ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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03.खान-पान की अशुद्धि चिंता का विषय

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खान-पान की अशुद्धि चिंता का विषय

-निर्मल जैन, सतना (म.प्र.)
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जैन समाज में खान-पान की शुद्धि पर विशेष ध्यान हमेशा से दिया जाता रहा है। खान-पान की शुद्धि जैनत्व की पहचान रही है। हमारे आचार्यों ने श्रावकाचार ग्रंथों के माध्यम से हमें श्रावक बनाये रखने का भरपूर प्रयास किया है। परन्तु अब मर्यादायें टूटती जा रही हैं। पाश्चात्य संस्कृति की देखा-देखी ने जीवन का दृष्टिकोण ही बदल दिया है। विज्ञान के नए-नए चमत्कार जहाँ समृद्धि के सूचक हैं, ज्ञानार्जन में सहयोगी हैं, वहीं नई पीढ़ी को अपनी पावन परम्पराओं से दूर हटाने में भी सहायक हो रहे हैं। व्यसन और फैशन का साम्राज्य बढ़ता जा रहा है। लगता है श्रावकाचार शब्द कहीं खो गया है। आधुनिक पीढ़ी में खान-पान का विवेक चिंतनीय स्थिति तक गिर गया है। खान-पान की अशुद्धता इस पीढ़ी को धर्म विमुख भी कर रही है और सदाचारी भी नहीं रहने दे रही। क्योंकि खानपान के विवेक बिना श्रावक धर्म का पालन तो दूर सदाचारी नागरिक होना भी कठिन है। उक्त प्रसिद्ध है-

यादृशं भक्ष्येदन्नं तादृशी जायते मति:
दीपोऽपि भक्ष्यते ध्वांतं कज्जलं च प्रसूयते।।

जैसा खान-पान होता है, उसी के अनुसार व्यक्ति की मति हो जाती है, दीपक अंधकार का भक्षण करता है अत: काजल उत्पन्न करता है। हमारे धर्मगुरु खान-पान की इस गिरावट से खिन्न हैं, समाज का नेतृत्व भी चिंतित है, सोच रहा है कि किस प्रकार युवाशक्ति को धर्म और समाज के कार्यों के लिए प्रोत्साहित करते हुए उनमें श्रावकाचार सदाचार को प्रतिष्ठित किया जाये। किन्तु यदि जनक ही दिग्भ्रमित होकर खान-पान की शुद्धि को शिथिल कर रहा हो, तो फिर नई पीढ़ी में संस्कार कहाँ से आयेंगे। अर्थ तंत्र के इस युग में शिक्षा का उद्देश्य भी मात्र अर्थ- प्राप्ति रह गया है। अर्थ प्राप्ति की होड़ में लोग यह देखने की आवश्यकता ही नहीं समझते कि अर्थ-अनर्थ भी कर रहा है। बचपन में पड़े संस्कार आसानी से बदलते नहीं है। यदि वे संस्कार अच्छे हुए तो भविष्य अच्छा होगा और यदि हमारी लापरवाही से बच्चों में बुरे संस्कार पड़ गये तो भविष्य भी अंधकारमय ही होगा। अत: हमें पहले अपने और परिवार के खान-पान की ओर ध्यान देना होगा।

इस स्थिति में श्रावकाचार का पालन संजीवनी का कार्य कर सकता है। वर्तमान में श्रावकाचार के ग्रंथों का पठन-पाठन कम ही देखा जाता है। या तो अपने को शुद्ध-बुद्ध सिद्ध करने के लिए समयसार प्रवचनसार जैसे महान ग्रंथों का स्वाध्याय होता है या साधुओं में दोष देखने के लिए श्रमणाचार बताने वाले ग्रंथ पढ़े जाते हैं। विचार करें फिर अपना कल्याण वैâसे होगा। उपरोक्त ग्रंथों का हार्द भी यदि हृदयंगम किया जाये, तो वह भी श्रावकाचार का पाठ पढ़ायेगा। मैंने देखा है कि जिन परिवारों में अच्छे संस्कार हैं उनमें बेटे-बहू भी समयसार पर पूज्य ज्ञानमती माताजी के प्रवचन टी.वी. पर सुनते-देखते हैं और हम जैसे लोगों को उलाहना देते हैं कि आपने इस तरह कभी हमें समयसार पढ़ाया ही नहीं। यदि हम श्रावक धर्म का यथाविधि पालन करना-कराना चाहते हैं तो मेरी दृष्टि में हमें तीन बातें परिवार में अपनाना आवश्यक है।(१) सत्संग (साधु संगति), (२) सत्साहित्य (स्वाध्याय) और (३) सत्संगति (गुणी और सदाचारी लोगों की संगति)। यह कार्य सभी उम्र के लोगों के लिए लाभदायक होगा, यदि हम यह कर सवेंâ तो हम सच्चे श्रावक बन सवेंâगे और नई पीढ़ी को भी श्रावकाचार का पाठ पढ़ा सकेगे। श्रावकाचार का स्वतंत्र रूप से वर्णन करने वाले प्रथम ग्रंथ ‘रत्नकरण्ड श्रावकाचार’ में आचार्य समन्तभद्र स्वामी ने मद्य, मांस, मधु के त्याग के साथ अहिंसादि पाँच अणुव्रतों के पालन को श्रावक के आठ मूलगुणों के रूप में बताकर हमें श्रावकधर्म का उपदेश दिया है।

