ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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038.छठॉ अधिकार - चार प्रकार के कषाय वाले

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छठॉ अधिकार - चार प्रकार के कषाय '

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अथ कषायमार्गणाधिकार:

अथ स्थलद्वयेन चतुर्भि: सूत्रै कषायमार्गणानाम षष्ठोऽधिकार: प्रारभ्यते।

तत्र प्रथमस्थले चतु:कषायसहितानां सामान्यलक्षणगुणस्थानप्रतिपादनार्थं ‘‘कसाया’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तदनु द्वितीयस्थले कषायरहितानां व्यवस्थाप्रतिपादनत्वेन एकं सूत्रमिति समुदायपातनिका।
अधुना कषायमार्गणानिरूपणाय सूत्रमवतरति-

कसायाणुवादेण अत्थि कोधकसाई माणकसाई मायाकसाई लोभकसाई अकसाई चेदि।।१११।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कषायानुवादेन क्रोधकषायी मानकषायी मायाकषायी लोभकषायी अकषायी न सन्तीति। अस्मिन् सूत्रे कषायिसामान्येन एकत्वाद् बहूनामपि एकवचनं घटते। अथवा न इदमेकवचनं ‘एए सोहंति सिही णच्चंता गिरिवरस्स सिहरम्मि’ एते शोभन्ते शिखी नृत्यन् गिरिवरस्य शिखरे इत्येवमादिबहुत्वेऽपि एवंविधरूपोपलंभात् अनेकान्तात्।
अथ स्यात्क्रोधकषाय: मानकषाय: इत्यादि वक्तव्यं, कषायेभ्यस्तद्वतां भेदात् इति ?
नैतत् वक्तव्यं, किंच जीवेभ्य: पृथक् क्रोधाद्यनुपलंभात्।
यदि तयोर्भेदाभाव: तर्हि कथं भिन्नस्तन्निर्देशो घटते इति चेत् ?
नैतत्, अनेकांते तदविरोधात्। शब्दनयाश्रयणे क्रोधकषाय: इति भवति, तस्य शब्दपृष्ठतोऽर्थ-प्रतिपत्तिप्रवणत्वात्। अर्थनयाश्रयणे क्रोधकषायीति स्यात्, शब्दतोऽर्थस्य भेदाभावात्। कषायिचातु-र्विध्यात्कषायस्य चातुर्विध्यमवगम्यते इति वा।
प्रसिद्धस्यानुवदनमनुवाद:। सिद्धासिद्धाश्रया हि कथामार्गा इति न्यायादनुवादोऽनर्थक:, अनधिगतार्थाधि-गन्तृत्वाभावाद्वा इति ?
नैतत्, प्रवाहरूपेणापौरुषेयत्वतस्तीर्थकृदादयोऽस्य व्याख्यातार एव न कर्तार: इति ज्ञापनार्थत्वात्१।
क: क्रोधकषाय: ?
रोष: आमर्ष: संरंभ:।
को मानकषाय: ?
रोषेण विद्यातपोजात्यादिमदेन वान्यस्य अनवनति:।
को मायाकषाय: ?
निकृतिर्वञ्चना मायाकषाय:।
को लोभकषाय: ?
गर्हा काङ्क्षा लोभ:।


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अथ कषायमार्गणा अधिकार

अब दो स्थलों में चार सूत्रों के द्वारा ‘‘कषायमार्गणा’’ नाम का छठा अधिकार प्रारंभ होता है। उसमें प्रथम स्थल में चारों कषाय सहित जीवों के सामान्य लक्षण तथा उनमें पाये जाने वाले गुणस्थानों के प्रतिपादन करने हेतु ‘‘कसाया’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं, तत्पश्चात् द्वितीय स्थल में कषाय रहित जीवों की व्यवस्था का कथन करने वाला एक सूत्र है, यह समुदायपातनिका हुई। अब कषायमार्गणा का निरूपण करने के लिए सूत्र का अवतार होता है-

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सूत्रार्थ

कषायमार्गणा के अनुवाद से क्रोध कषायी, मानकषायी, मायाकषायी, लोभकषायी और अकषायी जीव होते हैं।।१११।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका -कषायानुवाद से चारों कषाय वाले तथा कषाय रहित जीव होते हैं। इस सूत्र में कषायी सामान्य की अपेक्षा एक होने के कारण बहुत का भी एकवचन के द्वारा कथन बन जाता है। अथवा ‘‘कोधकसाई’’ इत्यादि पद एकवचन नहीं है, क्योंकि ‘‘एए सोहंति सिही णच्चंता गिरिवरस्स सिहरम्मि’’ अर्थात् ‘‘गिरिवर के शिखर पर नृत्य करते हुए ये मयूर शोभा पा रहे हैं।’’ इत्यादि प्रयोगों में बहुत्व की विवक्षा रहने पर भी इस प्रकार के रूपों की उपलब्धि होती है। इसलिए इस प्रकार के प्रयोगों में अनेकान्त समझना चाहिए।

शंका -सूत्र में क्रोधकषायी आदि के स्थान पर क्रोधकषाय, मानकषाय, मायाकषाय, लोभकषाय और अकषाय कहना चाहिए, क्योंकि कषायों से कषाय वालों में भेद पाया जाता है ?

