ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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035.सरधना चातुर्मास-सन् १९९१

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सरधना चातुर्मास-सन् १९९१

समाहित विषयवस्तु

१. माताजी की अगवानी में सरधना की सजावट।

२. संघ सहित चातुर्मास की स्थापना।

३. सबने सब कुछ पाया।

४. अनेक उत्सव का आयोजन।

५. श्रोताओं और पूजकों की आशातीतवृद्धि।

६. महिला मंडल की स्थापना।

७. आर्यिका चंदनामती का दीक्षादिवस आदि।

८. पंद्रह अगस्त पर माताजी के प्रवचन।

९. शिक्षण शिविर का आयोजन।

१०. माताजी की कृतियों का विमोचन।

११. ब्र.रवीन्द्र कुमार युवापरिषद के अध्यक्ष।

१२. चातुर्मास की निष्ठापना-विहार।

१३. सलावा-मवाना-हस्तिनापुर।

१४. वार्षिक रथयात्रा।

१५. माताजी की दैनिक चर्या।

१६. उ.प्र. मुख्यमंत्री कल्याणसिंह ने माताजी से आशीर्वाद लिया।

१७. कल्याणसिंह द्वारा माताजी के कार्यों की प्रशंसा।

१८. सरल संघ का सबको शुभाशीष।

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काव्य पद

नगर सरधना खुशियाँ छार्इं, यथा रंक को निधि मिली।

तोरण-वंदनवार-अल्पना, हुई अलंकृत गली-गली।।
पद प्रक्षालन करन आरती, की जनता में होड़ लगी।
माताजी के जयकारों से, हो गई नगरी जगी-जगी।।९०३।।

आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशी को, पच्चीस जुलाई आयी है।
आबाल-वृद्ध सबही के मन को, हार्दिकता से भाई है।।
चातुर्मास हुआ स्थापित, ज्ञानमती जी संघ सहित।
साथ चंदनामती आर्यिका, क्षुल्लक मोतीनिधि सहित।।९०४।।

माताजी के शुभागमन से, हर चेहरा मुस्काया है।
जैन समाज जागृति आई, नगर ने सब कुछ पाया है।।
बालक गण संस्कार मिले हैं, युवकों पाया पूजा दान।
वृद्धों ने माता से पाया, वात्सल्य भावना का वरदान।।९०५।।

माताजी के सन्निधान में, हुए महोत्सव नये-नये।
गुरूपूर्णिमा - वीरजयंती - पार्श्र्वनाथ निर्वाण गये।।
प्रतिदिन पूजन-प्रवचन होते, संख्या बढ़ती जाती है।
पहले पूजक मिलें न खोजे, अब जगह न मिलने पाती है।।९०६।।

महिला मंडल हुआ स्थापित, सात दिवस तक सात विधान।
दीक्षादिवस चंदनामाता, दिवस स्वतंत्रता पर्व महान्।।
पंद्रह अगस्त, रक्षाबंधन पर, इनके प्रवचन स्मरणीय।
एक राष्ट्र की याद दिलाता, धर्मात्मा रक्षा करणीय।।९०७।।

विश्वशांति संभव है केवल, धर्म अहिंसा के द्वारा।
जैनेतर वक्ताओं ने भी, इसी सत्य को स्वीकारा।।
सर्वतोभद्र मंडल विधान का, हुआ महत्तम आयोजन।
अशोककुमार जी साहू आये, लेने को आशीष वचन।।९०८।।

शिक्षण-शिविर हुआ आयोजित, ज्ञानार्जन सबने पाया।
माताजी ने प्रवचन द्वारा, रहस्य धर्म का समझाया।।
धर्म वही जो प्राणिमात्र को, दुख से सुख में पहुँचाये।
करो वही व्यवहार अन्य से, जो कि आपको भी भाये।।९०९।।

शरद पूर्णिमा के आने पर, माताजी का जन्म दिवस।
गया मनाया भक्ति-भाव से, विनयांजलि माँ गाया यश।।
बीस सदी की बालसती माँ, साध्वी शृंखला उच्च शिखर।
किए महत्तम कार्य बहुत से, जिन्हें नहीं कर पाये नर।।९१०।।

पुण्य लेखिनी माताजी की, नहिं रुकने का लेती नाम।
मुख्यमंत्री से हुई विमोचित, मुनिचर्या है कृति का नाम।।
बालब्रह्मचारी रवीन्द्र जी, हुए युवा परिषद अध्यक्ष।
मनोज कुमार महामंत्री पद, चयनित हुए सकल प्रत्यक्ष।।९११।।

नगर सरधना का हर कोना, हुआ धर्म से ओतप्रोत।
लश्कर गंज-गाँधी कालोनी, सब में बहे धर्म के स्त्रोत।।
चातुर्मास हुआ निष्ठापित, हुआ पिच्छिका परिवर्तन।
संघ सहित श्रीमाताजी का, हस्तिनागपुर हुआ गमन।।९१२।।

नगर सरधना के वासी सब, अश्रुविमोचित किए घने।
रहेंगे कैसे बिन माता के, दिल मसोस लगे कहने।।
हे माताजी! पुन: पधारें, दर्शन दें वात्सल्य मिले।
किन्तु विरागी साधु संघ के, कदम सलावा ओर चले।।९१३।।

