ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.png
Whatsappicon.png
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें |


पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर, रविवार से ११ दिसंबर २०१६, रविवार तक प्रातः ६ बजे से ७ बजे तक सीधा प्रसारण होगा | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

040.आठवाँ - नवमाँ अधिकार - संयम के पाँच भेद संयमासंयम और असंयम

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


विषय सूची

[सम्पादन]
आठवाँ - नवमाँ अधिकार - संयम के पाँच भेद संयमासंयम और असंयम

Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
अथ संयममार्गणाधिकार:

अथ स्थलपंचकेन अष्टसूत्रै: संयममार्गणानामाष्टमोऽधिकार: प्रारभ्यते। तत्र प्रथमस्थले सामान्यसंयम-संख्या-द्विविधसंयमिनां प्रतिपादनत्वेन ‘‘संजमाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तदनु द्वितीयस्थले परिहारशुद्धि-संयमप्रतिपादनपरेण ‘‘परिहारसुद्धि-’’ इत्यादिसूत्रमेकं। तदनंतरं तृतीयस्थले सूक्ष्मसांपरायाणां प्रतिपादनत्वेन ‘‘सुहुम-’’ इत्यादिसूत्रमेकं। तत: परं चतुर्थस्थले यथाख्यातभगवतां प्रतिपादनत्वेन ‘‘जहाक्खाद-’’ इत्यादिसूत्रमेकं। तत्पश्चात् पंचमस्थले संयतासंयतादिकथनत्वेन ‘‘संजदासंजदा’’ इत्यादिसूत्रद्वयं इति पातनिका।

अधुना संयममार्गणाप्ररूपणार्थं सूत्रावतारो भवति-

संजमाणुवादेण अत्थि संजदा सामाइय-छेदोवट्ठावण-सुद्धिसंजदा परिहारसुद्धि-संजदा सुहुम-सांपराइय-सुद्धि-संजदा जहाक्खाद-विहार-सुद्धि-संजदा संजदासंजदा असंजदा चेदि।।१२३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका -संयमानुवादेन संयता:-षष्ठगुणस्थानादारभ्य अयोगिगुणस्थानपर्यन्ता: सन्ति। तेषामेव संयतानां संयमापेक्षया नामभेदा: उच्यन्ते-सामायिक-छेदोपस्थापनशुद्धिसंयता: परिहारशुद्धिसंयता: सूक्ष्मसांपरायशुद्धिसंयता: यथाख्यातविहारशुद्धिसंयता: संयतासंयता:-देशव्रतिन: असंयता:-प्रथमद्वितीय-तृतीयचतुर्थगुणस्थानवर्तिन: चेति सन्तीति।
अत्रापि सूत्रे अभेदापेक्षया पर्यायस्य पर्यायिव्यपदेश: दृश्यते। सम्-सम्यक् सम्यग्दर्शनज्ञानानुसारेण यता:-बहिरङ्गान्तरङ्गास्रवेभ्यो विरता: संयता:। ‘सर्वसावद्ययोगाद्विरतोऽस्मीति’ सकलसावद्ययोगविरति: सामायिकशुद्धिसंयमो द्रव्यार्थिकत्वात्। स्वान्तर्भाविताशेषसंयमविशेषैकयम: सामायिकशुद्धिसंयत इति यावत्।
तस्यैकस्य व्रतस्य छेदेन-द्वित्र्यादिभेदेन उपस्थापनं-व्रतसमारोपणं छेदोपस्थापनशुद्धिसंयम:। सकलव्रतानामेकत्वमापाद्य एकयमोपादानात् द्रव्यार्थिकनय: सामायिकशुद्धिसंयम:। तदैवेकं व्रतं पंचधा बहुधा वा विपाट्य धारणात् पर्यायार्थिकनय: छेदोपस्थापनशुद्धिसंयम:।
निशितबुद्धिजनानुग्रहार्थं द्रव्यार्थिकनयदेशना, मंदधियामनुग्रहार्थं पर्यायार्थिकनयदेशना। ततो नानयो: संयमयोरनुष्ठानकृतो विशेषोऽस्तीति।
द्वितयदेशनानुगृहीत एक एव संयम: इति चेत् ?
नैष दोष:, इष्टत्वात्। अनेनैवाभिप्रायेण सूत्रे पृथक् न शुद्धिसंयतग्रहणं कृतम्।
परिहारप्रधान: शुद्धिसंयत: परिहारशुद्धिसंयत:। त्रिंशद्वर्षाणि यथेच्छया भोगमनुभूय सामान्यरूपेण विशेषरूपेण वा संयममादाय द्रव्यक्षेत्रकालभावगत-परिमितापरिमितप्रत्याख्यानप्रतिपादकप्रत्याख्यानपूर्वमहार्णवं सम्यगधिगम्य व्यपगतसकलसंशय: तपोविशेषात्समुत्पन्नपरिहारद्र्धिस्तीर्थकरपादमूले परिहारशुद्धिसंयममादत्ते। एवमादाय स्थानगमनचङ्क्रमणाशनपानासनादिषु व्यापारेष्वशेषप्राणिपरिहरणदक्ष: परिहारशुद्धिसंयतो नाम।
उक्तं च जीवकाण्डटीकायां-‘‘सन्ध्यात्रयोनसर्वकाले द्विक्रोशप्रमाणविहारी रात्रौ विहाररहित: प्रावृट्कालनियमरहित: परिहारविशुद्धिसंयतो भवति।’’

[सम्पादन]
अथ संयममार्गणा अधिकार

अब पाँच स्थलों में आठ सूत्रों के द्वारा ‘‘संयममार्गणा’’ नामका आठवाँ अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें प्रथम स्थल में सामान्य संयम की संख्या तथा दो प्रकार के संयमियों के कथन की मुख्यता से ‘‘संजमाणुवादेण’’ इत्यादि तीन सूत्र कहेंगे, पुन: द्वितीय स्थल में परिहारविशुद्धि संयम का प्रतिपादन करने वाला ‘‘परिहारसुद्धि......’’ इत्यादि एक सूत्र है। उसके पश्चात् तृतीय स्थल में सूक्ष्मसांपराय जीवों का कथन करने वाला ‘‘सुहुम......’’ इत्यादि एक सूत्र है। तत्पश्चात् चतुर्थ स्थल में यथाख्यात चारित्रधारी भगवन्तों के कथन की मुख्यता से ‘‘जहाक्खाद....’’