समाधान -ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि जीवों से पृथक् क्रोधादि कषायें नहीं पाई जाती हैं।

शंका -यदि कषाय और कषायी इन दोनों में भेद नहीं है तो भिन्नरूप से उनका निर्देश कैसे बन सकता है ?

समाधान -ऐसा नहीं है क्योंकि अनेकांत में भिन्न निर्देश के बन जाने में कोई विरोध नहीं आता है। शब्द नय का आश्रय करने पर ‘‘क्रोध कषाय:’’ इत्यादि प्रयोग बन जाते हैं, क्योंकि शब्द नय शब्दानुसार अर्थज्ञान कराने में समर्थ है और अर्थनय का आश्रय करने पर ‘‘क्रोधकषायी’’ इत्यादि प्रयोग होते हैं, क्योंकि इस नय की दृष्टि में शब्द से अर्थ का कोई भेद नहीं है। कषायवान् जीव चार प्रकार के होते हैं इससे कषाय भी चार प्रकार की हैं ऐसा ज्ञान हो जाता है।

शंका -प्रसिद्ध अर्थ के अनुकूल कथन करने को अनुवाद कहते हैं। कथामार्ग अर्थात् कथन परम्पराएँ प्रसिद्ध और अप्रसिद्ध इन दोनों के आश्रय से प्रवृत्त होती हैं। इस न्याय के अनुसार यहाँ पर अनुवाद अर्थात् केवल प्रसिद्ध अर्थ का अनुकूल कथन करना निष्फल है इससे अनधिगत अर्थ का ज्ञान नहीं होता है ?

समाधान- ऐसा नहीं है क्योंकि यह कथन प्रवाहरूप से अपौरुषेय है। तीर्थंकर आदि इसके केवल व्याख्यान करने वाले ही हैं, कर्ता नहीं हैं इस बात का ज्ञान कराने के लिए अनुवाद पद का कथन अनर्थक नहीं है।

शंका -क्रोध कषाय किसे कहते हैं ?

समाधान -रोष, आमर्ष और संरम्भ इन सबको क्रोध कहते हैं।

शंका -मान कषाय किसे कहते हैं ?

समाधान- रोष से अथवा विद्या, तप और जाति आदि के मद से अन्य के प्रति नम्र न होने को मान कहते हैं।

शंका -माया कषाय किसे कहते हैं ?

समाधान- निकृति या वंचना को माया कषाय कहते हैं।

शंका -लोभ कषाय किसे कहते हैं ?

समाधान -गृद्धि या आकांक्षा को लोभ कहते हैं।

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उक्तं च-

सिल-पुढवि-भेद-धूली-जल-राई-समाणओ हवे कोहो।

णारय-तिरिय-णरामर-गईसु उप्पायओ कमसो।।
सेलट्ठि-कट्ठ वेत्तं णियभेएणणुहरंतओ माणो।
णारय-तिरिय-णरामर-गइ-विसयुप्पायओ कमसो।।
वेलुवमूलोरब्भय - सिंगे गोमुत्तएण खोरप्पे।
सरिसी माया णारय-तिरिय-णरामरेसु जणइ जिअ।।
किमिराय-चक्क-तणु-मल-हरिद्द-राएण सरिसओ लोहो।
णारय-तिरिक्ख-माणुस-देवेसुप्पायओ कमसो।।

