ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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04. वाराणसी तीर्थ पूजा

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वाराणसी तीर्थ पूजा

स्थापना (शंभु छंद)


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जिस वाराणसि नगरी का हमने, नाम सुना है ग्रंथों में।
जो पावन और पवित्र सुपारस, पाश्र्वनाथ के चरणों से।।
उस जन्मभूमि तीरथ की पूजन, हेतु करूँ आह्वानन मैं।
स्थापन सन्निधिकरण करूँ, वाराणसि तीर्थ का अर्चन मैं।।१।।

ॐ ह्रीं तीर्थंकर श्रीसुपाश्र्वनाथ पाश्र्वनाथ जन्मभूमि वाराणसी तीर्थक्षेत्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं तीर्थंकर श्रीसुपाश्र्वनाथ पाश्र्वनाथ जन्मभूमि वाराणसी तीर्थक्षेत्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं।
ॐ ह्रीं तीर्थंकर श्रीसुपाश्र्वनाथ पाश्र्वनाथ जन्मभूमि वाराणसी तीर्थक्षेत्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।

अष्टक (शंभु छंद)
हे नाथ! विषयसुख की इच्छा में, मैंने निज को भरमाया।
लेकिन दुःखों की वैतरणी में, विंâचित् भी सुख नहिं पाया।।
वाराणसि नगरी का अर्चन, अब मुझको शांति दिलाएगी।
जिसकी पूजन से श्रीसुपाश्र्व, पारस की स्मृति आएगी।।१।।

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ॐ ह्रीं तीर्थंकरश्रीसुपाश्र्वनाथपाश्र्वनाथजन्मभूमि वाराणसीतीर्थक्षेत्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

क्रोधाग्नी में जलकर अब तक, अपना सर्वस्व लुटाया है।
अब चंदन से पूजा करने का, भाव हृदय में आया है।।
वाराणसि नगरी का अर्चन, अब मुझको शांति दिलाएगी।
जिसकी पूजन से श्रीसुपाश्र्व, पारस की स्मृति आएगी।।२।।

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ॐ ह्रीं तीर्थंकरश्रीसुपाश्र्वनाथपाश्र्वनाथजन्मभूमि वाराणसीतीर्थक्षेत्राय संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।

अक्षयनिधि की पहचान बिना, जड़ को आत्मा मैंने माना।
पूजन में अक्षत पुंज चढ़ा, अब चाहू अक्षय पद पाना।।
वाराणसि नगरी की पूजन, अब मुझको शांति दिलाएगी।
जिसकी पूजन से श्रीसुपाश्र्व, पारस की स्मृति आएगी।।३।।

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ॐ ह्रीं तीर्थंकरश्रीसुपाश्र्वनाथपाश्र्वनाथजन्मभूमि वाराणसीतीर्थक्षेत्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।

मैं कामभोग की मदिरा से, अब तक मतवाला बना रहा।
उसकी संतृप्ति हेतू मैं, अब पुष्पमाल को चढ़ा रहा।।
वाराणसि नगरी का अर्चन, अब मुझको शांति दिलाएगी।
जिसकी पूजन से श्रीसुपाश्र्व, पारस की स्मृति आएगी।।४।।

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ॐ ह्रीं तीर्थंकरश्रीसुपाश्र्वनाथपाश्र्वनाथजन्मभूमि वाराणसीतीर्थक्षेत्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

इस क्षुधा रोग की ज्वाला से, भव भव में जलता आया हूँ।
उस ज्वाला की उपशांति हेतु, नैवेद्य चढ़ाने आया हूँ।।
वाराणसि नगरी का अर्चन, अब मुझको शांति दिलाएगी।
जिसकी पूजन से श्री सुपाश्र्व, पारस की स्मृति आएगी।।५।।

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ॐ ह्रीं तीर्थंकरश्रीसुपाश्र्वनाथपाश्र्वनाथजन्मभूमि वाराणसीतीर्थक्षेत्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

मोहान्धकार में पड़ा-पड़ा, संसार में ही परिभ्रमण किया।
वह मोह दूर करने हेतू, दीपक का अब अवलंब लिया।।
वाराणसि नगरी का अर्चन, अब मुझको शांति दिलाएगी।
जिसकी पूजन से श्रीसुपाश्र्व, पारस की स्मृति आएगी।।६।।

