ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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04.काय मार्गणा अधिकार

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काय मार्गणा अधिकार

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अथ कायमार्गणाधिकार:

अत्र त्रिभिरन्तरस्थलैः चतुर्विंशतिसूत्रैः कालानुगमे कायमार्गणानामतृतीयोऽधिकारः प्रारभ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले बादरस्थावरकायानां कालकथनमुख्यत्वेन ‘‘कायाणुवादेण’’ इत्यादि द्वादशसूत्राणि। तदनु द्वितीयस्थले सूक्ष्मस्थावरकायजीवानां स्थितिप्रतिपादनत्वेन ‘‘सुहुमपुढविकाइया’’ इत्यादिषट्सूत्राणि। तत्पश्चात् तृतीयस्थले त्रसकायिकानां कालनिरूपणत्वेन ‘‘तसकाइया’’ इत्यादिषट्सूत्राणि इति समुदायपातनिका कथिता भवति।
तत्रेदानीं बादरपृथिवीकायिकादिजीवानां सामान्येन कालप्रतिपादनाय सूत्रषट्कमवतार्यते-
कायाणुवादेण पुढविकाइया आउकाइया तेउकाइया वाउकाइया केवचिरं कालादो होंति ?।।७२।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।७३।।
उक्कस्सेण असंखेज्जा लोगा।।७४।।
बादरपुढवि-बादरआउ-बादरतेउ-बादरवाउ-बादरवणप्फदि पत्तेयसरीरा केवचिरं कालादो होंति ?।।७५।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।७६।।
उक्कस्सेण कम्मट्ठिदी।।७७।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-कायमार्गणायां पृथिवीकायिकादिचतुष्कानां उत्कर्षेण अनर्पितकायात् आगत्य अर्पितकाये समुत्पद्य असंख्यातलोकमात्रकालं तत्र परिवत्र्य निर्गते तदुपलंभात्। पुनश्च बादरपृथ्वी-बादरजल-बादराग्नि-बादरवायु-बादरवनस्पतिप्रत्येकशरीरजीवाः जघन्येन क्षुद्रभवग्रहणकालं। उत्कर्षेण-कर्मस्थितिप्रमाणं कालं। सूत्रे ‘कम्मट्ठिदि’ इति कथिते सप्ततिसागरोपमकोटाकोटिमात्रा गृहीतव्या कर्मविशेषस्थितिं मुक्त्वा कर्मसामान्यस्थितिग्रहणात्।
‘केचिदाचार्याः सप्ततिसागरोपमकोटाकोटिं आवलिकायाः असंख्यातभागेन गुणिते बादरपृथिवीकायि-कादीनां कायस्थितिर्भवति इति भणंति।’ तेषां कर्मस्थितिव्यपदेशः कार्ये कारणोपदेशात्।
इदं व्याख्यानमस्ति इति कथं ज्ञायते ?
कर्मस्थितिं आवलिकायाः असंख्यातभागेन गुणिते बादरस्थितिर्भवतीति परिकर्मवचनान्यथानुपपत्तेः। तत्र सामान्येन बादरस्थितिर्भवतीति यद्यपि उक्तं तर्हि अपि पृथिवीकायिकादीनां बादराणां प्रत्येककायस्थिति-र्गृहीतव्या, असंख्यातासंख्याता अवसर्पिण्युत्सर्पिण्यः संति इति सूत्रे बादरस्थितिप्ररूपणात्।
बादरपृथिवीकायिकादिबादरप्रत्येकवनस्पतिकायिकादीनां पर्याप्तापर्याप्तानां स्थितिप्रतिपादनाय सूत्रषट्-कमवतार्यते-
बादरपुढविकाइय-बादरआउकाइय-बादरतेउकाइय-बादरवाउकाइय-बादरवणप्फदिकाइयपत्तेयसरीरपज्जत्ता केवचिरं कालादो होंति ?।।७८।।
जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।७९।।
उक्कस्सेण संखेज्जाणि वाससहस्साणि।।८०।।
बादरपुढवि-बादरआउ-बादरतेउ-बादरवाउ-बादरवणप्फदिपत्तेय-सरीरअपज्जत्ता केवचिरं कालादो होंति ?।।८१।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।८२।।
उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं।।८३।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-बादरपृथिव्यादिजीवानां पर्याप्तानां उत्कर्षेण स्थितिरुच्यते। अविवक्षित-कायादागत्य बादरपृथ्वी-बादराप्-बादरतेजो-बादरवायु-बादरवनस्पतिप्रत्येकशरीरजीवेषु पर्याप्तकेषु यथाक्रमेण द्वाविंशतिवर्षसहस्र-सप्तवर्षसहस्र-त्रिदिवस-त्रिवर्षसहस्र-दशवर्षसहस्रायुष्केषु उत्पद्य संख्यातवर्षसहस्राणि तत्र स्थित्वा निर्गतस्य तदुपलंभात्।
येषामेवापर्याप्तानां जघन्येन क्षुद्रभवग्रहणं। उत्कर्षेण अंतर्मुहूर्तं इति कथितं।
एवं प्रथमस्थले सामान्य-स्थावराणां बादरस्थावराणां च कालकथनमुख्यत्वेन द्वादशसूत्राणि गतानि।
संप्रति सूक्ष्मस्थावरकायजीवानां स्थितिप्रतिपादनार्थं सूत्रमवतरति-
सुहुमपुढविकाइया सुहुमआउकाइया सुहुमतेउकाइया सुहुमवाउकाइया सुहुमवणप्फदिकाइया सुहुमणिगोदजीवा पज्जत्ता अपज्जत्ता सुहुमेइंदिय-पज्जत्त-अपज्जत्ताणं भंगो।।८४।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूक्ष्मैकेन्द्रियाणां एषां षण्णां सामान्येन जघन्यकालः क्षुद्रभवग्रहणकालमात्रं, उत्कृष्टकालः असंख्यातलोकप्रमाणं। एषां पर्याप्तानां जघन्योत्कृष्टकालोऽपि अंतर्मुहूर्तं, अपर्याप्तानां जघन्येन क्षुद्रभवग्रहणं उत्कर्षेण अंतर्मुहूर्तं।
कश्चिदाह-सूक्ष्मनिगोदग्रहणमनर्थकमस्मिन् सूत्रे, किंच-सूक्ष्मवनस्पतिकायिकग्रहणेनैव सिद्धेः। न च सूक्ष्मवनस्पतिकायिकव्यतिरिक्ताः सूक्ष्मनिगोदाः सन्ति, तथानुपलंभात्।
आचार्यःप्राह-नेदं युज्यते, यत्र सूत्रं नास्ति तत्राचार्यवचनानां व्याख्यानानां च प्रमाणत्वं भवति। यत्र पुनः जिनवचनविनिर्गतं सूत्रमस्ति न तत्र एतेषां प्रमाणत्वं। किंच-सूक्ष्मवनस्पतिकायिकान् भणित्वा सूक्ष्मनिगोद-जीवाः सूत्रे प्ररूपिताः, ततः एतेषां पृथक् प्ररूपणान्यथानुपपत्तेः। अतः सूक्ष्मवनस्पतिकायिक-सूक्ष्मनिगोदयोरस्ति विशेषः इति ज्ञायते ।
तात्पर्यमेतत्-सूक्ष्मवनस्पतिकायिकेभ्यः सूक्ष्मनिगोदजीवाः पृथक् संति इति एतस्मात् एव सूत्रात् ज्ञातव्यं भवति।
इदानीं वनस्पतिकायिकानां स्थितिनिरूपणाय सूत्रमवतरति-
वणप्फदिकाइया एइंदियाणं भंगो।।८५।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-वनस्पतिकायिकानां जघन्यकालः क्षुद्रभवग्रहणं उत्कृष्टकालः अनंतकालप्रमाणं असंख्यातपुद्गलपरिवर्तनं च भवति।