शिलाभेदसमानोत्कृष्टशक्तिविशिष्टक्रोधकषाय: जीवं नरकगतावुत्पादयति। पृथ्वीभेदसमानानुत्कृष्ट-शक्तिविशिष्ट: क्रोध: तिर्यग्गतौ जीवमुत्पादयति। धूलीरेखासमानाजघन्यशक्तियुक्त: क्रोधो जीवं मनुष्यगतावुत्पादयति। जलरेखासमानजघन्यशक्तियुक्त: क्रोध: जीवं देवगतावुत्पादयति। तत्तच्छक्तियुक्त-क्रोधकषायपरिणतो जीव: तत्तद्गत्युत्पत्तिकारणतत्तदायुर्गत्यानुपूव्र्यादिप्रकृतीर्बध्नातीत्यर्थ:। अत्र राजिशब्दो रेखार्थवाची न तु पंक्तिवाची। यथा शिलादिभेदानां चिरतरचिरशीघ्रशीघ्रतरकालैर्विना अनुसंधानं न घटते तथोत्कृष्टादिशक्तियुक्तक्रोधपरिणतो जीवोऽपि तथाविधकालैर्विना क्षमालक्षणसंधानार्हो न स्यात् इत्युपमानोपमेययो: सादृश्यं संभवतीति तात्पर्यार्थ:।

शिलास्तम्भसमानोत्कृष्टशक्तियुक्तमानकषायो जीवं नारकगतावुत्पादयति। अस्थिसमानानुत्कृष्टशक्ति-युक्तमानकषायो जीवं तिर्यग्गतावुत्पादयति। काष्ठसमानाजघन्यशक्तियुक्तमानकषायो मनुष्यगतौ जीवमुत्पादयति। वेत्रसमानजघन्यशक्तियुक्तमानकषायो जीवं देवगतावुत्पादयति। यथा हि चिरतरादिकालैर्विना शैलास्थिकाष्ठवेत्रा: नामयितुं न शक्यन्ते तथोत्कृष्टादिशक्तिर्युक्तमानपरिणतो जीवोऽपि तथाविधकालैर्विना मानं परिहृत्य विनयरूपनमनं कर्तुं न शव्नतीति सादृश्यसंभवोऽत्र ज्ञातव्य:। तत्तच्छक्तियुक्तमानकषायपरिणतो जीव: तत्तद्गत्युत्पत्तिहेतुतत्तदायुर्गत्यानुपूर्वीनामादिकर्म बध्नातीति तात्पर्यम्।

वेणूपमूलं वेणुमूलग्रन्थि: तेन समानोत्कृष्टशक्तियुक्तमायाकषायो जीवं नरकगतौ निक्षिपति। उरभ्रक:-मेष:, तच्छृङ्गसदृशानुत्कृष्टशक्तियुक्तमायाकषाय: जीवं तिर्यग्गतौ निक्षिपति। गोमूत्रसमानाजघन्यशक्तियुक्त-मायाकषायो जीवं मनुष्यगतौ निक्षिपति। क्षुरप्रसमानजघन्यशक्तियुक्तमायाकषायो जीवं देवगतौ निक्षिपति यथा वेणूपमूलादय: चिरतरादिकालं विना स्वस्ववक्रतां परिहृत्य ऋजुत्वं न प्राप्नुवन्ति तथा जीवोऽपि उत्कृष्टादिशक्तियुक्तमायाकषायपरिणत: तथाविधकालैर्विना स्वस्ववक्रतां परिहृत्य ऋजुपरिणामो न स्यात् इति सादृश्यं युत्तं। तत्तदुत्कृष्टादिशक्तियुक्तमायाकषायपरिणतजीव: तत्तद्गतिक्षेपकारणं तत्तदायुर्गत्यानु-पूव्र्यादिकर्म बध्नाति। इति तात्पर्यार्थ:।

क्रिमिरागेण कंबलादिरञ्जनेन समानोत्कृष्टशक्तियुक्तलोभकषायो जीवं नारकगतौ उत्पादयति। चक्रमल:-रथाङ्गमल:, तेन समानानुत्कृष्टशक्तियुक्तलोभकषाय: जीवं तिर्यग्गतौ उत्पादयति। तनुमल: शरीरमल: बहिर्गत: जल्लमल्ल: तद्बन्धसदृशाजघन्यशक्तियुक्तलोभकषायो जीवं मनुष्यगतावुत्पादयति। हरिद्राराग: अङ्ग-वस्त्रादिरञ्जनद्रव्यराग:-तद्बन्धसदृशजघन्यशक्तियुक्तलोभकषायो जीवं मनुष्यगतावुत्पादयति। हरिद्रारागरू अङ्ग-वस्त्रादिरञ्जनद्रव्यराग:तद्बन्धसदृशजघन्यशक्तियुक्तलोभकषाय: जीवं देवगतावुत्पादयति। क्रिमिरागादि-सदृशतत्तदुत्कृष्टादिशक्तियुक्तलोभपरिणामेन परिणतो जीव: तन्नारकादिभवोत्पत्तिकारणतत्तदा-युर्गत्यानु-पूव्र्यादिकर्म बध्नातीति भावार्थ:।