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ॐ ह्रीं तीर्थंकरश्रीसुपाश्र्वनाथपाश्र्वनाथजन्मभूमि वाराणसीतीर्थक्षेत्राय मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

कर्मों का इस आत्मा के संग, बंधन अनादि से चला किया।
उस बन्धन से मुक्ती हेतू, मैं धूप अग्नि में जला दिया।।
वाराणसि नगरी का अर्चन, अब मुझको शांति दिलाएगी।
जिसकी पूजन से श्रीसुपाश्र्व, पारस की स्मृति आएगी।।७।।

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ॐ ह्रीं तीर्थंकरश्रीसुपाश्र्वनाथपाश्र्वनाथजन्मभूमि वाराणसीतीर्थक्षेत्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।

इतने फल भव-भव में खाये, उसका फल क्या पाया मैंने।
उत्तम शिवफल की आश में अब, फल थाल चढ़ाया है मैंने।।
वाराणसि नगरी का अर्चन, अब मुझको शांति दिलाएगी।
जिसकी पूजन से श्रीसुपाश्र्व, पारस की स्मृति आएगी।।८।।

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ॐ ह्रीं तीर्थंकरश्रीसुपाश्र्वनाथपाश्र्वनाथजन्मभूमि वाराणसीतीर्थक्षेत्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।

सांसारिक अभिलाषाओं में, नहिं पद अनघ्र्य पहचान सका।
‘‘चन्दनामती’’ अब अघ्र्य लिये, किंचित् उस पद को जान सका।।
वाराणसि नगरी का अर्चन, अब मुझको शांति दिलाएगी।
जिसकी पूजन से श्रीसुपाश्र्व, पारस की स्मृति आएगी।।९।।

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ॐ ह्रीं तीर्थंकरश्रीसुपाश्र्वनाथपाश्र्वनाथजन्मभूमि वाराणसीतीर्थक्षेत्राय अनघ्र्यपदप्राप्तये अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।

दोहा
गंगनदी का नीर ले, करूँ तीर्थ पर धार।
आत्मा भी निर्मल बने, पाऊँ शांति अपार।।

शांतये शांतिधारा
वाराणसि उद्यान के, पुष्प सुगंधित लाय।
पुष्पांजलि अर्पण करूँ, वाराणसि के माँहि।।

दिव्य पुष्पांजलिः
प्रत्येक अघ्र्य (शंभु छंद)
(इति मंडलस्योपरि चतुर्थदले पुष्पांजल् क्षिपेत्)

भादों सुदि षष्ठी को जहाँ गर्भ, कल्याणक हुआ सुपारस का।
इन्द्रों ने तब उत्सव कीना, जिनवर के गर्भकल्याणक का।।
राजा सुप्रतिष्ठ की रानी पृथ्वी-षेणा भी तब पूज्य बनी।
उस गर्भागम से पावन नगरी, वाराणसि भी वंद्य घनी।।१।।

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ॐ ह्रीं तीर्थंकरश्रीसुपाश्व्र्रनाथगर्भकल्याणक पवित्रवाराणसीतीर्थक्षेत्राय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।

शुभ ज्येष्ठ सुदी बारस तिथि में, जहाँ श्रीसुपाश्र्व ने जन्म लिया।
उन जन्मकल्याणक घड़ियों ने, वाराणसि नगरी धन्य किया।।
स्वर्गों में वाद्य स्वयं बाजे, इन्द्रासन भी कम्पा उस क्षण।
उस जन्मभूमि वाराणसि की, अर्चना किया करते सुरगण।।२।।

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ॐ ह्रीं तीर्थंकरश्रीसुपाश्र्वनाथजन्मकल्याणक पवित्रवाराणसीतीर्थक्षेत्राय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।

वाराणसि के उपवन में ही, जिनवर सुपाश्र्व ने दीक्षा ली।
ऋतु परिवर्तन लख हो विरक्त, मोही परिजन को शिक्षा दी।।
वह तिथि भी ज्येष्ठ सुदी बारस, जब दीक्षा स्वयं लिया प्रभु ने।
दीक्षाकल्याणक से पवित्र, नगरी को अघ्र्य दिया मैंने।।३।।

