ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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030.आचार्यश्री शिवसागर जी का वात्सल्य

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आचार्यश्री शिवसागर जी का वात्सल्य

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जयपुर में गुरुचरण स्थापना- ब्यावर चातुर्मास के बाद ब्रह्मचारी सूरजमलजी ने निवेदन किया- ‘‘महाराजजी! खानिया (जयपुर) में आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज के निषद्या स्थान पर छतरी बनकर तैयार हो गई है, अब आप ससंघ पधारकर उसमें गुरुदेव की चरण पादुका स्थापित करा दीजिये।’’

आचार्यश्री ने सहर्ष स्वीकृति दी और अपने पूरे चतुर्विध संघ सहित जयपुर आ गये। यहां खानिया में मंगलमय मुहूर्त में चरणपादुका स्थापित किये गये। गुरुदेव की निषद्या की वंदना कर गुरुवर्य के गुणों का स्मरण करते हुए यह समारोह संपन्न हुआ। इसी मध्य यहाँ क्षुल्लक श्री ज्ञानभूषणजी पधारे थे। वे पहले आचार्यश्री वीरसागरजी के संघ में पं. भूरामलजी के नाम से प्रसिद्ध विद्वान् थे, काफी दिन रहे है, ऐसा मैंने सुना था। संघ के ब्रह्मचारी गण एवं मुनि, आर्यिकायें भी इनसे अध्ययन करते थे। अनंतर कुछ मतभेद हो जाने से संघ से पृथक हो गये थे।

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मतभेद-

संघस्थ वृद्धा आर्यिका श्री सुमतिमती माताजी ने मुझे यह बताया था कि- पंडित भूरामलजी एक प्रकार से सुधारक विचारधारा के विद्वान् थे। जातिव्यवस्था, वर्णव्यवस्था को नहीं मानते थे। तेरहपंथ विचारधारा के थे तथा सबसे नई विचारधारा यह थी कि ये हरी सब्जी और फलों के कण-कण में जीव मानते थे। यही कारण था कि वे अनार, सेव, संतरा आदि के रसों को भी गरम किये बगैर नहीं लेते थे और अपने विषय का दृढ़ता से प्रतिपादन भी करते थे।

आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज अपने आचार्यश्री शांतिसागरजी गुरुवर्य के परमभक्त एवं आर्षपरंपरा के कट्टर थे अतः वे इन सुधारक विचारधाराओं के विरोधी थे, फिर भी संघ में बेमालूम ही साधुवर्गों में इन पंडितजी का प्रभाव पड़ने लगा और संघ की बड़ी आर्यिका वीरमती जी भी सेव, आम, संतरा आदि फलों को तथा इनके रसों को गरम कराकर लेने लगीं। तब संघ में कुछ संघर्ष का वातावरण बन जाने से इन पंडित जी को हटाना पड़ा था। वे यहाँ से जाने के बाद क्षुल्लक हो गये थे, वे अब यहाँ पर आये हुए थे। इस समय यहाँ खानिया में ये बोले कि-

‘‘अब मैं वृद्ध हो गया हूँ मुझे, अपनी समाधि की सिद्धि करनी है अतः मुझे मुनिदीक्षा देकर संघ में रखकर मेरी समाधि बना दीजिये।’’ उनका यह निवेदन चर्चा का विषय बना। कई बार एकांत में आचार्यश्री, मुनिश्रुतसागर जी, ब्र. सूरजमलजी, ब्र. राजमल जी, संघपति हीरालालजी, पं. इंद्रलालजी शास्त्री आदि बैठकर ऊहापोह करते रहते थे। क्षुल्लक ज्ञानभूषण जी ने अपने प्रेमभाव से ब्र. राजमलजी से बहुत बार निवेदन किया और आग्रह किया कि जैसे बने वैसे मेरी मुनि दीक्षा करा दो तथा मुझे संघ में आश्रय मिल जाए।

