं-असंख्यातासंख्यातावसर्पिण्युत्सर्पिणीमात्रकालं कुलालचक्रमिव तत्रैव परिभ्रम्य निर्गतस्तस्य एतदुत्कृष्टकालं संभवति।
बादरैकेन्द्रियपर्याप्तेषु अंतर्मुहूर्तं मुक्त्वान्यस्य जघन्यायुषः अनुपलंभात्। उत्कर्षेण अनर्पितेन्द्रियेभ्यः आगत्य बादरैकेन्द्रियपर्याप्तेषूत्पद्य संख्यातानि सहस्रवर्षाणि तत्रैव परिभ्रम्य निर्गतस्य तदुपलंभात्।
बहुकं कालं तत्र किन्न हिंडते ?
न, किंच-श्रीवीरसेनाचार्येण कथ्यते-‘‘केवलणाणादो विणिग्गयजिणवयणस्सेदस्स सयलपमाणेहिंतो अहियस्य विंसवादाभावा।।’’
बादरैकेन्द्रियापर्याप्तानां उत्कर्षेण कालमन्तर्मुहूर्तं-अनेकसहस्रबारं तत्रैव पुनः पुनः उत्पन्नस्यापि अंतर्मुहूर्तं मुक्त्वा उपरितनायुःस्थितीनामनुपलंभात्।
एवं द्वितीयस्थले बादरैकेन्द्रियजीवकालप्रतिपादनत्वेन सूत्रनवकं गतम्।
संप्रति सूक्ष्मानां जीवानां कालप्रतिपादनाय सूत्रनवकमवतार्यते-
सुहुमेइंदिया केवचिरं कालादो होंति ?।।५१।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।५२।।
उक्कस्सेण असंखेज्जा लोगा।।५३।।
सुहुमेइंदिया पज्जत्ता केवचिरं कालादो होंति ?।।५४।।
जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।५५।।
उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं।।५६।।
सुहुमेइंदियअपज्जत्ता केवचिरं कालादो होंति ?।।५७।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।५८।।
उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं।।५९।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थः सुगमो वर्तते। सामान्येन सूक्ष्मैकेन्द्रियजीवानां उत्कर्षेण कथ्यते-अन्येन्द्रियेभ्यः आगत्य सूक्ष्मैकेन्द्रियेषूत्पद्य असंख्यातलोकमात्रकालं संतप्यमानजलमिव तत्रैव परिभ्रम्य निर्गते जीवे तदुपलंभात्।
सूक्ष्मजीवस्थितिः बादरैकेन्द्रियस्थितितः अभ्यधिका किमर्थं न जाता ?
न जाता, बादरैकेन्द्रियेषु आयुर्बध्यमानवारेभ्यः सूक्ष्मैकेन्द्रियेषु आयुर्बध्यमान-वाराणामसंख्यातगुणत्वात्।
एतत्कथं ज्ञायते ?
‘‘एदम्हादो जिणवयणादो।’’ एतत्कथनेन इदं ज्ञायते यत् एतानि सूत्राणि जिनवचनान्येव, इदं श्रीवीरसेनाचार्यो ब्रवीति।
सूक्ष्मैकेन्द्रियपर्याप्तानां जघन्योत्कृष्टस्थितयोऽन्तर्मुहूर्तमेव। उत्कर्षेण-अनेकसहस्रवारं तत्रोत्पन्नेऽपि अंतर्मुहूर्तादधिकभवस्थितेः अनुपलंभात्।
कश्चिदाशंकते-सूक्ष्मैकेन्द्रियपर्याप्तापर्याप्तानां उत्कृष्टभवस्थितिप्रमाणमन्तर्मुहूत्र्तमेव, सूक्ष्मानां जीवानां पुनः भवस्थितिः असंख्यातलोकप्रमाणं, कथमेतत् कथनं न विरुध्यते ?
न विरुध्यते, पर्याप्तापर्याप्तकेषु असंख्यातलोकमात्रवारगतिं आगतिं च कुर्वतस्तस्य जीवस्य तदविरोधात्।
अस्यायमर्थः—अत्र सूक्ष्मपर्याप्तापर्याप्तजीवानां मिलित्वा पुनः पुनः परिभ्रमणेन असंख्यातलोकमात्र-प्रमाणा स्थितिः जायते। किंतु पृथक् -पृथक् सूक्ष्मपर्याप्तजीवस्य अपर्याप्तजीवस्य अंतर्मुहुर्तमात्रमेव भवतीति ज्ञातव्यं।
एतत् स्थितिकथनं ज्ञात्वा एकेन्द्रियजीवेषु अद्य प्रभृति मम जन्म न भवेत् इति भावनां भावयित्वा रत्नत्रयसाधनां कृत्वा संसारपरिभ्रमणं नाशयितव्यं भवद्भिरिति ।
एवं तृतीयस्थले सूक्ष्मजीवानां कालनिरूपणत्वेन सूत्रनवकं गतम् ।

