ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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037.मनोवती के मनोरथ फल

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मनोवती के मनोरथ फले-

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मनोवती अस्वस्थ चल रही थी। डाक्टर का इलाज चल रहा था किन्तु कोई खास फायदा नहीं दिख रहा था। माँ मोहिनी एक बार लखनऊ गर्इं। वहाँ चौक के मंदिर में दर्शन करने पहुँचीं तो देखा, पंचकल्याणक प्रतिष्ठा की कुमकुमपत्रिका मंदिर जी में लगी हुई है। बारीकी से पढ़ने लगी। विदित हुआ, इस समय आचार्य शिवसागर जी का संघ लाडनूं राजस्थान में है। पंचकल्याणक प्रतिष्ठा का अवसर है, वहाँ पर आर्यिका ज्ञानमती जी भी हैं। मन में सोचने लगीं- ‘‘यह मनोवती पाँच वर्ष से माताजी के लिए तड़फ रही है। इसका शरीर स्वास्थ्य इस मानसिक चिंता से ही खराब हो रहा है। इसको जब तक माताजी के दर्शन नहीं मिलेंगे तब तक इसे कोई भी दवाई नहीं लगेगी।......यह मौका अच्छा है। पति से पूछने पर, पता नहीं वे कितने मोही जीव हैं, इसे संघ में ले जाने की अनुमति नहीं देगें। मेरी समझ से तो अब मुझे इस मनोवती को माताजी के दर्शन करा देना चाहिए।’’ माँ मोहिनी के साथ उस समय रवीन्द्र कुमार नाम का सबसे छोटा पुत्र था। सोचा- ‘‘इसे ही साथ लेकर मैं क्यों न लाडनूं चली जाऊँ?’’

यद्यपि माँ मोहिनी ने आज तक कभी अकेले इस तरह रेल का सफर नहीं किया था, फिर भी साहस बटोर कर भगवान् का नाम लेकर उन्होंने किसी विश्वस्त व्यक्ति से लाडनू आने-जाने का मार्ग पूछ लिया और मनोवती पुत्री तथा रवीन्द्र पुत्र को साथ लेकर लाडनूं आ गर्इं, मेरे सब दर्शन किये, मन शांत हुआ पुनः दूसरे ही क्षण घबराहट में मुझसे बोली- ‘‘मैं तुम्हारे पिता से न बताकर लखनऊ से ही सीधे इधर आ गई हूँ। अगर मैं घर नहीं पहुँचूँगी तब लोग चिंता करेंगे।’’ मैंने सारी स्थिति समझ ली। शीघ्र ही ब्र. श्रीलाल जी को बुलाया और सारी बात बता दी तथा घर का पता बताकर कहा कि- ‘‘इनके घर तार दे दो कि ये लोग सकुशल यहाँ प्रतिष्ठा देखने आ गई हैं, चिंता न करें।’’ ब्र. श्रीलालजी ने उनके घर तार दे दिया। अब उन्होंने यहाँ रहकर पंचकल्याणक प्रतिष्ठा देखी और प्रतिदिन आहार दान का लाभ लेने लगीं। मनोवती की खुशी का क्या ठिकाना? मानों उसे सब कुछ मिल गया है। वह मेरे दर्शन कर अपने को धन्य मानने लगी। मेरे पास बैठकर उसने अपने ४-५ वर्ष के मनोभाव सुनाये और कहने लगी-

‘‘माताजी! अब मैं घर नहीं जाऊँगी। अब तो आप मुझे यहीं पर दीक्षा दिला दो। मैंने समझाया, सान्त्वना दी और कहा- ‘‘बेटी मनोवती! अब तुम संघ में आ गई हो, खूब धार्मिक अध्ययन करो, व्याकरण पढ़ो, दीक्षा भी मिल जायेगी। धीरे-धीरे सब काम हो जावेगा।’’ उस समय संघ में वयोवृद्धा और दीक्षा में भी सबसे पुरानी आर्यिका धर्ममती माताजी थीं। उनका मेरे प्राप्ति विशेष वात्सल्य था। उन्होंने इस कन्या मनोवती के ज्ञान की और वैराग्य की बहुत ही सराहना की तथा बार-बार माँ मोहिनी से कहने लगीं- ‘‘माँ जी! तुम्हारी कूख धन्य है कि जो तुमने ऐसी-ऐसी कन्यारत्न को जन्म दिया है। देखो! ज्ञानमती माताजी के ज्ञान से सभी साधुवर्ग प्रभावित हैं। ये इतनी कमजोर होकर भी रात-दिन संघ में आर्यिकाओं को पढ़ाती ही रहती हैं। यह कन्या मनोवती भी देखो, कितने अच्छे भावों को लिये हुए है। सिवाय दीक्षा लेने के और कोई बात ही नहीं करती है। इसे भी तत्त्वार्थसूत्र आदि का अर्थ मालूम है, अच्छा ज्ञान है और क्षयोपशम भी बहुत अच्छा है, खूब पढ़ जायेगी। अब इसे हम लोग संघ में ही रखेंगे, घर नहीं भेजेंगे।’’