नारकतिर्यग्नरसुरगत्युत्पन्नजीवस्य तद्भवप्रथमकाले-प्रथमसमये यथासंख्यं क्रोधमायामान-लोभकषायाणामुदय: स्यादिति नियमवचनं कषायप्राभृतद्वितीयसिद्धान्तव्याख्यातुर्यतिवृषभाचार्यस्य अभिप्रायमाश्रित्योक्तम्। वा-अथवा महाकर्मप्रकृतिप्राभृतप्रथमसिद्धान्तकर्तु: भूतबल्याचार्यस्य अभिप्रायेणाऽनियमो ज्ञातव्य:। प्रागुक्तनियमं विना यथासंभवं कषायोदयोऽस्तीत्यर्थ:। अपिशब्द: समुच्चयार्थ:, तत: कारणादुभयसंप्रदायोऽपि अस्माकं संशयादिरूढ एवास्ति एकतरावधारणे शक्तिरहितत्वात् अस्मिन् भरतक्षेत्रे केवलिद्वयाभावात् आरातीयाचार्याणामेतत् सिद्धान्तद्वयकर्तृभ्यो ज्ञानातिशयवत्वाभावात्। यद्यपि विदेहे गत्वा तीर्थंकरादिसन्निधौ कस्यचिदाचार्यस्य सकलश्रुतार्थेषु संशयविपर्यासानध्यवसायव्यवच्छेदेन वस्तुनिर्णयो भवेत् तदा सिद्धान्तद्वयकर्तृविप्रतिपत्तिस्तथैवास्तीति तत्प्रेक्षावान् क: शृद्दधीत ?

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कहा भी है-

गाथार्थ - क्रोधकषाय चार प्रकार का है-पत्थर की रेखा के समान, पृथिवी की रेखा के समान, धूलि रेखा के समान और जल रेखा के समान। ये चारों ही क्रोध क्रम से नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देवगति में उत्पन्न कराने वाले होते हैं।

मान चार प्रकार का है-पत्थर के समान, हड्डी के समान, काठ के समान तथा बेंत के समान। ये चार प्रकार के मान क्रम से नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देवगति के उत्पादक हैं।

माया चार प्रकार की है—बाँस की जड़ के समान, मेढ़े के सींग के समान, गोमूत्र के समान तथा खुरपा के समान। यह चार प्रकार की माया क्रम से जीव को नरक, तिर्यञ्च, मनुष्य तथा देवगति में ले जाती है।

लोभ कषाय चार प्रकार का है—क्रिमिराग के समान, चक्रमल के समान, शरीर के मल के समान और हल्दी के रंग के समान। यह क्रम से नरक, तिर्यंच, मनुष्य तथा देवगति का उत्पादक है।

शिलाभेद के समान उत्कृष्ट शक्ति से विशिष्ट क्रोध कषाय जीव को नरक गति में उत्पन्न कराती हैं। पृथ्वीभेद के समान अनुत्कृष्ट शक्ति से विशिष्ट क्रोध जीव को तिर्यंचगति में उत्पन्न कराता है। धूल की रेखा के समान अजघन्य शक्ति से युक्त क्रोध जीव को मनुष्यगति में उत्पन्न कराता है। जल में रेखा के समान जघन्य शक्ति से युक्त क्रोध जीव को देवगति में उत्पन्न कराता है। इसका अभिप्राय यह है कि उस-उस शक्ति से युक्त क्रोध कषायरूप से परिणत जीव उस-उस गति में उत्पत्ति में कारण, उस-उस आयु, गति, आनुपूर्वी आदि प्रकृतियों को बांधता है। यहाँ गाथा में आया ‘राजि’ शब्द का अर्थ रेखा लेना चाहिए, पंक्ति नहीं। जैसे शिला आदि में पड़ी दरार अतिचिरकाल, चिरकाल, शीघ्र और अतिशीघ्र कालों के बिना भरती नहीं है वैसे ही उत्कृष्ट आदि शक्ति से युक्त क्रोधरूप से परिणत जीव भी उस प्रकार के काल के बिना क्षमा भाव धारण करने के योग्य नहीं होता है। इस प्रकार उपमान और उपमेय में समानता बनती है।