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अथ इन्द्रियमार्गणा अधिकार प्रारंभ

मंगलाचरण

श्लोकार्थ-महाराजा सिद्धार्थ के पुत्र भगवान महावीर को मैं भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूँ। जिनका सर्वधर्मों में प्रधान सार्वभौम जैनशासन इस धरती पर प्रवर्तित हो रहा है।।१।।

वह माता सरस्वती देवी इस धरा पर जयशील होवें जो भगवान महावीर के मुख से दिव्यध्वनि द्वारा उत्पन्न हुई हैं, वे द्वादशअंग और अंगबाह्यरूप अवयवों से निर्मित शरीराकार में भी हैं और अदेहरूप भी हैं।।२।।

जिन निग्र्रन्थ गुरुओं के निमित्त से षट्खण्डागम ग्रंथ रचना के कारण श्रुतपंचमी तिथि संसार में प्रसिद्ध हुई है, उन ज्ञानप्रदाता गुरुदेव श्रीधरसेनाचार्य को, ग्रंथकर्ता श्री पुष्पदंत-भूतबली आचार्य को एवं उनके द्वारा रचित षट्खण्डागम ग्रंथ को ज्ञान प्राप्ति हेतु हमारा बारम्बार नमस्कार है।।३।।

इस जम्बूद्वीप में भरतक्षेत्र के आर्यखण्ड में भारतदेश की राजधानी दिल्ली महानगर के प्रीतविहार क्षेत्र (कालोनी) में श्रीनाभिरायमण्डप में विराजमान प्रतिष्ठेय प्रतिमाएं चौबीस कल्पद्रुम महामण्डल विधान के अवसर पर चौबीस समवसरणों के मण्डलों पर विराजमान की जाने वाली चौबीस तीर्थंकरों की चार-चार जिनप्रतिमाएं कुल मिलाकर छ्यिानवे प्रतिमा, मूलनायक (कमल मंदिर में विराजमान होने वाली २१ इंच अष्ट धातु की पद्मासन) भगवान ऋषभदेव जिनप्रतिमा एवं अन्य जो भी प्रतिमाएं पंचकल्याणक प्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित होंगी, वे सभी प्रतिष्ठित होकर इस लोक में जयशील होवें तथा सभी श्रद्धालु भक्तों के लिए मंगल, आरोग्य एवं कल्याण को करें, यही भावना है।

भावार्थ-षट्खण्डागम के द्वितीय खण्ड का प्रकरण पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने सन् १९९७ में श्रुतपंचमी के दिन (१० जून १९९७ को) लिखा है। उस दिन प्रीतविहार-दिल्ली में भक्तिमान श्रावक श्री अनिल कुमार जैन द्वारा अपने मकान के प्रांगण में निर्मित किये गये भगवान ऋषभदेव कमल मंदिर में विराजमान होने वाली भगवान ऋषभदेव जिनप्रतिमा का पंचकल्याणक महोत्सव प्रारंभ हुआ था। उसी पंचकल्याणक में आश्विन मास में होने वाले चौबीस कल्पद्रुम विधान की ९६ प्रतिमाओं की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई थी इसीलिए उनका भी उल्लेख यहाँ किया गया है।

