ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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03. जलहोम-विधानम्

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जलहोम-विधानम्

जलहोम कुंड भी तीर्थंकर कुण्ड के समान चैकोन बनावें या बालू से चैकोन 2ग2 या 1) ग 1) फुट का चबूतरा बनाकर उसमें चारों तरफ कटनी बनावें, उसके पश्चिम में दो कुंभ स्थापित करें।

तत्रादौ तावत्संकल्पपूर्वकपुण्याहवाचनं कुर्यात्।

(शांतिहोम विधि से पुण्याहवाचन से लेकर घंटाटंकारवीणा.... से पूर्व तक विधि करके पुनः आगे से विधि करें।)

घण्टाटंकारवीणाक्वणित-मुरजधा-धां-क्रियाकाहलाच्छें। छेंकारोदार - भेरी - पटह - धलधलंकार - सम्भूतघोषे।।

आक्रम्याशेषकाष्ठातटमथ झटिति प्रोच्छटत्युद्भटेऽभ्रं। शिष्टाभीष्टार्हदिष्टिप्रमुख इह लतांतांजलिं प्रोत्क्षिपामः।।1।।

वाद्यमुद्घोषपूर्वक पुष्पांजलिं क्षिपामि।
क्षेत्रं मखेऽस्मिन् परिपालयन्तं, विघ्नानशेषानपसारयन्तं।
वैश्वानराशापरिकल्पितेन, श्रीक्षेत्रपालं बलिना धिनोमि।।2।।

ॐ ह्रीं अत्रस्थ क्षेत्रपाल! अत्र आगच्छ आगच्छ संवौषट्।
ॐ ह्रीं अत्रस्थ क्षेत्रपाल! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः।
ॐ ह्रीं अत्रस्थ क्षेत्रपालाय इदं अघ्र्यं इत्यादि।
सर्वेषु वास्तुषु सदा निवसंतमेनं, श्रीवास्तुदेवमखिलस्य कृतोपकारं।
प्रागेव वास्तुविधिकल्पितयज्ञभागस्येशानकोणदिशि पूजनया धिनोमि।।3।।

ॐ ह्रीं वास्तुकुमार देव! अत्र आगच्छ आगच्छ संवौषट्।
ॐ ह्रीं वास्तुकुमार देव! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः।
ॐ ह्रीं वास्तुकुमाराय इदं अघ्र्यं इत्यादि।

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अनंतर वायुकुमार आदि की पूर्व और ईशान दिशा के मध्य स्थापना करना।

आलेप्याखिलकुंडवेदिजगतीमृत्प॰चगव्यैर्मरुन्-मेघाग्नीनमरान् समच्र्य वसुधामेतैर्विशोध्य त्रिधा।

सन्तप्र्यामृततोप्यहीन् कुशमथो, निक्षिप्य दिक्षु क्रमात्। वार्दर्भादिभिरर्चयामि महितां, सर्वज्ञयज्ञक्षितिम्।।4।।
प्रकृतक्रमविध्यवधानाय वेद्यां पुष्पांजलिं क्षिपेत्।
विहारकाले जगदीश्वराणां, अवाप्तसेवार्थकृतापदान।
हुत्वार्चितो वायुकुमार देव!, त्वं वायुना शोधय यागभूमिम्।।5।।

ॐ ह्रीं वायुकुमारदेव महीं पूतां कुरु कुरु फट् स्वाहा।
(षट्दर्भपूलेन भूमिं सम्मार्जयेत्) वायुकुमार की स्थापना व अघ्र्य।
विहारकाले जगदीश्वराणां, अवाप्तसेवार्थकृतापदान।
हुत्वार्चितो मेघकुमार देव! त्वं वारिणा शोधय यागभूमिम्।।6।।