पत्थर के स्तम्भ के समान उत्कृष्ट शक्ति से युक्त मानकषाय जीव को नरक गति में उत्पन्न कराती है। अस्थि के समान अनुत्कृष्ट शक्ति से युक्त मानकषाय जीव को तिर्यंचगति में उत्पन्न कराती है। काष्ठ के समान अजघन्य शक्ति से युक्त मानकषाय जीव को मनुष्यगति में उत्पन्न कराती है। बेंत के समान जघन्य शक्ति से युक्त मानकषाय जीव को देवगति में उत्पन्न कराती है। जैसे चिरतर आदि समय के बिना पत्थर, हड्डी, काठ और बेंत को नमाना (मोड़ना) शक्य नहीं है वैसे ही उत्कृष्ट आदि शक्ति से युक्त मानकषायरूप से परिणत जीव भी उस प्रकार के कालों के बिना मान को त्यागकर विनयरूप नमन करने में समर्थ नहीं होता है इस प्रकार समानता जानना। इसका आशय यह है कि उस-उस शक्ति से युक्त मानकषायरूप परिणत जीव उस-उस गति में उत्पत्ति के कारण उस-उस गति, आयु और आनुपूर्वी नामकर्म का बंध करता है।

बाँस की जड़ के समान उत्कृष्ट शक्ति से युक्त माया कषाय जीव को नरकगति में उत्पन्न कराती है। मेढ़े के सींग के समान अनुत्कृष्ट शक्ति से युक्त माया कषाय जीव को तिर्यंचगति में उत्पन्न कराती है। गोमूत्र के समान अजघन्य शक्ति से युक्त माया कषाय जीव को मनुष्यगति में उत्पन्न कराती है तथा खुरपे के समान जघन्य शक्ति से युक्त माया कषाय जीव को देवगति में उत्पन्न कराती है। जैसे बाँस की जड़ वगैरह चिरतर आदि कालों के बिना अपने-अपने टेढ़ेपने को छोड़कर सरलता से सीधेपने को प्राप्त नहीं होते, वैसे ही उत्कृष्ट आदि शक्ति से युक्त माया कषायरूप परिणत जीव भी उस प्रकार के कालों के बिना अपनी वक्रता को छोड़कर सरल परिणामी नहीं होता। इस प्रकार समानता योग्य है। इसका आशय यह है कि उस-उस उत्कृष्ट आदि शक्ति से युक्त माया कषायरूप परिणत जीव उस-उस गति में ले जाने में निमित्त, उस-उस आयु, गति और आनुपूर्वी आदि कर्मों को बांधता है।

कृमिराग जिससे कम्बल आदि रंगे जाते हैं, उसके समान उत्कृष्ट शक्ति से युक्त लोभकषाय जीव को नरकगति में उत्पन्न कराती है। चक्रमल अर्थात् रथ के पहिये की औंगन के समान अनुत्कृष्ट शक्ति से युक्त लोभकषाय जीव को तिर्यंचगति में उत्पन्न कराती है। शरीर के बाह्य मैल के समान अजघन्य शक्ति से युक्त लोभकषाय जीव को मनुष्यगति में उत्पन्न कराती है। हल्दी के रंग के समान जघन्य शक्ति से युक्त लोभकषाय जीव को देवगति में उत्पन्न कराती है। इसका भावार्थ यह है कि कृमिराग आदि के समान उस-उस उत्कृष्ट आदि शक्ति से युक्त लोभ परिणाम से परिणत जीव उस-उस नारक आदि भवों में उत्पत्ति के कारण उस-उस आयु, गति, आनुपूर्वी आदि कर्मों का बंध करता है।

नरकगति, तिर्यंचगति, मनुष्यगति और देवगति में उत्पन्न हुए जीव के जन्म लेने के प्रथम समय में क्रम से क्रोध, माया, मान और लोभ कषाय का उदय होता है, इस नियम का कथन कषायप्राभृत नामक द्वितीय सिद्धान्त ग्रंथ के व्याख्याता आचार्य यतिवृषभ के अभिप्राय को लेकर किया है। अथवा महाकर्म प्रकृति प्राभृत नामक प्रथम सिद्धान्त ग्रंथ के रचयिता आचार्य भूतबली के अभिप्राय से अनियम जानना। अर्थात् पूर्वोक्त नियम के बिना यथायोग्य कषाय का उदय होता है। ‘अपि’ शब्द समुच्चय के लिए है। इसलिए दोनों ही आचार्यों के अभिप्राय हमारे लिए सन्देहास्पद हैं, दोनों में से किसी एक को मान्य करने की शक्ति हमारे में नहीं है क्योंकि इस भरत क्षेत्र में केवली, श्रुतकेवली का अभाव है तथा आरातीय आचार्यों में दोनों सिद्धान्तों के रचयिताओं से अधिक ज्ञान नहीं है। यद्यपि विदेह में जाकर तीर्थंकर आदि के निकट में कोई आचार्य समस्त श्रुत के अर्थ के विषय में संशय, विपर्यय और अनध्यवसाय को दूर करके वस्तु का निर्णय कर सकते हैं तथापि सिद्धान्तद्वय के कत्र्ताओं में जो विवाद है उसके संबंध में ‘‘यही ठीक है’’ ऐसा कौन बुद्धिशील श्रद्धान करेगा। अत: दोनों मतों का कथन किया है।

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कषायशब्दस्य कोऽर्थ: ?

