ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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04.योगमार्गणाधिकार

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योगमार्गणाधिकार

अथ योगमार्गणाधिकार:

अथ स्थलपंचकेन एकविंशतिसूत्रैः योगमार्गणानाम चतुर्थोऽधिकारः प्रारभ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले मनोवचनयोगिनामंतरनिरूपणत्वेन ‘‘जोगाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। ततः परं द्वितीयस्थले सामान्यकाय-योगिनामौदारिक-औदारिकमिश्रयोगिनामन्तरकथनत्वेन ‘‘कायजोगीणं-’’ इत्यादिसूत्रषट्कं । तदनु तृतीयस्थले वैक्रियकवैक्रियकमिश्रयोगिनामंतरकथनत्वेन ‘‘बेउव्विय-’’ इत्यादिषट्सूत्राणि । तदनंतरं चतुर्थस्थले आहाराहार-मिश्रकाययोगिनामंतरनिरूपणत्वेन ‘‘आहारकायजोगि-’’ इत्यादिना त्रीणि सूत्राणि। तत्पश्चात् पंचमस्थले कार्मणकाययोगिनामन्तरप्ररूपणत्वेन ‘‘कम्मइय-’’ इत्यादिसूत्रत्रयमिति समुदायपातनिका।
अधुना योगमार्गणायां मनोयोगिवचनयोगिनामंतरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
जोगाणुवादेण पंचमणजोगि-पंचवचिजोगीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।५९।।
जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।६०।।
उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियट्टं।।६१।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-मनोयोगात्काययोगं वचनयोगं वा गत्वा सर्वजघन्यमंतर्मुहूर्तं स्थित्वा पुनो मनोयोगं आगतस्य जघन्येनान्तर्मुहूर्तान्तरोपलंभात्। शेषचतुर्मनोयोगिनां पंचवचनयोगिनां चैवमेवांतरं प्ररूपयितव्यं, भेदाभावात्।
अत्र एकसमयः किन्न लभ्यते ?
न, यदा एकमनोयोगस्य वचनयोगस्य वा व्याघातो भवति, अथवा विवक्षितयोगिनो जीवस्य मरणं भवति, तदा केवलं एकसमयांतरेण पुनः अनन्तरसमये तस्यैव मनोयोगस्य वचनयोगस्य वा प्राप्तिर्न संभवति।
उत्कर्षेण-मनोयोगात् वचनयोगं गत्वा तत्र सर्वोत्कृष्टकालं स्थित्वा पुनः काययोगं गत्वा तत्रापि सर्वचिरं कालं गमयित्वा एकेन्द्रियेषूत्पद्य आवलिकायाः असंख्यातभागमात्रपुद्गलपरिवर्तनानि परिवत्र्य पुनो मनोयोगं गतस्य तदुपलंभात्। शेषचतुर्मनोयोगिनां पंचवचनयोगिनां चैवं अंतरं कथयितव्यम्, विशेषाभावात्।
एवं प्रथमस्थले मनोवचनयोगिनामंतरनिरूपणपरत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।
इदानीं सामान्येन काययोगिनामन्तरनिरूपणाय सूत्रषट्कमवतार्यते-
कायजोगीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।६२।।
जहण्णेण एगसमओ।।६३।।
उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं।।६४।।
ओरालियकायजोगी-ओरालियमिस्सकायजोगीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।६५।।
जहण्णेण एगसमओ।।६६।।
उक्कस्सेण तेत्तीसं सागरोवमाणि सादिरेयाणि।।६७।।
