ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.png
Whatsappicon.png
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें |


पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर २०१६- रविवार से सीधा प्रसारण चल रहा है | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

04. गृहचैत्यालय के प्रमाण

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


[सम्पादन]
उमास्वामी श्रावकाचार ग्रंथ के आधार से ये मूर्ति प्रमाण मात्र गृहचैत्यालय के लिए हैं, मंदिर के लिए नहीं हैं

एकादशांगुलं बिम्बं सर्वकामार्थसाधकम्।

एतत्प्रमाणामाख्यातमत ऊध्र्वं न कारयेत्।।100।।

अर्थ-उस चैत्यालय में ग्यारह अंगुल प्रमाण प्रतिमा होनी चाहिए क्योंकि ग्यारह अंगुल प्रमाण प्रतिमा समस्त मनोरथों को सिद्ध करने वाली है, चैत्यालयों में विराजमान करने के लिए शास्त्रकारों ने ग्यारह अंगुल प्रमाण ही प्रतिमा बतलाई है। उसी से समस्त कार्यों की सिद्धि हो सकती है। चैत्यालयों में इससे अधिक ऊंची प्रतिमा कभी विराजमान नहीं करनी चाहिए।

एकांगुलं भवेच्छ्रेष्ठं व्द्यंगुलं धननाशनम्।

त्र्यंगुले जायते वृद्धिः पीडां स्याच्चतुरंगुले।।101।।

अर्थ-गृहस्थों के चैत्यालय में एक अंगुल प्रमाण जिनप्रतिमा श्रेष्ठ गिनी जाती है। दो अंगुल की प्रतिमा से धन का नाश हो जाता है। तीन अंगुल की प्रतिमा विराजमान करने से वृद्धि होती है और चार अंगुल की प्रतिमा विराजमान करने से पीड़ा होती है।

पंचांगुले तु वृद्धिः स्यादुद्वेगस्तु षडंगुले।

सप्तांगुले गवां वृद्धिर्हानिरष्टांगुले मता।।102।।

अर्थ-पाँच अंगुल की प्रतिमा विराजमान करने से वृद्धि होती है, छह अंगुल की प्रतिमा विराजमान करने से उद्वेग होता है, सात अंगुल की प्रतिमा विराजमान करने से गोधन की वृद्धि होती है और आठ अंगुल की प्रतिमा विराजमान करने से हानि होती है।

नवांगुले पुत्रवृद्धिर्धननाशो दशांगुले।

आरभ्यैकांगुलाद्बिम्बा-द्यावदेकादशांगुलम्।।103।।

अर्थ-नौ अंगुल की प्रतिमा विराजमान करने से संतान की वृद्धि होती है और दश अंगुल की प्रतिमा से धन का नाश होता है। इस प्रकार एक अंगुल से लेकर ग्यारह अंगुल तक की प्रतिमा घर के चैत्यालय में विराजमान करने का वर्णन किया। जिनमंदिर के लिए यह नियम नहीं है, जिनमंदिर में चाहे जितनी ऊंची प्रतिमा विराजमान कर सकते हैं।