इन बातों को सुनकर मनोवती खुश हो जाती थी। एक दिन मेरे साथ आचार्य शिवसागर महाराज के पास पहुँचकर उसने नारियल चढ़ाकर दीक्षा के लिए प्रार्थना की। महाराज जी ने कहा- ‘‘अभी तुम आई हो, संघ में रहो, कुछ दिनों में दीक्षा भी मिल जायेगी।’’ किन्तु माँ मोहिनी घबराने लगीं, उन्होंने कहा- ‘‘यदि यह वापस घर नहीं चलेगी तो मुझे घर में रहना भी मुश्किल हो जायेगा। इसके पिता बहुत उपद्रव करेंगे।’’ तब सभी माताजी ने मनोवती को समझा-बुझाकर शांत कर दिया।

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व्रती जीवन का प्रारंभ-

एक दिन मैंने केशलोंच किया। मोहिनी देवी ने अपनी पुत्री के अर्थात् मेरे केशलोंच पहली बार देखे थे। उनके हृदय में वैराग्य का स्रोत उमड़ आया। केशलोच के बाद वे श्रीफल लेकर आचार्यश्री के पास गर्इं और दो प्रतिमा के व्रत लेने के लिए प्रार्थना करने लगीं। मैंने कहा- ‘‘आपको उस प्रान्त में शुद्ध घी नहीं मिलेगा पुनः रूखी रोटी कैसे खावोगी? तुम्हारा स्वास्थ्य तो बहुत कमजोर रहता है?’’ उन्होंने कहा-‘‘कोई बात नहीं, जैसा होगा सब निभ जायेगा।’’ आचार्यश्री ने उस समय उन्हें पांच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत देकर दो प्रतिमाओं के व्रत दे दिये, सारी विधि बतला दी। वैसे ये स्वयं घर में प्रायःशुद्ध भोजन करती थीं, हाथ का पिसा हुआ आटा, शुद्ध घी और कुंये का जल मात्र इतने की ही कमी थी। दोनों समय सामायिक भी करती थीं और प्रातः नित्य ही शुद्ध वस्त्र पहनकर शुद्ध धुले अष्टद्रव्य से भगवान् का पूजन करती थीं, स्वयं स्वाध्याय करती थीं और महिलाओं की सभा में भी शास्त्र बाँचकर सुनाती थीं। अब इनका जीवन व्रतिक बन चुका था। ये मन में तो यही सोच रही थीं कि-

‘‘भगवन्! कब ऐसा दिन आयेगा कि जिस दिन मैं केशलोंच करके घर-कुटुम्ब, पति, पुत्र-पुत्रियों का मोह छोड़ करके दीक्षा लेकर संघ में रहूँगी.....?’’ इसी प्रसंग में मनोवती ने भी ब्रह्मचर्यव्रत के लिए आग्रह किया किन्तु माँ ने कहा-‘‘अभी मैं तुम्हें व्रत नहीं दिला सकती।’’ माँ की आज्ञा न होने से आचार्य महाराज ने भी टाल दिया। यहाँ आदिमती माताजी की कमर में वायु प्रकोप हो जाने से वे उठने-बैठने में बहुत ही परेशान थीं। मैं स्वयं अपने हाथ से उनकी वैयावृत्ति करती रहती थी, संघ की अन्य आर्यिका जिनमती जी, क्षुल्लिका श्रेयांसमतीजी भी उनकी वैयावृत्ति में लगी रहती थीं। पंचकल्याणक प्रतिष्ठा के अवसर पर भी मैं इनकी अस्वस्थता के कारण प्रतिष्ठा के पांडाल में कम ही जा पाती थी। मैं वैयावृत्ति को ही बहुत बड़ा धर्म समझती थी। ऐसे प्रसंग पर माँ मोहिनी भी समयोचित वैयावृत्ति में पीछे नहीं रही थीं। इस समय मेरे पास में कोई ब्रह्मचारिणी न होने से सारी वैयावृत्ति आदि मुझे ही संभालना पड़ती थी। तभी एक दिन आर्यिका सिद्धमती माताजी ने मोहिनी जी से कहा-