सिद्धांतिंचतामणिटीका-काययोगात् मनोयोगं वचनयोगं वा गत्वा एकसमयं स्थित्वा द्वितीयसमये मृते व्याघातिते वा काययोगं गतस्य जघन्येनैकसमयः उपलभ्यते। उत्कर्षेण-काययोगात् मनोयोगं वचनयोगं च परिपाटीक्रमेण द्वयोरपि योगयोः सर्वोत्कृष्टकालं स्थित्वा पुनः काययोगमागतस्यान्तर्मुहूर्तमात्रान्तरं लभ्यते।
औदारिककाययोगस्यान्तरमेवमेव ज्ञातव्यं।
औदारिकमिश्रयोगिनोऽपर्याप्तभावेन मनोवचनयोगविरहितस्य कथमन्तरस्य एकसमयो भवति ?
न, औदारिकमिश्रकाययोगात् एकविग्रहं कृत्वा कार्मणयोगे एकसमयं स्थित्वा द्वितीयसमये औदारिकमिश्रं गतस्य एकसमयान्तरं उपलभ्यते।
उत्कर्षेण-औदारिककाययोगात् चतुर्मनोयोगचतुर्वचनयोगेषु परिणम्य कालं कृत्वा त्रयस्त्रिंशदायुःस्थितिकेषु देवेषूत्पद्य स्वकस्थितिं स्थित्वा द्वौ विग्रहौ कृत्वा मनुष्येषूत्पद्य औदारिकमिश्रकाययोगेन दीर्घकालं स्थित्वा पुनः औदारिककाययोगं गतस्य नवभिरन्तर्मुहूर्तैः द्वाभ्यां समयाभ्यां सातिरेकत्रयस्त्रिंशत्सागरोपममात्रान्तरोपलंभात्।
औदारिकमिश्रयोगस्य अंतर्मुहूर्तोनपूर्वकोटिसातिरेकाणि त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि अंतरं भवति। नारकेभ्यः पूर्वकोट्यायुष्कमनुष्येषूत्पद्य औदारिकमिश्रकाययोगस्यादिं कृत्वा सर्वलघुकालेन पर्याप्तीः समाप्य औदारिक-काययोगेनान्तरं कृत्वा देशोनपूर्वकोटिकालं गमयित्वा त्रयस्त्रिंशदायुःस्थितिमद्देवेषूत्पद्य पुनः विग्रहं कृत्वा औदारिकमिश्रकाययोगं गतस्य तदुपलंभात्।
एवं द्वितीयस्थले काययोगि-औदारिक-औदारिकमिश्रयोगिनामन्तरकथनत्वेन सूत्रषट्कं गतम्।
इदानीं वैक्रियक-वैक्रियिकमिश्रयोगिनामंतरप्रतिपादनाय सूत्रषट्कमवतार्यते-
वेउव्वियकायजोगीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।६८।।
जहण्णेण एगसमओ।।६९।।
उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियट्टं।।७०।।
वेउव्वियमिस्सकायजोगीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।७१।।
जहण्णेण दसवाससहस्साणि सादिरेयाणि।।७२।।
उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियट्टं।।७३।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-वैक्रियिककाययोगात् मनोयोगं वचनयोगं वा गत्वा तत्रैकसमयं स्थित्वा द्वितीयसमये व्याघातवशेन वैक्रियिककाययोगं गतस्य तदुपलंभात्। उत्कर्षेण सूत्रोक्तकालान्तरं सुगममेव ।
वैक्रियिकमिश्रकाययोगस्य जघन्येन कथ्यते-तिर्यग्भ्यः मनुष्येभ्यो वा देवेषु नारकेषु वा उत्पद्य दीर्घकालेन षट्पर्याप्तीः परिपूर्य वैक्रियिककाययोगेन वैक्रियिकमिश्रकाययोगं अंतरयित्वा देशोनदशवर्षसहस्राणि स्थित्वा तिर्यक्षु मनुष्येषु वोत्पद्य सर्वजघन्यकालेन पुनरागत्य वैक्रियिकमिश्रं गतस्य सातिरेकदशवर्ष-मात्रान्तरोपलंंभात्।
कथमेतेषां सातिरेकत्वं ?
न, कींच-वैक्रियिकमिश्रकालात् तिर्यग्मनुष्य पर्याप्तानां गर्भजानां जघन्यायुषो बहुत्वोपलंभात्।
उत्कर्षेण-वैक्रियिकमिश्रयोगात् वैक्रियिककाययोगं गत्वान्तरं कृत्वा असंख्यातपुद्गलपरिवर्तनानि परिवत्र्य वैक्रियिकमिश्रं गतस्य तदुपलंभात्।
एवं तृतीयस्थले वैक्रियिक-वैक्रियिकमिश्रकाययोगिनामन्तरनिरूपणत्वेन सूत्रषट्क गतम्।