ॐ ह्रीं मेघकुमारदेव! धरां प्रक्षालय प्रक्षालय अं हं सं वं झं ठं क्षः फट् स्वाहा।
(षट्दर्भपूलोपात्तजलेन भूमिंसिंचेत्) मेघकुमार की स्थापना व अघ्र्य।
गर्भान्वयादौ महितद्विजेन्द्रैः, निर्वाणपूजासु कृतापदान।
हुत्वार्चितो वन्हिकुमारदेव! त्वं ज्वालया शोधय यागभूमिम्।।7।।

ॐ ह्रीं अग्निकुमारदेव! भूमिं ज्वालय ज्वालय अं हं सं वं झं ठं क्षः फट् स्वाहा।
ज्वलद्दर्भपूलानलेन भूमिं ज्वालयेत। अग्निकुमार की स्थापना व अघ्र्य।

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आगे का मंत्र बोलकर ईशान दिशा में पानी की अँजुली देवें।

तुष्टा अमी षष्टिसहस्रनागा, भवंत्ववार्या भुवि कामचाराः।

यज्ञावनीशानदिशाप्रदत्त-सुधोपमानांजलि-पूर्णवार्भिः।।8।।
ॐ ह्रीं क्रों षष्टिसहस्रसंख्येभ्यो नागेभ्यः स्वाहा। नागतर्पणार्थमैशान्यां दिशि जलांजलिं क्षिपेत्।
दश दिक्षु दर्भन्यासः।
ब्रह्मप्रदेशे निदधामि पूर्वं, पूर्वादिकाष्ठासु पुनः क्रमेण।
दर्भं जगद्गर्भजिनेन्द्रयज्ञ-विघ्नौघ-विध्वंसकृते समंत्रम्।।9।।

ॐ ह्रीं दर्पमथनाय नमः स्वाहा। इंद्रदर्भः इसी प्रकार आग्नेयदर्भः, यमदर्भः, नैऋत्यदर्भः, वरुणदर्भः, पवनदर्भः, कुबेरदर्भः, ईशान्यदर्भः, धरणेंद्रदर्भः सोमदर्भः। (ऐसा बोलते हुए दशों दिशा में दर्भ स्थापना करें।)

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भूदेवता का सत्कार करने हेतु आगे के मंत्रों से अष्टद्रव्य चढ़ावें।

वार्दर्भगंधैः सुमनोऽक्षतौघेः, धूपप्रदीपैरमृतोपमान्नैः।

क्रमान्महामो महितां महद्भिः, महीं महादेवमहामहस्य।।10।।
ॐ नीरजसे नमः जलं। शीलगंधाय नमः गंधं। अक्षताय नमः अक्षतान्। विमलाय नमः पुष्पं। परमसिद्धाय नमः चरुं। ज्ञानोद्योताय नमः दीपं। श्रुतधूपाय नमः धूपं। अभीष्टफलदाय नमः फलं।
।। इति भूम्यर्चनम्।।

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आगे की वेदी के पास आकर विधि करें।

वेद्या मूध्र्नि विधाय पीठमुचितं प्रक्षाल्य तीर्थांबुभिः, प्रत्यग्रेन महाधनेन परितः प्रच्छाद्य दर्भैरपि।

अभ्यच्र्योपरि तस्य सज्जिनपतेरर्चां सतामर्चितां। न्यस्यार्चामि सयक्ष-यक्ष्युपगतां चक्रातपत्रांचिताम्।।11।।
प्रकृतक्रमविध्यवधानाय पुष्पांजलिं क्षिपामि।
श्रीपाण्डुकाव्हय-शिलाग्रिमपीठकल्पं, तद्वेदिकोपरितटे निदधामि पीठम्।
प्रक्षालयामि शुचिभिः सलिलैः पटेन, प्रच्छादितेऽत्र निदधेऽक्षत-पुष्पदर्भान्।।12।।

