ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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033.जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर चातुर्मास-सन् १९८९

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जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर चातुर्मास-सन् १९८९

समाहित विषयवस्तु

१. चातुर्मास की स्थापना।

२. कु. माधुरी द्वारा दीक्षा हेतु निवेदन।

३. आर्यिका दीक्षा पूर्व की क्रियाएँ प्रारंभ।

४. माताजी द्वारा दीक्षा के संस्कार।

५. आर्यिका चंदनामती नाम की जय-जयकार।

६. दीक्षा मोक्ष की ओर कदम।

७. आर्यिका चंदनामती का परिचय।

८. आज ही ब्र.श्यामाबाई क्षुल्लिका हुर्इं।

९. शरद पूर्णिमा-माताजी का जन्म दिवस।

१०. त्रिदिवसीय संगोष्ठी का आयोजन।

११. चातुर्मास समापन एवं विहार।

१२. विहार काल में संत समागम।

१३. मुनि कनकनंदी आदि संघ को बड़ौत में अष्टसहस्री पढ़ाई।

१४. हस्तिनापुर वापसी।

१५. श्रुताभ्यास पुन: प्रारंभ।

१६. माताजी द्वारा तप आराधना।

१७. सन् १९८९ में अनेक महत्वपूर्ण कार्य हुए।

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काव्य पद

पुण्यपुंज बिन संत न मिलते, संत बिना कल्याण नहीं।

संत रहे धरती के सूरज, वे रुकते इक ठौर नहीं।।
वर्षावास निकट जब आया, जनता दौड़ी माँ के पास।
हे पूज्याश्री जम्बूद्वीप ही, करें नवासी चातुर्मास।।८६०।।

भक्तों के वश में हैं भगवन, यद्यपि कथन पुराना है।
पर चरितार्थ हो रहा अब तक, आया नया जमाना है।।
जल बरसा पर्जन्य पूरते, जिस प्रकार चातक की आस।
बस वैसे ही माताजी ने, किया गजपुर में चातुर्मास।।८६१।।

आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशि तिथि को, हुआ स्थापित चातुर्मास।
माताजी के जयकारों से, गूँज उठे धरती-आकाश।।
उस ही काल माधुरी जी ने, भाव विशुद्धि बढ़ा करके।
जिनदीक्षा हित किया निवेदन, श्रीफल चरण चढ़ाकर के।।८६२।।

हे पूज्याश्री! यह जग मुझको, बिल्कुल नहीं सुहाता है।
भव-तन-भोग-विरक्त हुआ मन, गीत विरागी गाता है।।
इस तन का उपयोग यही है, भवसागर को पार करें।
अत: आर्यिका दीक्षा देकर, माँ मेरा उद्धार करें।।८६३।।

औरस भगिनी श्री माधुरी, माताजी उपकार किया।
बाल ब्रह्मचारिणी जी को, दीक्षा देना स्वीकार किया।।
हर्ष लहर की दौड़ी सब में, किया सभी ने अनुमोदन।
होने लगे संस्कार पूर्व के, सम्मान बिनौरी आयोजन।।८६४।।

तेरह अगस्त नवासी के दिन, जम्बूद्वीप सजा चहुँ ओर।
उमड़ा जन सैलाब अपरिमित, जिसका कोई ओर न छोर।।
कारण आज महोत्सव दीक्षा, का आयोजन होना है।
मोहमल्ल को नारी हाथों, आज पराजित होना है।।८६५।।

बने बृहत् पाण्डाल बीच में, शोभित मंच निराला है।
स्वास्तिक बने चौक पाटे पर, बैठी सुंदर बाला है।।
ये हैं माधुरी ब्रह्मचर्य व्रत, बाल्यकाल से धारे हैं।
इनके माता ज्ञानमती ने, सारे बाल उखारे हैं।।८६६।।

पाप - कषाएँ - विषयवासना, ममता - मोह सभी हारे।
अब न लौटकर के आयेंगे, कहकर भागे बेचारे।।
इधर किए गणिनी माता ने, मधुर आर्यिका के संस्कार।
उधर दर्शकों के नयनों से, बह निकली असुवन की धार।।८६७।।