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अथ योगमार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब पाँच स्थलों में इक्कीस सूत्रों के द्वारा योगमार्गणा नामका चतुर्थ अधिकार प्रारंभ हो रहा है। उनमें से प्रथम स्थल में मनोयागी और वचनयोगी जीवों का अन्तर निरूपण करने वाले ‘‘जोगाणुवादेण’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। उसके बाद द्वितीय स्थल में सामान्य काययोगी, औदारिक एवं औदारिकमिश्रकाययोगी जीवों का अन्तर कथन करने वाले ‘‘कायजोगीणं’’ इत्यादि छह सूत्र हैं। उसके आगे तृतीय स्थल में वैक्रियिक और वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवों का अन्तर कथन करने वाले ‘‘वेउव्विय’’ इत्यादि छह सूत्र हैं। तदनंतर चतुर्थ स्थल में आहारक और आहारकमिश्रकाययोगियों का अन्तर निरूपण करने हेतु ‘‘आहारकायजोगि’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। तत्पश्चात् पंचम स्थल में कार्मणकाययोगियों का अन्तर प्ररूपण करने वाले ‘‘कम्मइय’’ इत्यादि तीन सूत्र कहेंगे। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

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अब योगमार्गणा में मनोयोगी और वचनयोगी जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

योगमार्गणानुसार पाँच मनोयोगी और पाँच वचनयोगी जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।५९।।

जघन्य से पाँच मनोयोगी और पाँच वचनयोगी जीवों का अन्तर अन्तर्मुहूर्तप्रमाण होता है।।६०।।

उत्कृष्ट से अनन्तकाल तक पाँच मनोयोगी और वचनयोगी जीवों का जो अंतर होता है वह असंख्यात पुद्गलपरिवर्तनप्रमाण के बराबर होता है।।६१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मनोयोग से काययोग में अथवा वचनयोग में जाकर सबसे कम अन्तर्मुहूर्त प्रमाणकाल तक वहाँ रहकर पुन: मनोयोग में आने वाले जीव के अन्तर्मुहूर्तप्रमाण जघन्य अन्तर पाया जाता है। शेष चार मनोयोगी और पाँच वचनयोगी जीवों का भी इसी प्रकार अन्तर प्ररूपित करना चाहिए, क्योंकि इस अपेक्षा उन सबमें कोई अन्तर नहीं है।

शंका-यहाँ एक समयप्रमाण अन्तर क्यों नहीं पाया जाता है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि जब एक मनोयोग या वचनयोग का विघात हो जाता है या विवक्षित योग वाले जीव का मरण हो जाता है, तब केवल एक समय के अन्तर से पुन: अनन्तर समय में उसी मनोयोग या उसी वचनयोग की प्राप्ति नहीं हो सकती है।

उत्कृष्ट से-मनोयोग से वचनयोग में जाकर वहाँ अधिक काल तक रहकर पुन: काययोग में जाकर और वहाँ भी सबसे अधिक काल व्यतीत करके एकेन्द्रियों में उत्पन्न होकर आवली के असंख्यातवें भाग प्रमाण पुद्गलपरिवर्तन में परिभ्रमण कर पुन: मनोयोग में आये हुए जीव के उक्त प्रमाण अन्तरकाल पाया जाता है। शेष चार मनोयोगी और पाँच वचनयोगी जीवों का अन्तरकाल इसी प्रकार प्ररूपित करना चाहिए, क्योंकि इस अपेक्षा से उनमें कोई विशेषता नहीं है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में मनोयोगी और वचनयोगी जीवों का अन्तर निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब सामान्य से काययोगी जीवों का अन्तर निरूपण करने हेतु छह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

काययोगी जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।६२।।

जघन्य से एक समय तक काययोगी जीवों का अन्तर होता है।।६३।।

काययोगी जीवों का उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त होता है।।६४।।

औदारिककाययोगी और औदारिकमिश्रकाययोगी जीवों का अन्तर एक समय होता है।।६५।।

औदारिक काययोगी और औदारिकमिश्रकाययोगी जीवों का जघन्य अन्तर एक समय होता है।।६६।।

औदारिककाययोगी व औदारिकमिश्रकाययोगी जीवों का उत्कृष्ट अन्तर कुछ अधिक तेतीस सागरोपमप्रमाण होता है।।६७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीकाकाययोग से मनोयोग में या वचनयोग में जाकर एक समय वहाँ रहकर दूसरे समय में मरण करने या योग के व्याघातित होने पर पुन: काययोग को प्राप्त हुए जीव के एक समय का जघन्य अन्तर पाया जाता है। उत्कृष्ट से-काययोग से मनोयोग और वचनयोग में परिपाटी से क्रमश: जाकर और उन दोनों ही योगों में उनके सर्वोत्कृष्ट काल तक रहकर पुन: काययोग में आए हुए जीव के अन्तर्मुहूर्तप्रमाण अन्तर प्राप्त होता है।

औदारिककाययोगी जीवों का अन्तर इसी प्रकार जानना चाहिए।

शंका-औदारिकमिश्रकाययोगी तो अपर्याप्त अवस्था में होता है जब कि जीव के मनोयोग और वचनयोग होता ही नहीं है, अतएव औदारिकमिश्रकाययोग का एक समय अन्तर किस प्रकार हो सकता है ?