‘‘ये आपकी पुत्री जब वीरमती क्षुल्लिका थीं, संघ में आर्इं, आचार्यश्री वीरसागरजी महाराज ने भी इनसे कहा था कि- ‘‘तुम कुछ दिन सोनूबाई और कु. प्रभावती को ब्रह्मचारिणी अवस्था में ही रखो। ये दोनों कुछ दिनों तक संघ की और तुम्हारी सेवा करें, आहार देवें और गुरुओं की विनय करें, पश्चात् इन्हें दीक्षा दिलाना।’’

किन्तु ये नहीं मानीं और झट अपने साथ ही कु. प्रभावती को क्षुल्लिका दीक्षा दिला दी। कुछ दिन बाद ही ब्र. सोनुबाई को भी आर्यिका पद्मावती बना दिया। अभी एक वर्ष पूर्व ही यह ब्र. अंगूरी संघ में आई थी, झट से इसे भी माताजी बना दिया और ब्र. रतनीबाई को भी क्षुल्लिका दीक्षा दिला दी। तुम्हीं सोचो, भला इन्हें इतनी जल्दी क्या रहती है? हम सभी यहाँ जितनी भी आर्यिकायें हैं, सबने संघ में कई-कई वर्षों रहकर सेवा की है? आर्यिकाओं की वैयावृत्ति की है और चौका बनाकर खूब आहार दिया है। बाद में खूब अभ्यास हो जाने के बाद ही दीक्षा ली है।.....देखो न! अंगूरी को कुछ अभ्यास नहीं था अतः दीक्षा लेते ही बीमार रहने लगी.....।’’

यह सब सुनकर माँ मोहिनी ने आकर एकांत में मुझसे सारी बातें सुना दीं और कुछ समझाना शुरू किया। तब मैं बोली- ‘‘बात यह है कि जिसने घर छोड़ा है, मुझे लगता है दीक्षा लेकर आत्मकल्याण करे। अपनी वैयावृत्ति और व्यवस्था के लिए भला मैं उसे क्यों ब्रह्मचारिणी वेष में रहने दूँ? मैं अपने भाग्य पर भरोसा रखती हूँ। मेरा भाग्य होगा तो ये आर्यिका बनकर भी मेरी सेवा करेंगी तथा गृहस्थ लोग भी करेंगे और भाग्य नहीं होगा तो ये ब्रह्मचारिणी रहकर भी नहीं करेंगी......।’’ ऐसा उत्तर सुनकर और मेरी निःस्पृहता देखकर माँ मोहिनी चुप हो गर्इं।

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यात्रा के प्रस्थान की चर्चा-

एक दिन मोहिनी जी ने सुना। मैं अपनी शिष्या जिनमती के साथ कुछ परामर्श कर रही थी। जिनमती ने आज तक सम्मेदशिखर जी की यात्रा नहीं की थी अतः वह मुझसे शिखर जी यात्रा हेतु चलने के लिए प्रार्थना कर रही थी। मैं कह रही थी-

‘‘हाँ! कई बार ब्र. सुगनचन्द जी ने भी कहा है कि मैं आपको सम्मेदशिखर की यात्रा कराना चाहता हूँ और सेठ हीरालाल जी निवाई वालों ने भी कई बार कहा है कि ‘‘माताजी! आपकी शिखर जी की यात्रा की व्यवस्था जैसी चाहो, वैसी मैं करने को तैयार हूँ।’’

किन्तु गर्मी आ रही है चातुर्मास के बाद ही यात्रा के लिए प्रस्थान किया जा सकेगा। इसी मध्य शिखर जी की वन्दना होने तक मैंने चावल का त्याग कर दिया था, मैं मात्र एक अन्न गेहूँ ही आहार में लेती थी। मेरा इतना कमजोर शरीर और इतना अधिक त्याग देखकर माँ मोहिनी बहुत घबराने लगती थीं। मोहिनीजी को यहाँ संघ के सानिध्य में रहते हुए लगभग एक महीना व्यतीत हो रहा था, अब वे घर जाने के लिए सोच रही थीं कि एक दिन सहसा घर से तार आया कि ताऊजी का स्वर्गवास हो गया है। तभी मोहिनी जी ने ब्र. सुगनचंद के साथ घर जाने की तैयारी की।