ॐ ह्रीं अर्हं क्ष्मं ठः ठः श्रीपीठस्थापनं करोमि स्वाहा।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र: नमोऽर्हते भगवते श्रीमते पवित्रतरजलेन श्रीपीठप्रक्षालनं करोमि स्वाहा।
तत्पीठोपरि प्रागग्रवस्त्राच्छादनं करोमि स्वाहा।
ॐ ह्रीं दर्पमथनाय नमः दर्भस्थापनं करोमि स्वाहा।
(सकुसुमाक्षतदर्भ-स्थापनम्) स्वच्छैस्तीर्थ-पीठं समभ्यर्चये। पीठ-जिसमें भगवान विराजमान करना है उसे अघ्र्य चढ़ावें।
ॐ ह्रीं सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राय पीठार्चनम् करोमि स्वाहा।
संस्थापयाम्युपरि तस्य जिनेश्वरार्चां, चक्रत्रयं जिनपतेरपसव्यभागे।
छत्रत्रयं तदनु तस्य तु सव्यभागे, वादित्रजालजटिले सति सर्वलोके।।13।।

ॐ ह्रीं अर्हं धर्मतीर्थाधिनाथ भगवन् इह पाण्डुकशिलापीठे तिष्ठ तिष्ठ स्वाहा। प्रतिमा-स्थापनम्।
दक्षिण-पाश्र्वे चक्रत्रय-स्थापनम्। वामपाश्र्वे छत्रत्रयस्थापनम्।

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(श्रीपीठ-सिंहासन पर भगवान विराजमान करें। प्रतिमा के दायीं तरफ तीन चक्र एवं बायीं तरफ तीन छत्र स्थापित करें)

आहूता भवनामरैरनुगता यं सर्वदेवास्तथा, तस्थौ यस्त्रिजगत्-सभान्तरमहापीठाग्रसिंहासने।

यं द्यं दि संनिधाप्य सततं ध्यायन्ति योगीश्वराः, तं देवं जिनमर्चितं कृतधियामाव्हाननाद्यैर्भजे।।14।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र: असिआउसा अर्हं! एहि एहि संवौषट्।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र: असिआउसा अर्हं! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र: असिआउसा अर्हं! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।

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भगवान के चरणों पर जल छोड़ें पुनः मंत्रोच्चारण कर पुष्पांजलि छोड़ें।

गद्य-तीर्थौदकैर्जिनपादौ प्रक्षाल्य तदग्रे पृथग्मंत्रानुचारयन्। वार्गन्धाक्षतार्चितपुष्पांजलिं प्रयुंजीत।

पाद्यमंत्र-ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं नमोर्हते स्वाहा। (जलधारा छोड़ें)
आचमन मंत्र-ॐ ह्रीं झ्वीं क्ष्वीं वं मं हं सं तं पं द्रां द्रीं हं सः स्वाहा। (जलधारा छोड़ें)
भगवान जिनेन्द्रदेव का अष्ट विधार्चन
ॐ ह्रीं परब्रह्मणेऽनंतान्तज्ञानशक्तये जलं (चंदन से लेकर अघ्र्य पर्यंत चढ़ावें)

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चक्रत्रय एवं छत्रत्रय पूजा

राजेन्द्र-देवेन्द्र-जिनेन्द्र योग्यं, चक्रत्रयं मंगल-वस्तु-मुख्यम्।

निवेशितं श्रीजिनबिम्बपाश्र्वे, यजामहे निर्मलवारिमुख्यैः।।15।।
ॐ नीरजसे नमः जलं। शीलगंधाय नमः गंधं। अक्षताय नमः अक्षतान्। विमलाय नमः पुष्पं। परमसिद्धाय नमः चरुं। ज्ञानोद्योताय नमः दीपं। श्रुतधूपाय नमः धूपं। अभीष्टफलदाय नमः फलं।
लोकत्रयैकाधिपतित्वचिन्हं, छत्र-त्रयं मंगल-वस्तु-मुख्यम्।
निवेशितं श्रीजिनवामभागे, यजामहे निर्मलवारिमुख्यैः।।16।।

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ॐ नीरजसे नमः इत्यादि आगे की क्रिया यज्ञकुंड के आगे करें।