इत्यादि एक सूत्र है। पुन: पंचम स्थल में संयतासंयत जीवों का कथन करने वाले ‘‘संजदासंजदा.......’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। इस प्रकार आठ सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

अब संयममार्गणा का प्ररूपण करने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

[सम्पादन]
सूत्रार्थ-

संयम-मार्गणा के अनुवाद से सामान्यसंयत, सामायिक-छेदोपस्थापनाशुद्धिसंयत, परिहारशुद्धिसंयत, सूक्ष्मसांपरायशुद्धिसंयत, यथाख्यातविहारशुद्धिसंयत ये पाँच प्रकार के संयत तथा संयतासंयत और असंयत जीव होते हैं।।१२३।।

सिद्धांतचिंतामणिटीका -संयममार्गणा के कथन से संयतजीव छठे गुणस्थान से प्रारंभ होकर अयोगकेवली नामक चौदहवें गुणस्थान तक होता है। उन्हीं संयतों के नाम और भेद संयम की अपेक्षा कहते हैं।

सामायिकशुद्धिसंयत, छेदोपस्थापनाशुद्धिसंयत, परिहारशुद्धिसंयत, सूक्ष्मसाम्परायशुद्धिसंयत, यथाख्यातविहारशुद्धिसंयत, संयतासंयत अर्थात् देशव्रती और असंयत प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ गुणस्थानवर्ती होते हैं।

यहाँ भी सूत्र में अभेद की अपेक्षा से पर्याय का पर्यायीरूप से कथन किया है। ‘‘सम्’’ उपसर्ग सम्यक् अर्थ का वाची है इसलिए सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञानपूर्वक ‘‘यता:’’ अर्थात् जो बहिरंग और अंतरंग आस्रवों से विरत हैं उन्हें संयत कहते हैं।

‘‘मैं सर्व सावद्य—सभी प्रकार के सावद्ययोग से विरत हूँ’’ इस प्रकार द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा सकल सावद्ययोग के त्याग को सामायिकशुद्धिसंयम कहते हैं। इस कथन से यह सिद्ध हुआ कि जिसने सम्पूर्ण संयम के भेदों को अपने अंतर्गत कर लिया है ऐसे अभेदरूप से एक यम को धारण करने वाला जीव सामायिकशुद्धिसंयत कहलाता है।

उस एक व्रत का छेद अर्थात् दो, तीन आदि के भेद से उपस्थापन करने को अर्थात् व्रतों के आरोपण करने को छेदोपस्थापनाशुद्धिसंयम कहते हैं। सम्पूर्ण व्रतों को सामान्य की अपेक्षा एक मानकर एक यम को ग्रहण करने वाला होने से सामायिक शुद्धिसंयम द्रव्यार्थिकनयरूप है। उसी एक व्रत को पाँच अथवा अनेक प्रकार के भेद करके धारण करने वाला होने से छेदोपस्थापना शुद्धिसंयम पर्यायार्थिकनरूप है। यहाँ पर तीक्ष्णबुद्धि मनुष्यों के अनुग्रह के लिए द्रव्यार्थिक नय का उपदेश दिया गया है और मंदबुद्धि प्राणियों का अनुग्रह करने के लिए पर्यायार्थिक नय का उपदेश दिया गया है। इसलिए इन दोनों संयमों में अनुष्ठानकृत कोई विशेषता नहीं है।

शंका-तब तो उपदेश की अपेक्षा संयम को भले ही दो प्रकार का कह लिया जावे पर वास्तव में तो वह एक ही है ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं है क्योंकि यह कथन हमें इष्ट ही है और इसी अभिप्राय से सूत्र में स्वतंत्ररूप से (सामायिक पद के साथ) ‘‘शुद्धिसंयत’’ पद का ग्रहण नहीं किया है।

जिसके हिंसा का परिहार ही प्रधान है ऐसे शुद्धिप्राप्त संयतों को परिहारशुद्धिसंयत कहते हैं। तीस वर्ष तक अपनी इच्छानुसार भोगों को भोग कर सामान्यरूप से अर्थात् सामायिक संयम को और विशेषरूप से अर्थात् छेदोपस्थापना संयम को धारण कर द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव के अनुसार परिमित या अपरिमित प्रत्याख्यान के प्रतिपादन करने वाले प्रत्याख्यानपूर्वरूपी महासमुद्र में अच्छी तरह प्रवेश करके जिसका संपूर्ण संशय दूर हो गया है और जिसने तपोविशेष से परिहार ऋद्धि को प्राप्त कर लिया है ऐसा जीव तीर्थंकर के पादमूल में परिहारशुद्धिसंयम को ग्रहण करता है। इस कारण संयम को धारण करके जो खड़े होना, गमन करना, यहाँ-वहाँ विहार करना, भोजन करना, पान करना और बैठना आदि सम्पूर्ण व्यापारों—क्रियाओं मेें प्राणियों की हिंसा के परिहार में दक्ष हो जाता है उसे परिहारशुद्धिसंयत कहते हैं।