अब षट्खण्डागम के क्षुद्रकबंध नामक द्वितीय खण्ड में द्वितीय अधिकार में एक जीव की अपेक्षा कालानुगम में पाँच अन्तरस्थलों के द्वारा तेंतीस सूत्रों से समन्वित इन्द्रियमार्गणा अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में सामान्य से एकेन्द्रिय जीवों का काल निरूपण करने वाले ‘‘इंदियाणुवादेण’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। उसके बाद द्वितीय स्थल में बादर एकेन्द्रिय जीवों का काल प्रतिपादन करने वाले ‘‘बादरेइंदिया’’ इत्यादि नौ सूत्र हैं। तत्पश्चात् तृतीय स्थल में सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीवों का काल कथन करने वाले ‘‘सुहुमेइंदिया’’ इत्यादि नौ सूत्र हैं। पुन: चतुर्थस्थल में विकलत्रय जीवों का काल बतलाने वाले ‘‘बीइंदिया’’ इत्यादि छह सूत्र हैं। उसके बाद पंचम स्थल में पंचेन्द्रिय जीवों का काल निरूपण करने वाले ‘‘पंचिंदिय’’ इत्यादि छह सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका कही गई है।

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अब एकेन्द्रिय जीवों का सामान्य से काल प्ररूपण करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

इन्द्रियमार्गणानुसार एकेन्द्रिय जीव वहाँ कितने काल तक रहते हैं ?।।३९।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहण काल तक जीव एकेन्द्रिय रहते हैं।।४०।।

उत्कृष्ट से असंख्यात पुद्गलपरिवर्तनप्रमाण अनन्तकाल तक जीव एकेन्द्रिय रहते हैं।।४१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त सूत्रों का अर्थ सुगम है। अन्य अविवक्षित इन्द्रियों वाले जीवों में से आकर एकेन्द्रियों में उत्पन्न होकर, कदलीघात से घातितक्षुद्रभवग्रहणमात्र काल रहकर अन्य द्वीन्द्रियादि जीवों में गये हुए जीव के वह क्षुद्रभवग्रहण मात्र काल जघन्य से होता है।

उत्कृष्टरूप से-अविवक्षित इन्द्रियों वाले जीवों में से आकर एकेन्द्रियों में उत्पन्न होकर आवली के असंख्यात भागमात्र पुद्गलपरिवर्तन में कुम्भकार के चक्र के समान परिभ्रमण करके अविवक्षित द्वीन्द्रियादिक जीवों में गये हुए जीव के वह काल घटित होता है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में सामान्य एकेन्द्रिय जीवों का कालनिरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब बादर एकेन्द्रिय जीवों का काल निरूपण करने हेतु नौ सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

बादर एकेन्द्रिय जीव वहाँ कितने काल तक रहते हैं ?।।४२।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहणमात्र काल तक वहाँ बादर एकेन्द्रिय जीव रहते हैं।।४३।।

उत्कृष्ट से अंगुल के असंख्यातवें भाग प्रमाण असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी- उत्सर्पिणी प्रमाणकाल तक वहाँ बादर एकेन्द्रिय जीव रहते हैं।।४४।।

बादर एकेन्द्रिय पर्याप्त जीव वहाँ कितने काल तक रहते हैं ?।।४५।।

जघन्य से अन्तर्मुहूर्त काल तक बादर एकेन्द्रिय पर्याप्त जीव वहाँ रहते हैं।।४६।।

उत्कृष्ट से संख्यात हजार वर्षोें तक बादर एकेन्द्रिय पर्याप्त जीव वहाँ रहते हैं।।४७।।

बादर एकेन्द्रिय अपर्याप्त जीव वहाँ कितने काल तक रहते हैं ?।।४८।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण काल तक बादर एकेन्द्रिय अपर्याप्त जीव वहाँ रहते हैं।।४९।।

उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त काल तक एकेन्द्रिय बादर अपर्याप्त जीव वहाँ रहते हैं।।५०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त सूत्रों का अर्थ सुगम है। सामान्य से कोई जीव अविवक्षित इन्द्रियों वाले जीवों मेें से आकर बादर एकेन्द्रियों में उत्पन्न होकर अंगुल के असंख्यातवें भागप्रमाण असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी-उत्सर्पिणी प्रमाण काल तक वहाँ कुम्हार के चक्र के समान उसी पर्याय में परिभ्रमण करके निकलने वाले जीव के उत्कृष्टकाल का होना संभव रहता है।

बादर एकेन्द्रिय पर्याप्तक जीवों में अन्तर्मुहूर्त के सिवाय अन्य जघन्य आयु नहीं पाई जाती है। उत्कृष्ट से अन्य इन्द्रियों वाले जीवों में से आकर बादर एकेन्द्रिय पर्याप्तकों में उत्पन्न होकर संख्यात हजार वर्षों तक उसी पर्याय में परिभ्रमण करके निकले हुए जीव के उत्कृष्ट काल पाया जाता है।

शंका-संख्यात हजार वर्षों से अधिक काल तक जीव बादर एकेन्द्रिय पर्याप्तकों में क्यों नहीं भ्रमण करता है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि श्री वीरसेनाचार्य ने कहा है कि केवलज्ञान से निकले हुए व समस्त प्रमाणों से अधिक प्रमाणभूत इस जिनवचन के संबंध में विसंवाद नहीं हो सकता है।

बादर एकेन्द्रिय अपर्याप्त जीवों का उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्तकाल होता है-अनेक हजारों बार उसी पर्याय में पुन: पुन: उत्पन्न हुए जीव के भी अन्तर्मुहूर्त को छोड़ और ऊपर की आयु स्थितियाँ नहीं पाई जाती हैं।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में बादर एकेन्द्रिय जीवों का काल प्रतिपादन करने वाले नौ सूत्रों का कथन पूर्ण हुआ।

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अब सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीवों का काल बतलाने हेतु नौ सूत्रों का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीव वहाँ कितने काल तक रहते हैं ?।।५१।।

जघन्य से सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीव क्षुद्रभवग्रहण काल तक रहते हैं।।५२।।

उत्कृष्ट से सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीव असंख्यात लोकप्रमाण काल तक वहाँ रहते हैं।।५३।।

सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्त जीव कितने काल तक वहाँ रहते हैं ?।।५४।।

जघन्य से अन्तर्मुहूर्त काल तक सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्तक जीव रहते हैं।।५५।।

उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त काल तक सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्तक जीव वहाँ रहते हैं।।५६।।

सूक्ष्म एकेन्द्रिय अपर्याप्तक जीव कितने काल तक वहाँ रहते हैं ?।।५७।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहण काल तक सूक्ष्म एकेन्द्रिय अपर्याप्त जीव रहते हैं।।५८।।

उत्कृष्ट से सूक्ष्म एकेन्द्रिय अपर्याप्त जीव अन्तर्मुहूर्त काल तक वहाँ रहते हैं।।५९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त सूत्रों का अर्थ सुगम है। सामान्य से सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीवों का उत्कृष्ट कथन करते हैं-अन्य इन्द्रियों वाले जीवों में से आकर सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीवों में उत्पन्न होकर असंख्यात लोकप्रमाण काल तक तपाये हुए जल के समान उसी पर्याय में परिभ्रण करके निकले हुए जीव में उत्कृष्ट काल पाया जाता है।

शंका-सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीवों की स्थिति बादर एकेन्द्रिय जीवों की स्थिति से अधिक क्यों नहीं है ?

समाधान-नहीं होती है, क्योंकि बादर एकेन्द्रिय जीवों में जितनी बार आयु बंध होता है उनसे सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीवों के असंख्यातगुणी अधिक बार आयु के बंध होते हैं।

शंका-यह कैसे जाना जाता है ?