कुण्डात् पुरस्तात् परिमृष्टदेशे, सुविष्टरं न्यस्य सुदृष्टमृष्टम्।

तत्रोपविष्टोऽस्म्यथ पश्चिामस्यः, पर्यंकतो वाम्बुरुहासनाद्वा।।17।।

ॐ ह्रीं क्षीं भूः शुद्ध्यतु स्वाहा। (यज्ञभूमि शुद्ध करें)
ॐ ह्रीं अर्हं क्ष्मं ठं आसनं निक्षिपामि स्वाहा। (आसन बिछावें)
ॐ ह्रीं अर्हं ह्युं ह्यं णिसिहिये णिसिहिये आसने उपविशामि स्वाहा। (आसन पर बैठें)
ॐ ह्रीं अर्हं मौनस्थितार्हं मौनव्रतं गृण्हामि स्वाहा। (पूजापर्यंत मौन रखें)

तीर्थोम्बुपूर्णोज्ज्वलशातकुंभ-कुंभस्य नालाद्गलितेन वारा।
कुण्डं शुभं सर्वममत्रमत्र, द्रव्यं च सिंचामि समंत्रमेव।।1।।
ॐ ह्रीं नमः सर्वज्ञाय सर्वलोकनाथाय धर्मतीर्थकराय श्रीशान्तिनाथाय, परमपवित्राय, पवित्रतरजलेन होमकुण्डशुद्धिं करोमि स्वााहा। (इस मंत्र से होमकुंड पर पानी छिड़कें)

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कुण्डपूजा

तीर्थेशसंबंधसमर्चनीय-श्रीगार्हपत्याश्रयतोर्चनीयम्। चैत्याश्रयत्वादिव चैत्यगेहं, समर्चयामश्चतुरस्रकुण्डम्।।2।।

ॐ नीरजसे नमः जलं। शीलगंधाय नमः गंधं। अक्षताय नमः अक्षतान्। विमलाय नमः पुष्पं। परमसिद्धाय नमः चरुं। ज्ञानोद्योतनाय नमः दीपं। श्रुतधूपाय नमः धूपं। दर्पमथनाय नमः दर्भं।

होमकुंड में तंदुल से स्वस्तिक बनावें, उस पर तांबे या पीतल की नयी पतीली रखें, उस पतीली में जलयंत्र बनावें। पुनः होमकुंड के सामने स्थापित दो कुंभों का जल निम्नलिखित मंत्र पढ़ते हुए पतीली में डालते हुए उसका जल शुद्ध करें।

ॐ नमोऽर्हते भगवते पद्म-महापद्म-तिगिंछ-केसरी-महापुण्डरीक-पुण्डरीक-गंगा-सिंधु-रोहिद्-रोहितास्या- हरित्-हरिकान्ता-सीता-सीतोदा-नारी-नरकान्ता-सुवर्णकूला-रुप्यकूला-रक्ता-रक्तोदा-अनेक नद-नदीजलप्रवाह- परिपूर्ण-मधुरजलधि-इक्षुरससमुद्र-घृतार्णव-क्षीरसागर-प्रभृत्यखिलतीर्थदेवतामणिमयं गलकलशसंश्रृत-नवरत्न- सुगन्ध-चूर्णपुष्पफलकुशाद्यैश्च रचितं तीर्थोदकं पवित्रं कुरु कुरु ह्मममफ ह्मममफ वं मं हं सं तं पं झ्वीं हं सः असिआउसा जलशुद्धिं कुरु कुरु स्वाहा।
पुनः शंबर नाम के यंत्र की पूजा करें।
ॐ नीरजसे नमः जलं। शीलगंधाय नमः गंधं। अक्षताय नमः अक्षतान्। विमलाय नमः पुष्पं। परमसिद्धाय नमः चरुं। ज्ञानोद्योतनाय नमः दीपं। श्रुतधूपाय नमः धूपं। दर्पमथनाय नमः दर्भं।