[सम्पादन]
उक्तं च तत्रैव टीकायां-

परिहारद्र्धिसमेत:, षड्जीवनिकायसंकुले विहरन्।

पयसेव पद्मपत्रं, न लिप्यते पापनिवहेन।।
सांपराय:-कषाय:, सूक्ष्म:सांपरायो येषां ते सूक्ष्मसांपराया:। ते शुद्धसंयता:, सूक्ष्मसांपरायशुद्धिसंयता:। ते एव द्विधोपात्तसंयमा:-सामायिकशुद्धिसंयता: छेदोपस्थापनशुद्धिसंयता वा यदा सूक्ष्मीकृतकषाया भवन्ति तदा ते सूक्ष्मसांपरायशुद्धिसंयता: इत्युच्यन्ते इति यावत्।
यथाख्यातो यथाप्रतिपादित: विहार: कषायाभावरूपमनुष्ठानम्। यथाख्यातो विहारो येषां ते यथाख्यात- विहारा:। यथाख्यातविहाराश्च ते शुद्धिसंयताश्च यथाख्यातविहारशुद्धिसंयता:।
संयमानुवादेन असंयतानां संयतासंयतानां च ग्रहणं कथं भवेत् ?
नैतत्, आम्रतरुप्रधानवनान्तस्थनिम्बानामपि आम्रवनव्यपदेशदर्शनतोऽनेकान्तात्।
तेषां देशव्रतिनां असंयतानां च लक्षणं कथ्यते-
उक्तं च-
पंच-ति-चउव्विहेहि अणु-गुण-सिक्खा-वएहिं संजुत्ता।
वुच्चंति देसविरया सम्माइट्ठी ज्झरिय-कम्मा।
दंसणवयसामाइय-पोसह-सचित्त-राइभत्ते य।
बम्हारंभ-परिग्गह-अणुमण-उद्दिट्ठ-देसविरदे दे।।
जीवा चोद्दसभेया इंदियविसया तहट्ठवीसं तु।
जे तेसु णेव विरदा असंजदा ते मुणेयव्वा।।
पंचाणुव्रतत्रिगुणव्रतचतु:शिक्षाव्रतै: संयुक्तसम्यग्दृष्टय: कर्मनिर्जरावन्त: ते देशविरता: इति परमागमे उच्यन्ते। तत्र दार्शनिको, व्रतिक:, सामायिक:, प्रोषधोपवास:, सचित्तविरत:, रात्रिभक्तविरत:, ब्रह्मचारी, आरंभविरत:, परिग्रहविरत:, अनुमतिविरत:, उद्दिष्टविरतश्चेत्येकादशैते विरतभेदा:। तत्रापि-
पंचुंबरसहियाइं सत्तइ वसणाणि जो विवज्जेई।
सम्मत्तविसुद्धमई सो दंसणसावओ भणिओ।।
इत्यादिलक्षणानि श्रावकाचारग्रन्थादवगन्तव्यानि।
चतुर्दशजीवभेदा: तु पुन: इन्द्रियविषया: अष्टाविंशति:-पंच रसा:, पंच वर्णा:, द्वौ गंधौ, स्पर्शा: अष्टौ, स्वरा:-षड्ज-ऋषभ-गांधार-मध्यम-पंचम-धैवत-निषादा: सरगमपधनिरूपा: सप्त एते इन्द्रिय-विषया: सप्तविंशति। मनोविषय: एक: एवमष्टाविंशतिर्मन्तव्या:।
ये चतुर्दशजीवभेदेषु अष्टाविंशतिइंद्रियविषयेषु नैव विरता: तेऽसंयता: इति मन्तव्या:।
संप्रति संयतानां गुणस्थानव्यवस्थां व्यवस्थापयता सूत्रावतार: क्रियते आचार्येण-

संजदा पमत्तसंजद-प्पहुडि जाव अजोगिकेवलि त्ति।।१२४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-संयता: प्रमत्तसंयत-प्रभृति यावत् अयोगिकेवलिन: इति।
कश्चिदाह-बुद्धिपूर्विका सावद्यविरति: संयम:, स च केवलिषु न घटते ? नैतद् वक्तव्यं, अघातिचतुष्टयविनाशापेक्षया समयं प्रत्यसंख्यातगुणश्रेणिकर्मनिर्जरापेक्षया च सकलपापक्रियानिरोध-लक्षणपारिणामिकगुणाविर्भावापेक्षया च तत्र संयमोपचारात्। अथवा प्रवृत्त्यभावापेक्षया मुख्यसंयमोऽस्ति।

[सम्पादन]
जीवकाण्ड ग्रंथ की टीका में भी कहा है-

जो तीनों संध्याकालों को छोड़कर दो कोशप्रमाण विहार करता है, रात्रि में विहार नहीं करता, वर्षाकाल में उसके विहार न करने का नियम नहीं रहता है वह परिहारविशुद्धिसंयमी होता है। उसी ग्रंथ की टीका में आगे कहते हैं-

श्लोकार्थ- परिहारविशुद्धि ऋद्धि से संयुक्त जीव छहकाय के जीवों से भरे स्थान में विहार करते हुए भी पापसमूह से वैसे ही लिप्त नहीं होता जैसे कमल का पत्ता पानी में रहते हुए भी पानी से लिप्त नहीं होता।

साम्पराय का अर्थ है कषाय, सूक्ष्म कषाय है जिनके वे सूक्ष्मसाम्पराय कहे जाते हैं। वे शुद्ध संयत सूक्ष्मसाम्परायशुद्धिसंयत कहलाते हैं। वे ही साधु दोनों प्रकार के संयम को प्राप्त करके अर्थात् सामायिकशुद्धिसंयत अथवा छेदोपस्थापना शुद्धिसंयत जब अत्यन्त सूक्ष्मकषाय वाले हो जाते हैं तब वे ‘‘सूक्ष्मसाम्परायशुद्धिसंयत’’ कहे जाते हैं।

परमागम में विहार अर्थात् कषायों के अभावरूप अनुष्ठान का जैसा प्रतिपादन किया गया है तदनुकूल विहार जिनके पाया जाता है उन्हें यथाख्यातविहार कहते हैं। जो यथाख्यातविहार वाले होते हुए शुद्धिप्राप्त संयत हैं वे यथाख्यातविहारशुद्धिसंयत कहलाते हैं।

शंका -संयम मार्गणा के कथन से संयतों में संयतासंयत और असंयतों का ग्रहण कैसे हो सकता है ?