सुहदुक्खसुबहुसस्सं, कम्मक्खेत्तं कसेदि जीवस्स।

संसारदूरमेरं, तेण कसाओ त्ति णं वेंति।।
सुखदु:खसुबहुसस्यं-सुखदु:खानि इंद्रियविषयसंबंधसमुद्भव-हर्षशरीरमानस-परितापरूपाणि सुबहूनि बहुप्रकाराणि सस्यानि धान्यानि यस्मिन् भवन्ति तत्सुखदु:ख-सुबहुसस्यं, कर्मक्षेत्रं-ज्ञानावरणादिमूलोत्तरोत्तर-प्रकृतिभेदभिन्नशुभाशुभकर्मरूपक्षेत्रं सस्याधिकरणं भूतलं कृषति विलिखते जीवस्य संसारिण:, तेन कारणेन इमं क्रोधादिजीवपरिणामं कषाय: इति ब्रुवन्ति श्रीवर्धमानभट्टारकीया गौतमगणधरदेवादय: कथयन्ति। किंविशिष्टं एतत्कर्मक्षेत्रं ? संसारदूरमर्यादं-अनाद्यनिधन द्रव्यक्षेत्रकालभवभावानन्तपरिवर्तनरूपसीमानु-बद्धमित्यर्थ:। अत्र कृषि विलेखने इत्यस्य धातोर्विलेखनार्थं गृहीत्वा निरुक्तिपूर्वकंकषायशब्दस्यार्थनिरूपणं आचार्येण कृतम्।
कषायानां कार्याणि भेदान् च प्ररूपयति-
सम्मत्तदेससयलचरित्तजहक्खाद-चरणपरिणामे।
घादंति वा कसाया चउसोल असंखलोगमिदा।।

अनंतानुबंधिकषाया: आत्मन: सम्यक्त्वपरिणामं कषन्ति अनंतसंसारकारणत्वात् अनंतं-मिथ्यात्वं, अनंतभवसंस्कारकालं वा अनुबध्नन्ति सुघटयन्ति इति अनंतानुबंधिन:। अप्रत्याख्यानावरणा: अणुव्रतपरिणामं कषन्ति। अप्रत्याख्यानं-ईषत्प्रत्याख्यानं अणुव्रतं आवृण्वन्ति घ्नन्ति इति। प्रत्याख्यानावरणा: सकलचारित्रं महाव्रतपरिणामं कषन्ति। प्रत्याख्यानं-सकलसंयमं आवृण्वन्ति इति। सं-समीचीनं, विशुद्धं संयमं यथाख्यातचारित्रनामधेयं ज्वलन्ति दहन्ति इति संज्वलना:, ते कषाया: यथाख्यातचारित्रपरिणामं कषन्ति, इति एतदुदये सत्यपि सामायिकादीतरसंयमाविरोध: सिद्ध:।

एवंविध: कषाय: सामान्येन एक:, विशेषविवक्षायां तु अनन्तानुबंध्यादिभेदात् चत्वार:, पुनस्ते चत्वारोऽपि प्रत्येकं क्रोधमानमायालोभा: इति षोडश। पुन: सर्वेऽपि उदयस्थानविशेषापेक्षया असंख्यात-लोकप्रमिता: भवन्ति।
एवंविधकषायसहिता: जीवा सकषाया: भवन्ति।
सकलकषायाभावोऽकषाय:। कषायरहिता जीवा सन्तीति।
उक्तं च-
अप्पपरोभय-बाधण-बंधासंजम-णिमित्तकोहादी।
जेसिं णत्थि कसाया अमला अकसाइणो जीवा।।
स्वस्मिन् परस्मिन् उभयस्मिन् इति स्थानत्रयेऽपि प्रत्येकं बाधनबंधनासंयमानां त्रयाणामपि निमित्तभूता: क्रोधादय: कषाया:, पुंवेदादयो नोकषायाश्च येषां जीवानां न सन्ति ते अकषाया:, अमला-द्रव्यभावनोकर्म-मलरहिता: सिद्धपरमेष्ठिन: सन्तीति ज्ञातव्यं।
कस्यचित् जीवस्य क्रोधादिकषाय: स्वस्यैव बंधनहेतु: स्वशिरोऽभिघातादिबाधाहेतु: हिंसाद्यसंयमहेतुश्च भवति। कस्यचित् जीवस्य क्रोधादिकषाय: परस्यैव स्वशत्रु-आदेर्बाधनबन्धनासंयमहेतुर्भवति। कस्यचित् कामुकादिजीवस्य क्रोधादिकषाय: स्वपरयोरपि यथासंभवं बाधनबंधनासंयमहेतुर्भवति इति विभाग: लोकानुसारेण आगमानुसारेण च द्रष्टव्य:।