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प्रथम-कटनी- मेखला पूजा

नन्द्रां च भद्रां च जयां च रिक्तां, पूर्णा च भूयो भुवि वर्तयन्ति।

ये ताननेकान्त-सुपक्षपक्षान्, न्यक्षेण यक्षप्रमुखान् प्रयक्ष्ये।।3।।
ॐ आँ क्रों ह्रीं प॰चदशतिथिदेवताः! अत्र आगच्छत आगच्छत संवौषट्।
ॐ आँ क्रों ह्रीं प॰चदशतिथिदेवताः! अत्र तिष्ठत तिष्ठत ठः ठः।
ॐ आँ क्रों ह्रीं प॰चदशतिथिदेवताः! अत्र मम सन्निहिता भवत भवत वषट् स्वाहा।
ॐ ह्रीं क्रों ह्रीं प॰चदशतिथिदेवताभ्याः इदमघ्र्यं पाद्यं, जलं, गंधं, अक्षतान्, पुष्पं, चरुं, दीपं, धूपं, फलं, बलिं, स्वस्तिकं यज्ञभागं दधामहे प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां इति स्वाहा।।

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द्वितीय-कटनी- मेखला पूजा

मेरुं परीत्यैव चरन्ति नित्यं, ये निग्रहानुग्रहदा नृलोके।

अवस्थिता ये बहिरर्कमुख्याः, सर्वान् समाहूय समर्चये तान्।।4।।
ॐ आँ क्रों ह्रीं आदित्यादिनवग्रहदेवाः! अत्र आगच्छत आगच्छत संवौषट्।
ॐ आँ क्रों ह्रीं आदित्यादिनवग्रहदेवाः! अत्र तिष्ठत तिष्ठत ठः ठः।
ॐ आँ क्रों ह्रीं आदित्यादिनवग्रहदेवाः! अत्र मम सन्निहिता भवत भवत वषट् स्वाहा।
ॐ आँ क्रों ह्रीं नवग्रहदेवेभ्योः इदमघ्र्यं पाद्यं, जलं, गंधं, अक्षतान्, पुष्पं, चरुं, दीपं, धूपं, फलं, बलिं, स्वस्तिकं यज्ञभागं दधामहे प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां इति स्वाहा।।

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तृतीय-कटनी- मेखला पूजा

चतुर्णिकायप्रभवामरेन्द्रान्, जिनेन्द्रसेवाप्रसितान्तरंगान्।

प्रभूतभूतद्युतिसौख्यबोधा-नाहूय मंत्रैः पृथगर्चयामि।।5।।
ॐ आँ क्रों ह्रीं असुरेन्द्रादिद्वात्रिंशदिंद्राः! अत्र आगच्छत आगच्छत संवौषट्।
ॐ आँ क्रों ह्रीं असुरेन्द्रादिद्वात्रिंशदिंद्राः! अत्र तिष्ठत तिष्ठत ठः ठः।
ॐ आँ क्रों ह्रीं असुरेन्द्रादिद्वात्रिंशदिंद्राः! अत्र मम सन्निहिता भवत भवत वषट् स्वाहा।
ॐ आँ क्रों ह्रीं नवग्रहदेवेभ्यो इदमघ्र्यं पाद्यं, जलं, गंधं, अक्षतान्, पुष्पं, चरुं, दीपं, धूपं, फलं, बलिं, स्वस्तिकं यज्ञभागं दधामहे प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां इति स्वाहा।।

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दिक्पाल पूजा

एतत्सर्वजनीनजैनसवनप्रत्यूहविध्वंसन-प्रोद्भूताप्रतिमप्रभावविहितप्रख्यातपूजा॰िचतान्।