मद्यमांसमधुत्यागै: सहाणुव्रत पंचकम्।
अष्टौ मूलगुणानाहुर्गृहिणां श्रमणोत्तम:।।६६।।

अर्थात् श्रमणों में उत्तम गणधरदेव ने मद्यत्याग, मांसत्याग, मधुत्याग और पाँच अणुव्रत-अहिंसाणुव्रत, सत्याणुव्रत, अचौर्याणुव्रत, ब्रह्मचर्याणुव्रत, इच्छा परिमाणव्रत के धारण को जैनत्व का मूल पाठ कहा है। यह मूल पाठ ही जिसे याद नहीं होगा, वह केवल जन्मना जैन है, कर्म से उसे जैन नहीं कहा जा सकता। उक्त श्लोक से यह ध्वनित होता है कि आचार्य महाराज गृहस्थों के लिए खानपान की शुद्धि पर विशेष जोर देना चाहते हैं। अभक्ष्य आहार से धार्मिक प्रवृत्ति और शारीरिक शक्ति शिथिल होकर चित्त की प्रवृत्ति अनुचित विषयों में लग जाती है। हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह ये जो पाँच पाप हैं ये अशुभ कर्म बंध के कारण होने से हमारी आगामी भवों को भी बिगाड़ते हैं और वर्तमान में भी व्यक्ति को परिवार, समाज और कानून की दृष्टि में हेय बनाकर दुखी और अपमानित करते हैं। रात्रि भोजन का त्याग न होना भी नई पीढ़ी में खान-पान की अशुद्धि का कारण बन रहा है। आचार्य सकलकीर्ति महाराज ने अपने ग्रंथ प्रश्नोत्तर श्रावकाचार में रात्रिभोजन त्याग आवश्यक मानते हुए एक श्लोक दिया है-

इत्येवं दोष संयुत्तं त्याज्यं सम्भोजनं निशि।
विषान्नमिव नि:शेषं पापभीतैर्नरै: सदा।।२२-८१।।

अर्थात् पापों से डरने वाले मनुष्यों को अनेक दोषों से भरे हुए रात्रि भोजन को विष मिले हुए अन्न के समान सदा के लिए अवश्य त्याग कर देना चाहिए। रात्रि भोजन त्याग की बात विज्ञान की कसौटी पर भी खरी उतरती है। चिकित्सा विज्ञान मानता है कि रात्रि विश्राम से चार घंटे पूर्व भोजन बंद कर देना चाहिए क्योंकि नींद आ जाने के बाद पाचन क्रिया बंद हो जाती है। उसकी मान्यता यह भी है कि भोजन के कुछ तत्व मस्तिष्क को उत्तेजित कर देते हैं जिससे नींद नहीं आती। यह उत्तेजना मादक पदार्थों के सेवन या गरिष्ठ भोजन से विशेष रूप से आती है। एक वैज्ञानिक तथ्य यह भी है कि दिन में वायुमंडल अधिक आक्सीजन युक्त होने के कारण स्वास्थ्य के लिए अनुवूâल होता है। यह तो सर्वमान्य तथ्य है कि सूर्य की रोशनी में सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति कम होती है तथा सूर्यास्त के बाद बढ़ जाती है। रात्रि में उत्पन्न होने वाले विषाक्त कीड़े आदि भोजन में पड़ जाये, तो फूड-पायजिनिंग की घटनाएं भी हो जाती हैं। जैन श्रावकाचार ग्रंथों के अतिरिक्त वैदिक शास्त्रों में भी रात्रि भोजन का निषेध किया गया है। मार्वâण्डेय पुराण का यह श्लोक दृष्टव्य है-

