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पू० गणिनी श्रीज्ञानमती माताजी ससंघ मांगीतुंगी के (ऋषभदेव पुरम्) में विराजमान हैं |

039.जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर चातुर्मास-सन् १९९५

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जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर चातुर्मास-सन् १९९५

समाहित विषयवस्तु

१. बीस माह पश्चात् माताजी का शुभागमन।

२. चातुर्मास की स्थापना।

३. माताजी द्वारा केशलुंचन।

४. केशलुंचन का उद्देश्य।

५. पर्यूषण पर्व का आगमन।

६. धर्म की परिभाषा।

७. माताजी के प्रवचन-दशधर्म।

८. माताजी के प्रवचन-तत्त्वार्थसूत्र।

९. तत्त्वार्थसूत्र की विषयवस्तु।

१०. अनेक सामयिक पर्वों का आयोजन।

११. मांगीतुंगी पधारने का निमंत्रण।

१२. जम्बूद्वीप महोत्सव-१९९५।

१३. ज्ञानमती साहित्य संगोष्ठी।

१४. अ.भा.दिगम्बर जैन युवा परिषद का अधिवेशन।

१५. माताजी की जन्मजयंति।

१६. समयसार उत्तराद्र्ध की टीका का विमोचन।

१७. णमोकार बैंक का उद्घाटन।

१८. डॉ.अनुपम जैन गणिनी आर्यिका ज्ञानमती पुरस्कार से अलंकृत।

१९. चातुर्मास निष्ठापन एवं विहार।

२०. मवाना में इंद्रध्वज विधान, चंदनामती के प्रवचन।

२१. पुन: हस्तिनापुर-कार्तिक मेले में बहार।

२२. मांगीतुंगी यात्रा की घोषणा।

२३. मांगीतुंगी का परिचय।

२४. संघ सहित विहार।

२५. संघ विहार की शोभा।

२६. मार्ग में नगर-ग्राम-एवं संत समागम।

२७. मांगीतुंगी पंचकल्याणक समिति में ब्र.रवीन्द्र कुमार जी अध्यक्ष एवं पन्नालाल पापड़ीवाल महामंत्री पद प्राप्त।

२८. इंदौर गोम्मटगिरि में आयोजन।

२९. सनावद में णमोकार धाम का निर्माण।

३०. पावागिरि ऊन में स्वर्णभद्र आदि ४ मुनियों के चरणों की स्थापना।

३१. संघ मांगीतुंगी पहुँचा।

३२. विहार काल में माताजी के उपदेश।

३३. माताजी के प्रभाव से मांगीतुंगी में जल समस्या हल हुई।

३४. मांगीतुंगी में श्रावण सा सुहाना मौसम।

३५. भक्तों का आगमन।

३६. पंचकल्याणक सम्पन्न।

३७. मंत्रों का अद्भुत प्रभाव।

३८. मुनिसुव्रतनाथ अभिषेक के साथ पंचकल्याणक समाप्त।

३९. अगला चातुर्मास मांगीतुंगी में हो।

काव्य पद

बीस माह तक कर प्रभावना, संघ हस्तिनापुर आया।

माताजी की पद-रज पाकर, जन-जन अतिशय हर्षाया।।
जम्बूद्वीप बिना माताजी, लगता सबको वीराना।
रोम-रोम खिल उठा भूमि का, लख माँ का वापस आना।।१०३२।।

हुआ व्यवस्थित संघ पूर्णत:, स्वाध्याय का क्रम जारी।
दैनिक चर्या-अध्ययन-पाठन, भजन-आरती सुखकारी।।
धीरे-धीरे कदम बढ़ाता, माह जुलाई आया है।
माताजी के चतुर्मास को, मन सबका ललचाया है।।१०३३।।

त्रिलोक शोध संस्थान सदस्यों, पदाधिकारियों ने मिलकर।
किया निवेदन दिल्ली-मेरठ, उत्तरअंचल ने आकर।।
धर्मपिपासू चातक हैं हम, दो-क वर्ष से बाँधे आस।
प्यास बुझाएँ धर्मामृत से, दें पिंचानवै चातुर्मास।।१०३४।।

