ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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039.आर्यिका संघ आगरा में

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आर्यिका संघ आगरा में

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आगरा- मथुरा से निकल कर विहार करते हुए मैं आगरा पहुँची, वहाँ पर छीपीटोला वालों के आग्रह से छीपीटोला ही ठहरी। २-४ दिन में कुछ मंदिरों के दर्शन किये। यहाँ बाजार के बीच सभा में पांडाल बनाया गया था, वहाँ एक आर्यिका का केशलोच कराया। जैन जैनेत्तर बहुत प्रभावित हुए। उपदेश सुनकर आगरा के भिन्न-भिन्न जगह के लोगों ने बहुत आग्रह किया कि ‘‘माताजी! आप यहाँ कम से कम एक महीना ठहरें’’ किन्तु मेरा लक्ष्य यात्रा का बन चुका था अतः कहीं ठहरने का विचार ही नहीं था।

यहाँ आगरा में एक दिन एक विद्वान् महानुभाव बोले- ‘‘माताजी! जब साधु-साध्वियाँ घर छोड़कर दीक्षा ले लेते हैं तो पुनः संघ क्यों इकट्ठा करते हैं? अरे! एक घर छोड़ा और दूसरा बसा लिया, यह भला कहाँ की बुद्धिमानी है? मैंने कहा-पंडितजी! संघ बनाये बगैर मोक्षमार्ग भला कैसे चलेगा? देखो, संघ में शिष्यों का संग्रह करने के लिए और उन पर अनुग्रह करने के लिए श्रीकुन्दकुन्ददेव ने भी कहा है-


दंसणणाणुवदेसो सिस्सग्गहणं च पोसणं तेसिं।

चरिया हि सरागाणं जिणिंदपूजोवदेसो य।।२४८।।

सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान का उपदेश देना, शिष्यों का संग्रह करना और उनका पोषण करना तथा जिनेन्द्रदेव की पूजा का उपदेश देना, यह सब सरागचारित्री मनुष्यों की चर्या है। टीकाकार ने कहा है-‘‘रत्नत्रयाराधनाशिक्षाशीलानां शिष्याणां ग्रहणं स्वीकार-स्तेषामेव पोषणमशनपानादिचिंता।’’ रत्नत्रय आराधना की शिक्षा को ग्रहण करने वाले ऐसे शिष्यों को संघ में रखना और उनके आहार आदि की चिंता करना आदि ये सब आचार्यों के कर्तव्य हैं। इस प्रवचनसार के प्रमाण को सुनकर वे बहुत ही प्रसन्न हुए पुनः उन्होंने और भी शंकाएँ कीं, जिनका समाधान आगमप्रमाण सहित मैंने दे दिया। ‘‘यह गाथा मुझे क्षुल्लिका अवस्था से ही याद थी कि जब मैंने प्रवचनसार का स्वाध्याय किया था पुनः यही गाथा रैनवाल में आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज के समय जब चर्चा में आई तब से तो मेरे हृदय-पटल पर अंकित ही हो गई है। बात यह थी कि एक दिन मध्यान्ह में कुछ संघस्थ-साधु-साध्वियों के मध्य चर्चा चल रही थी कि मुनियों को श्रावकों के लिए भगवान की पूजा का उपदेश नहीं देना चाहिए क्योंकि पूजा की सामग्री तैयार करने में और पूजा करने में आरंभ होता है।’’ इस विषय को क्षुल्लक चिदानन्दसागरजी अधिक खींच रहे थे चूँकि दीक्षा के पूर्व ये सुधारक विचाराधारा के थे, सो अभी भी उनके संस्कार गये नहीं थे। उस समय संघ में एक पार्श्वमती माताजी थीं जो कि आचार्यकल्प चन्द्रसागरजी की शिष्या थीं (ये अभी मौजूद हैं) उन्होंने कहा-