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अथ कायमार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब तीन अन्तर स्थलों में चौबीस सूत्रों के द्वारा कालानुगम में कायमार्गणा नाम का तृतीय अधिकार प्रारंभ हो रहा है। उनमें से प्रथम स्थल में बादर स्थावरकाय वाले जीवों के कालकथन की मुख्यता वाले ‘‘कायाणुवादेण’’ इत्यादि बारह सूत्र कहेंगे। पुन: द्वितीय स्थल में सूक्ष्मस्थावरकायिक जीवों की कालस्थिति का प्रतिपादन करने हेतु ‘‘सुहुमपुढविकाइया’’ इत्यादि छह सूत्र हैं। तत्पश्चात् तृतीय स्थल में त्रसकायिक जीवों का कालनिरूपण करने वाले ‘‘तसकाइया’’ इत्यादि छह सूत्र हैं, यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

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उनमें से यहाँ सर्वप्रथम बादर पृथिवीकायिक आदि जीवों का सामान्य से काल प्रतिपादन करने हेतु छह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

कायमार्गणानुसार जीव पृथिवीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक व वायुकायिक कितने काल तक रहते हैं ?।।७२।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहण काल तक जीव पृथिवीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक व वायुकायिक रहते हैं।।७३।।

उत्कृष्ट से असंख्यातलोक प्रमाण काल तक जीव पृथिवीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक व वायुकायिक रहते हैं।।७४।।

जीव बादर पृथिवीकायिक, बादर जलकायिक, बादर अग्निकायिक, बादर वायुकायिक व बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर वाले कितने काल तक रहते हैं ?।।७५।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहण काल तक जीव बादर पृथिवीकायादिक पूर्वोक्त पर्यायों में रहते हैं।।७६।।

उत्कृष्ट से कर्मस्थितिप्रमाण काल तक जीव बादर पृथिवीकायादिक पूर्वोक्त पर्यायों में रहते हैं।।७७।।

सद्धान्तचिंतामणिटीका-कायमार्गणा में पृथिवीकायिक आदि चार स्थावरकायिक जीवों का उत्कृष्ट से अविवक्षित काय से आकर और विवक्षित काय में उत्पन्न होकर असंख्यातलोकमात्र काल तक वहीं परिभ्रमण करके निकलने वाले जीव के सूत्र कथित काल पाया जाता है। पुन: बादर पृथ्वी, बादर जल, बादर अग्नि, बादर वायु, बादर वनस्पति, बादर वनस्पतिप्रत्येकशरीर धारण करने वाले जीवों का जघन्य से क्षुद्रभवग्रहण काल है। उत्कृष्ट से कर्मस्थिति प्रमाण काल है। सूत्र में ‘‘कर्मस्थिति’’ ऐसा कहने पर सत्तर सागरोपम कोडाकोड़ीप्रमाण काल का ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि कर्मविशेष की स्थिति को छोड़कर कर्मसामान्य की स्थिति का यहाँ ग्रहण किया गया है।

कितने आचार्य सत्तर सागरोपम कोड़ाकोड़ी को आवली के असंख्यातवें भाग से गुणा करने पर बादर पृथिवीकायिक जीवों की कायस्थिति का प्रमाण होता है ऐसा कहते हैं। किन्तु उनकी यह कर्मस्थिति यह संज्ञा कार्य में कारण के उपचार से सिद्ध होती है।

शंका-ऐसा व्याख्यान है, यह कैसे जाना जाता है ?

समाधान-‘कर्मस्थिति को आवली के असंख्यातवें भाग से गुणित करने पर बादर स्थिति होती है’ ऐसे परिकर्म के वचन की अन्यथा उपपत्ति नहीं बन सकती, इससे पूर्वोक्त व्याख्यान जाना जाता है। वहाँ पर यद्यपि सामान्य से ‘बादरस्थिति होती है’ ऐसा कहा है, तो भी पृथिवीकायिक बादर जीवों में प्रत्येक की कायस्थिति ग्रहण करनी चाहिए, क्योंकि सूत्र में बादरस्थिति का प्ररूपण असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी-उत्सर्पिणीप्रमाण किया गया है।

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अब बादरपृथिवीकायिक से लेकर बादरवनस्पतिकायिक पर्याप्त-अपर्याप्त जीवों की स्थिति बतलाने हेतु छह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

जीव बादर पृथिवीकायिक, बादर जलकायिक, बादर अग्निकायिक, बादर वायुकायिक व बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर पर्याप्त कितने काल तक रहते हैं ? ।।७८।।

जघन्य से अन्तर्मुहूर्त काल तक जीव बादर पृथिवीकायिक आदि पर्याप्त रहते हैं।।७९।।

उत्कृष्ट से संख्यात हजार वर्षों तक जीव बादर पृथिवीकायिक पर्याप्त रहते हैं।।८०।।

जीव बादर पृथिवीकायिक, बादर जलकायिक, बादर अग्निकायिक, बादरवायुकायिक, बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर अपर्याप्त कितने काल तक रहते हैं ?।।८१।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहण काल तक जीव बादर पृथिवीकायिक आदि अपर्याप्त रहते हैं।।८२।।

अधिक से अधिक अन्तर्मुहूर्त काल तक जीव बादर पृथिवीकायिक आदि अपर्याप्त रहते हैं।।८३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-बादरपृथिवीकायिक आदि पर्याप्तक जीवों की उत्कृष्ट स्थिति कहते हैं। अविवक्षित काय से आकर बादर पृथिवीकायिक बाइस हजार वर्ष, बादर जलकायिक जीव सात हजार वर्ष, बादर अग्निकायिक तीन दिन, बादर वायुकायिक तीन हजार वर्ष और बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर पर्याप्तक दस हजार वर्ष की आयु वाले जीवों में उत्पन्न होकर व संख्यात हजार वर्षों तक उसी पर्याय में रहकर निकलने वाले जीव के सूत्रोक्त प्रमाण काल पाया जाता है।