समाधान -ऐसा नहीं है क्योंकि जिस वन में आम्र वृक्षों की प्रधानता है उसमें रहने वाले नीम के वृक्षों की भी ‘‘आम्रवन’’ ऐसी संज्ञा देखने में आती है। अतएव अनेकांत का आश्रय लेने से संयतासंयत तथा असंयतों का भी संग्रह संयममार्गणा में ग्रहण किया है।

उन देशव्रतियों का एवं असंयतों का लक्षण कहते हैं-

कहा भी है-

[सम्पादन]
गाथार्थ-

जो सम्यग्दृष्टि जीव पाँच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत इस तरह कुल बारह व्रतों से युक्त हैं उनको देशविरत अथवा संयमासंयमी कहते हैं। इस देशसंयम के द्वारा जीवों के असंख्यातगुणी कर्मों की निर्जरा होती है।

दार्शनिक, व्रती, सामायिकी, प्रोषधोपवासी, सचित्तविरत, रात्रिभुक्तिविरत, ब्रह्मचारी, आरम्भविरत, परिग्रहविरत, अनुमतिविरत और उद्दिष्टविरत ये देशविरत (पाँचवें गुणस्थान) के ग्यारह भेद हैं।

चौदह प्रकार के जीवसमास और अट्ठाईस प्रकार के इंद्रियों के विषयों से जो विरक्त नहीं हैं उनको असंयत कहते हैं।

पाँच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रतों से संयुक्त सम्यग्दृष्टी जो कर्मों की निर्जरा करते हैं उन्हें परमागम में देशविरत कहते हैं। उनमें ही दार्शनिक, व्रतिक, सामायिक, प्रोषधोपवास, सचित्तविरत, रात्रिभुक्तिविरत, ब्रह्मचारी, आरंभविरत, परिग्रहविरत, अनुमतिविरत और उद्दिष्टविरत ये ग्यारह भेद होते हैं। उनमें भी—

[सम्पादन]
गाथार्थ-

पाँच उदुम्बर आदिक के साथ जो सात व्यसनों को भी छोड़ता है उस विशुद्ध सम्यक्त्वधारी को दार्शनिक श्रावक कहते हैं।

इत्यादि इन भेदों के लक्षण श्रावकाचार ग्रंथों से जानना चाहिए।

चौदह प्रकार के जीव और अट्ठाईस इंद्रिय विषय—पाँच रस, पाँच वर्ण, दो गंध, आठ स्पर्श, स्वर—षड्ज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद ये सा रे ग म प ध नि रूप सात स्वर हैं। सब मिलकर ये सत्ताईस इंद्रियविषय हैं और एक मन का विषय है, इस प्रकार अट्ठाईस विषय जानना चाहिए।

जो इन चौदह जीवसमासों में एवं अट्ठाईस इंद्रियविषयों में विरक्त नहीं हैं वे असंयत हैं ऐसा जानना चाहिए।

[सम्पादन]
भावार्थ-

पाँच रस (मीठा, खट्टा, कषायला, कडुवा, चरपरा), सफेद, पीला, हरा, लाल, काला ये पाँच वर्ण, सुगंध और दुर्गन्ध ये दो गंध, आठ स्पर्श (हल्का, भारी, कड़ा, नरम, रूखा, चिकना, ठण्डा, गरम), सात स्वर (षड्ज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद) और एक मन इस तरह ये इंद्रियों के अट्ठाईस विषय हैं। तथा चौदह जीवसमासों से जो विरक्त नहीं हैं वे असंयत कहलाते हैं तथा इनसे विरक्त जीव क्रमश: संयत की श्रेणी में आते हैं।

अब संयतों के गुणस्थानव्यवस्था का कथन कहते हुए आचार्यदेव सूत्र का अवतार करते हैं-

[सम्पादन]
सूत्रार्थ-

संयतजीव प्रमत्तसंयत से लेकर अयोगिकेवली गुणस्थान तक होते हैं।।१२४।।

सिद्धांतचिंतामणिटीका -प्रमत्तसंयत से लेकर अयोगकेवली गुणस्थान तक के जीव संयत शब्द से जाने जाते हैं।

यहाँ कोई शंका करता है कि बुद्धिपूर्वक सावद्ययोग के त्याग को संयम कहना तो ठीक है किन्तु वह संयम तो केवलियों में घटित नहीं होता है ?