अंततोगत्वा संघ के विशिष्ट साधु-साध्वी और ब्रह्मचारी तथा श्रावकवर्गों में यही निर्णय हुआ कि- ‘‘ये वचन देवें कि अपने सिद्धांत का, अपनी विचारधाराओं का, कथमपि प्रचार नहीं करेंगे। स्वयं अपनी विचारधारा तो बदल नहीं सकते, उसे अपने तक ही सीमित रखें।’’ यह बात इन्हें कही गर्इं, इन क्षुल्लक महाराज ने भी इसे स्वीकार कर लिया। तब शुभमुहूर्त में आचार्यश्री ने इन्हें मुनि दीक्षा देकर इनका नाम ‘ज्ञानसागर’ रखा। संघ यहाँ से विहार कर जयपुर शहर में आ गया और कुछ दिन यहीं रहा।

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आर्ष परम्परा-

उस समय जो संघ में ‘‘आर्षपरम्परा’ के संरक्षण की चर्चा हुई थी, आज मुझे गौरव है कि चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी की परम्परा के सभी शिष्य इस आर्षपरम्परा के पोषक, समर्थक और संरक्षक ही रहे हैं। उनके प्रथम पट्टाधीश आचार्य श्रीवीरसागर जी के सभी शिष्य भी कट्टर अनुयायी रहे हैं। उनके द्वितीय पट्टाधीश आचार्य श्री शिवसागर जी आगमपरम्परा में दृढ़ रहे हैं। जो उनकी परम्परा निभाने में असमर्थ रहे, उन्हें संघ से अलग होना पड़ा है। इन आचार्यश्री शिवसागर जी के पट्टाधीश आचार्यश्री धर्मसागर जी ने भी दिल्ली आकर निर्वाण महामहोत्सव के समय अच्छी धर्मप्रभावना की है। इस उत्तर प्रांत में अनेक संघर्ष के प्रसंग में भी वे ‘यज्ञोपवीत, सज्जातीयत्व और बीसपंथ आदि’ आर्षपरम्परा पर अटल रहे हैं तथा अपनी सरलता, निस्पृहता और चारित्र की दृढ़ता आदि गुणों से मुनिभक्त समाज ही क्या, सुधारकवर्ग के लोगों में भी अपना प्रभाव डाल गये हैं। यही कारण है कि आज इस विषमयुग में भी इन महामुनियों द्वारा और आर्यिका संघों के द्वारा आर्ष परम्परा की रक्षा करते हुए चहुँमुुखी धर्मप्रभावना हो रही है। इससे यह अनुभव आता है कि दीक्षा के लिए आये हुए पात्र को अच्छी तरह देखकर, उसकी दृढ़ता की परीक्षा करके ही दीक्षा देना चाहिए। अन्यथा-जल्दबाजी कर देने से यदि वे शिष्य स्वच्छंद हो जाते हैं तो उनके द्वारा आर्षपरम्परा की हानि होती है और धर्मप्रभावना के बजाए अप्रभावना हो जाती है। मोक्षमार्ग को अक्षुण्ण चलाने के साथ-साथ आर्षपरम्परा के संरक्षण को भी दृष्टि में रखकर दीक्षा देने से धर्म की सर्वतोमुखी उन्नति होती है अतः संघ बढ़ाने के लोभ में आकर ‘अपात्र’ को दीक्षा नहीं देनी चाहिए। जो दुराग्रही हैं, गुरु के प्रति पूर्ण समर्पित नहीं है, गुरुपरम्परा को पालने में दृढ़ नहीं हैं अथवा चारित्र में शिथिल हैं, ऐसे शिष्य अपात्र हैं। दैगम्बरी-जैनेश्वरी दीक्षा के लिए अथवा आर्यिका, ऐलक, क्षुल्लक और क्षुल्लिका दीक्षा के लिए पात्र नहीं हैं। आज जो शिष्य के लोभ में पढ़कर पात्र-अपात्र का विचार नहीं करके जल्दी से दीक्षा दे देते हैं तो उनसे धर्म की अप्रभावना का प्रसंग देखने में आता रहता है।