करुणा कलित हृदय माताजी, कुछ क्षण सोच-विचार किया।
देख स्वपर कल्याण आपश्री, चतुर्मास स्वीकार किया।।
एकादश जुलाई पिंचानवै, आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशी।
चातुर्मास किया स्थापित, भक्तिपाठ-सह माताजी।।१०३५।।

चातुर्मास दिवस स्थापन, हुआ विरागमय आयोजन।
पूज्य आर्यिका ज्ञानमती ने, किया स्वहस्त केशलुंचन।।
तृणवत् केश उखाड़ आपने, पूर्व संकल्प किया उपवास।
धर्म अहिंसा पालन करना, केशलुंच का मकसद खास।।१०३६।।

स्वावलम्ब का पाठ पढ़ाता, जीव सुरक्षा रहता ध्यान।
रहे देह संस्कार उपेक्षा, तन-भव-भोग विरक्ति प्रधान।।
पंचेन्द्रिय-मन हाथ-पैर का, जब हो जाता है मुंडन।
तदनंतर एकादश क्रम पर, करता साधु केशलुंचन।।१०३७।।

पर्वराज पर्यूषण आया, दशलक्षण का लेकर हार।
पूज्य आर्यिका ज्ञानमती ने, दिया सकल प्रवचन उपहार।।
उत्तम सुखे धरति स: धर्म:, यह व्युत्पत्ति धर्म रही।
जो दुख से सुख में पहुँचा दे, परिभाषा यह धर्म कही।।१०३८।।

परम पूज्य श्रीमाताजी की, भाव व्यंजना सहज-सरल।
दशधर्मों का सार बताया, माताजी प्रतिदिन अविरल।।
पाप-कषायों को तजकर हम, पा सकते हैं आत्म स्वभाव।
इनके कारण ही यह चेतन, करता रहता राग-विभाव।।१०३९।।

उत्तम क्षमा-मार्दव-आर्जव, सत्य-शौच-संयम-तप-त्याग।
आकिंचन-ब्रह्मचर्य-धरम दश, पालन करते जो बड़भाग।।
वे निश्चित ही कर्म क्षपण कर, जा विराजते मोक्ष सदन।
दृढ़ प्रतिज्ञ हो करें सभी हम, इनका भलीभाँति पालन।।१०४०।।

क्षमा आत्मा का स्वभाव है, जीवन में उपयोग करें।
क्रोध-बैर को त्याग निराकुल, होने का उद्योग करें।।
क्रोध आग है इसमें जलकर, बड़े-बड़े भी खाक हुए।
इसके कारण मुनि द्वीपायन, अतिशय ही दुख भाक् हुए।।१०४१।।

मान महाविष कभी न करना, यहाँ न कोई नित्य-अटल।
हर पदार्थ नश्वर-क्षणभंगुर, सपने नभ के मेघमहल।।
जिसने मान किया पछताया, हो घमण्ड का नीचा सर।
अत: मान्यवर! मार्दव पालो, करके त्याग मान सत्वर।।१०४२।।

धर्म आर्जव कहता हमसे, कपट नहीं करना भाई।
जिसने कपट किया जीवन में, उसने ही दुर्गति पाई।।
मन हो सरल, वचन हों मीठे, कार्य प्रशंसित जग द्वारा।
माया अर्गल बन्द किये है, हमको कर्म कठिन कारा।।१०४३।।

सत्य धर्म का प्राण कहा है, सत्य देवता धर्मसदन।
बिना सत्य के निष्फल है सब, कितना कर लो ईश भजन।।
सत्य अहिंसा में बसता है, दया सभी धर्मों का सार।
धर्म एक है परम अहिंसा, शेष अन्य उसका विस्तार।।१०४४।।

लोभ मृत्यु का आमंत्रण है, लोभ जीव का शत्रु महान।
सर्व दु:ख भंडार लोभ है, है संतोष सुखों की खान।।
अंतर-बाहर हो पवित्रता, होता वहीं शौच का वास।
जिसका मन होता पवित्र है, है ईश्वर का वहीं निवास।।१०४५।।

संयम माने आत्मनियंत्रण, तन-मन को वश में करना।
संयम बिना असंभव ही है, भव सुदीर्घ सागर तरना।।
भव सागर से पार उतरने, संयम है उत्तम नौका।
दुर्गति त्याग सुगति पाने का, मानव भव सुंदर मौका।१०४६।।