विशेषार्थ-यद्यपि जिन प्रतिमा पुण्य-बंध का कारण है तथापि वस्तु का स्वभाव भी भिन्न-भिन्न होता है तथा पूजा करने वालों की कामनाएं भी भिन्न-भिन्न होती है और कामनाओं के अनुसार विधि भी भिन्न-भिन्न होती है और कामनाओं के अनुसार विधि भी भिन्न-भिन्न होती है। पूज्य-पूजक मंत्र विधि आदि समस्त सामग्री के अनुसार मनोकामना की सिद्धि होती है। यदि इनमें कोई भी सामग्री विपरीत हो तो उसका फल भी विपरीत ही होता है। पूजन की विधि में प्रतिमा की श्रेष्ठता और उसका प्रमाण भी मंत्रशास्त्र से संबंध रखता है। मंत्र शास्त्रों में लिखा है कि यदि प्रतिमा कुरूप हो, उसकी दृष्टि वक्र हो या उसका आकार कुत्सित हो तो उससे पूजक की हानि होती है यह बात प्रायः सब लोगों के अनुभव में आ रही है। जिस प्रकार वक्रदृष्टि वाली प्रतिमा से पूजक को हानि होती है उसी प्रकार यदि सम अंगुल वाली प्रतिमा (दो, चार, छह, आठ वा दश अंगुल की प्रतिमा) घर के चैत्यालय में विराजमान की जाये तो उससे हानि होती है यह संख्या की समता और विषमता अनेक स्थानों में शुभ-अशुभ की सूचक होती है। शुभ कार्यों में विषम संख्या ही शुभ मानी जाती है सम संख्या कभी शुभ नहीं मानी जाती। इसीलिए सम अंगुलों की प्रतिमाएं घर के चैत्यालयों में शुभ नहीं होती हैं।

[सम्पादन]
भगवान के सामने के दरवाजे से भगवान की दृष्टि माप की विधि

(1) आयभागे भजेद् द्वारमष्टममूध्र्वतस्त्यजेत्।

      सप्तमे सप्तमे दृष्टि वृषे सिंहे ध्वजे शुभा।। 1।। (प्रासादमंडन)

द्वार की ऊँचाई के आठ भाग करके ऊपर का आठवाँ भाग छोड़ देना। अनंतर सातवें भाग के फिर आठ भाग करके उसमें गजाय, वृषभाय, ध्वजाय, सिंहाय में अर्थात् सातवें, पाँचवें, तीसरे या पहले भाग में दृष्टी रख सकते हैं।

(2) विभज्य नवधा द्वारं तत् षड् भानधस्त्यजेत्।

      ऊध्र्वद्वौ सप्तमं तद्वद् विभज्य स्थापयेद् दृशाम्।।1।। (श्रीवसुनंदी प्रतिष्ठासार)

द्वार के नव भाग करके नीचे के छः भाग और ऊपर के दो भाग छोड़कर जो सातवाँ भाग है उसके फिर नौ भाग करें और उसमें से सातवें भाग में दृष्टी रखें। यह गजाय है।

(3) द्वार के 64 भाग करके 55वें भाग में प्रतिमा की दृष्टी रखी जावे। यह भी एक मत है।

[सम्पादन]
मंदिर की नींव में एवं शिखर की नींव में शिला रखने की विधि

सर्वौषधीपंचरत्नमिश्रतीर्थांबुपूरितान्। पंचताम्रमयान् कुंभान् दधिदूर्वाक्षतांचितान्।।1।।


तत्रारोप्यैकशोऽनादिसिद्धमंत्रेण मंत्रयेत्। ततस्तन्न्यासदेशेषु सूतश्रीखंडकुंकुमम्।।2।।

क्षिप्त्वा प्रागेकमुत्क्षिप्य क्षेत्रगर्भे न्यसेत्तथा। पृथक्कोणेषु चतुरस्तेतः पंचशिलाः पृथक्।।3।।

जिनादिमंत्रैरध्यास्य सुलग्ने तेषु विन्यसेत्। ततः प्रतोष्य शिल्प्यादीन् स्वक्षेत्रे भ्रामयेद् बलिम्।।4।।

पीठबंधेप्यसावेव विधिः कृत्स्नो विधीयताम्। विकुंभो देहली पद्मशिलयोश्च निवेशने।।5।।

जिनादि मंत्राः (खरशिलानिवेशनम्)

1. ॐ ह्रीं नमोर्हद्भ्यः स्वाहा।

2. ॐ ह्रीं सिद्धेभ्यः स्वाहा।

3. ॐ ह्रीं नमः सूरिभ्यः स्वाहा।

4. ॐ ह्रीं नमः पाठकेभ्यः स्वाहा।

5. ॐ ह्रीं नमः सर्वसाधुभ्यः स्वाहा।

खरशिला निवेशनं करोमि स्वाहा।