अस्तंगते दिवानाथे, आपो रुधिरमुच्यते।
अन्नं मांससमं प्रोत्तं, मार्वण्डेयमहर्षिणां।।

अर्थात् महर्षि मार्वण्डेय कह रहे हैं कि सूर्यास्त के बाद जल रुधिर के समान और अन्न मांस के समान हो जाता है। इस प्रसंग में महाभारत का यह श्लोक भी महत्वपूर्ण है-

मद्यमांसाशनं रात्रौ भोजनं कन्द भक्षणम्।
ये कुर्वन्ति वृथा, तेषां, तीर्थयात्राजपस्तप:।।

अर्थात् जो मद्यपान करते हैं, मांस खाते हैं, रात्रि भोजन करते हैं, कन्दमूल भक्षण करते हैं, उनकी तीर्थयात्रा और जप तप सब व्यर्थ हो जाते हैं। श्रावकाचार के अनुसार कन्दमूल खाना भी हम श्रावकों के लिए वर्जित है। इस पर बहुत ऊहापोह होता है, अनेक प्रकार के कुतर्कों का सहारा लेकर कन्दमूल खाना उचित ठहराने का प्रयत्न किया जाता है परन्तु सत्य तो सत्य ही रहेगा। जैनाचार्यों का मानना है कि कन्दमूल अनन्त जीवों का पिण्ड है। देखें प्रश्नोत्तर श्रावकाचार का यह श्लोक-

तिलमात्रसमे कन्दे चानन्तजीवसंस्थिति:।
तस्य भक्षणतो भुक्ता: सर्वे जीवा: कुदृष्टिभि:।।९८-१७।।

अर्थात् तिल के समान थोड़े से कन्दमूल में भी अनन्त जीवों का निवास होता है। इस श्लोक में आचार्य सकलकीर्ति महाराज ने कन्दमूल की स्थिति भी बताई और यह भी घोषित कर दिया कि सम्यग्दृष्टि जीव कन्दमूल नहीं खाते। जैनाचार्यों ने पाँच प्रकार के अभक्ष्यों का वर्णन किया है। ये अभक्ष्य हमें धर्म विमुख भी करते हैं और हमारे शरीर में विकृति उत्पन्न करके हमें अस्वस्थ भी बनाते हैं। पंडित आशाधर- जी ने गृहस्थ धर्म के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘सागारधर्मामृत’ में इन अभक्ष्यों का वर्णन इस प्रकार किया है-

पलमधुमद्यवदखिल त्रसबहुघात प्रमादविषयोऽर्थ:।
त्याज्योऽन्यथाऽप्यनिष्टोऽनुपसेव्यश्च व्रताद्धि फलामिष्टम्।।५-१५।।

अर्थात् मद्य, मांस, मधु के समान ही त्रसघात विषयक, बहुघात विषयक, प्रमाद विषयक, अनिष्टकारक और अनुपसेव्य पदार्थों का त्याग कर देना चाहिए। आचार्य कुंथुसागर महाराज ने अपने श्रावकाचार ग्रंथ ‘श्रावक धर्म प्रदीप’ में तो यहाँ तक लिख दिया कि-

माद्यमांसमधूनां हि सेवनं स्पर्शनं तथा।
म कार्यं दु:खदं निन्द्यं श्राववैर्धर्मवत्सले।।

अर्थात् मांस आदि पदार्थों का सेवन तो बहुत दूर उसे स्पर्श करना भी निंद्य और पापकर्म होने से दु:खदायक है। और भी अनेक प्रकार से आचार्य भगवन्तों ने और पंडित आशाधर जी जैसे विद्वानों ने अपने ग्रंथों में श्रावकधर्म का वर्णन करते हुए खान-पान की शुद्धि के लिए हमें सचेत किया है। आवश्यकता है उनके उपदेशों को जीवन में उतारने की और आधुनिक पीढ़ी को उन उपदेशों का मर्म समझाने की। आधुनिक पीढ़ी हमसे अधिक समझदार है, वह यदि श्रावकाचार की उपयोगिता को समझ लेगी, तो हमें चिंतित होने की आवश्यकता नहीं रहेगी।