धर्म कल्पतरु क्षमा मूल है, मार्दव है स्कंध सबल।
आर्जव शाखा, सत्य पत्र हैं, उत्तम शौच धर्म है जल।।
उत्तम संयम-तपस्त्याग के, खिले हुए हैं पुष्प विकल।
आकिंचन-ब्रह्मचर्य मंजरी, स्वर्ग मोक्ष हैं उत्तम फल।।१०४७।।

कार्य सिद्ध होते उद्यम से, नहीं मनोरथ आते काम।
कर्मक्षपण-साधना करण, इसी क्रिया का तप है नाम।।
तक के बारह भेद बताये, अंतर-बाहर द्विविध प्रकार।
तप से केवलज्ञान प्राप्त हो, ज्ञान नष्ट करता संसार।।१०४८।।

तप कर वस्तु विकार छोड़ती, अत: त्याग है तप का फल।
बिना त्याग के सुख नहिं मिलता, तन-मन रहता सदा विकल।।
जिसने दिया उसी ने पाया, ऋतु बसंत प्रत्यक्ष प्रमाण।
पात्र त्रयों को रत्नत्रय का, देना उचित चतुर्विध दान।।१०४९।।

पूर्ण परिग्रह त्याग करें जो, सकलव्रती वे बड़भागी।
इंद्रिय वन में, मनमृग भटके, वश कर लेते गृहत्यागी।।
धर्म अकिंचन पाल तीर्थंकर, मोक्ष लक्ष्मी पाते हैं।
इससे कामविरागी मुनिवर, वंदनीय हो जाते हैं।।१०५०।।

मंदिर नहीं पूर्णता पाता, बिना शिखर-कलशारोहण।
धर्म कल्पतरु, फले मोक्षसुख, करके ब्रह्मचर्य पालन।।
बाहर विषयवासना त्यागो, भीतर डूबो आत्मगही।
निश्चित ही तुम पा जाओगे, स्वल्पकाल भवदधि का तीर।।१०५१।।

तत्त्वार्थसूत्र जिनवाणी-अमृत, जिसने इसका पान किया।
सफल किया अपना मानव भव, द्वादशांग को जान लिया।।
उमास्वामि आचार्यश्री ने, सप्ततत्त्व का वर्णन कर।
रत्नत्रयात्मक मोक्षमार्ग कह, प्राप्य कहा मोक्ष सुखकर।।१०५२।।

सूत्ररूप ग्रंथ की शैली, तत्त्वार्थसूत्र भी नाम अपर।
टीका-भाष्य लिखे बहुतों ने, किया न अक्षर इधर-उधर।।
अति प्रामाणिक ग्रंथराज यह, व्यापक ज्यों आकाश-अनंत।
गहरा जैसे महा महोदधि, पाया नहीं किसी ने अंत।।१०५३।।

जितनी गहरी पैठ लगाओ, उतना मिले रत्नभंडार।
सूक्ष्म है इतना, अणु है जितना, कूट भरा जिनवाणी सार।।
तीन-सत्तावन मणियों वाला, ग्रंथराज यह सुंदर हार।
जो इसको धारण करता है, शोभित होता सभी प्रकार।।१०५४।।

जो इसका पारायण करता, पा जाता उपवासी फल।
यदपि भव्य यह पीता रहता, जिनवाणी पीयूष सकल।।
प्रयोजनभूत सात तत्त्वों का, किया गया इसमें आख्यान।
इसके अध्ययन से मिल जाता, चतुरनुयोगी सम्यग्ज्ञान।।१०५५।।

पहले के अध्याय चार में, जीवतत्त्व का रहा कथन।
अजीव पाँचवें, आस्रव षट्-सत्, अष्टम बंध तत्त्व वर्णन।।
नवमें में है संवर-निर्जर, दसवें में है मोक्ष महल।
नौ तक वर्णित मोक्ष मार्ग है, दसमें वर्णित उसका फल।।१०५६।।

रहा काल का चक्र घूमता, आते रहे रात औ दिन।
मनी पुण्यतिथि शांतिसिंधु की, पर्व मना रक्षाबंधन।।
निर्वाणलाडू श्रेयांसनाथ जी, प्रज्ञाश्रमणी दीक्षा दिन।
मोतीसागर की जन्मजयंती, आये हर्ष-विरागी क्षण।।१०५७।।