समाधान-ऐसा नहीं है, क्योंकि औदारिकमिश्रकाययोग से एक विग्रह करके कार्मणकाययोग में एक समय रहकर दूसरे समय में औदारिकमिश्रकाययोग में आए हुए जीव के औदारिकमिश्रकाययोग का एक समय अन्तर प्राप्त होता है।

उत्कृष्ट से-औदारिककाययोग से चार मनोयोगों व चार वचनयोगों में परिणमित हो मरण कर तेतीस सागरोपमप्रमाण आयु स्थिति वाले देवों में उत्पन्न होकर वहाँ अपनी स्थितिप्रमाण रहकर पुन: दो विग्रह करके मनुष्यों में उत्पन्न हो औदारिकमिश्रकाययोग के साथ दीर्घ काल तक रहकर पुन: औदारिककाययोग के प्राप्त हुए जीव के नौ अन्तर्मुहूर्तों व दो समयों से अधिक तेतीस सागरोपमप्रमाण औदारिककाययोग का अन्तर प्राप्त होता है। औदारिकमिश्रकाययोग का भी अन्तर अन्तर्मुहूर्त कम पूर्वकोटि से अधिक तेतीस सागरोपमप्रमाण होता है, क्योंकि नारकियों में से निकलकर पूर्वकोटि आयु वाले मनुष्यों में उत्पन्न होकर औदारिकमिश्रकाययोग का प्रारंभ कर कम से कम काल में पर्याप्तियों को पूर्ण करके औदारिककाययोग के द्वारा औदारिकमिश्रकाययोग का अन्तर कर, कुछ कम पूर्वकोटि काल व्यतीत करके तेतीस सागरोपम की आयु वाले देवों में उत्पन्न हो, पुन: विग्रह करके औदारिकमिश्रकाययोग को प्राप्त होने वाले जीव के उत्कृष्ट अन्तर पाया जाता है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में काययोगी जीवों में औदारिक और औदारिकमिश्रकाययोगी जीवों का अन्तर कथन करने वाले छह सूत्र पूर्ण हुए।

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अब वैक्रियिक और वैक्रियिकमिश्रकाययोगियों का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु छह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

वैक्रियिककाययोगी का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।६८।।

वैक्रियिककाययोगियों का जघन्य अन्तर एक समय है।।६९।।

वैक्रियिककाययोगियों का उत्कृष्ट अन्तर अनन्तकाल है, जो असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन बराबर है।।७०।।

वैक्रियिकमिश्रकाययोगियों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।७१।।

वैक्रियिकमिश्रकाययोगियों का जघन्य अन्तर कुछ अधिक दश हजार वर्ष प्रमाण होता है।।७२।।

वैक्रियिकमिश्रकाययोगियों का उत्कृष्ट अन्तर अनन्तकाल है, जो असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन प्रमाण के बराबर है।।७३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-वैक्रियिककाययोग से मनोयोग या वचनयोग में जाकर वहाँ एक समय तक रहकर दूसरे समय में उस योग का व्याघात हो जाने के कारण वैक्रियिककाययोग को प्राप्त करने वाले जीव के एक समय प्रमाण अन्तर पाया जाता है। उत्कृष्टरूप से सूत्र कथित अन्तर सुगम ही है।

अब वैक्रियिकमिश्रकाययोग का जघन्य अन्तर कहा जा रहा है-तिर्यंचों से अथवा मनुष्यों से देव व नारकियों में उत्पन्न होकर दीर्घ काल द्वारा छह पर्याप्तियाँ पूरी कर वैक्रियिककाययोग के द्वारा वैक्रियिकमिश्रकाययोग का अन्तर करके कुछ कम दश हजार वर्ष तक वहीं रहकर तिर्यंचों अथवा मनुष्यों में उत्पन्न हो, सबसे कम काल में पुन: देव या नरक गति में आकर वैक्रियिकमिश्रयोग को प्राप्त हुए जीव के कुछ अधिक दश हजार वर्ष प्रमाण जघन्य अन्तर पाया जाता है।