समाधान-‘‘इस जिनवचन से ही यह बात जानी जाती है।’’ इस कथन से यह जाना जाता है कि ये सूत्र जिनवचन ही है, यह श्री वीरसेनाचार्य कहते हैं।

सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्त जीवों की जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति अन्तर्मुहूर्त ही है, उत्कृष्ट से-अनेक सहस्रबार उसी-उसी पर्याय में उत्पन्न होने पर भी अन्तर्मुहूर्त से अधिक सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीवों की भवस्थिति नहीं पाई जाती है।

यहाँ कोई शंका करता है कि-सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्त और अपर्याप्त जीवों की उत्कृष्ट भवस्थिति का प्रमाण अन्तर्मुहूर्त ही है, जब कि सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीवों की भवस्थिति असंख्यात लोकप्रमाण है, यह बात परस्पर विरुद्ध क्यों नहीं है ?

'समाधान-नहीं, क्योंकि सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीव असंख्यात लोकप्रमाण बार पर्याप्तक और अपर्याप्तकों में आवागमन करते हैं, इसलिए उनके असंख्यात लोकप्रमाण होने में कोई विरोध नहीं आता है।

इसका अर्थ यह है कि-यहाँ सूक्ष्म पर्याप्त और अपर्याप्त जीवों के मिलकर पुन: पुन: परिभ्रमण से असंख्यात लोकमात्र प्रमाण स्थिति उत्पन्न होती है, किन्तु सूक्ष्मपर्याप्त जीव और अपर्याप्त जीवों की पृथक-पृथक् स्थिति अन्तर्मुहूर्त मात्र ही होती है, ऐसा जानना चाहिए।

यह स्थिति कथन जानकर एकेन्द्रिय जीवों में अब कभी भी मेरा जन्म न होवे, ऐसी भावना भाते हुए रत्नत्रय की साधना करके आप सभी को अपने संसारपरिभ्रमण का अन्त करना चाहिए।

इस प्रकार तृतीय स्थल में सूक्ष्म जीवों का कालनिरूपण करने वाले नौ सूत्र पूर्ण हुए।

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इदानीं विकलत्रयाणां कालकथनाय सूत्रषट्कमवतार्यते-

बीइंदिया तीइंदिया चउिंरदिया बीइंदिय-तीइंदिय-चउिंरदिय-पज्जत्ता केवचिरं कालादो होंति ?।।६०।।

जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणमंतोमुहुत्तं।।६१।।
उक्कस्सेण संखेज्जाणि वाससहस्साणि।।६२।।
बीइंदिय-तीइंदिय-चउिंरदिय अपज्जत्ता केवचिरं कालादो होंति ?।।६३।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।६४।।
उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं।।६५।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-अत्र यथाक्रमेण द्वीन्द्रिय-त्रीन्द्रिय-चतुरिन्द्रियाणां स्वकान्तर्भूतापर्याप्तानां संभवात् तेषां क्षुद्रभवग्रहणमात्रं कालं, एतेषां चैव पर्याप्तानामन्तर्मुहूर्तं, तत्रापर्याप्तानामभावात्।
उत्कर्षेण अविवक्षितेन्द्रियेभ्यः आगत्य द्वादशवर्षायुष्केषु द्वीन्द्रियेषु एकोनपंचाशद्रात्रिंदिवायुष्केषु त्रीन्द्रियेषु वा षण्मासायुष्केषु चतुरिन्द्रियेषु वा उत्पद्य बहुवारं तत्रैव परिवर्तनं कृत्वा निर्गतस्य तस्य विवक्षितद्वीन्द्रि-यादिजीवस्य सूत्रोक्तकालसंभवात्। अपर्याप्तानां एषां एव विकलत्रयाणां जघन्येन क्षुद्रभवग्रहणकालमात्रं, उत्कर्षेण अंतर्मुहूर्तं।
एवं चतुर्थस्थले विकलत्रयजीवकालनिरूपणत्वेन षट् सूत्राणि गतानि।
अधुना पंचेन्द्रियाणां जीवानां कालनिरूपणाय सूत्रषट्कमवतार्यते-
पंचिंदिय-पंचिंदियपज्जत्ता केवचिरं कालादो होंति ?।।६६।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणमंतोमुहुत्तं।।६७।।
उक्कस्सेण सागरोवमसहस्साणि पुव्वकोडिपुधत्तेणब्भहियाणि सागरोवम-सदपुधत्तं।।६८।।
पंचिंदिय अपज्जत्ता केवचिरं कालादो होेंति ?।।६९।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।७०।।
उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं।।७१।।
सिद्धांतिंचतामणिटीका-सूत्राणामर्थः सुगमोऽस्ति ।
पंचेन्द्रियाणां पूर्वकोटिपृथक्त्वेन अभ्यधिकसागरोपमसहस्राणि सामान्यजीवानामिति । पर्याप्तानां पुनः सागरोपमशतपृथक्त्वमिति यथासंख्यन्यायात्।
एवं पंचमस्थले पंचेन्द्रियाणां कालप्ररूपणत्वेन सूत्रषट्कं गतम् ।
इति षट्खंडागमस्य श्री क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखंडे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां एकजीवापेक्षयाकालानुगमे इंद्रियमार्गणानाम द्वितीयोऽधिकारः समाप्तः।

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अब विकलत्रय जीवों का काल कथन करने हेतु छह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय-चतुरिन्द्रिय तथा द्वीन्द्रिय पर्याप्त, त्रीन्द्रिय पर्याप्त व चतुरिन्द्रिय पर्याप्त जीव कितने काल तक वहाँ रहते हैं ?।।६०।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहणमात्र काल व अन्तर्मुुहूर्त काल तक जीव विकलत्रय व विकलत्रय पर्याप्त होते हैं।।६१।।

उत्कृष्ट से विकलत्रय व विकलत्रय पर्याप्त जीव असंख्यात हजार वर्षों तक वहाँ रहते हैं।।६२।।

द्वीन्द्रिय अपर्याप्त, त्रीन्द्रिय अपर्याप्त व चतुरिन्द्रिय अपर्याप्त जीव कितने काल तक वहाँ रहते हैं ?।।६३।।

जघन्य से विकलत्रय अपर्याप्त जीव क्षुद्रभवग्रहण काल तक वहाँ रहते हैं।।६४।।

उत्कृष्ट से विकलत्रय अपर्याप्त जीव अन्तर्मुहूर्त काल तक वहाँ रहते हैं।।६५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ यथाक्रम से द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय जीवों में उनके अपर्याप्तकों का भी अन्तर्भाव है अतएव उन्हीं अपर्याप्तकों की अपेक्षा उनका जघन्यकाल क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण होता है। उन्हीं द्वीन्द्रियादिक जीवों में पर्याप्तकों का काल अन्तर्मुहूर्त है, क्योंकि उनमें अपर्याप्तकों का अभाव है।

उत्कृष्ट से-अविवक्षित इन्द्रिय वाले जीवों में से आकर बारह वर्ष की आयु वाले द्वीन्द्रिय, उनचास रात्रि-दिन वाले तीन इंद्रिय तथा ६ मास की आयु वाले चतुरिन्द्रिय जीवों में उत्पन्न होकर बहुत बार उन्हीं पर्यायों में परिभ्रमण करके निकलने वाले जीव के सूत्रोक्त काल का होना संभव है।

उन्हीं विकलत्रय अपर्याप्त जीवों का जघन्य से क्षुद्रभवग्रहण काल मात्र है और उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्तकाल होता है।

इस प्रकार चतुर्थ स्थल में विकलत्रय जीवों का काल निरूपण करने वाले छह सूत्र पूर्ण हुए।

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अब पंचेन्द्रिय जीवों का काल निरूपण करने के लिए छह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