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ॐ ह्रीं तीर्थंकरश्रीसुपाश्र्वनाथदीक्षाकल्याणक पवित्रवाराणसीतीर्थक्षेत्राय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।

वाराणसि के उद्यान सहेतुक, में शिरीष तरु के नीचे।
फाल्गुन वदि छट्ठ तिथी को केवल-ज्ञान प्राप्त किया जिनवर ने।।
घाती कर्मों का कर विनाश, शुभ समवसरण लक्ष्मी पाया।
मैं इसीलिए वाराणसि तीरथ, की पूजन करने आया।।४।।

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ॐ ह्रीं तीर्थंकरश्रीसुपाश्र्वनाथकेवलज्ञानकल्याणक पवित्रवाराणसी-तीर्थक्षेत्राय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।

फिर बाद करोड़ों वर्ष जहाँ, प्रभु पाश्र्वनाथ इतिहास चला।
वैशाख कृष्ण दुतिया को गर्भ-कल्याणक उत्सव वहाँ मना।।
पितु अश्वसेन माता वामा के, महलों में सुरगण आये।
उस पावन तीर्थ बनारस को, हम अघ्र्य चढ़ाकर हरषाये।।५।।

ॐ ह्रीं तीर्थंकरश्रीसुपाश्र्वनाथपाश्र्वनाथजन्मभूमि वाराणसीतीर्थक्षेत्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

तिथि पौष कृष्ण ग्यारस को, पारसनाथ जहाँ पर जन्मे थे।
मेरूपर्वत की पांडुशिला पर, अभिषव किया था इन्द्रों ने।।
उस जन्मकल्याणक से पावन, नगरी को अघ्र्य चढ़ाऊँ मैं।
वाराणसि तीरथ है प्रसिद्ध, उसकी गुणगाथा गाऊँ मैं।।६।।

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ॐ ह्रीं तीर्थंकरश्रीपाश्र्वनाथजन्मकल्याणक पवित्रवाराणसीतीर्थक्षेत्राय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।

जहाँ ऋषभदेव गुणगाथा सुन, पारसप्रभु को वैराग्य हुआ।
तिथि पौष वदी ग्यारस को प्रभु ने, राजपाट सब त्याग दिया।।
उन बालब्रह्मचारी प्रभु के, चरणों में शीश झुका मेरा।
उनकी दीक्षाभूमी वाराणसि, को है कोटि नमन मेरा।।७।।

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ॐ ह्रीं तीर्थंकरश्रीपाश्र्वनाथदीक्षाकल्याणक पवित्रवाराणसीतीर्थक्षेत्राय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।

जब पाश्र्वनाथ भगवान ध्यान में, लीन तपस्या में रत थे।
उपसर्ग किया तब पूर्व जन्म के, बैरी उस कमठासुर ने।।
धरणेंद्र और पद्मावती ने, उपसर्ग प्रभू का दूर किया।।
हुआ केवलज्ञान जहाँ प्रभु को, अहिच्छत्र तीर्थ वह पूज्य हुआ।।८।।

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ॐ ह्रीं तीर्थंकरश्रीपाश्र्वनाथ केवलज्ञानकल्याणक पवित्रअहिच्छत्रतीर्थ-क्षेत्राय अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।


पूर्णाघ्र्य
जिनवर सुपाश्र्व अरू पाश्र्वनाथ के, कल्याणक से पावन जो।
उनके प्राचीन कथानक से, है प्रसिद्ध तीर्थ बनारस वो।।
उस तीरथ से प्रार्थना मेरी, आत्मा भी तीरथ बन जावे।
मैं पूर्ण अघ्र्य अर्पित करता, मुझको अनघ्र्य पद मिल जावे।।९।।

ॐ ह्रीं तीर्थंकर श्रीसुपाश्र्वनाथपाश्र्वनाथगर्भजन्मादिकल्याणक पवित्र-वाराणसि तीर्थक्षेत्राय पूर्णाघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।
शांतये शांतिधारा, दिव्य पुष्पांजलिः।