शंका-इन दश हजार वर्षों के अधिकपना कैसे कहा गया है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि वैक्रियिकमिश्रयोग के काल की अपेक्षा तिर्यंच व मनुष्य पर्याप्त गर्भज जीवों की जघन्य आयु बहुत पायी जाती है।

उत्कृष्ट से-वैक्रियिकमिश्रकाययोग से वैक्रियिककाययोग में जाकर वैक्रियिकमिश्रकाययोग का अन्तर प्रारंभ कर असंख्यात पुद्गलपरिवर्तनकाल तक परिभ्रमण कर पुन: वैक्रियिकमिश्रकाययोग में जाने वाले जीव के यह उत्कृष्ट अन्तर पाया जाता है।

इस प्रकार तृतीय स्थल में वैक्रियिककाययोगी एवं वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवों का अन्तर निरूपण करने वाले छह सूत्र पूर्ण हुए।


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आहार-आहारमिश्रयोगिनामन्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-

आहारकायजोगि-आहारमिस्सकायजोगीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।७४।।

जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।७५।।
उक्कस्सेण अद्धपोग्गलपरियट्टं देसूणं।।७६।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-आहारकाययोगादन्ययोगं गत्वा सर्वलघुकालं स्थित्वा पुनः आहारकाययोगं गतस्यान्तर्मुहूर्तान्तरमुपलभ्यते ।
एकसमयः किन्नोपलभ्यते ?
न लभ्यते, आहारकाययोगस्य व्याघाताभावात्। एवं आहारमिश्रकाययोगस्यापि वक्तव्यं। विशेषतया-आहारशरीरमुत्थाप्य सर्वजघन्येन कालेन पुनरपि उत्थापयतः प्रथमतः अंतरपरिसमाप्तिः कर्तव्या।
उत्कर्षेण किञ्चिन्न्यूनं अद्र्धपुद्गलपरिवर्तनकालप्रमाणं। तथाहि-अनादिमिथ्यादृष्टिजीवेनाद्र्धपुद्गलपरिवर्तन- प्रमाणस्य कालावशेषे प्रथमसमये उपशमसम्यक्त्वं संयमं च युगपत् गृहीतंं। तत्रान्तर्मुहूर्तं स्थित्वा (१) अप्रमत्तो भूत्वा (२) आहारशरीरं बंधयित्वा (३) अप्रमत्तात् प्रच्युत्य प्रमत्तो भूत्वा (४) आहारशरीरमुत्थाप्यान्तर्मुहूर्तं स्थित्वा (५) आहारकाययोगी भूत्वा तस्यादिं कृत्वा एकसमयं स्थित्वा मृतः। इत्थमाहारकाययोगस्यान्तरं प्रारब्धं। पश्चात् तेनैव जीवेन उपार्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाणकालं परिभ्रम्यान्तर्मुहूर्तावशेषे संसारे किञ्चित् न्यूनमद्र्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाणमन्तरकालं समाप्य (६) अन्तर्मुहूर्तं स्थित्वा (७) अबंधभावं गतः, तस्य यथाक्रमेण आहारकाययोगस्याष्टभिः आहारमिश्रकाययोगस्य सप्तभिर्वा अंतर्मुहूर्तैःऊनमद्र्धपुद्गल-परिवर्तनमात्रमन्तरं उपलभ्यते।
एवं चतुर्थस्थले आहारकाय-आहारमिश्रकाययोगिनामंतरप्रतिपादनत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।
इदानीं कार्मणकाययोगिनामंतरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
कम्मइयकायजोगीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।७७।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं तिसमऊणं।।७८।।
उक्कस्सेण अंगुलस्स असंखेज्जदिभागो असंखेज्जासंखेज्जाओ ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीओ।।७९।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-त्रिविग्रहाणि कृत्वा क्षुद्रभवग्रहणकारकजीवेषूत्पद्य पुनो विग्रहं कृत्वा निर्गतस्तस्य त्रिसमयोनक्षुद्रभवग्रहणमात्रान्तरमुपलभ्यते, जघन्यान्तरमेतत्। उत्कर्षेण-कार्मणकाययोगादौदारिकमिश्रं वैक्रियिकमिश्रं वा गत्वा असंख्यातासंख्याताः अवसर्पिण्युत्सर्पिणीप्रमाणाः अंगुलस्यासंख्यातभागमात्राः तत्र स्थित्वा पुनः विग्रहं गतस्तस्यैतत्कालो लभ्यते ।
एवं पंचमस्थले कार्मणकाययोगिनामंतरनिरूपणत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे एकजीवापेक्षयान्तरानुगमे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां योगमार्गणानाम
चतुर्थोऽधिकारः समाप्तः।