पंचेन्द्रिय व पंचेन्द्रिय पर्याप्त जीव कितने काल तक वहाँ रहते हैं ?।।६६।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहण काल व अन्तर्मुहूर्त काल तक जीव पंचेन्द्रिय व पंचेन्द्रिय पर्याप्त रहते हैं।।६७।।

उत्कृष्ट से पूर्वकोटिपृथक्त्व से अधिक सागरोपमसहस्र व सागरोपमशत पृथक्त्व काल तक जीव क्रमश: पंचेन्द्रिय पर्याप्त रहते हैं।।६८।।

जीव पंचेन्द्रिय अपर्याप्त कितने काल तक रहते हैं।।६९।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहण काल तक जीव पंचेन्द्रिय अपर्याप्त रहते हैं।।७०।।

उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त काल तक जीव पंचेन्द्रिय अपर्याप्त रहते हैं।।७१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त सूत्रों का अर्थ सरल है।

पंचेन्द्रिय जीवों का काल पूर्वकोटिपृथक्त्व से अधिक एक हजार सागरोपमप्रमाण सामान्य जीवों की अपेक्षा कहा गया है। परन्तु पंचेन्द्रिय पर्याप्त जीवों का काल सागरोपमशतपृथक्त्व ही है, ऐसा सूत्र में कथित ‘यथासंख्य’ न्याय से जाना जाता है।

इस प्रकार पंचम स्थल में पंचेन्द्रिय जीवों का काल प्ररूपण करने वाले छह सूत्र पूर्ण हुए।

विशेषार्थ-इन्द्रियमार्गणा नामक इस अधिकार में एक इन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय तक के जीवों का काल बतलाया गया है। इस संदर्भ में गोम्मटसार जीवकाण्ड में इन्द्रियमार्गणा के विषय में वर्णन आया है कि जिस प्रकार नव ग्रैवेयक आदि में रहने वाले इन्द्र सामानिक, त्रायस्त्र्ािंश आदि भेदों तथा स्वामी भृत्य आदि विशेष भेदों से रहित होने के कारण किसी के वशवर्ती नहीं है-स्वतंत्र हैं उसी प्रकार स्पर्शन आदि इन्द्रियाँ भी अपने-अपने स्पर्श आदि विषयों में दूसरी रचना आदि की अपेक्षा न रखकर स्वतंत्र हैं। यही कारण है कि इनको इन्द्रों-अहमिन्द्रों के समान होने से इन्द्रिय कहते हैं।

इन्द्रियों के दो भेद-भावेन्द्रिय और द्रव्येन्द्रिय।

भावेन्द्रिय के दो भेद-लब्धि और उपयोग। मतिज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशम से प्रगट हुई अर्थ ग्रहण की शक्तिरूप विशुद्धि को ‘लब्धि’ कहते हैं और उसके होने पर अर्थ-विषय के ग्रहण करने रूप जो व्यापार होता है, उसे ‘उपयोग’ कहते हैं।

द्रव्येन्द्रिय के दो भेद-निर्वृति और उपकरण। आत्म प्रदेशों तथा आत्म सम्बद्ध शरीर प्रदेशों की रचना को निर्वृत्ति कहते हैं। निर्वृत्ति आदि की रक्षा में सहायकों को उपकरण कहते हैं।

जिन जीवों के बाह्य चिन्ह और उनके द्वारा होने वाला स्पर्श, रस, गंध, रूप और शब्द इन पाँच विषयों का ज्ञान हो, उनको क्रम से एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, पंचेन्द्रिय जीव कहते हैं। इनके भी अवान्तर भेद अनेक हैं।

एकेन्द्रिय जीव के केवल एक स्पर्शनेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय के स्पर्शन, रसना, त्रीन्द्रिय के स्पर्शन, रसना, घ्राण, चतुरिन्द्रिय के स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और पंचेन्द्रिय के स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और श्रोत्र।