‘‘मेरे गुरु श्रीचन्द्रसागरजी महाराज सदा ही हाथ में ‘भावसंग्रह’ ग्रंथ रखते थे और श्रावकों की सभा में दान-पूजा का ही विशेष उपदेश दिया करते थे.....’’ किन्तु वे बेचारी कुछ प्रमाण न दे पार्इं और दुःखी होने लगीं। बात बढ़ती गई, कुछ निष्कर्ष नहीं निकल पाया कि अकस्मात् मेरे मस्तिष्क में यह गाथा आ गई, मैंने प्रवचनसार लाकर दिखाया तब सभी साधु आश्चर्यचकित होकर बोले- ‘‘अरे! हम लोगों ने भी तो प्रवचनसार का स्वाध्याय किया है, इस गाथा पर लक्ष्य क्यों नहीं गया था? यह तो बहुत ही महत्त्वपूर्ण गाथा है। इसमें बहुत ही स्पष्ट लिखा है कि सरागचर्या वाले-शुभोपयोगी मुनि ‘जिनेन्द्रदेव की पूजा का उपदेश’ दे सकते हैं जब तक संघ में शिष्यों का संंग्रह-अनुग्रह करना होता है तब तक दान-पूजा का उपदेश भी देना चाहिए, कोई बाधा नहीं है।’’

पुनः क्षुल्लक चिदानन्दसागरजी आचार्यवर्य श्रीवीरसागरजी के पास पहुँचे और प्रश्नोत्तर की बातें सुनकर आचार्यदेव को यह गाथा दिखाकर बोले- ‘‘महाराजजी! आपकी क्या आज्ञा है?’’ आचार्य महाराज बोले-‘‘जो आगम में लिखा है, उससे अधिक हम क्या बोलेंगे.....? चन्द्रसागरजी महाराज गलत नहीं थे, वे आगम के अनुकूल ही उपदेश करते थे.....।’’ आचार्य महाराज के मुख से ऐसे शब्द सुनकर आर्यिका पार्श्वमतीजी भी बहुत ही प्रसन्न हुर्इं और मुझसे बोलीं- ‘‘ज्ञानमतीजी! तुम शंका - समाधान में शास्त्रप्रमाण जरूर दिखाया करो। देखो! हमें तो इतना ज्ञान है नहीं कि जो कुछ प्रमाण दिखा सकें, हम लोग तो, ‘‘गुरु के वचन ही शास्त्र हैं’’ ऐसा मान लेते हैं.....।’’ उनके ये वचन आज भी हमें कितने अच्छे लगते हैं कि मुनि श्रीचन्द्रसागरजी के वचन ही शास्त्र हैं। वास्तव में वे महामुनि शास्त्र के अनुकूल ही उपदेश करते थे, सिंहवृत्ति के साधु थे तभी सुधारक विद्वान और श्रावक उनसे घबराते रहते थे।

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एत्मादपुर-

वहाँ से विहार करते हुए हमें एत्मादपुर पहुँचना था। प्रातः नवम्बर-दिसम्बर की ठंड में कुहरा पड़ रहा था। रास्ते में ही बारिश आ गई। इतनी भयंकर ठण्ड में गीले वस्त्र पहिने हुए जैसे-तैसे ७-८ मील का रास्ता पार कर हम लोग एत्मादपुर मंदिर में पहुँचे। श्रावकों ने अच्छी भक्ति की। यहाँ पर संघस्थ लोगों ने हम लोगों की साड़ियाँ धोकर रखी थीं। वे सूखी नहीं थीं अतः आहार के समय उन्हीं गीली साड़ियों को पहन कर आहार को उठना पड़ा।

कुछ बाईयाँ जो दर्शनार्थ आई थीं, वे कहने लगीं- ‘‘अरे! मैं नई साड़ी मंगाये देती हूँ, माताजी इन्हें बदल दो। कई घंटे गीली साड़ी पहनकर आप लोग बीमार पड़ जावोगी।’’ मैंने कहा-‘‘बाई! नयी साड़ियाँ भी तो धोकर सुखानी पड़ेंगी। हम लोग नया- कोरा वस्त्र बिना धोये नहीं पहनती हैं।’’ तब उन महिलाओें ने समझाना शुरू किया- ‘‘माताजी! ऐसे-ऐसे प्रसंगों के लिए तीसरी साड़ी रखना चाहिए।’’ मैंने कहा-‘‘शास्त्र में आर्यिकाओं के लिए तीसरी साड़ी का विधान नहीं है, दो ही साड़ियाँ बतायी हैं। यथा-