किन्तु माधुरी के चेहरे पर, लगे झलकने स्वच्छ विचार।
भीतर का आनंद प्रकट हो, मुखछवि छाया हर्ष अपार।।
अष्टाविंशति मूलगुणों का, माताजी संस्कार किया।
पिच्छी-शास्त्र-कमण्डलु देकर, दो साड़ी परिधान दिया।।८६८।।

नाम चन्दनामती आर्यिका, ज्यों माँश्री उद्घोष किया।
त्यों ही दश सहस्र जनता ने, दुहरा कर जय घोष किया।।
माताजी ने इस अवसर पर, दिया बहुत मार्मिक प्रवचन।
श्री माधुरी दीक्षा लेकर, पाया साध्वी नया जनम।।८६९।।

मोक्ष परमपद को पाने का, दीक्षा लेना श्रेष्ठ कदम।
मनुष जनम की सब से उत्तम, सार्थकता कह सकते हम।।
एक जन्म की नहीं कमाई, कई जन्म साधना फल।
देव नमन करते चरणों में, जहाँ धर्म बसता प्रतिपल।।८७०।।

चंदनामती आर्यिका जी ने, जगमाता का रूप लिया।
समुपस्थित समुदाय सकल ने, शत-शत सविनय नमन किया।।
पूर्व प्राप्त संस्कार मातुश्री, दीक्षा से दृढ़ता को पा।
ज्ञान-ध्यान-तप-हुर्इं अग्रणी, अत्युत्तम साहित्य रचा।।८७१।।

पूजन-भजन-आरती माता, रचे किया चेतन का भोग।
विधान कराये मधुर कंठ से, प्रवचन दिये चतु: अनुयोग।।
इन्द्रध्वज विधान सम्पन्ना, दशलक्षण जब आया पर्व।
लाभ उठाया तन-मन धन से, नगराये१ अभ्यागत सर्व।।८७२।।

दशलक्षण पर्वाधिराज में, प्रात:-दोपहर-रात्रि समय।
रहा बरसता धर्म का अमृत, वातावरण रहा सुखमय।।
पूज्य आर्यिका ज्ञानमती का, शुभ छप्पनवाँ जन्म दिवस।
सोत्साह अति गया मनाया, शरदपूर्णिमा चन्द्र दिवस।।८७३।।

दिवस आज ही ब्रह्मचारिणी, श्यामाबाई टिकैतनगर।
हुर्इं क्षुल्लिका पद पर दीक्षित, श्रद्धामती नाम को धर।।
पूज्य आर्यिका ज्ञानमती ने, दीक्षा दे उपकार किया।
श्यामाबाई दीक्षा लेकर, यह मानवतन सफल किया।।८७४।।

हुई आयोजित अक्टूबर में, तीन दिवस संगोष्ठी है।
विधि-प्रतिष्ठा-ज्ञान कराने, रही महत् उपयोगी है।।
किया सम्बोधित माताजी ने, अत्युपयोगी ज्ञान दिया।
कार्य सफल होगा निश्चित ही, यदि आचार उतार लिया।।८७५।।

कार्तिक कृष्ण चतुर्दशि आयी, हुआ समापन वर्षायोग।
विहार काल में पाया उत्तम, संत-समागम का संयोग।।
मिले मवाना में नवकारी, आचार्यश्री कल्याण निधि।
उपाध्याय ज्ञाननिधि दर्शन, किये बिनौली यथानिधि।।।८७६।।

बड़ौत नगर में कुंथनिधि के, दर्शन का शुभयोग रहा।
करें ज्ञान का दान संघ को, कनकनंदि मुनिराज कहा।।
तब मातुश्री अष्टसहस्री, ग्रंथ पढ़ाया पूरे संघ।
बड़ौत नगर में विधान काल में, मातृ आगमन रहा प्रसंग।।८७७।।