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अब आहारककाययोगी और आहारकमिश्रकाययोगियों का अन्तर बतलाने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

आहारककाययोगी और आहारकमिश्रकाययोगी जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।७४।।

आहारककाययोगी और आहारकमिश्रकाययोगी जीवों का जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त होता है।।७५।।

आहारककाययोगी और आहारकमिश्रकाययोगी जीवों का उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण होता है।।७६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-आहारककाययोग से अन्य योग में जाकर सबसे कम अन्तर्मुहूर्त वहाँ रहकर पुन: आहारककाययोग को प्राप्त हुए जीव के आहारककाययोग का अन्तर्मुहूर्तप्रमाण अन्तर पाया जाता है।

शंका-आहारककाययोग का एक समय मात्र अन्तर क्यों नहीं प्राप्त होता है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि आहारककाययोग का व्याघात नहीं होता है। इसी प्रकार आहारकमिश्रकाययोग का भी अन्तर कहना चाहिए। केवल विशेषता यह है कि आहारक शरीर को उत्पन्न करके सबसे कम काल में फिर भी आहारकशरीर को उत्पन्न करने वाले जीव के पहले ही अन्तर की समाप्ति कर देनी चाहिए।

उत्कृष्ट से कुछ कम अद्र्धपुद्गलपरिवर्तन काल प्रमाण अन्तर है। वह इस प्रकार है- अनादि मिथ्यादृष्टि एक जीव के अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण संसार शेष रहने के प्रथम समय में उपशमसम्यक्त्व और संयम इन दोनों का एक साथ ग्रहण किया और अन्तर्मुहूर्त रहकर (१) अप्रमत्त होकर (२) आहारशरीर को बंध करके (३) अप्रमत्त से च्युत हो प्रमत्त होकर (४) आहारकशरीर को उत्पन्न करके वहाँ अन्तर्मुहूर्त रहा (५) और आहारकाययोगी होकर उसका प्रारंभ करके वहाँ एक समय रहकर मर गया। इस प्रकार आहारककाययोग का अन्तर प्रारंभ हुआ। पश्चात् वही जीव उपार्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण काल तक भ्रमण करके संसार के अन्तर्मुहूर्त शेष रहने पर कुछ कम अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण अन्तरकाल समाप्त कर (६) वहाँ अन्तर्मुहूर्त रहकर (७) अबंधक भाव को प्राप्त हो गया। ऐसे जीव के यथाक्रम से आहारककाययोग का आठ और आहारकमिश्रकाययोग का सात अन्तर्मुहूर्त से कम अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण अन्तरकाल पाया जाता है। इस प्रकार चतुर्थ स्थल में आहारककाययोगी एवं आहारकमिश्रकाययोगी जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब कार्मणकाययोगी जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

कार्मणकाययोगी जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।७७।।

कार्मणकाययोगियों का जघन्य अन्तर तीन समय कम क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण होता है।।७८।।

कार्मणकाययोगियों का उत्कृष्ट अन्तर असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी-उत्सर्पिणी काल प्रमाण होता है, जो अंगुल के असंख्यातवें भाग प्रमाण के बराबर होता है।।७९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तीन विग्रह करके क्षुद्रभवग्रहण करने वाले जीवों में उत्पन्न हो पुन: विग्रह करके निकलने वाले जीव के तीन समय कम क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण कार्मणकाययोग का जघन्य अन्तर प्राप्त होता है। उत्कृष्ट से-कार्मणकाययोग से औदारिकमिश्र अथवा वैक्रियिकमिश्रकाययोग में जाकर अंगुल के असंख्यातवें भाग मात्र असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी-उत्सर्पिणीप्रमाण काल वहाँ रहकर पुन: विग्रहगति को प्राप्त हुए जीव के कार्मणकाययोग का सूत्रोक्त अन्तर काल पाया जाता है।

इस प्रकार पंचम स्थल में कार्मणकाययोगी जीवों का अन्तर निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में एक जीव की अपेक्षा अन्तरानुगम में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणि-टीका में योगमार्गणा नाम का चतुर्थ अधिकार समाप्त हुआ।