ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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प्रथामाचार्य श्री शांतिसागर महाराज की प्राचीन शिष्या परम पूज्य गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माता जी के ससंघ सानिध्य में मुंबई के जैनम हाँल में दशलक्षण पर्व के शुभ अवसर पर 24 कल्पद्रुम महामंडल विधान का आयोजन धूमधाम से मनाया जायेगा|सभी महानुभाव विधान का लाभ लेकर पुण्य लाभ अर्जित करें|
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इस मंत्र की जाप्य दो दिन 24 और 25 तारीख को करे |

सोलहकारण व्रत की जाप्य - "ऊँ ह्रीं अर्हं वैय्यावृत्त्यकरण भावनायै नमः"

030.जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर चातुर्मास-सन् १९८६-८७

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जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर चातुर्मास-सन् १९८६-८७

समाहित विषयवस्तु

१. पीलिया से माताजी का शरीर निर्बल हुआ।

२. चातुर्मास की स्थापना।

३. दो इन्द्रध्वज विधानों का आयोजन, माताजी को स्वास्थ्य लाभ हो।

४. रोगमुक्ति-स्तोत्रों का फल।

५. माताजी ने इन्द्रध्वज विधान सुनकर आरोग्यता प्राप्त की।

६. शरदपूर्णिमा को ५३वां जन्मदिवस मना।

७. जम्बूद्वीप में आचार्य श्री विमलसागर जी का पदार्पण।

८. माताजी को तीर्थोद्धारक चूड़ामणि एवं विधान वाचस्पति की उपाधियाँ।

९. ब्र.मोतीचंद को क्षुल्लक दीक्षा।

१०. युग प्रतिक्रमण की परम्परा प्रारंभ।

काव्य पद

शरीर धर्म का पहला साधन, बिना न उसके काम चले।

शिथिलगात हो गर्इं मातश्री, हुई पीलिया मुक्ति भले।।
दो-क कदम न चल पाती थीं, शिष्या थाम चलाती थीं।
जिनको शिवमग पकड़ चलाया,इनको आज चलाती थीं।।८१९।।

अत: जुलाई सन् छ्यासी में, माताजी ने यथाविधि।
चातुर्मास किया स्थापित, जम्बूद्वीप, शुभलग्न-तिथि।।
माताजी की पावन सन्निधि, दो इन्द्रध्वज हुए विधान।
स्वास्थ्य लाभ हो माताजी को, महदुद्देश्य रखा यजमान।।८२०।।

चातुर्मास काल माताजी, किया अपूर्व ही कार्य महान्।
रहा अपूर्ण जो, पूर्ण किया वह, श्री इन्द्रध्वज महाविधान।।
रचना से माताजी तन भी, पूर्ण स्वस्थता पाया है।
इसमें है आश्चर्य कौन सा, यह तो होता आया है।।८२१।।

मानतुंग आचार्यश्री का, भक्तामर है काव्य अमर।
टूट गए अड़तालिस ताले, पद अड़तालिस रचने पर।।
वादिराज मुनिराजश्री का, कुष्ठ गलित था तन सारा।
कंचन जैसा दमक उठा था, एकीभाव रचना द्वारा।।८२२।।

तिथि सत्रह, अक्टूबर छियासी, को विधान यह पूर्ण हुआ।
माताजी के प्रमुदित मन में, उक्त भाव अवतीर्ण हुआ।।
शरदपूर्णिमा रही इसी दिन, भक्त जनों की पूरी चाह।
जन्म दिवस माँ का त्रेपनवाँ, सभी मनाया भर उत्साह।।८२३।।

भारत के कोने-कोने से, भक्त हजारों आये हैं।
विनयाँजलि अर्पण करने में, माता के गुण गाये हैं।।
दीर्घायू-नीरोग हों माता, सधे साधना रत्नत्रय।
सकल लोक को प्राप्त हो सके, आशीष शुभंकर अमृतमन।।८२४।।

चातुर्मासिक काल अनंतर, हुए यहाँ दो उत्तम कार्य।
पंचकल्याणक-क्षुल्लक दीक्षा, सम्पन्ने सन्निधि आचार्य।।
हस्तिनागपुर जम्बूद्वीप में, पधराये आचार्यश्री।
संघ सहित, श्री विमलसिन्धु जी, मोती क्षुल्लक दीक्षा दी।।८२५।।

माताजी ने शुभाशीष में, कहा कि मैं लायी मोती।
किन्तु आज ये सागर बनकर, दीक्षा वृद्धिकरी होती।।
पंचकल्याणक-दीक्षानंतर, गमन किया आचार्य विमल।
किन्तु रहे मोतीसागर जी, माताजी के चरण कमल।।८२६।।

युग प्रतिक्रमण की परम्परा, शुरू हो माँ की इच्छा थी।
विमलसिंधु आचार्य श्री ने, मनोकामना पूरी की।।
विमल-ज्ञान निजसंघ चतुर्विध, बैठ युग प्रतिक्रमण किया।
किया जाए प्रति पाँच वर्ष में, आचार्यश्री आदेश दिया।।८२७।।

इस महान् मंगल अवसर पर, माताजी गुणगान किया।
तीर्थोद्धारक चूड़ामणि यह, आचार्यश्री ने नाम दिया।।
माताजी की रचनाएँ हैं, बहु विधान पूजादि अनेक।
विमल सिंधु आचार्यश्री तब, हुए हर्षित कृतियों को देख।।८२८।।

आशीष सहित आचार्यश्री ने, दी उपाधि वाचस्पति विधान।
माताजी ने किया नमोऽस्तु, गुरुवर करें सदा कल्याण।।
ध्यान केन्द्र शिलान्यास इस समय, आचार्य सन्निधि किया गया।
ह्रीं ध्यान है प्रिय माताजी, ध्यान उसी पर दिया गया।।८२९।।