स्वस्वातुच्छपरिच्छदान् दशदिशामन्याप्रधृष्यामितान्, दिक्पाला॰जगदेक-पालकजिनाधीशाध्वरे व्याव्हये।।6।।
ॐ ह्रीं इन्द्रादिदशदिक्पालदेवाः! अत्र आगच्छत आगच्छत संवौषट्।
ॐ ह्रीं इन्द्रादिदशदिक्पालदेवाः! अत्र तिष्ठत तिष्ठत ठः ठः।
ॐ ह्रीं इन्द्रादिदशदिक्पालदेवाः! अत्र मम सन्निहिता भवत भवत वषट् स्वाहा।
ॐ ह्रीं इन्द्रादिदशदिक्पालदेवेभ्यो इदमघ्र्यं पाद्यं, जलं, गंधं, अक्षतान्, पुष्पं, चरुं, दीपं, धूपं, फलं, बलिं, स्वस्तिकं यज्ञभागं दधामहे प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां इति स्वाहा।।
सप्तधान्याहुतिः
दिक्पालकानिति समच्र्य यवान्विता ये, गोधूम-मुद्ग-चण-काढक-शालि-माषाः।
तत्सप्त-धान्यकृतमुष्टिभिरम्बुकुण्डे, सप्ताहुतीरिह दधे पृथगेव तेभ्यः ।।7।।

सात धान्य-चना, अरहर, उड़द, मूंग, गेंहूं, शालि और जौ इनको मिलाकर दिक्पाल मंत्रों से जलकुंभ में एक-एक मंत्र की सात-सात बार आहुति देवें।

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आहुति मंत्र

1. ॐ आँ क्रों ह्रीं इन्द्राय स्वाहा।

2. ॐ आँ क्रों ह्रीं अग्नये स्वाहा।

3. ॐ आँ क्रों ह्रीं यमाय स्वाहा।

4. ॐ आँ क्रों ह्रीं नैऋत्याय स्वाहा।

5. ॐ आँ क्रों ह्रीं वरुणाय स्वाहा।

6. ॐ आँ क्रों ह्रीं पवनाय स्वाहा।

7. ॐ आँ क्रों ह्रीं धनदाय स्वाहा।

8. ॐ आँ क्रों ह्रीं ईशानाय स्वाहा।

9. ॐ आँ क्रों ह्रीं धरणेन्द्राय स्वाहा।

10. ॐ आँ क्रों ह्रीं सोमाय स्वाहा।

11. ॐ आँ क्रों ह्रीं शंबरनामधेयाय स्वाहा।

इत्थं सारसपर्ययाद्य महिता यूयं प्रसन्नाः स्थ नः, सांगास्ताद्विकलापि मोहमुखतो, युष्मत्प्रसादादियम्।

सर्वज्ञाध्वरविघ्नमाघ्नत द्रुतं, सर्वेऽपि दिक्पालकाः, पूर्णांगां विधिपूर्तिपूर्णफलदां, पूर्णाहुतिं वोऽर्पये।। 8।।
पूर्णाघ्र्यम्।।

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त्रिधान्याहुति-तीन धान्य से आहुति देना

तीन धान्य-जौ, तिल और शालि धान्य इन तीनों को मिलाकर आगे लिखे नव मंत्रों से सात-सात बार जलकुंभ में आहुति देवें।

यवैस्तिलैः शालिभिरेव सप्त-सप्तस्वमुष्टि-प्रमितैर्विशुद्धैः।

होमं विधास्यामि समंत्रमंभः, कुण्डे ग्रहाणामिह सुप्रपत्त्यै।।9।।

ॐ ह्रीं ह्र: फट् आदित्यमहाग्रह (अमुकस्य)1 शिवं कुरु कुरु स्वाहा। एवं सोमादिष्वपि प्रयु॰जीत।

ॐ ह्रीं ह्र: फट् सोममहाग्रह (.......) शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

ॐ ह्रीं ह्र: फट् मंगलमहाग्रह (.......) शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

ॐ ह्रीं ह्र: फट् बुधमहाग्रह (.......) शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

ॐ ह्रीं ह्र: फट् गुरुमहाग्रह (.......) शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

ॐ ह्रीं ह्र: फट् शुक्रमहाग्रह (.......) शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

ॐ ह्रीं ह्र: फट् शनिमहाग्रह (.......) शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

ॐ ह्रीं ह्र: फट् राहुमहाग्रह (.......) शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

ॐ ह्रीं ह्र: फट् केतुमहाग्रह (.......) शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