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जाप्यमंत्र- ॐ ह्रीं वाराणसीजन्मभूमि पवित्रीकृत श्रीसुपाश्र्वनाथ पाश्र्वनाथ जिनेन्द्राभ्यां नमः।

जयमाला

(शंभु छंद)
शुभ तीर्थराज वाराणसि को, मेरा है कोटि-कोटि वन्दन।
प्रभु श्रीसुपाश्र्व अरु पाश्र्वनाथ की, जन्मभूमि को सदा नमन।।टेक.।।
तीर्थंकर श्री वृषभेश्वर की, आज्ञा से बसी नगरियाँ थीं।
उनमें से ही प्रसिद्ध वाराणसि, आदि कई नगरियाँ थीं।।
यहाँ प्रथम आदि तीर्थंकर के, चलते रहते थे सदा भजन।
शुभ तीर्थराज वाराणसि को, मेरा है कोटि-कोटि वन्दन।।१।।

जब-जब स्वर्गों से च्युत होकर, तीर्थंकर यहाँ जनमते थे।
तब-तब धनपति आकर रुचि से, बहुमूल्य रत्न बरसाते थे।।
माता की सेवा करके अष्ट, कुमारी होती थीं प्रसन्न।
शुभ तीर्थराज वाराणसि को, मेरा है कोटि-कोटि वन्दन।।२।।

दो बार हुई पन्द्रह-पन्द्रह, महिने तक यहाँ रतन वर्षा।
सौधर्म इन्द्र इक सहस नेत्र से, प्रभु को देख-देख हर्षा।।
मेरूपर्वत की पाण्डुशिला पर, किया प्रभू का जन्म न्हवन।
शुभ तीर्थराज वाराणसि को, मेरा है कोटि-कोटि वन्दन।।३।।

भगवान जहाँ खेले एवं, स्वर्गों का भोजन किया जहाँ।
तीर्थंकर श्रीसुपाश्र्व जिन ने, राजा बन राज्य किया था जहाँ।।
युवराज पाश्र्व ने दीक्षा ली, स्वयमेव बालब्रह्मचारी बन।
शुभ तीर्थराज वाराणसि को, मेरा है कोटि-कोटि वंदन।।४।।

सम्मेदशिखर से मोक्ष गये, पारस सुपाश्र्व द्वय तीर्थंकर।
उपसर्ग हुआ अहिछत्र में, केवलज्ञान लहा पारस जिनवर।।
तीर्थंकर प्रभु की पदरज से, धरती बन जाती नन्दनवन।
शुभ तीर्थराज वाराणसि को, मेरा है कोटि-कोटि वन्दन।।५।।

है वर्तमान में वाराणसि का, क्षेत्र भदैनी सुखकारी।
वह प्रभु सुपाश्र्व की जन्मभूमि, मानी जाती मंगलकारी।।
भेलूपुर पारसनाथ जिनेश्वर, का कहलाता जन्मस्थल।
शुभ तीर्थराज वाराणसि को, मेरा है कोटि-कोटि वंदन।।६।।

यह अघ्र्यथाल स्वीकार करो, आठों द्रव्यों से युक्त मेरा।
यह शब्दमाल स्वीकार करो, गुणवर्णन से संयुक्त मेरा।।
यह भक्तिमाल स्वीकार करो, भावों से मैं करता अर्चन।
शुभ तीर्थराज वाराणसि को, मेरा है कोटि-कोटि वंदन।।७।।

जन्मभूमि वाराणसी, है जग में सुप्रसिद्ध।
नमन ‘‘चन्दनामती’’ सदा, पूजन का है लक्ष्य।।८।।

ॐ ह्रीं तीर्थंकरश्रीसुपाश्र्वनाथपाश्र्वनाथजन्मभूमिवाराणसीतीर्थक्षेत्राय जयमाला पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
शांतये शांतिधारा, दिव्य पुष्पांजलिः।

गीता छन्द-जो भव्य प्राणी जिनवरों की, जन्मभूमि को नमें।
तीर्थंकरों की चरणरज से, शीश उन पावन बनें।।
कर पुण्य का अर्जन कभी तो, जन्म ऐसा पाएंगे।
तीर्थंकरों की श्रँखला में, ‘‘चंदना’’ वे आएंगे।।
 इत्याशीर्वादः पुष्पांजलिः।

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