‘वस्त्रयुग्मं सुबीभत्सलिंगप्रच्छादनाय च।

आर्याणां संकल्पेन तृतीये मूलमिष्यते।।

आर्यिकाओं को दो साड़ी अपने शरीर को ढकने के लिए ग्रहण करना होता है, यदि तीसरी साड़ी रखती हैं तो उन्हें उन्हें प्रायश्चित्त का भागी माना गया है। इस नियम के अनुसार आर्यिकायें दो साड़ी रखती हैं, फिर भी एक साथ में एक ही पहनती हैं। दूसरे दिन दूसरी बदल लेती हैं। यदि कदाचित् विशेष बीमारी आदि में कोई संघस्थ ब्रह्मचारिणी अपने पास एक नई साड़ी धोकर रखे और प्रसंगोपात्त बदला दे, तो चल भी सकता है किन्तु यह उत्सर्ग (उत्तम) मार्ग नहीं है।

हम सभी आर्यिकाएँ उस समय लगातार कई दिनों तक कुहरा, ओस, वर्षा, बूँदें, ठंडी हवा को झेलती हुयी चलती रहीं। क्रम से फिरोजाबाद पहुँचीं किन्तु कोई बीमार नहीं पड़ीं। उस समय मेरी उम्र २८ वर्ष की थी। उस ठंडी में अयोध्या तक लगभग हम लोगों ने चलायी की है।

इधर कई वर्षाें में जरा सी हवा लग जाने से जुकाम, नजला, खांसी आदि प्रकोप शुरू हो जाते हैं। सन् १९७० से जुकाम होकर लगभग मुझे तीन वर्ष तक परेशान करता रहा था। इन दिनों मैं कई बार सोचा करती हूँ कि-

‘‘शक्ति, संहनन, देश, काल और वातावरण से भावों में परिवर्तन आता ही है और कर्मनिर्जरा में अंतर पड़ता ही है। अब आज यदि मैं ऐसी सर्दी झेलने की कोशिश करूँ तो सारा शरीर ही अकड़ जाये और पता नहीं कुछ व्याधि प्रकोप होकर असमाधि ही हो जाये। उस समय शरीर में शक्ति होने से सहनशीलता थी। आज कितना ही सोचो, शरीर जवाब दे देता है अतः यह कहना पड़ता है- ‘‘समय एव करोति बलाबलं’’

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फिरोजाबाद-

फिरोजाबाद एक दिन बाद पहुँचना था। मार्ग में सेठ छिदामीलालजी एक दो महानुभावों के साथ आये। रास्ते में कार रोकी, उतरे और विनय से दर्शन किया। मैंने भी नाम पूछा-उन्होंने बताया। अनंतर उन्होंने पूछा-‘‘आप किसके संघ की हैं?’’

मैंने कहा -‘‘आचार्यश्री वीरसागरजी की शिष्या हूँ, उन्हीं के संघ के पट्टाधीश आचार्यश्री शिवसागरजी के संघ से निकलकर अब यात्रा के लिए जा रही हूँ।’’ रास्ता चलते हुए किंचित् पीछे होकर इन लोगों ने आपस में कुछ चर्चा की और पुनः आगे बढ़कर नमस्कार करके वापस चले गये। इसके बाद पुनः आगरे वालों की सूचना के अनुसार फिरोजाबाद के दो-चार श्रावक और आ गये। उन्होंने नमस्कार कर सारी बातें समझीं और ‘‘शहर में बाहुबलि मंदिर में आपके लिए व्यवस्था की है’’ ऐसा बोले। इसी बीच संघस्थ एक आर्यिका ने छिदामीलाल सेठजी के आने का और समाचार सुना दिया। तब उसमें से एक श्रावक ने हंसकर कहा-