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जलतर्पणानि-जल से तर्पण करना

अंजुलि में दर्भ, गंध, अक्षत, पुष्प लेकर अंजुलि जल हवन कुंभ पर रखकर आगे के तर्पण मंत्र पढ़ते हुए जल डालते जावें।

अन्वतो विमलाम्भोर्भिगन्धपुष्पाक्षतान्वितैः। कुर्महे पीठिकामंत्रैस्तर्पणं परमेष्ठिनाम्।।10।।
ॐ सत्यजाताय नमः। अर्हज्जाताय नमः। परमजाताय नमः। अनुपमजाताय नमः। स्वप्रदाय नमः। अचलाय नमः। अक्षताय नमः। अव्याबाधाय नमः। अनंतज्ञानाय नमः। अनंतदर्शनाय नमः। अनंतवीर्याय नमः। अनंतसुखाय नमः। नीरजसे नमः। निर्मलाय नमः। अच्छेद्याय नमः। अभेद्याय नमः। अजराय नमः। अमराय नमः। अप्रमेयाय नमः। अगर्भवासाय नमः। अक्षोभ्याय नमः। अविलीनाय नमः। परमघनाय नमः। परमकाष्ठयोगरूपाय नमः। लोकाग्रवासिने नमो नमः। परमसिद्धेभ्यो नमः। अर्हत्सिद्धेभ्यो नमः। केवलिसिद्धेभ्यो नमो नमः। अंतकृतसिद्धेभ्यो नमो नमः। परंपरासिद्धेभ्यो नमो नमः। अनादिपरंपरासिद्धेभ्यो नमो नमः। अनाद्यनुपमसिद्धेभ्यो नमो नमः। सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे आसन्नभव्य आसन्नभव्य निर्वाणपूजार्ह निर्वाणपूजार्ह शंबरनामधेयाय स्वाहा।
(आगे के मंत्रों से पुण्याहमंत्र का पानी तीन बार होमकुंड पर सिंचित करें।)
ॐ ह्रीं सम्यग्दर्शनाय नमः स्वाहा। ॐ ह्रीं सम्यग्ज्ञानाय नमः स्वाहा। ॐ ह्रीं सम्यक्चारित्राय नमः स्वाहा। (इमान्मंत्रान् त्रिरुच्चार्य जलं सि॰चेत्)।

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द्वादशांग स्पर्शमंत्र

ॐ ॐ ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं झ्वीं झ्वीं क्ष्वीं क्ष्वीं वं मं हं सं तं पं द्रां द्रीं हं सः स्वाहा।

प्राणायाम मंत्र
ॐ भूर्भुवः स्वः असिआउसा अर्हं प्राणायामं करोमि स्वाहा।
इमं मंत्रं नासिकामंगुष्ठानामिकाग्रेण धृत्वा त्रिवारान् जपेत्।
(प्राणायाम मंत्र को अंगूठा और अनामिका से नाक के दोनों भागों पर रखकर तीन बार जपें।)
दिक्पालाः प्रतिसेवनाकुलजगद्दोषार्हदण्डोद्भटाः, सौधर्मः प्रणयेन बद्धभगवत्-सेवानियोगेन वा।
पूजापात्रकराग्रहः सदमुपेत्योपात्य बालार्चनं, प्रत्यूहान् निखिलान् निरस्यतु जिनस्नानोत्सवोत्साहिनाम्।।11।।
आदेषणाघ्र्यं।।
ॐ आँ क्रों ह्रीं प्रशस्तवर्ण-सर्वलक्षणसंपूर्ण-स्वायुधवाहन-वधूचिन्हसपरिवाराः हे प॰चदशतिथिदेवाः! नवग्रहदेवाः! द्वात्रिंशदिन्द्राः! दश लोकपालाः! शंबरनामधेयादयः सर्वे देवता इदं जलादिकमर्चनं यूयं अत्र गृण्हीध्वं गृण्हीध्वं ॐ भूर्भुवः स्वाहा। पूर्णाहुतिः (यहाँ पूर्णाघ्र्य देना)।
।। इति जलहोमविधानम् समाप्तम्।।