मांगीतुुंगी सिद्धक्षेत्र से, प्राप्त निवेदन बारम्बार।
पूज्य आर्यिका ज्ञानमती जी, कार्य सम्हालें क्षेत्र पधार।।
वर्षों से हैं बंद पेटियाँ, आ खुलवायें आप श्री।
पंचकल्याणक-दिव्य शक्ति से, बनें प्रतिष्ठित प्रतिमाजी।।१०५८।।

सुना निवेदन माताजी ने, बारम्बार विचार किया।
सोचा मंजिल दूर बहुत है, अभी न मन स्वीकार किया।।
किन्तु भावना बीजरूप में, खोज रही उत्तम वातास।
काललब्धि के आ जाने पर, अंकुर छू लेते आकाश।।१०५९।।

जम्बूद्वीप महोत्सव बेला, पाँच वर्ष में आती है।
सर्वप्रथम झंडारोहण की, विधि पूरी की जाती है।।
नवनिर्मित श्री ॐ जिनालय, वासुपूज्य-शांतिजिन धाम।
वेदी प्रतिष्ठा सकल जिनालय, हुए विराजित श्री भगवान।।१०६०।।

ज्ञानमती साहित्य संगोष्ठी, हुई आयोजित इस ही काल।
अभिव्यक्ति देने को आये, शतकाधिक विद्वान् महान।।
अखिल भारतीय युवा परिषद का, सम्पन्न हुआ अधिवेशन आज।
एक हजार आठ कलशों से, गिरि अभिषेक शांति जिनराज।।१०६१।।

गणिनी ज्ञानमती माता की, जन्मजयंती मनी अभी।
समयसार उत्तराद्र्ध की टीका, हुई विमोचित समय तभी।।
सब मंत्रों में मंत्र महत्तम, णमोकार है मंत्र अमित।
णमोकार बैंक उद्घाटन, किया चौधरीसिंह अजित।।१०६२।।

जैसा नाम तथा गुणधारी, श्री डॉक्टर अनुपम जैन।
जैन गणित के विश्लेषण में, रही आपकी अनुपम देन।।
भद्रपुरुष हैं, सदा समर्पित, महा आराधक, सरस्वती।
हुये अलंकृत पुरस्कार से, गणिनी आर्यिका ज्ञानमती।।१०६३।।

काल शिशु ने दौड़ लगाकर, की स्पर्श समय सीमा।
किया निष्ठापन चतुर्मास का, पूज्य आर्यिका गणिनी माँ।।
महावीर के चरण कमल में, सभक्ति चढ़ा लाडू निर्वाण।
हुआ मवाना में आयोजित, श्री इंद्रध्वज महाविधान।।१०६४।।

पूज्य चंदनामती आर्यिका, अतिशायी प्रतिभा भंडार।
शुभाशीष-प्रवचन के द्वारा, माता किया महत् उपकार।।
आया संघ पुन: गजपुर में, कार्तिक मेला आई बहार।
जैनाजैन सकल नर-नारी, पधराये पच्चीस हजार।।१०६५।।

मंजिल दूर उन्हें लगती है, जिस मन दृढ़ संकल्प नहीं।
पर्वत शिखर इरादे चढ़ते, बढ़ जाते हैं कदम वहीं।।
पच्चीस नवम्बर सन् पिंचानवै, को आई वह महाघड़ी।
मांगीतुंगी शुभयात्रा की, करी घोषणा माताजी।।१०६६।।

जैन दिगम्बर अति ही पावन, मांगीतुुंगी क्षेत्र महान।
राम-हनू-सुग्रीव-नील-महा, अगणित मुनि पाया निर्वाण।।
श्री कृष्ण-बलराम बंधु द्वय, अंतकाल यहाँ पर आये।
आशंका लखकर अकाल की, भद्रबाहु-संघ पधराये।।१०६७।।

पर्वत एक, शिखर दो उसके, मांगी-तुंगी क्रमश: नाम।
करें वंदना भक्तिभाव से, मुनि-तीर्थंकर मूर्ति प्रणाम।।
दृढ़ संकल्प अगर हो मन में, हो जाता है कार्य सरल।
पूज्य आर्यिका ज्ञानमती का, बढ़ता गया संघ अविरल।।१०६८।।