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मनोवती का संघ में रहना-

अब मनोवती ने जिद पकड़ ली- ‘‘चाहे जो हो जाये, अब मैं घर नहीं जा सकती। कितनी मुश्किल से मुझे माताजी मिली हैं, अब मैं इन्हें नहीं छोड़ने की, मैं तो यहीं रहूँगी।’’ तब ब्र. श्रीलालजी ने माता मोहिनीजी को जैसे-तैसे समझाकर उनसे स्वीकृति दिलाकर कु. मनोवती को एक वर्ष का ब्रह्मचर्य व्रत आचार्य शिवसागरजी से दिला दिया और एक वर्ष तक उसे संघ में रहने की स्वीकृति दिला दी तथा मोहिनी जी को सान्त्वना देकर घर भेज दिया।

मोहिनीजी के पास लगभग २ वर्ष की छोटी सी कन्या थी। उसका नाम मैंने ‘‘त्रिशला’’ रखा था। मोहिनीजी अपनी इस कन्या को और रवीन्द्र कुमार को साथ लेकर ब्रह्मचारी जी के साथ अपने घर वापस चली गर्इं। सारे पुत्र-पुत्रियाँ माँ को देखते ही उनसे चिपट गये और कहने लगे-

‘‘माँ! तुम हमें छोड़कर माताजी के पास क्यों चली गयी थीं? बताओ, हम माताजी के दर्शन कैसे करेंगे?’’ इधर जब पिता ने मनोवती को नहीं देखा, तो उनका पारा गरम हो गया और वे गुस्से से बोले- ‘‘अरे! मेरी बिटिया मनोवती कहाँ है? क्या तुम उसे ज्ञानमती के पास छोड़ आर्इं?’’

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मोहिनीजी ने शांति से जवाब दिया-

‘‘वह पाँच वर्ष से रोते-रोते बीमार हो गयी थी, आखिर मैं कब तक अपना कलेजा पत्थर का रखती? अब मैं क्या करूँ?........संघ की आर्यिकाओं ने मुझे खूब समझाया और उसे एक वर्ष तक के लिए संघ में रख लिया है। जब चाहे आप संघ में चले जाना, सब साधु-साध्वियों के और ज्ञानमती माताजी के दर्शन भी कर आना तथा जैसे प्रकाश को वापस बुला लिया था, वैसे ही उसे भी ले आना..........।’’

वातावरण शान्त हो गया पुनः समय पाकर सबने संघ के समाचार सुने। माँ ने दो प्रतिमा के व्रत ले लिये हैं, ऐसा मालूम होते ही घर में सबको दुःख हुआ। पिता ने सोचा- ‘‘अब ये भी एक न एक दिन दीक्षा ले लेंगी ऐसा ही दिखता है अतः इन्हें भी संघ में नहीं भेजना चाहिए।’’ पुत्र कैलाशचन्द, पुत्रवधू चन्दा आदि भी सोचने लगे-

‘‘क्या माँ भी कभी हम लोगों को छोड़कर दीक्षा ले लेंगी, आखिर बात क्या है?’’ सभी लोग तरह-तरह की आशंका करने लगे, तब माँ ने समझाया- ‘‘देखो! चिंता करने की कोई बात नहीं है, अभी तो मैंने मात्र दो प्रतिमा के ही व्रत लिये हैंं। छठी प्रतिमा तक लेकर भी गृहस्थाश्रम में रहा जाता है, कोई बाधा नहीं आती है।’’

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शोध चतुराई-

अब माँ कुएँ का ही जल पीती थीं, बाहर का घी नहीं खाती थीं, हाथ का पिसा आटा यदि कदाचित् न मिल सके तो खिचड़ी बनाकर ही खा लेती थीं। इनकी शोध चतुराई में पिताजी कभी-कभी चिढ़ जाते थे और हल्ला मचाना शुरू कर देते थे। कभी-कभी तो उनका चौका छू देते, तब ये पुनः दूसरा चौका बनाकर भोजन करती थीं। ये माँ मोहिनी अपने त्याग में बहुत ही दृढ़ थीं और आजकल की अपेक्षा बहुत ही बढ़-चढ़कर शोध किया करती थीं। इनको क्रियाकोष में बहुत प्रेम था, स्वाध्याय भी अच्छा था, सभी बातों का ज्ञान था। सभी लड़के और लड़कियाँ इनकी आज्ञा के अनुरूप ही शुद्ध दूध, जल आदि के लाने में लगे रहते थे।

