ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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04. कैकेई द्वारा वरदान माँगना

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कैकेई द्वारा वरदान माँगना

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(२०)

यह त्याग—तपस्या की बातें, इस वय में ना शोभा देतां।
हे पुत्र! अभी तुम राज्य करो, इस जग की वत्स यही रीति।।
माँ को मत व्यथित करो बेटे, इस दुख को झेल न पायेगी।

वह पुत्र मोह में पागल हो, यदि मृत्यु प्राप्त कर जायेगी।।
(२१)

तो दोष लगेगा तुमको भी, मेरी अपकीर्ति फैलेगी ।
ना वचन निभाया राजन ने, जग में भी बड़ी हँसी होगी।।
इक समय युद्ध में कैकेयी ने, अपना कौशल दिखलाया था।

वरदान माँगने को कहकर, मैंने भी फर्ज निभाया था।।
(२२)

जब समय पड़ेगा ले लूँगी, यह कहकर उनने टाल दिया ।
अब पुत्रमोह से प्रेरित हो, वरदान आज यह मांग लिया।।
दे राज्य भरत को हे स्वामिन ! अब यही हमारी इच्छा है।

वरना यह सब कुछ तज करके, ले लेगा मुनि की दीक्षा है।।
(२३)

पति के वियोग से दु:खित, कैकेयी मुख नीचे कर बोली ये ।
होगा ऐसा ही शोक तजो, अब ऋण से मुक्त हुआ हूँ मैं।।
राजा दशरथ का अंतर्मन, हो गया दुखी पर क्या करते।

तब पास बुलाकर रामचंद्र से, अपनी व्यथा कथा कहते।।