पूज्य आर्यिका श्री चंदना, क्षुल्लक श्री मोतीसागर।
श्रद्धामती क्षुल्लिका संघ में, ब्रह्मचारी रविगुण आगर।।
ब्रह्मचारी श्रीचंद, कुमारी बीना-आस्था-अलका जी।
इन्दु-चंद्रिका-चलें संघ में, कुमारी श्री सारिका जी।।१०६९।।

गणिनी माता ज्ञानमती जी, करें गमन आगे-आगे।
श्वेत साटिका, पिछी-कमण्डलु, देख सकल श्रद्धा जागे।।
माताजी वंदामि तुमको, स्वर गूँजने लगता था।
ग्राम-नगर के आस-पास जब, संघ गुजरने लगता था।।१०७०।।

सकल संघ मिल धीरे-धीरे, पंक्तिबद्ध यों करे गमन।
भागीरथ के पीछे करती, जैसे गंगा अनुसरण।।
सुंदर दृश्य देख यों लगता, हंस उड़ रहे नील गगन।
लालायित रहती थीं आँखें, पुन:पुन: करने दर्शन।।१०७१।।

वँकरीली-पथरीली धरती, परमपूज्य माँ करें विहार।
काँटें अपना भाग्य सराहें, लता-वृक्ष मानें आभार।।
जहाँ चरण धरतीं माताजी, हो जाता था तीर्थ वहीं।
कहते लोग स्वर्ग से आये, भू ऐसे गुणवन्त नहीं।।१०७२।।

नगर मवाना-मेरठ-मोदी-गाजियाबाद हो प्रीतविहार।
संघ प्रविष्टा बाल-आश्रम, किया गया मंगल सत्कार।।
गजपुर से मांगीतुुंगी तक, बने संघपति जो श्रीमान्।
महावीर जी स्वीट बंगाली, उनका किया गया सम्मान।।१०७३।।

गणिनी आर्यिका ज्ञानमती जी, विद्यानंद आचार्यश्री।
अन्यप्रभावक साधुवृंद से, हुआ सु-मंगल मिलन तभी।।
आचार्यप्रवर श्री विद्यानंद ने, मंंगलकलश दिया माँ श्री।
पूर्ण सफल हो मांगी-तुंगी, मंगल यात्रा माता की।।१०७४।।

दिल्ली से मंगलविहार कर, पहुँचा संघ तिजारा जी।
चंद्रप्रभ के प्रथमबार ही, दर्श किए तब माताजी।।
अतिशय क्षेत्र तिजारा के जो, दर्शन करने आते हैं।
भूत-प्रेत-पैशाचिक बाधा, कष्ट सभी भग जाते हैं।।१०७५।।

माताजी के शुभागमन से, हुई क्षेत्र पर चहल-पहल।
आने लगे भक्त-यात्रीगण, बढ़ने लगी भीड़ प्रतिपल।।
पंचकल्याणक मांगी-तुंगी, हुई समिति का गठन यहाँ।
कर्मयोगी श्री रवीन्द्रकुमार को, चुना गया अध्यक्ष यहाँ।।१०७६।।

पापड़ीवाल श्री पन्नालाल को, महामंत्री पद सौंपा भार।
प्रीतिभोज यात्रा-कल्याणक, पूनमचंद किया स्वीकार।।
रचना श्री सम्मेदशिखर की, मंगल सन्निधि माताजी।
हुई भूमिपूजन विधिपूर्वक, हुआ यंत्र स्थापन भी।।१०७७।।

अतिशय क्षेत्र तिजारा जी से, महावीर जी पहुँचा संघ।
पायी यहीं क्षुल्लिका दीक्षा, स्मृत आये सकल प्रसंग।।
मंगल स्वागत हुआ संघ का, शांतिनाथ जी का अभिषेक।
मन्दारकल्पतरुवर स्थापना, गोम्मटगिरि कार्यक्रम एक।।१०७८।।

महावीर जी से विहार कर, संघ चमत्कारजी आया।
गिरि कैलाश की संरचना का, शिलान्यास यहाँ करवाया।।
संघ गया केशोरावपाटन, मुनिसुव्रत जिन दर्श किया।
दादावाड़ी कोटा में फिर, तीनलोक शिलान्यास हुआ।।१०७९।।