नगर सलावा के जन-जन ने, किया संघ का अभिनंदन।
पद प्रक्षालन, करन आरती, पुन:-पुन: सविनय वंदन।।
माताजी ने सभी जनों को, प्रवचन सह वात्सल्य दिया।
तीन दिवस में तीन साल-सा, धर्म का अमृत पिला दिया।।९१४।।

नगर सलावा को सरसा कर, संघ महलका पधराया।
धर्म अहिंसा पाठ पढ़ा कर, नगर मवाना में आया।।
माताजी का पुण्ययोग का, हुआ सभी को हर्ष अपार।
हार्दिक स्वागत किया संघ का, करी आरती बारम्बार।।९१५।।

अल्प प्रवास मवाना में कर, हस्तिनागपुर आया संघ।
विविध वाद्य संगीत स्वरों से, हुआ सौर मिल सकल प्रसंग।।
कार्तिक शुक्ला चतुर्दशी को, वार्षिक रथयात्रा उत्सव।
माताजी के सन्निधान में, सोत्साह मनाया सब।।९१६।।

जन सैलाब उमड़कर आया, दर्शन करने जम्बूद्वीप।
जैनाजैन सभी ने जाकर, गिरि सुमेरु को लखा समीप।।
ओ हो! अद्भुत रचना है यह, अभी दृष्टि में आई है।
परम पूज्य माँ ज्ञानमती ने, देख शास्त्र बनवाई है।।९१७।।

माताजी की चर्यानियमित, समय यंत्र से सधी हुई।
जिनवाणी माँ के मन मंदिर, पूर्ण रूप से बसी हुई।।
श्रीधरसेनाचार्य ने दिया, पुष्पदन्त-भूतबलि को ज्ञान।
षट्खंडागम की टीका है, श्री धवलाजी ग्रंथ महान।।९१८।।

पूज्य आर्यिका ज्ञानमती जी, करती हैं उसका स्वाध्याय।
प्रात:काल समय है निश्चित, दत्तचित हो, बिन अंतराय।।
स्वाध्याय अतिरिक्त आपका, नियमित लेखन चलता है।
फलस्वरूप अत्यल्पकाल ही, कृति के रूप निकलता है।।९१९।।

धन्य लेखनी माताजी की, सरस्वती भंडार भरा।
सार्ध दो शतक ग्रंथ हों जिसके, ऐसी नारि नहीं अपरा।।
निजशिष्यों का पाठन करतीं, आगन्तुक आशिष प्रवचन।
व्यस्त सदा रहतीं माताजी, व्यर्थ न जाता कोई क्षण।।९२०।।

माघ बदी नवमी सन् बानवै, पूज्य आर्यिका रत्नमती।
पुण्यतिथि जब आई सातवीं, श्रद्धांजलि सब अर्पित की।।
तेरह रत्नप्रसूता माँ ने, तेरह वर्ष साधना की।
नाम मोहिनी, हो निर्मोही, धर्मशूरता शिक्षा दी।।९२१।।

आचार्यश्री शांतिसागर जी, चारित्र चक्रवर्ती महाराज।
उनके पट्टाधीश पाँचवे, श्री श्रेयांससागराचार्य।।
नगर बांसवाड़ा में उनका, हुआ यकायक समाधिमरण।
जम्बूद्वीप में माताजी ने, श्रद्धांजलि में कहे वचन।।९२२।।

आचार्यश्री श्रेयांससिन्धु जी, निर्भय परम तपस्वी थे।
ज्ञान-ध्यान तपलीन साधु में, मुनि श्री महामनस्वी थे।।
सबने मिलकर श्रद्धांजलि में, णमोकार पढ़ रक्खा मौन।
होनहार बलवान बहुत है, उसे रोक सकता है कौन।।९२३।।

कल्याणसिंह यू.पी. मुखमंत्री, हस्तिनागपुर में आये।
मातृचरण रज चंदन लेकर, खुशी हुए अति हर्षाये।।
माताजी आशीष में कहा, चलें अहिंसा के मग में।
देश-प्रदेश कल्याण सभी का, मैत्री भाव रहे जग में।९२४।।

कल्पवृक्ष सम सब फलदायी, महावीर स्वामी जिनराज।
जम्बूद्वीप कमल मंदिर में, विराजमान शोभित सरताज।।
सत्तरहवां प्रतिष्ठापना दिवस, माता सन्निधि खूब मना।
वीर प्रभू मंगल प्रसाद से, हुआ क्षेत्र विकसित इतना।।९२५।।

धीरे-धीरे सन् इक्यानवे, बूढ़ा होकर हुआ अतीत।
योग-वियोग समय जो आया, नियम प्राकृतिक, हुआ व्यतीत।।
साम्यभाव धारण करते हैं, महापुरुष दोनों ही काल।
माताजी के शुभाशीष से, जम्बूद्वीप रहा खुशहाल।।९२६।।

यथासमय भक्तों ने आकर, जम्बूद्वीप में किए विधान।
पूज्य आर्यिका ज्ञानमती का, प्राप्त रहा मंगल सन्निधान।।
चन्दनामती माताजी द्वारा, सबको प्रवचन लाभ मिला।
क्षुल्लक श्री मोतीसागर ने, दिया ज्ञान पीयूष पिला।।९२७।।