समाधान -ऐसा नहीं कहना चाहिए क्योंकि चार अघातिया कर्मों के विनाश करने की अपेक्षा और समय-समय में असंख्यातगुणश्रेणी कर्मनिर्जरा की अपेक्षा सम्पूर्ण पापक्रिया के निरोधस्वरूप पारिणामिक गुण प्रगट हो जाता है इसलिए इस अपेक्षा से वहाँ संयम का उपचार किया जाता है अत: वहाँ संयम के मानने में कोई विरोध नहीं है। अथवा प्रवृत्ति के अभाव की अपेक्षा वहाँ पर मुख्य संयम है।

[सम्पादन]
अधुना उभयनयनिमित्तकसंयमगुणप्रतिपादनार्थं सूत्रावतारो भवति-

सामाइय-च्छेदोवट्ठावण-सुद्धि-संजदा पमत्तसंजद-प्पहुडि जाव अणियट्टि त्ति।।१२५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सामायिकच्छेदोपस्थापनाशुद्धिप्राप्तसंयता: प्रमत्तसंयतनामषष्ठगुणस्थानादारभ्य अनिवृत्तिकरणनामनवमगुणस्थानपर्यन्ता: सन्ति इति। अत्र ग्रन्थे इमौ द्वावपि संयमौ एक एव उच्यते। द्रव्यार्थिकपर्यायार्थिकनयद्वयनिबंधनत्वादिति।
एवं प्रथमस्थले संयम-सामायिकछेदोपस्थापनासंयमप्रतिपादनत्वेन सूत्रत्रयं गतं।

परिहारविशुद्धिनामद्वितीयसंयमप्रतिपादनार्थं सूत्रावतारो भवति-

परिहारसुद्धिसंजदा दोसु ट्ठाणेसु पमत्तसंजद-ट्ठाणे अपमत्त-संजदट्ठाणे।।१२६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-परिहारशुद्धिसंयता: द्वयो: गुणस्थानयो:-प्रमत्तसंयतगुणस्थाने अप्रमत्तसंयत-गुणस्थाने इति। किंच, ध्यानामृतसागरान्तर्निमग्नात्मनां वाचंयमानामुपहृतगमनागमनादिकायव्यापाराणां अपूर्वकरणादिगुणस्थानवर्तिमुनीनां परिहारशुद्धिसंयमानुपपत्ते:।
एवं द्वितीयस्थले परिहारशुद्धिसंयतकथनेन एकं सूत्रं गतम्।

अधुना तृतीयसंयमस्वामिप्रतिपादनार्थं सूत्रावतार: क्रियते-

सुहुमसांपराइय-सुद्धि-संजदा एक्कम्मि चेव सुहुमसांपराइयसुद्धिसंजद-ट्ठाणे।।१२७।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूक्ष्मसांपरायशुद्धिसंयता: मुनय: एकस्मिन् चैव सूक्ष्मसांपरायशुद्धिसंयतनाम-दशमगुणस्थाने सन्तीति।
एवं तृतीयस्थले सूक्ष्मसांपरायमुनिप्रतिपादनत्वेन एकं सूत्रं गतम्।

संप्रति चतुर्थसंयमस्वामिनिरूपणार्थं सूत्रमवतरति-

जहाक्खाद-विहार-सुद्धि-संजदा चदुसु ट्ठाणेसु उवसंतकसाय-वीयराय-छदुमत्था खीणकसाय-वीयराय-छदुमत्था सजोगिकेवली अजोगिकेवली त्ति।।१२८।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यथाख्यातविहारशुद्धिसंयता: चतुर्षु गुणस्थानेषु-उपशान्तकषायवीतरागछद्मस्था: क्षीणकषायवीतरागछद्मस्था: सयोगिकेवलिन: अयोगिकेवलिनश्च इति। अत्र चतुर्विध एव संयम: कथित:, सामायिकछेदोपस्थापनयोरभेदादिति ज्ञातव्यं। भेदापेक्षया पंचविधो वा अन्यत्र ग्रन्थेऽपि प्रतिपादनात्।
चारित्रं सर्वजिनैश्चरितं प्रोत्तं च सर्वशिष्येभ्य:।
प्रणमामि पंचभेदं, पंचम चारित्रलाभाय।।
एवं चतुर्थस्थले यथाख्यातसंयमिनां कथनमुख्यत्वेन एकं सूत्रं गतम्।

देशविरतगुणस्थानव्यवस्थाप्रतिपादनार्थं सूत्रमवतरति-

संजदासंजदा एक्कम्मि चेय संजदासंजदट्ठाणे।।१२९।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-संयतासंयता:-देशव्रतिन: प्रथमप्रतिमाया: आरभ्य एकादशप्रतिमाधारिण: श्रावका: क्षुल्लका: ऐलकाश्च इमे एकस्मिन् चैव संयतासंयतनामपंचमगुणस्थाने सन्ति।
एकादशप्रतिमाव्रतेभ्य: उपरिस्थिता: आर्यिका: उपचारेण महाव्रतिन्योऽपि पंचमगुणस्थाने एव वसन्ति, किंच द्रव्यस्त्रीणां भावपुरुषवेदधारिणीणामपि पंचमगुणस्थानपर्यंतमेव।

अधुना असंयतानां गुणस्थानव्यवस्थाप्रतिपादनाय सूत्रावतार: क्रियते-

असंजदा एइंदिय-प्पहुडि जाव असंजदसम्माइट्ठि त्ति।।१३०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-असंयता:-एकेन्द्रियादारभ्य असंयतसम्यग्दृष्टिपर्यंता: भवन्ति। प्रथमद्वितीयतृतीयचतुर्थगुणस्थानवर्तिन: जीवा: असंयता: एवेति।
मिथ्यादृष्टयोऽपि केचित् संयता: दृश्यन्ते इति चेत् ?
न, सम्यक्त्वमन्तरेण संयमानुपपत्ते:।
सिद्धानां क: संयमो भवतीति चेत् ?
नैकोऽपि संयम:,यथाबुद्धिपूर्वकनिवृत्तेरभावान्न संयतास्ते सिद्धा:, तत: एव न संयतासंयता: नाप्यसंयता: प्रणष्टाशेषपापक्रियत्वात्।
इत्थं संयममार्गणामभ्यस्य सकलसंयमो गृहीतव्य:, यावत्सकलसंयमग्रहणशक्तिर्न भवेत्तावद् देशव्रतान्यादाय सामायिकादिसंयमानां भावना भावयितव्या इति।
एवं संयमासंयम-असंयमिनां प्रतिपादनत्वेन सूत्रद्वयम्।
इत्थं संयममार्गणायां संयमसंयमासंयमासंयमधारिणां सामान्यकथनरूपेण एकं सूत्रं प्रतिपादितं, तत: परं गुणस्थानेषु संयतादीनां व्यवस्थाप्रतिपादनपरत्वेन सप्त सूत्राणि गतानि इति अष्टौ सूत्राणि गतानि।
अथ राजस्थानप्रदेशे झालरापाटननामनगरे वीराब्दे द्वाविंशत्युत्तरपंचविंशतिशततमे फाल्गुनशुक्ला-तृतीयायां प्राचीननिषद्यानामलघुपर्वते ‘सिद्धाचल’ रचनाया: शिलान्यास: कारित:। अत्र स्थाप्यमानजिनचरणानि श्रीपाश्र्वनाथजिनप्रतिमाश्च सर्वत्र विपदमपसार्य संपदं संपादयन्तु इति काम्यते मया।