इन लोगों के उधर कुएँ से जल भरने की प्रथा नहीं थी, प्रायः कहार नौकर-नौकरानी ही पानी भरते थे। उस समय इनके लिए पुत्र या पुत्रियाँ पानी भरने जाते थे तब पिताजी को बहुत ही खेद होता था। ऐसा देखकर पिता ने घर में ‘‘हैण्डपम्प’’ लगवा दिया, उसमें किरमिच का वाल डलवा दिया और बोले- ‘‘तुम अब इसका पानी अपने भोजन के काम में ले लो। यह धरती से आया हुआ पानी बिल्कुल शुद्ध है।’’ माँ मोहिनी ने संघ में पत्र लिखा- ‘‘क्या मैं हैण्डपम्प का पानी पी सकती हूँ?’’

मैंने उत्तर दिया-‘‘नहीं’’ चूँकि उस समय संघ में कोई व्रतिक हैण्डपम्प का पानी नहीं पीते थे। तब पिताजी के अत्यधिक आग्रह से भी मोहिनी जी ने उस हैण्डपम्प का जल नहीं पिया। आजकल तो बहुत से सप्तम प्रतिमाधारी भी हैण्डपम्प का जल पीते हैं। आचार्यों ने छूट कर दी है क्योंकि उसे शुद्ध समझते हैं। उस समय माता मोहिनी ने अपने प्रतिमा के व्रतों को भी बहुत ही विशेषता से पाला था।

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संघ में रहने की प्रेरणा-

एक बार मुनिश्री अजितसागर जी कुछ छोटी सी बात के लिए संघ से अलग होने को तैयार हो गये। उन्होंने यह बात मुझे बताई, तब मैंने उन्हें समझाने का पूरा-पूरा प्रयास किया और संघ में ही रहने का अनुरोध किया। मेरा कहना यही था कि अब तो मैं सम्मेदशिखर की यात्रा के लिए जा रही हूँ, पता नहीं कितने वर्ष बाद संघ में आकर मिलूँ? आप तो आचार्य संघ में ही रहकर धर्माराधना करते हुए संघ का गौरव बढ़ावें, संघ के साधु-साध्वियों को अध्ययन करावें और आर्ष परंपरा को अक्षुण्ण बनावें। मैं सोचा करती थी कि मूलाचार में लिखा है-

तवसुत्तसत्तएगत्तभावसंघडणधिदिसमग्गो य।

पविआआगमबलिओ एयविहारी अणुण्णादो।।

तप, सूत्र, सत्त्व, एकत्वभाव, संहनन और धैर्य इन सबमें परिपूर्ण दीक्षा और आगम में बली मुनि एकलविहारी स्वीकार किया गया है।

सच्छंदगदागदीसयणणिसयणादाणभिक्खवोसरणे।

सच्छंदजंपरोचि य मा मे सत्तूवि एगागी।।

गमन, आगमन, सोना, बैठना, किसी वस्तु को ग्रहण करना, आहार लेना और मलमूत्रादि विसर्जित करना-इन कार्यों में जो स्वच्छंद प्रवृत्ति करने वाला है और बोलने में भी स्वच्छन्द रुचि वाला है, ऐसा मेरा शत्रु भी एकलविहारी न होवे।

गुरुपरिवादो सुदवुच्छेदो तित्थस्स मइलणा जडदा।

भिंभलकुसीलपासत्थदा य उस्सारकप्पम्हि।।

स्वेच्छाचार की प्रवृत्ति में गुरु की निन्दा, श्रुत का विनाश, तीर्थ की मलिनता, मूढ़ता, आकुलता, कुशीलता और पार्श्वस्थता ये दोष आते हैं।

कंटयखण्णुयपडिणियसाणगोणादिसप्पमेच्छेहिं।

पावइ आदविवत्तो विसेण व विसूइया चेव।।

ठूँठ, विरोधीजन, कुत्ता, गौ आदि तथा सर्प और म्लेच्छ जनों से अथवा विष से और अजीर्ण आदि रोगों से अपने आप में विपत्ति को प्राप्त कर लेता है।