इन्द्रियों का विषय-एकेन्द्रिय के स्पर्शनेन्द्रिय का उत्कृष्ट विषय क्षेत्र चार सौ धनुष है और द्वीन्द्रिय आदि के वह दूना-दूना है।

चक्षु इद्रिय के उत्कृष्ट विषय में विशेषता-सूर्य का भ्रमण क्षेत्र योजन चौड़ा है। यह पृथ्वी तल से ८०० योजन ऊपर जाकर है। वह इस जम्बूद्वीप के भीतर १८० योजन एवं लवण समुद्र में योजन है अर्थात् समस्त गमन क्षेत्र योजन या मील है। इतने प्रमाण गमन क्षेत्र में सूर्य की १८४ गलियाँ हैं। इन गलियों में सूर्य क्रमश: एक-एक गली में संचार करते हैं इस प्रकार जम्बूद्वीप में दो सूर्य तथा दो चन्द्रमा हैं।

चक्रवर्ती के चक्षुरिन्द्रिय का उत्कृष्ट विषय-जब सूर्य पहली गली में आता है तब अयोध्या नगरी के भीतर अपने भवन के ऊपर स्थित चक्रवर्ती सूर्य विमान में स्थित जिनबिम्ब का दर्शन करते हैं। इस समय सूर्य अभ्यन्तर गली की ३,१५,०८९ योजन परिधि को ६० मुहूर्त में पूरा करता है। इस गली में सूर्य निषध पर्वत पर उदित होता है वहाँ से उसे अयोध्या नगरी के ऊपर आने में ९ मुहूर्त लगते हैं। जब-जब वह ३,१५,०८९ योजन प्रमाण उस वीथी को ६० मुहूर्त में पूरा करता है, तब वह ९ मुहूर्त में कितने क्षेत्र को पूरा करेगा, इस प्रकार त्रैराशिक करने पर योजन अर्थात् १,८९०५,३४,००० मील होता है।

इन्द्रियों का आकार-मसूर के समान चक्षु का, जव की नली के समान श्रोत्र का, तिल के पूâल के समान घ्राण का तथा खुरपा के समान जिह्वा का आकार है। स्पर्शनेन्द्रिय के अनेक आकार हैं।

एकेन्द्रियादि जीवों का प्रमाण-स्थावर एकेन्द्रिय जीव असंख्यातासंख्यात है, शंख आदि द्वीन्द्रियजीव असंख्यातासंख्यात हैं, चिंवटी आदि त्रीन्द्रिय जीव असंख्यातासंख्यात हैं, भ्रमर आदि चतुरिन्द्रिय जीव असंख्यातासंख्यात हैं, मनुष्य आदि पंचेन्द्रिय जीव असंख्यातासंख्यात हैं और निगोदिया जीव अनंतानंत हैं। अर्थात् पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, प्रत्येक वनस्पति ये पाँच स्थावर और त्रस जीव असंख्यातासंख्यात हैं और जो वनस्पति के भेदों का दूसरा भेद साधारण है, वे साधारण वनस्पति जीव अनन्तानन्त प्रमाण हैं।

इन्द्रियातीत-अर्हंत और सिद्ध जीव इन्द्रियों के व्यापार से युक्त नहीं हैं, अवग्रह, ईहा आदि क्षयोपशम ज्ञान से रहित, इन्द्रिय सुखों से रहित, अतीन्द्रिय ज्ञान और अनन्त सुख से युक्त हैं। इन्द्रियों के बिना भी आत्मोत्थ निराकुल सुख का अनुभव करने से वे पूर्णतया सुखी हैं। ऐसे अतीन्द्रिय सुख की प्राप्ति हेतु हमें भी सतत पुरुषार्थ करना चाहिए और अपने काल की एक कला भी व्यर्थ नहीं करना चाहिए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम के क्षुद्रकबंध नामक द्वितीय खण्ड में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में एक जीव की अपेक्षा से कालानुगम में इन्द्रियमार्गणा नाम का द्वितीय अधिकार समाप्त हुआ।