मोदीनगर, नगर मेरठ फिर, माताजी का हुआ विहार।
चर्चा-चर्या दोनों द्वारा, सकल समाज दिए संस्कार।।
नगर-गाँव में माताजी के, हुए नित्य मंगल प्रवचन।
कर विहार गजपुर पधरार्इं, बाईस फरवरी नब्बे सन्।।८७८।।

चलते चरण रुके हथनापुर, हुए व्यवस्थित कार्य सकल।
सामूहिक स्वाध्याय के कारण, मिला ज्ञान का अमृत फल।।
जगकल्याणी माताजी का, लेखन पुनरारम्भ हुआ।
महामहोत्सव जम्बूद्वीप का, क्रमश: कार्यारंभ हुआ।।८७९।।

महाव्रतों को जो भी पालें, महापुरुष वे हो जाते।
अथवा महाव्रतों का पालन, महापुरुष ही कर पाते।।
हाथी योग्य भार को केवल, हाथी ही ढो सकता है।
केसरिणी का दुग्ध सुरक्षित, स्वर्णपात्र रह सकता है।।८८०।।

परम पूज्य माँ ज्ञानमती ने, महाव्रतों को धारण कर।
नारी-जन को मोक्षमार्ग का, खोल दिया द्वार हितकर।।
निरतिचार दृढ़ता लाने को, अन्यानेक तपों को आप।
धारण-पालन करती रहतीं, बिना ख्याति-लाभ चुपचाप।।८८१।।

माताजी का तन कोमल है, रुग्ण-जीर्णता वाला है।
किन्तु आत्मा पूज्याश्री का, अतिशायी बल वाला है।।
जीर्ण-रुग्ण तन तप में बाधक, हो सकता है कभी नहीं।
गर साधक के आतमबल में, होती कोई कमी नहीं।।८८२।।

किए कौन से व्रत माताजी, है उनका विस्तृत आकाश।
किन्तु यहाँ पर सब का वर्णन, करने का है नहिं अवकाश।।
अत: कथा संक्षेप ही पढ़ें, किए अन्न-रस आदिक त्याग।
धन्य-धन्य माताजी तुमने, व्रत पाले स्व-शक्ति बड़भाग।।८८३।।

कई वर्षों तक माताजी ने, एक अन्न ही ग्रहण किया।
केवल चावल के ही द्वारा, चर्या व्रत निर्वहन किया।।
वर्षों बाद अन्न दो लेकर, रहा सकल अन्नों का त्याग।
अब भी उसी नियम का पालन, माँ करतीं अतिशय अनुराग।।८८४।।

गुरुवर वीर समाधि अनन्तर, जिनेन्द्रदेव की साक्षि रही।
रस परित्याग किये माताजी, गुड़-शर्वरा-तेल-दही।।
तीस बरस तक पूज्याश्री के, रहा नमक रस का परित्याग।
वर्तमान में दो अनाज-रस, शेष सभी का माँ के त्याग।।८८५।।

सन् उन्नीस नवासी भीतर, कई कार्य सम्पन्न हुए।
नयाध्यक्ष मेयर सम्मेलन, शिविर प्रशिक्षण आदि हुए।।
श्री मज्जिनेन्द्र पंचकल्याणक, अद्भुत छटा बिखेरी है।
माताजी ने युद्धभूमि पर, धार्मिक तस्वीर उकेरी है।।८८६।।

स्मृति ग्रंथ आचार्य वीरनिधि, अष्टसहस्री समय का सार।
हुए विमोचित पंचकल्याणक, माँ मन आया हर्ष अपार।।
आचार्यश्री शांतिसागर की, परम्परा के पट्टाचार्य।
हुए प्रतिष्ठित पंचमपद पर, निधि श्रेयांस कल्प आचार्य।।८८७।।

यह उन्नीस-नवासी का सन्, रहा अधिक महिमाशाली।
पंचकल्याण-आर्यिकादीक्षा, हुए कार्य गौरवशाली।।
आप बताएँ इसके पीछे, किसका है मंगल आशीष।
पूज्य आर्यिका ज्ञानमती को, श्रद्धासहित नमाते शीश।।८८८।।