इति षट्खण्डागमप्रथमखण्डस्य गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां संयममार्गणानाम अष्टमोऽधिकार: समाप्त:।

[सम्पादन]
अब द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक इन दोनों नयों के निमित्त से माने गये संयम के गुणस्थान का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

सामायिक और छेदोपस्थापनारूप शुद्धि को प्राप्त संयतजीव प्रमत्तसंयत से लेकर अनिवृत्तिकरण गुणस्थान तक होते हैं।।१२५।।

सिद्धांतचिंतामणिटीका-सामायिक और छेदोपस्थापना शुद्धि को प्राप्त संयत जीव प्रमत्तसंयत नामक छठे गुणस्थान से लेकर अनिवृत्तिकरण नामक नवमें गुणस्थान पर्यन्त होते हैं। इस ग्रंथ में ये दोनों संयम एकरूप ही माने गये हैं। क्योंकि द्रव्यार्थिक-पर्यायार्थिक इन दोनों नयों के निमित्त से यहाँ संयम का कथन किया गया है।

इस प्रकार प्रथमस्थल में सामायिक और छेदोपस्थापना संयम के प्रतिपादन की मुख्यता से तीन सूत्र पूर्ण हुए।

अब आगे परिहारविशुद्धि नामक द्वितीय संयम के प्रतिपादन हेतु सूत्र का अवतार होता है-

[सम्पादन]
सूत्रार्थ-

परिहारशुद्धिसंयत प्रमत्त और अप्रमत्त इन दो गुणस्थानों में होते हैं।।१२६।।

सिद्धांतचिंतामणिटीका-प्रमत्त और अप्रमत्त इन दो गुणस्थानों में परिहारशुद्धिसंयम को पालन करने वाले संयत जीव होते हैं क्योंकि जिनकी आत्मा ध्यानरूपी अमृत के सागर में निमग्न है, जो वचन यम (मौन) का पालन करते हैं और जिन्होंने आने-जाने रूप सम्पूर्ण शरीरसम्बंधी व्यापार—क्रिया को संकुचित कर लिया है ऐसे अपूर्वकरण आदि गुणस्थानवर्ती महामुनियों के परिहारशुद्धिसंयम नहीं होता है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में परिहारशुद्धि संयतों का कथन करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

अब तृतीय संयम के स्वामियों का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

[सम्पादन]
सूत्रार्थ-

सूक्ष्मसाम्परायशुद्धिसंयत जीव एक सूक्ष्मसाम्परायशुद्धिसंयत गुणस्थान में ही होते हैं।।१२७।।

सिद्धांतचिंतामणिटीका-दशवें गुणस्थान का नाम है—सूक्ष्मसाम्पराय, उसी एक गुणस्थान में सूक्ष्मसाम्परायशुद्धिसंयम का पालन करने वाले संयमी जीव रहते हैं।

इस प्रकार तृतीय स्थल में सूक्ष्मसाम्पराय मुनियों का कथन करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

अब चतुर्थ संयम के स्वामी का निरूपण करने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

[सम्पादन]
सूत्रार्थ-

यथाख्यातविहारशुद्धिसंयत जीव उपशांतकषायवीतरागछद्मस्थ, क्षीणकषायवीतराग छद्मस्थ, सयोगकेवली और अयोगकेवली इन चार गुणस्थानों में होते हैं।।१२८।।

सिद्धांतचिंतामणिटीका-उपर्युक्त चार गुणस्थानों में यथाख्यातविहारशुद्धिसंयत जीव पाये जाते हैं। यहाँ चार प्रकार के ही संयम कहे गये हैं क्योंकि सामायिक और छेदोपस्थापना संयम में अभेद है। भेद की अपेक्षा से अन्यत्र ग्रंथ में पाँच प्रकार का संयम प्रतिपादित किया है। कहा भी है-

श्लोकार्थ-समस्त जिनेश्वर देवों ने चारित्र का पालन किया तथा शिष्यों के लिए उसी चारित्र का उपदेश दिया है। उस पाँच भेद युक्त चारित्र को मैं पंचम (यथाख्यात) चारित्र की प्राप्ति हेतु नमन करता हूँ।।

पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने इस गाथा के पद्यानुवाद में बतलाया है-

सभी जिनेश्वर ने भवदुखहर, चारित को पाला रुचि से।

सब शिष्यों को भी उपदेशा, विधिवत् सम्यक् चारित ये।।
पाँच भेदयुत सम्यक्चारित, को प्रणमूँ मैं भक्ती से।

पंचम यथाख्यात चारित की, प्राप्ति हेतु वंदूं मुद से।।

इस प्रकार चतुर्थ स्थल में यथाख्यात संयमी जीवों के कथन की मुख्यता से एक सूत्र पूर्ण हुआ।