अधुना कषायाणां गुणस्थानव्यवस्थानिरूपणार्थं सूत्रावतारो भवति-

कोधकसाई माणकसाई मायाकसाई एइंदिय-प्पहुडि जाव अणियट्टि त्ति।।११२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-क्रोधकषायी मानकषायी मायाकषायी इमे त्रिविधकषायसहिता: जीवा: एकेन्द्रियादारभ्य यावत्-अनिवृत्तिकरणगुणस्थानपर्यन्ता: भवन्तीति।
यतीनामपूर्वकरणादीनां कथं कषायास्तित्वमिति चेत् ?
न, अव्यक्तकषायापेक्षया तथोपदेशात्।
लोभकषायाणां गुणस्थानव्यवस्थाप्रतिपादनार्थं सूत्रावतारो भवति-
लोभकसाई एइंदिय-प्पहुडि जाव सुहुम-सांपराइय-सुद्धि-संजदा त्ति।।११३।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-लोभकषायी-लोभकषायसहिता जीवा: एकेन्द्रियादारभ्य यावत् सूक्ष्मसांपराय-शुद्धिसंयता: इति। शेषकषायोदयविनाशे लोभकषायस्य विनाशानुपपत्ते: लोभकषायस्य सूक्ष्मसांपरायोऽवधि: इति ज्ञातव्यं।
एवं प्रथमस्थले कषायसहितजीवानां गुणस्थानव्यवस्थापनत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
संप्रति अकषायजीवानां गुणस्थानप्रतिपादनार्थं सूत्रमवतरति-

अकसाई चदुसु ट्ठाणेसु अत्थि उवसंतकसाय-वीयराय-छदुमत्था खीणकसाय-वीयराय-छदुमत्था सजोगिकेवली अजोगिकेवली त्ति।।११४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अकषायिणो जीवा: चतुर्षु गुणस्थानेषु सन्ति उपशांतकषायवीतरागछद्मस्था: क्षीणकषायवीतरागछद्मस्था: सयोगिकेवलिन: अयोगिकेवलिन: इति। उपशान्तकषायस्य साधो: कथं अकषायत्वं ? द्रव्यकषायस्यानन्तस्य सत्त्वात् ?
नैतत् वक्तव्यं, कषायोदयाभावापेक्षया तस्योपशांतकषायस्य अकषायत्वोपपत्ते:।
गत्यादिमार्गणायां कषायस्य कथनं किं न क्रियते ?
नैतत्, विशेषाभावतोऽनेनैव गतार्थत्वात् नात्र प्रतन्यते।
एवंविधेन कषायमार्गणायां सामान्यकषायभेदान् तेषु गुणस्थानव्यवस्थां द्वितीयस्थले अकषायाणां च प्रतिपादनमुख्यत्वेन चत्वारि सूत्राणि गतानि।
इति षट्खण्डागमप्रथमखंडे गणिनीज्ञानमतीकृतसिद्धान्तचिंतामणि-
टीकायां कषायमार्गणानाम षष्ठोऽधिकार: समाप्त:।

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कषाय शब्द का क्या अर्थ है ?

गाथार्थ-जीव के सुख-दु:ख आदि रूप अनेक प्रकार के धान्य को उत्पन्न करने वाले तथा जिसकी संसार रूप मर्यादा अत्यन्त दूर है, ऐसे कर्मरूपी क्षेत्र (खेत) का यह कर्षण करता है, इसलिए इसको कषाय कहते हैं।

इन्द्रिय विषयों के संबंधों से उत्पन्न जो सुख-दु:ख अर्थात् शारीरिक और मानसिक प्रसन्नता अथवा शारीरिक-मानस परितापरूप बहुत प्रकार के धान्य जिसमें उत्पन्न होते हैं तथा ज्ञानावरणादि मूलप्रकृति और उत्तरप्रकृति के भेद से भिन्न शुभ-अशुभ कर्मरूप क्षेत्र को अर्थात् धान पैदा होने की भूमि को यह कृषति अर्थात् जोतती है इस कारण से इन क्रोधादिरूप जीव परिणाम को वर्धमान भट्टारक के गणधर देव श्री गौतम स्वामी आदि ‘कषाय’ कहते हैं। ऐसा कर्मरूपी खेत किस प्रकार का होता है ?

