ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्ज एप पर मेसेज करें|

पूज्य गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माता जी के द्वारा अागमोक्त मंगल प्रवचन एवं मुंबई चातुर्मास में हो रहे विविध कार्यक्रम के दृश्य प्रतिदिन देखे - पारस चैनल पर प्रातः 6 बजे से 7 बजे (सीधा प्रसारण)एवं रात्रि 9 से 9:20 बजे तक|
इस मंत्र की जाप्य दो दिन 16 और 17 तारीख को करे |

सोलहकारण व्रत की जाप्य - "ऊँ ह्रीं अर्हं संवेग भावनायै नमः"

04. कैकेई द्वारा वरदान माँगना

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


कैकेई द्वारा वरदान माँगना

(२०)

यह त्याग—तपस्या की बातें, इस वय में ना शोभा देतां।
हे पुत्र! अभी तुम राज्य करो, इस जग की वत्स यही रीति।।
माँ को मत व्यथित करो बेटे, इस दुख को झेल न पायेगी।

वह पुत्र मोह में पागल हो, यदि मृत्यु प्राप्त कर जायेगी।।
(२१)

तो दोष लगेगा तुमको भी, मेरी अपकीर्ति फैलेगी ।
ना वचन निभाया राजन ने, जग में भी बड़ी हँसी होगी।।
इक समय युद्ध में कैकेयी ने, अपना कौशल दिखलाया था।

वरदान माँगने को कहकर, मैंने भी फर्ज निभाया था।।
(२२)

जब समय पड़ेगा ले लूँगी, यह कहकर उनने टाल दिया ।
अब पुत्रमोह से प्रेरित हो, वरदान आज यह मांग लिया।।
दे राज्य भरत को हे स्वामिन ! अब यही हमारी इच्छा है।

वरना यह सब कुछ तज करके, ले लेगा मुनि की दीक्षा है।।
(२३)

पति के वियोग से दु:खित, कैकेयी मुख नीचे कर बोली ये ।
होगा ऐसा ही शोक तजो, अब ऋण से मुक्त हुआ हूँ मैं।।
राजा दशरथ का अंतर्मन, हो गया दुखी पर क्या करते।

तब पास बुलाकर रामचंद्र से, अपनी व्यथा कथा कहते।।