अब देशविरत गुणस्थान की व्यवस्था का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

[सम्पादन]
सूत्रार्थ-

संयतासंयत जीव एक संयतासंयत नामक गुणस्थान में ही होते हैं।।१२९।।

सिद्धांतचिंतामणिटीका-प्रथम प्रतिमा से लेकर ग्यारह प्रतिमाधारी श्रावक, क्षुल्लक और ऐलक देशव्रती श्रावक कहलाते हैं और ये संयतासंयत नामके पाँचवें गुणस्थान में होते हैं।

ग्यारह प्रतिमा के व्रतों से ऊपर स्थित आर्यिका माताएँ उपचार से महाव्रती होते हुए भी पंचम गुणस्थान में ही रहती हैं क्योंकि द्रव्यस्त्रीवेदी महिलाओं के कदाचित् भाव से पुरुषवेद होने पर भी पंचम गुणस्थान तक ही होते हैं।

अब असंयत जीवों की गुणस्थान व्यवस्था का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार किया जाता है-

[सम्पादन]
सूत्रार्थ-

असंयतजीव एकेन्द्रिय से लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान तक होते हैं।।१३०।।

सिद्धांतचिंतामणिटीका-एकेन्द्रिय से लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि पर्यन्त जीव प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ गुणस्थानवर्ती होते हैं।

शंका-कई मिथ्यादृष्टिजीव भी संयत देखे जाते हैं ?

समाधान-नहीं, क्योंकि सम्यग्दर्शन के बिना संयम की उत्पत्ति नहीं हो सकती है।

शंका-सिद्ध जीवों के कौन सा संयम होता है ?

समाधान-सिद्ध जीवों के एक भी संयम नहीं होता है। उनके बुद्धिपूर्वक निवृत्ति का अभाव होने से जिसलिए वे संयत नहीं हैं इसलिए संयतासंयत नहीं है और असंयत भी नहीं हैं क्योंकि उनके संपूर्ण पापरूप क्रियाएँ नष्ट हो चुकी हैं।

इस प्रकार संयम मार्गणा में सकलसंयम को ग्रहण करना चाहिए, जब तक सकलसंयम को ग्रहण करने की शक्ति न होवे तब तक देशव्रतों को ग्रहण करके सामायिक आदि संयमों की भावना भानी चाहिए।

इस प्रकार संयमासंयम एवं असंयमी जीवों के प्रतिपादन की मुख्यता से दो सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार संयममार्गणा में संयम, संयमासंयम एवं असंयमधारी जीवों का सामान्य कथन करने वाला एक सूत्र प्रतिपादित किया है, उसके पश्चात् गुणस्थानों में संयत आदिकों की व्यवस्था का प्रतिपादन करने वाले सात सूत्र पूर्ण हुए। इस तरह आठ सूत्र पूर्ण हुए।

राजस्थान प्रदेश के ‘‘झालरापाटन’’ नामके नगर में वीर निर्वाण संवत् पच्चीस सौ बाईस (२५२२) की फाल्गुन शुक्ला तृतीया के दिन प्राचीन नशिया नाम की एक लघुकाय पहाड़ी पर ‘‘सिद्धाचल’’ नामकी नूतन रचना का मैंने शिलान्यास कराया। यहाँ स्थापित होने वाले जिनचरण एवं भगवान पाश्र्वनाथ की प्रतिमा सभी जगह की विपत्ति को दूर करके सम्पत्ति का विस्तार करें यही मेरी कामना है।

इस प्रकार षट्खंडागम ग्रंथ के प्रथम खंड में गणिनी ज्ञानमतीकृत ‘‘सिद्धांतचिंतामणि’’ नामक टीका में संयममार्गणा नाम का अष्टम अधिकार समाप्त हुआ।

[सम्पादन]
नवमाँ अधिकार - दर्शनमार्गणा में चार भेद'

अथ दर्शनमार्गणाधिकार:

अथ स्थलद्वयेन पंचसूत्रै: दर्शनमार्गणानाम नवमोऽधिकार: प्रारभ्यते। तत्र प्रथमस्थले सामान्य-दर्शन-चक्षुरचक्षुर्दर्शनकथनेन ‘‘दंसणाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तत: परं द्वितीयस्थले अवधि-केवलदर्शननिरूपणत्वेन ‘‘ओधिदंसणी’’ इत्यादिसूत्रद्वयं इति समुदायपातनिका।