अतिशय क्षेत्र चाँदखेड़ी में, आदिनाथ प्रभु दर्श किया।
क्षेत्रझालरापाटन जाकर, शांतिनाथ अभिषेक हुआ।।
छब्बीस फरवरी सन् छियानवे, संघ पहुँचा सुसनेर नगर।
एक कुंवारी कन्या आई, हुई विरक्त प्रवचन सुनकर।।१०८०।।

आकर हुई संघ में शामिल, ज्ञान-ध्यान-तप-अपनाया।
रोके रुकी न घर में पल को, मात-पिता बहु समझाया।।
उपसर्ग भूमि भगवान वीर की, संघ पहुँचा उज्जैन शहर।
शिलान्यास कर तीर्थरूप का, गया संघ इंदौर नगर।।१०८१।।

माताजी के शुभागमन से, सब में छाया हर्ष अपार।
एक हजार आठ कलशों से, संघ हुआ मंगल सत्कार।।
माताजी से प्राप्त प्रेरणा, महिला संगठन जन्म लिया।
गोम्मटगिरि दशाब्दि महोत्सव, माँ सन्निधि सम्पन्न हुआ।।१०८२।

पूज्य आर्यिका ज्ञानमती जी, संघ सहित प्रस्थान किया।
सिद्धक्षेत्र सिद्धवर कूट , इक्कीस मार्च आगमन हुआ।।
रेवा-कावेरी नदियों का, संगम स्थल क्षेत्र महान।
दो चक्री, दस कामदेव मुनि, अगणित गये यहाँ निर्वाण।।१०८३।।

महावीर दिल्ली करकमलों, रचना तेरहद्वीप महान।
शिलान्यास सम्पन्न हुआ था, पूज्य आर्यिका संघ सन्निधान।।
पूज्य आर्यिका संघ यहाँ से, नगर सनावद किया प्रवास।
क्षुल्लक श्री मोतीसागर जी, पहले करते यहाँ निवास।।१०८४।।

गणिनी ज्ञानमती माता से, प्राप्त प्रेरणा श्री प्रकाश।
भूमिदान कर तीर्थ बनाया, माँ सन्निधि हुआ शिलान्यास।।
णमोकार धाम नामांकित, रूपाबाई-अमोलक चंद।
हुर्इं सम्मानित रजत प्रशस्ति, सबमें छाया हर्ष अमंद।।१०८५।।

पावागिरी-ऊन संघ पहुँचा, नगर सनावद किया विहार।
सिद्धक्षेत्र यह, मोक्ष पधारे, यहाँ से स्वर्णभद्र मुनि चार।।
माताजी ने करी प्रेरणा, हों स्थापित मुनि चरण।
करी तपस्या, कर्म नष्ट कर , किया यहाँ से मोक्ष गमन।।१०८६।।

महाराष्ट्र-दिल्ली-हरियाणा, यू.पी.-एम.पी.-राजस्थान।
षट् खण्डों में कर विहार फिर, संघ पहुँचा गंतव्य सुथान।।
सांभर दूर, सिमिरिया नियरी, सुनते आये मिथक कथन।
आज सत्य हो गया संघ का, हुआ मांगी-तुंगी शुभागमन।।१०८७।।

सर्दी-गर्मी गिनी न मावस, एक रहा चलना ही काम।
जिनको है मंजिल ही प्यारी, करते नहीं बीच विश्राम।।
पाँच माह में पदयात्रा कर, चले कि.मी. सोलह सौ बीस।
हर्ष-विषाद न आया मन में, जब आए क्षण सुख या टीस।।१०८८।।

जब उत्थान मार्ग में आया, संघ सविनय स्वीकार किया।
जब क्षण आये दु:ख-पीर के, समता रस का पान किया।।
परिषहजय करते क्रम-क्रम से, पहुँच गये मंजिल के तीर।
भूल गए सब मार्ग में आये, सुमन गंध काँटों की पीर।।१०८९।।