‘‘माताजी! आप की गुरुपरंपरा सुनकर शायद ये चमक गये होंगे। आपकी गुरुपरंपरा में शूद्र जल त्याग कराकर आहार लेना और अंतर्जातीय विवाह वालों के यहाँ आहार नहीं लेना, ऐसी व्यवस्थायें हैंं अतः इन्होंने अपने यहाँ मंदिर में ठहराने के लिए नहीं सोचा होगा। चूंकि इन्होंने जानबूझ कर सुधारक होने के नाते अपने पुत्र का अंतर्जातीय विवाह कर लिया है। ये पल्लीवाल हैं और अग्रवाल की पुत्री से पुत्र का विवाह किया है......।’’

खैर! इन बातों को सुनकर मुझे सन् १९५३ की बात याद आ गई, जब आचार्यश्री देशभूषणजी महाराज यहाँ आये थे। तब इन श्रीमान सेठजी ने आचार्यश्री का बहुत बड़े समारोह से स्वागत किया था और साथ में कुछ दूर पैदल भी चले थे। लोगों ने कहा- ‘‘शायद उस समय इनके यहाँ यह अंतर्जातीय संबंध नहीं हुआ था।’’ अगले दिन मैं फिरोजाबाद पहुँची, वहाँ भी ४-५ दिन ठहरी। इन छिदामीलालजी के विशाल जिनमंदिर का भी दर्शन किया। यहाँ प्रतिदिन मेरा उपदेश हुआ पुनः यहाँ से विहार कर भयंकर सर्दी की भी परवाह न करते हुए मैं शिकोहाबाद, कन्नौज, मैनपुरी आदि होते हुए कानपुर आ गई। संघ फिरोजाबाद तक आया ही था कि कुछ लोगों से पता चला-

‘‘मुनिश्री अजितसागरजी आचार्यसंघ से अलग होकर जयपुर के एक मंदिर में ठहरे हुए हैं।’’ मुझे बहुत ही दुःख हुआ। अपने वचन के अनुसार मैंने तक्र का त्याग कर दिया। संघ यहाँ से विहार करते हुए कुछ दिनों में कानपुर आ गया। उन दिनों पेट की गड़बड़ी से तक्र ही मेरे लिए औषधि था, कुछ स्वास्थ्य गिरते देखकर संघस्थ साध्वियों और ब्रह्मचारी-ब्रह्मचारिणियों को चिंता होने लगी, तभी आर्यिका आदिमती ने मेरे से तक्र लेने का बहुत आग्रह किया किन्तु जब मैंने नहीं लिया तब उन्होंने भी अन्न का त्याग कर दिया और बोली-

‘‘माताजी! तक्र ही आपके स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ी औषधि है अतः जब तक आप तक्र नहीं लेंगी मैं भी अन्न नहीं लूँगी।’’ इधर ब्र. सुगनचंद और प्रकाशचंद को इस तरह त्याग की बात मालूम होने से वे मेरे पास आकर बहुत कुछ अनुनय-विनय करने लगे, तब मैंने कहा कि- ‘‘जब तक मुनिश्री अजितसागर जी आचार्यसंघ में नहीं पहुँचेंगे, तब तक मैं तक्र नहीं ले सकती हूँ।’’

तब इन दोनों ने जयपुर में पं. इन्द्रलालजी शास्त्री और श्रेष्ठी रामचंद्रजी कोठारी को पत्र दिया तथा सेठ हीरालालजी को भी निवाई गाँव में पत्र डाल दिया। पत्रों द्वारा विगत समाचार जानकर ये लोग ब्र. श्रीलाडमलजी को साथ लेकर मुनिश्री के पास मंदिर जी में पहुँचे और सारी बातें सुना दीं। महाराजजी ने विचार किया और उठकर खड़े होकर बोले- ‘‘चलो, मैं आचार्यसंघ में चलता हूँ। मैं आर्यिका ज्ञानमती माताजी का आग्रह नहीं टाल सकता हूँ, वे मेरी माँ हैं.......।’’ इतना कहकर उन्होंने आचार्यसंघ की ओर विहार कर दिया और संघ में पहुँच गये तब उधर से पं. इन्द्रलालजी शास्त्री का पत्र आया कि- ‘‘पूज्य माताजी! अब आप अपना नियम पूरा करके आहार में तक्र लेना शुरू करें, आपके पुरुषार्थ से मुनिश्री अजितसागरजी आचार्यसंघ में पहुँच गये हैं। हम लोगों को प्रसन्नता है कि आप संघस्थ मुनि-आर्यिकाओं का कितना हित चाहती हैं......इत्यादि।’’