उन्हीं बादर पृथिवीकायिक आदि अपर्याप्त जीवों की जघन्य स्थिति क्षुद्रभवग्रहण है और उत्कृष्ट स्थिति अन्तर्मुहूर्त कही गई है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में सामान्य स्थावर जीवों का और बादर स्थावर जीवों का काल कथन करने वाले बारह सूत्र पूर्ण हुए।

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अब सूक्ष्मस्थावरकायिक जीवों की स्थिति का प्ररूपण करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

सूक्ष्म पृथिवीकायिक, सूक्ष्म जलकायिक, सूक्ष्म अग्निकायिक, सूक्ष्म वायुकायिक, सूक्ष्म वनस्पतिकायिक और सूक्ष्म निगोदजीव तथा इन्हीं के पर्याप्त व अपर्याप्त जीवों के काल का निरूपण क्रम से सूक्ष्म एकेन्द्रिय, सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्त व सूक्ष्म एकेन्द्रिय अपर्याप्तों के समान है।।८४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-जिस प्रकार सूक्ष्म एकेन्द्रिय छहों प्रकार के जीवों का सामान्य से जघन्य काल क्षुद्रभवग्रहणकालमात्र होता है और उत्कृष्टकाल असंख्यातलोकप्रमाण होता है, उसी प्रकार पर्याप्त जीवों का जघन्य और उत्कृष्टकाल भी अन्तर्मुहूर्त होता है। अपर्याप्त जीवों का जघन्य से क्षुद्रभवग्रहणकाल और उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त काल होता है।

यहाँ कोई शंका करता है-

सूत्र में सूक्ष्म निगोदियाजीवों का ग्रहण करना निरर्थक है, क्योंकि-सूक्ष्म वनस्पतिकायिक जीवों के ग्रहण से ही उनका ग्रहण सिद्ध है तथा सूक्ष्म वनस्पतिकायिक जीवों से भिन्न सूक्ष्म निगोदिया जीव नहीं हैं, क्योंकि वैसा पाया नहीं जाता है ?

आचार्य इसका समाधान देते हैं कि-यह शंका ठीक नहीं है, क्योंकि जहाँ सूत्र नहीं हैं वहाँ आचार्य वचनों की और व्याख्यानों की प्रमाणता होती है। किन्तु जहाँ जिन भगवान के मुख से निर्गत सूत्र हैं वहाँ इनकी प्रमाणता नहंी होती। चूँकि सूक्ष्म वनस्पतिकायिकों का पृथक् से कथन कर सूत्र में सूक्ष्म निगोदियाजीवों का निरूपण किया गया है, अत: इनके पृथक्प्ररूपण की अन्यथानुपपत्ति से सूक्ष्म वनस्पतिकायिक और सूक्ष्म निगोदिया जीवों में भेद है, यह विशेष जाना जाता है।

तात्पर्य यह है कि-सूक्ष्मवनस्पतिकायिक जीवों से सूक्ष्म निगोदिया जीव पृथक् हैं, ऐसा इसी सूत्र से जानना चाहिए।

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अब वनस्पतिकायिक जीवों की स्थिति का निरूपण करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

वनस्पतिकायिक जीवों के काल का कथन एकेन्द्रिय जीवों के समान है।।८५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-वनस्पतिकायिक जीवों का जघन्य काल क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण है, उत्कृष्टकाल अनंतकाल प्रमाण और असंख्यातपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण काल होता है।

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संप्रति निगोदजीवानां कालप्रतिपादनाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-

