ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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03.कायमार्गणाधिकार

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विषय सूची

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कायमार्गणाधिकार

अथ कायमार्गणाधिकार:

अथ स्थलचतुष्टयेन द्वादशसूत्रैः कायमार्गणानाम तृतीयोऽधिकारः प्रारभ्यते। तत्र तावद् प्रथमस्थले पृथ्वीचतुष्कानामन्तरनिरूपणत्वेन ‘‘कायाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तदनु द्वितीयस्थले वनस्पतिकायिक-निगोदानां अंतरकथनमुख्यत्वेन ‘‘वणप्फदि-’’ इत्यादिसूत्रत्रयं । ततः परं तृतीयस्थले बादरवनस्पतिकायिक- प्रत्येकशरीरजीवानामंतरनिरूपणत्वेन ‘‘बादरवणप्फदि-’’ इत्यादिना त्रीणि सूत्राणि। तदनंतरं चतुर्थस्थले त्रसकायिकानामंतरप्रतिपादनत्वेन त्रीणि सूत्राणीति समुदायपातनिका।
संप्रति कायमार्गणायां पृथिव्यादिचतुष्कानामंतरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
कायाणुवादेण पुढविकाइय-आउकाइय-तेउकाइय-वाउकाइय-बादर-सुहुम-पज्जत्त-अपज्जत्ताणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।४७।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।४८।।
उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियट्टं।।४९।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-विवक्षितपृथिवीकायिकादिशरीरं मुक्त्वा अविवक्षितवनस्पतिकायादिषु आवलिकायाः असंख्यातभागमात्रपुद्गलपरिवर्तनानि परिभ्रमितुं संभवोपलंभात्।
एवं प्रथमस्थले पृथिवीकायिकादिचतुष्काणामंतरप्रतिपादनत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।
इदानीं वनस्पतिकायिकनिगोदजीवानामंतरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
वणप्फदिकाइयणिगोदजीवबादर-सुहुम-पज्जत्त-अपज्जत्ताणमन्तरं केवचिरं कालादो होदि ?।।५०।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।५१।।
उक्कस्सेण असंखेज्जा लोगा।।५२।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-अर्पितवनस्पतिकायाद् निर्गतस्यानर्पितपृथिवीकायादिषु एव परिभ्रमतः असंख्यातलोकप्रमाणकालं मुक्त्वान्यस्यान्तरस्यासंभवात्।
एवं द्वितीयस्थले निगोदजीवानां अंतरकथनत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
बादरवनस्पतिकायिकप्रत्येकशरीरजीवानामंतरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
बादरवणप्फदिकाइयपत्तेयसरीरपज्जत्त-अपज्जत्ताणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।५३।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।५४।।
उक्कस्सेण अड्ढाइज्जपोग्गलपरियट्टं।।५५।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-विवक्षितवनस्पतिकायेभ्यो निर्गतस्याविवक्षितनिगोदजीवादिषु भ्रमतः सार्धद्वयपुद्गलपरिवर्तनेभ्योऽधिकांतरानुपलंभात्।
एवं तृतीयस्थले प्रत्येकवनस्पतिजीवानां अंतरनिरूपणत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।
त्रसकायिकानामन्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतरति-
तसकाइय-तसकाइयपज्जत्त-अपज्जत्ताणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।५६।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।५७।।
उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियट्टं ।५८।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-ववक्षितत्रसकायेभ्यो निर्गत्याविवक्षितवनस्पतिकायिकादिषु आवलिकायाः असंख्यातभागमात्रपुद्गलपरिवर्तनानामुपलंभात्।
एवं चतुर्थस्थले त्रसकायिकानामंतरनिरूपणत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे एकजीवापेक्षयान्तरानुगमे गणिनीज्ञानमतीकृतसिद्धांतचिंतामणिटीकायां कायमार्गणानाम
तृतीयोऽधिकारः समाप्तः।