मैं तो सोचती हूँ कि यह पूज्य अजितसागर महाराज की महानता ही थी जो उन्होंने मुनि होकर भी मेरी इतनी बात मानी थी। पत्र सुनकर मुझे भी बहुत ही प्रसन्नता हुई और अगले दिन ही मैंने अपना नियम पूरा करके आहार में तक्र ले लिया, तभी आर्यिका आदिमती ने भी आहार में अन्न ग्रहण किया। संघ में सबको बहुत ही प्रसन्नता हुई। आगे संघ सहित विहार करके मैं लखनऊ आ गई।

आज मुझे लिखते हुए अतीव प्रसन्नता है कि उस समय सन् १९६२ में आचार्यसंघ मेंं प्रवेश करने के बाद आचार्यश्री शिवसागरजी के जीवित रहने तक सन् १९६९ तक ये मुनिश्री अजितसागर जी संघ में ही रहे हैं। बाद में आचार्यश्री शिवसागर जी की समाधि के पश्चात् मुनिश्री श्रुतसागरजी के साथ जयपुर से अलग हुए हैं।

इसी प्रकार गिरनार क्षेत्र की यात्रा करके वापस आते समय मुनिश्री श्रुतसागर महाराजजी संघ से अलग हो रहे थे, तब मैंने वापस संघ में न आने तक ‘नमक’ का त्याग कर दिया था। इसके बाद वे संघ से अलग विहार कर दो घंटे बाद ही वापस आ गये थे और बोले थे कि- ‘‘माताजी! अब आपका नमक का त्याग पूरा हो गया, अब मैंने नियम ले लिया है कि आचार्य संघ से कभी भी अलग नहीं होउँगा।’’

वे मुनिश्री श्रुतसागरजी भी आचार्य शिवसागरजी की समाधि के बाद ही सन् १९६९ में मुनिश्री अजितसागर आदि मुनि-आर्यिकाओं को लेकर संघ से पृथक हुए थे। उन दिनों जो मेरा संघ के मुनि-आर्यिकाओं के प्रति वात्सल्य भाव था और साधु-साध्वियाँ जो मेरी बात मानते थे, इन प्रसंगों में आचार्यश्री शिवसागर जी भी कितना मेरा गौरव करते थे? उन सब बातों का स्मरण करते ही मन पुलकित हो उठता है। इसमें मैं अपना पूर्व पुण्य, आगमानुकूल चर्या, परामर्श एवं मार्गदर्शन ही कारण समझती हूँ। मेरी जो संघ के प्रति एकसूत्र में बंधे रहने की भावना थी, वह गुरुदेव आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज के उपदेश का ही प्रभाव था, गुरुदेव हमेशा कहा करते थे कि- ‘‘सुई का काम करो, कैची का नहीं-देखो! सुई जोड़ती है और कैची काटती है अतः सुई के समान संघ में साधु-साध्वियाँ एक-दूसरे को जोड़ने का-संघ में रहने का और रखने का प्रयास करो, अलग करने का नहीं।’’

इसी प्रकार मूलाचार के पढ़ने-पढ़ाने से भी श्रीकुन्दकुन्ददेव की गाथायें मस्तिष्क में हमेशा घूमा करती थीं और आज भी घूूमती ही रहती हैं तथा खास करके यह पंक्ति तो विशेष ही स्मरण में आती रहती है कि- ‘‘मा भूद मे सत्तु एगागी’’ अर्थात् मेरा शत्रु भी मुनि एकल विहारी न होवे। इसके बाद मैं विहार करते हुए लखनऊ आ गई, यहाँ डालीगंज में ठहर गई। आर्यिका दीक्षा में संघ सहित मुझे देखकर और मेरा उपदेश सुनकर लखनऊ के लोग बहुत ही प्रसन्न हुए। मैंने यहाँ से विहार कर नौराही के दर्शन किये पुनः अयोध्या पहुँच गई।