ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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04.कथा और कथक के लक्षण

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कथा और कथक के लक्षण

बुद्धिमानों को इस कथारम्भ के पहले ही कथा, वक्ता और श्रोताओं के लक्षण अवश्य ही कहना चाहिए। मोक्ष पुरुषार्थ के उपयोगी होने से धर्म, अर्थ तथा काम का कथन करना कथा कहलाती है। जिसमें धर्म का विशेष निरूपण होता है उसे बुद्धिमान् पुरुष सत्कथा कहते हैं। धर्म के फलस्वरूप जिन अभ्युदयों की प्राप्ति होती है, उनमें अर्थ और काम भी मुख्य हैं अत: धर्म का फल दिखाने के लिए अर्थ और काम का वर्णन करना भी कथा कहलाती है। यदि यह अर्थ और काम की कथा धर्मकथा से रहित हो, तो विकथा ही कहलायेगी और मात्र पापास्रव का ही कारण होगी। जिससे जीवों को स्वर्ग आदि अभ्युदय तथा मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है, वास्तव में वही धर्म कहलाता है, उससे संबंध रखने वाली जो कथा है, उसे सद्धर्मकथा कहते हैं। सप्त ऋद्धियों से शोभायमान गणधरादि देवों ने इस सद्धर्मकथा के सात अंग कहे हैं। इन सात अङ्गों से भूषित तथा अलंकारों से सजी हुई कथा नटी के समान अत्यन्त सरस हो जाती है। द्रव्य, क्षेत्र, तीर्थ, काल, भाव, महाफल और प्रकृत ये सात अंग कहलाते हैं। ग्रंथ की आदि में इनका निरूपण अवश्य होना चाहिए।

जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल ये छह द्रव्य हैं। ऊध्र्व, मध्य और पाताल ये तीन लोक क्षेत्र हैं। जिनेन्द्रदेव का चरित्र ही तीर्थ है। भूत, भविष्यत् और वर्तमान यह तीन प्रकार का काल है। क्षायोपशमिक अथवा क्षायिक ये दो भाव हैं। तत्त्वज्ञान का होना फल कहलाता है और वर्णनीय कथावस्तु को प्रकृत कहते हैं। इस प्रकार ऊपर कहे हुए सात अंग जिस कथा में पाए जाएँ, उसे सत्कथा कहते हैं। इस ग्रंथ में भी अवसर के अनुसार इन अंगों का विस्तार दिखाया जाएगा।