गारविओ गिद्धीओ माइल्लो अलसलुद्धणिद्धम्मो।

गच्छेवि संवसंतो णेच्छइ संघाडयं मंदो।।

जो गौरव से सहित है, आहार में लम्पट है, मायाचारी है, आलसी है, लोभी है और धर्म से रहित है, ऐसा शिथिल मुनि संघ में रहते हुए भी साधु समूह को नहीं चाहता है।

आणा अणवत्थाविय मिच्छत्ताराहणादणासो य।

संजमविराहणाविय एदे दुणिकाइया ठाणा।।

एकाकी रहने वाले के आज्ञा का उलंघन, अनवस्था, मिथ्यात्व का सेवन, आत्मनाश और संयम की विराधना ये पाँच पापस्थान माने गये हैं। ये अजितसागरजी महाराज ब्र. राजमल के रूप में बचपन से संघ में रह रहे थे। आचार्य शिरोमणि श्रीवीरसागर जी महाराज को गुरु बनाया। उनके संरक्षण में बहुत कुछ अनुभव प्राप्त कर चुके थे, शास्त्रज्ञान भी अच्छा था और अब आचार्य शिवसागरजी से मुनिदीक्षा ग्रहण कर चुके थे, अतः संघ परम्परा के निर्वाह में कुशल थे। इसलिए मैंने कहा-‘‘महाराजजी! आप संघ से अलग हो जायेंगे तो मूलाचार ग्रंथ में कथित जो दोष हैं वे भले ही आप में नहीं आ सकेगे लेकिन फिर भी आज्ञालोप, अनवस्था, मिथ्यात्व-आराधना, आत्मनाश और संयमविराधना इन पाँच दोषों में से ‘अनवस्था’ दोष तो आ ही जावेगा अर्थात् अन्य मुनि भी आपकी देखा-देखी एकलविहारी होने लगेंगे। यह उन दिनों की घटना है जब आचार्यवर्य श्रीवीरसागरजी के और शिवसागर जी के संघ के कोई भी मुनि ‘एकल-विहारी’ नहीं हुए थे।

संघ के अन्य साधु भी मुनिश्री अजितसागर जी को संघ में रोकने के प्रयास में लगे हुए थे। कई बार मुनिश्री श्रुतसागरजी एवं मुनिश्री जयसागरजी ने मुझसे कहा-

‘‘माताजी! हम लोग तो पुरुषार्थ कर चुके हैं अब आपके पुरुषार्थ से ही इन्हें संघ में रोका जा सकता है.....इत्यादि।’’ जब मेरे जाने का निश्चित हो गया तब मैंने पुनः मुनिश्री अजितसागर से अनुनय-विनय करके संघ में रहने का अनुरोध किया क्योंकि अब मैं अनुशासन तो नहीं कर सकती थी, मात्र विनय से ही समझाने का प्रयास कर रही थी। मुनिपद आर्यिका से महान है, अपना शिष्य हो चाहे पुत्र, मुनिदीक्षा लेने के बाद बड़ी से बड़ी भी आर्यिकायें उन्हें उसी क्षण -नमोऽस्तु’ करती हैं अतः मैं भी बहुत ही विनय से उन्हें नमस्कार करती थी। जब मुनिश्री ने किसी की भी नहीं मानी और जाने का विचार नहीं बदला तब मैंने कहा- ‘‘महाराजजी! यदि आप संघ से पृथक विहार कर जायेंगे तो पुनः संघ में वापस न आने तक मैं अपने स्वास्थ्य के लिए औषधिस्वरूप ऐसे तक्र (मट्ठा) का ही त्याग कर दूँगी।’’ क्योंकि साधुओं के पास आहार के सिवाय भला अन्य वस्तु है ही क्या? इतना सुनकर मुनिराज बोले-

‘‘माताजी! मैं वापस आने के लिए नहीं जाऊँगा, जाकर पुनः आने की क्या बात?.....।’’ तब मैंने कहा-‘‘महाराजजी! तब तो जीवन भर के लिए ही मेरा तक्र का त्याग हो जावेगा.....।’’ बात आई गई हो गई और सम्मेदशिखर यात्रा हेतु मेरे विहार का निर्णय आ गया।