वह कर्मरूपी खेत अनादि अनिधन पंचपरावर्तनरूप सीमा से अनुबद्ध है ऐसा अर्थ है। यहाँ ‘‘कृषि विलेखने’’ धातु का ‘‘जोतना’’ यह अर्थ लेकर आचार्य ने निरुक्तिपूर्वक ‘‘कषाय’’ शब्द का अर्थ कहा है।

कषायों के कार्य और भेदोें का प्ररूपण करते हैं-

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गाथार्थ-

जो सम्यक्त्व, देशचारित्र, सकलचारित्र और यथाख्यातचारित्ररूप आत्मा के विशुद्ध परिणामों को ‘‘कषति’’ अर्थात् घातते हैं उन्हें कषाय कहते हैं। इसके चार, सोलह अथवा असंख्यात लोकप्रमाण भेद हैं।

अनन्तानुबंधी कषायें आत्मा के सम्यक्त्व परिणाम को घातती हैं क्योंकि अनन्त संसार का कारण होने से अनन्त—मिथ्यात्व या अनन्त भव के संस्कार काल को बांधती हैं इसलिए उसे अनन्तानुबंधी कहते हैं।

अप्रत्याख्यानावरण कषाय अणुव्रत परिणामों को घातती है। अप्रत्याख्यान अर्थात् ईषत् प्रत्याख्यान यानी अणुव्रत को आवृण्वन्ति—घातती है ऐसा अर्थ हुआ।

प्रत्याख्यानावरण सकल चारित्र महाव्रतरूप परिणामों का घात करता है क्योंकि प्रत्याख्यान का अर्थ है-सकलसंयम को प्रगट न होने देना।

सं का अर्थ है—समीचीन अर्थात् विशुद्ध संयम यथाख्यातचारित्र को जो जलाती है वह संज्वलन है। वे संज्वलन कषायें यथाख्यात चारित्ररूप परिणाम का घात करती हैं, इसलिए उसके उदय रहने पर भी सामायिक आदि अन्य संयमों के होने में कोई विरोध नहीं आता है, यह सिद्ध हो जाता है।

इस प्रकार सामान्य से कषाय एक है, विशेष विवक्षा में अनन्तानुबंधी आदि से उसके चार भेद हो जाते हैं, पुन: वे चारों भी प्रत्येक के क्रोध-मान-माया-लोभ ये चार-चार भेद होने से सोलह हो जाती हैं। पुन: वे सभी कषायें नाना प्राणियों में उदयस्थान की अपेक्षा असंख्यात लोकप्रमाण हो जाती हैं।

इस प्रकार की कषायों से सहित जीव सकषायी कहलाते हैं।

सम्पूर्ण कषाय भावों से रहित जीव अकषायी होते हैं—कषायरहित होते हैं। कहा भी है—

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गाथार्थ

-जिनके स्वयं अपने को, दूसरे को तथा दोनों को बाधा देने, बंध करने और असंयम करने में निमित्तभूत क्रोधादि कषाय नहीं है तथा जो बाह्य और अभ्यन्तर मल से रहित हैं ऐसे जीवों को अकषायी कहते हैं।।

अपने, दूसरे और दोनों के बंधन, बाधा तथा असंयम में निमित्तभूत क्रोधादि कषाय और पुरुषवेद आदि नोकषाय जिन जीवों के नहीं हैं वे द्रव्यकर्म, भावकर्म और नोकर्मरूप मल से रहित सिद्धपरमेष्ठी अकषाय—कषायरहित हैं ऐसा जानना चाहिए। किसी जीव की क्रोधादि कषायें अपने ही बंधन का हेतु हैं, अपने मस्तक के अभिघात आदि बाधा में हेतु और हिंसा आदि असंयम में हेतु होती हैं। किसी जीव की क्रोधादि कषाय दूसरे अपने शत्रु आदि के बंधन, बाधा तथा असंयम में हेतु होती हैं। किसी कामुक आदि जीव को क्रोधादि कषाय तथा यथासंभव अपने और दूसरों के बंधन, बाधन और असंयम में हेतु होती है। इस प्रकार का विभाग लोकानुसार और आगमानुसार जानना चाहिए।

अब कषायमार्गणा में गुणस्थान व्यवस्था का निरूपण करने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

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सूत्रार्