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अथ कायमार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब चार स्थलों में बारह सूत्रों के द्वारा कायमार्गणा नाम का तृतीय अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में पृथ्वीचतुष्क का अन्तर निरूपण करने वाले ‘‘कायाणुवादेण’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। पुन: द्वितीय स्थल में वनस्पतिकायिक निगोदिया जीवों का अन्तर कथन करने वाले ‘‘वणप्फदि’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। उसके बाद तृतीय स्थल में बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीरी जीवों का अन्तर निरूपण करने वाले ‘‘बादरवणप्फदि’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। तदनंतर चतुर्थ स्थल में त्रसकायिक जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने वाले तीन सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका अधिकार के प्रारंभ में कही गई है।

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अब कायमार्गणा में पृथिवीकायिकचतुष्क का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

कायमार्गणानुसार पृथिवीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक, बादर और सूक्ष्म तथा पर्याप्त और अपर्याप्त जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।४७।।

कम से कम क्षुद्रभवग्रहण काल तक पृथिवीकायिक आदि उक्त जीवों का अन्तर होता है।।४८।।

उत्कृष्ट से असंख्यात पुद्गलपरिवर्तनप्रमाण अनन्त काल तक उक्त पृथिवीकायिक आदि जीवों का अन्तर होता है।।४९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-विवक्षित पृथिवीकायिक आदि काय को छोड़कर अविवक्षित वनस्पतिकाय आदि जीवों में आवली के असंख्यातवें भाग मात्र पुद्गलपरिवर्तन भ्रमण करना संभव है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में पृथिवीकायिक के चार भेद वाले जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब वनस्पतिकायिक निगोदिया जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

वनस्पतिकायिक निगोदिया बादर और सूक्ष्म तथा पर्याप्त और अपर्याप्त जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।५०।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण काल तक उक्त वनस्पतिकायिक निगोदिया जीवों का अन्तर होता है।।५१।।

उत्कृष्ट से असंख्यात लोकप्रमाण काल तक उक्त वनस्पतिकायिक निगोदिया जीवों का अन्तर होता है।।५२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-विवक्षित वनस्पतिकाय से निकलकर अविवक्षित पृथिवीकायादिकों में ही भ्रमण करने वाले जीव के असंख्यातलोकप्रमाण काल को छोड़कर अन्य कालप्रमाण अन्तर होना असंभव है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में निगोदिया जीवों का अन्तर कथन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब बादरवनस्पतिकायिकप्रत्येकशरीर जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येकशरीरपर्याप्त और अपर्याप्त जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।५३।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण काल तक बादरवनस्पतिकायिकप्रत्येकशरीर पर्याप्त और अपर्याप्त जीवों का अन्तर होता है।।५४।।

उत्कृष्ट से अढ़ाई पुद्गलपरिवर्तनप्रमाण बादरवनस्पतिकायिकप्रत्येकशरीर पर्याप्त और अपर्याप्त जीवों का अन्तर होता है।।५५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-विवक्षित वनस्पतिकायिक जीवों में से निकलकर अविवक्षित निगोद आदि जीवों में भ्रमण करने वाले जीव के ढाई पुद्गलपरिवर्तनों से अधिक अन्तरकाल नहीं पाया जा सकता है।

इस प्रकार तृतीय स्थल में प्रत्येक वनस्पति जीवों का अन्तर निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब त्रसकायिक जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

त्रसकायिक और त्रसकायिकपर्याप्त व अपर्याप्त जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।५६।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण काल तक उक्त त्रसकायादि जीवों का अन्तर होता है।।५७।।

उत्कृष्ट से अनन्त काल तक त्रसकायादि उक्त जीवों का अन्तर होता है, जो असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन प्रमाण के बराबर है।।५८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-विवक्षित त्रसकायिक जीवों में से निकलकर अविवक्षित वनस्पतिकायादि जीवों में आवली के असंख्यातवें भागप्रमाण पुद्गलपरिवर्तनप्रमाण अन्तरकाल पाया जाता है।

इस प्रकार चतुर्थ स्थल में त्रसकायिक जीवों का अन्तर निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में एक जीव की अपेक्षा अन्तरानुगम में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणि-टीका में कायमार्गणा नाम का तृतीय अधिकार समाप्त हुआ।