णिगोदजीवा केवचिरं कालादो होंति ?।।८६।।

जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।८७।।
उक्कस्सेण अड्ढाइज्जपोग्गलपरियट्ठं।।८८।।
बादरणिगोदजीवा बादरपुढविकाइयाणं भंगो।।८९।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थः सुगमोऽस्ति। उत्कर्षेण अनिगोदजीवस्य निगोदेषु उत्पन्नस्य सार्धद्वय-पुद्गलपरिवर्तनेभ्यः उपरि परिभ्रमणाभावात्। यथा बादरपृथ्वीकायिकानां जघन्यकालः क्षुद्रभवग्रहणमुत्कृष्टः कर्मस्थितिप्रमाणं, तथैव बादरनिगोदजीवानां जघन्यकालः क्षुद्रभवग्रहणं, उत्कृष्टः कर्मस्थितिः। बादरनिगोद-पर्याप्तानां उत्कृष्टकालः अंतर्मुहूर्तं। बादरनिगोदापर्याप्तानां जघन्यकालः क्षुद्रभवग्रहणमुत्कृष्टकालोऽन्तर्मुहूर्तं।
एवं द्वितीयस्थले सूक्ष्मपृथ्वीकायिकादीनां कालनिरूपणत्वेन षट्सूत्राणि गतानि।
त्रसकायिकानां कालप्रतिपादनाय सूत्रषट्कमवतार्यते-
तसकाइया तसकाइयपज्जत्ता केवचिरं कालादो होंति ?।।९०।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं अंतोमुहुत्तं।।९१।।
उक्कस्सेण बे सागरोवमसहस्साणि पुव्वकोडीपुधत्तेणब्भहियाणि बे सागरोवमसहस्साणि।।९२।।
तसकाइयअपज्जत्ता केवचिरं कालादो होंति ?।।९३।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।९४।।
उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं।।९५।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थः सुगमोऽस्ति। सामान्यत्रसकायिकानां पूर्वकोटिपृथक्त्वेनाधिक- द्विसागरोपमसहस्राणि। त्रसपर्याप्तानां द्विसहस्रसागरोपमानि चैव।
एवं तृतीयस्थले त्रसजीवानां कालप्रतिपादनत्वेन षट्सूत्राणि गतानि।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे एकजीवापेक्षया कालानुगमे
गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां काय-मार्गणानाम तृतीयोऽधिकारःसमाप्तः।

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अब निगोदिया जीवों का काल प्रतिपादन करने हेतु चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

निगोदिया जीव कितने काल तक रहते हैं ?।।८६।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहण काल तक निगोदिया जीव उस पर्याय में रहते हैं।।८७।।

उत्कृष्ट से अढ़ाई पुद्गलपरिवर्तनप्रमाण काल तक निगोदिया जीव उस पर्याय में रहते हैं।।८८।।

बादर निगोदियाजीवों का काल बादर पृथिवीकायिकों के समान है।।८९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त सूत्रों का अर्थ सुगम है। उत्कृष्ट से जो अनिगोद अर्थात् निगोदपर्याय से भिन्न जीव निगोद जीवों में उत्पन्न होता है उसका अढ़ाई पुद्गलपरिवर्तनों से ऊपर परिभ्रमण नहीं होता है। जिस प्रकार बादर पृथिवीकायिकों का जघन्यकाल क्षुद्रभवग्रहण और उत्कृष्टकाल कर्मस्थितिप्रमाण है, उसी प्रकार बादर निगोदजीवों का जघन्य काल क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण और उत्कृष्टकाल कर्मस्थिति प्रमाण होता है। बादर निगोद पर्याप्तों का उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त है। बादर निगोद अपर्याप्तकों का जघन्य काल क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण और उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त होता है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में सूक्ष्मपृथिवीकायिक आदि जीवों का काल निरूपण करने वाले छह सूत्र पूर्ण हुए।

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अब त्रसकायिक जीवों का काल प्रतिपादन करने हेतु छह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

जीव त्रसकायिक और त्रसकायिक पर्याप्त कितने काल तक रहते हैं ?।।९०।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहण और अन्तर्मुहूर्त काल तक जीव क्रम से त्रसकायिक और त्रसकायिक पर्याप्त रहते हैं।।९१।।

उत्कृष्ट से त्रसकायिक जीव पूर्वकोटिपृथक्त्व से अधिक दो हजार सागरोपम और त्रसकायिक पर्याप्त जीव केवल दो हजार सागरोपम काल तक रहते हैं।।९२।।

जीव त्रसकायिक अपर्याप्त कितने काल तक रहते हैं ?।।९३।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहण काल तक जीव त्रसकायिक अपर्याप्त रहते हैं।।९४।।

उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त काल तक जीव त्रसकायिक अपर्याप्त रहते हैं।।९५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त सूत्रों का अर्थ सुगम है। सामान्य से त्रसकायिकों का उत्कृष्टकाल पूर्वकोटिपृथक्त्व से अधिक दो हजार सागरोपम और त्रसकायिक पर्याप्तों का काल केवल दो हजार सागरोपम ही है।

इस प्रकार तृतीय स्थल में त्रस जीवों का काल प्रतिपादन करने वाले छह सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम के द्वितीय खण्ड में क्षुद्रकबंध नामक द्वितीय खण्ड में एक जीव की अपेक्षा कालानुगम प्रकरण में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्त-चिंतामणिटीका में कायमार्गणा नाम का तृतीय अधिकार समाप्त हुआ।