गजपुर से गिरि मांगीतुंगी, सोलह बीस किलोमीटर।
समतल-बीहड़-पर्वत आये, नदियाँ-कस्बे-ग्राम-नगर।।
गणिनी ज्ञानमती माता ने, सबको सद् उपदेश दिया।
दयाधर्म का मूल बताया, संयम पथ से जोड़ दिया।।१०९०।।

श्रावकजन षट्कर्म बताए, प्रमुख बताए पूजा-दान।
माताजी ने रत्नत्रय का, दिया सभी को सम्यग्ज्ञान।।
जैसे मेघ बरसते जाते, बढ़ते जाते हैं आगे।
वैसे संघ आर्यिकाजी से, भाग्य सभी के हैं जागे।।१०९१।।

जंगल-बीहड़-वन प्रदेश में, माताजी का संघ चला।
माँसाहारी जन सम्बोधे, त्याग कराया किया भला।।
सप्तव्यसन से मुक्ति दिलाकर, माँ सन्मार्ग दिखाया है।
जैसा पात्र नियम दें वैसा, यथायोग्य समझाया है।।१०९२।।

सच है सुमन जहाँ से निकले, निज सुगंध फैलाता है।
निम्बवृक्ष चंदन संगति से, खुद चंदन हो जाता है।।
माताजी का संघ जहाँ से, गुजरा आया वहीं सुकाल।
जीवनमैल धुला जीवों का, हुआ समुज्ज्वल, उन्नत भाल।।१०९३।।

मांगीतुंगी क्षेत्र वहाँ पर, फैला था विघ्नों का जाल।
जल जीवन की वहाँ समस्या, धारण रूप किए विकराल।।
माताजी आगमन पूर्व ही, बोरिंग से निकली जल धार।
मानों धरती चाह रही थी, माताजी के चरण पखार।।१०९४।।

जहाँ चरण पड़ते संतों के, आ जाता है वहाँ बसंत।
माताजी के शुभागमन से, हुआ यहाँ ताप का अंत।।
भारत का कोना-कोना जब, झेल रहा था ग्रीष्म तपन।
मांगी-तुंगी के मौसम में, अनुभव होता सावन तब।।१०९५।।

माताजी के शुभागमन से, सकलकार्य में गति आई।
त्रेपन वर्ष रुके मौसम में, चलने लग गई पुरवाई।।
जंगल बदल गया मंगल में, मांगी-तुंगी बदली काय।
भारत के पूरे अंचल से, आने लगे भक्त समुदाय।।१०९६।।

रत्नत्रय के मूर्तिमान त्रय, साधु संघ यहाँ पधराये।
रयणनिधि जी, ज्ञानमती जी, श्रेयांसमती के संघ आये।।
ब्रह्मचारी बाबा सूरजमल, प्रतिष्ठाचार्य सहयोगी गण।
सौधर्मादिक सब पात्रों का, हुआ समय पर शुभागमन।।१०९७।।

संघत्रय की मंगल सन्निधि, हुआ पताका आरोहण।
पता बताने लगी पताका, पंचकल्याण क्रिया शोभन।।
उन्निस से तेईस मई तक, सम्पन्न हुआ पंचकल्याण (क)।
उत्सव मध्य पधारे विद्वत्, राजनयिक प्रदेश प्रधान।।१०९८।।

अतिशय चमत्कार सम्पन्ना, माताजी व्यक्तित्व महान।
मंत्र जपन में अद्भुत शक्ति, होती है कहते विद्वान्।।
मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र के, चतुर्दिशा ओलावृष्टि।
लेकिन माँ के मंत्र जपन से, यहाँ रही शांत सृष्टि।।१०९९।।

मई तेईस ज्येष्ठ शुक्ला षट्, श्रीमुनिसुव्रत भगवान।
एक हजार आठ कलशों से, किया गया अभिषेक महान।।
हुआ समापन पंचकल्याणक, महाराष्ट्र बतलाई प्यास।
हे माताजी! हमें चाहिए, सन् छियानवे चातुर्मास।।११००।।

जैन समाज इंदौर सकल का, पहले ही प्रस्ताव रहा।
पौर्वापर्य विचार मातश्री, मांगीतुंगी ओर कहा।।
मिष्ठान्न बांट, घृत दीप जलाये, मेघदेवता हर्षाये।
मूसलधार हुई वर्षा से, प्रकृति गीत मंगल गाये।।११०१।।