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मानस्तम्भ की प्रतिष्ठा-

यहाँ दीवानजी की नशिया में एक क्षुल्लिका वृषभसेना ने बहुत ही पुरुषार्थ से समाज से द्रव्य इकट्ठा करके एक मानस्तम्भ बनवाया था। यह बनकर तैयार हो गया था वहाँ की प्रमुख महिला ‘दीवानीजी’ ने और क्षुल्लिका ने भी आचार्यश्री से प्रार्थना की कि- ‘‘आपके सानिध्य में इस मानस्तम्भ की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा कराना चाहती है अतः आप इस नशिया में पधारकर इस प्रतिष्ठा को संपन्न करायें।’’ प्रतिष्ठाचार्य में ब्रह्मचारी सूरजमलजी से निवेदन कर उनकी स्वीकृति ली और आचार्यश्री की भी स्वीकृति प्राप्त कर इस विशाल चतुर्विध संघ का पदार्पण यहाँ कराया गया। मुहूर्त के अनुसार बहुत ही सुन्दर प्रतिष्ठा हुई और जयपुर शहर में अच्छी धर्म प्रभावना हुई।

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अजमेर के लिए विहार-

इन्हीं दिनों संघ के अगले चातुर्मास के लिए अजमेर के श्रावकों का आग्रह शुरू हुआ। सर सेठ भागचन्दजी सोनी भी कई बार निवेदन करने के लिए आये। इधर जयपुर के श्रावकों का भी विशेष आग्रह था चूँकि आई निधि को भला कौन छोड़ना चाहेगा? फिर भी अनेक ऊहापोह के बाद आचार्यश्री ने अजमेर में चातुर्मास करने के लिए स्वीकृति दे दी। समय कुछ कम था अतः आर्यिकाओं में वृद्धा सुमतिमती माताजी आदि ने अजमेर की तरफ विहार करने से इंकार कर दिया। उस समय बहुत ही संघर्ष का वातावरण बन गया। आचार्यश्री ने भी इनको समझाने का प्रयास किया लेकिन कुछ तथ्य नहीं निकला। तब यह निर्णय रहा कि- ‘‘मुनिसंघ विहार करेगा और आर्यिकाएँ यहीं रहेंगी।’’ इस विषय में आर्यिका वीरमती जी सहमत नहीं थीं, फिर भी वे आर्यिका सुमतिमती माताजी के बगैर जाना भी नहीं चाहती थीं। इधर मुझे आचार्यश्री ने बुलाया और कहा- ‘‘ज्ञानमतीजी! मैं चाहता हूँ कि आप अपने आर्यिकासंघ सहित अजमेर चलें।’’ आचार्यश्री ने कई प्रकार से समझाया तथा आश्वासन भी दिया और पुनःपुनः कहा कि- ‘‘तुम्हें साथ चलना चाहिए।’’ पहले तो मैं मौन से सुनती रही किन्तु आर्यिकासंघ में अशांति हो जायेगी, ऐसा सोचकर मैंने आचार्य महाराज के समक्ष यही कह दिया कि- ‘‘जब सब आर्यिकाएँ चलेंगी, तभी मैं चलूँगी।’’ इससे आचार्यश्री को बुरा भी लगा और मुझे भी खेद हुआ किन्तु.......मैं अशांति के डर से ही उस समय आचार्यश्री की आज्ञा नहीं पाल सकी। अनंतर ब्र. सूरजमल जी और अजमेर समाज के धुरीण (प्रमुख) व्यक्तियों का आग्रह सभी आर्यिकाओं के विहार के लिए चालू ही रहा। आचार्यश्री के संघ का तो विहार हो गया, वह अपने गाँव में रुका रहा। इधर एक-दो दिन बाद भक्तों का पुरुषार्थ सफल हो गया, आर्यिकाओं ने भी अजमेर की तरफ विहार कर दिया और अगले दिन जाकर संघ में शामिल हो गर्इं। इस सफलता से संघ में सबको बहुत ही खुशी हुई। मार्ग के विहार में समय कम होने से अधिक चलना होता था कई बार विहार के मध्य मार्ग में खूब वर्षा हुई और सभी साधु खूब भीगे फिर भी यथासमय आषाढ़ शुक्ला तेरस के दिन संघ सकुशल अजमेर पहुँच गया, वहाँ के अनुसार संघ का भव्य स्वागत हुआ। यहाँ पठन-पाठन आदि क्रियाएँ सभी मुनि, आर्यिकाओं की सुचारू चल रही थीं, सभी श्रावक-श्राविकाएँ चतुर्विध संघ की भक्ति करते हुए धर्मलाभ ले रहे थे।