सांप्रतं दर्शनगुणप्रतिपादनार्थं सूत्रमवतरति-

दंसणाणुवादेण अत्थि चक्खुदंसणी अचक्खुदंसणी ओधिदंसणी केवलदंसणी चेदि।।१३१।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-दर्शनमार्गणाया अनुवादेन-कथनेन चक्षुर्दर्शनाचक्षुर्दर्शनावधिदर्शनकेवलदर्शन-धारिणो जीवाश्च सन्तीति।
चक्षुषा सामान्यस्यार्थस्य ग्रहणं चक्षुर्दर्शनम्। अस्य दर्शनस्य अन्तरङ्गार्थविषयत्वात्। अन्तरङ्गार्थोऽपि सामान्यविशेषात्मक: इति। अत्र सामान्यविशेषात्मकस्यात्मन: सामान्यशब्दवाच्यत्वेनोपादानात्। चक्षुरिन्द्रियक्षयोपशमो हि नाम रूप एव नियमितस्ततो रूपविशिष्टस्यैवार्थग्रहणस्योपलम्भात्। आत्मव्यतिरिक्तक्षयोपशमाभावादात्मापि तद्द्वारेण समान:, तस्य भाव: सामान्यम्, तद्दर्शनस्य विषय: इति स्थितम्।
दर्शनावरणीयकर्मणोऽस्तित्वान्यथानुपपत्ते: अन्तरङ्गार्थविषयोपयोगप्रतिबंधकं दर्शनावरणीयम्। बहिरङ्गार्थविषयोपयोगप्रतिबंधकं ज्ञानावरणम् इति प्रतिपत्तव्यम्। अतो अन्तरङ्गार्थविषयोपयोग: दर्शनमिति ज्ञातव्यम्।
आत्मविषयोपयोगस्य दर्शनत्वेऽङ्गीक्रियमाणे आत्मनो विशेषाभावाच्चतुर्णामपि दर्शनानामविशेष: स्यादिति चेत् ?
नैष दोष:, यद् यस्य ज्ञानस्योत्पादकं स्वरूपसंवेदनं तस्य तद्दर्शनव्यपदेशात् न दर्शनस्य चातुर्विध्य- नियम:। यावन्तश्चक्षुरिन्द्रियक्षयोपशमजनितज्ञानस्य विषयभावमापन्ना: पदार्थास्तावन्त एव आत्मस्थक्षयोपशमास्तत्तन्नामान: तद्द्वारेणात्मापि तावानेव, तच्छक्तिखचितात्मपरिच्छित्तिदर्शनम्। न चैतत्काल्पनिकं परमार्थत: एव परोपदेशमन्तरेण शक्त्या सहात्मन: उपलंभात्।
न दर्शनानामक्रमेण प्रवृत्तिज्र्ञानानामक्रमेणोत्पत्त्यभावतस्तदभावात्। एवं शेषदर्शनानामपि वक्तव्यम्। ततो न दर्शनानामेकत्वमिति।
उक्तं च-
चक्खूण जं पयासदि दिस्सदि तं चक्खुदंसणं वेंति।
सेसिंदिय-प्पयासो णादव्वो सो अचक्खु त्ति।।
परमाणुआदियाइं अंतिमखंधं ति मुत्तिदव्वाइं।
तं ओधिदंसणं पुण जं पस्सइ ताइं पच्चक्खं।।
बहुविह बहुप्पयारा उज्जोवा परिमियम्हि खेत्तम्हि।
लोगालोग अतिमिरो जो केवलदंसणुज्जोवो।।
चक्खूण-नयनयो: संबंधि यत्सामान्यग्रहणं प्रकाशते पश्यति तद्वा दृश्यते जीवेनानेन कृत्वा तद्वा तद्विषयप्रकाशनमेव तद्वा चक्षुर्दर्शनमिति गणधरदेवादयो ब्रुवन्ति। यश्च शेषेन्द्रियप्रकाश: स अचक्षुर्दर्शनमिति। परमाणोरारभ्य महास्कंधपर्यंतं मूर्तद्रव्याणि पुन: यद्दर्शनं प्रत्यक्षं पश्यति तदवधिदर्शनं भवति। बहुविधा:-तीव्रमंदमध्यमादिभावेन अनेकविधा: बहुप्रकाराश्चोद्योता: चन्द्रसूर्यरत्नादिप्रकारा: लोके परिमितक्षेत्रे एव भवन्ति तै: प्रकाशैरनुपमेय: लोकालोकयोर्विगततिमिरो य: स केवलदर्शनोद्योतो भवति।
चक्षुर्दर्शने गुणस्थानव्यवस्थाप्रतिपादनार्थं सूत्रावतार: क्रियते-

चक्खुदंसणी चउरिंदिय-प्पहुडि जाव खीणकसाय-वीयराय-छदुमत्था त्ति।।१३२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-चक्षुर्दर्शनिनो जीवा: चतुरिन्द्रियादारभ्य यावत् क्षीणकषाय-वीतरागछद्मस्था: इति।


[सम्पादन]
अथ दर्शनमार्गणा अधिकार

अब दो स्थलों में पाँच सूत्रों के द्वारा दर्शनमार्गणा नामका नवमाँ अधिकार प्रारंभ होता है। उसमें प्रथमस्थल में सामान्य दर्शन तथा चक्षु-अचक्षु दर्शन के कथन की मुख्यता से ‘‘दंसणाणुवादेण’’ इत्यादि तीन सूत्र कहेंगे, उसके पश्चात् द्वितीय स्थल में अवधिदर्शन और केवलदर्शन का निरूपण करने वाले ‘‘ओधिदंसणी’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। ऐसी यह समुदायपातनिका हुई।

अब दर्शनगुण का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार होता है—

[सम्पादन]
सूत्रार्थ—

दर्शनमार्गणा के कथन द्वारा चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन और केवलदर्शन के धारण करने वाले जीव होते हैं।।१३१।।

सिद्धांतचिंतामणिटीका —दर्शनमार्गणा के कथन द्वारा चारों प्रकार के दर्शनधारी जीवों का प्ररूपण किया जा रहा है।

चक्षु इंद्रिय के द्वारा सामान्य अर्थ-पदार्थ के ग्रहण करने को चक्षुदर्शन कहते हैं। क्योंकि वह दर्शन अंतरंग पदार्थ को विषय करता है और अंतरंग पदार्थ भी सामान्य-विशेषात्मक होता है। यहाँ पर सामान्यविशेषात्मक आत्मा को सामान्यशब्द के वाच्यरूप से ग्रहण किया है।

चक्षु इंद्रियावरण का क्षयोपशम नामरूप में ही नियमित है इसलिए उससे रूपविशिष्ट ही पदार्थ का ग्रहण पाया जाता है। इसलिए आत्मा भी क्षयोपशम की अपेक्षा समान है और उस समान के भाव को सामान्य कहते हैं, वह दर्शन का विषय है।

दर्शन यदि न हो तो दर्शनावरण कर्म का अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता है अत: अंतरंग पदार्थ को विषय करने वाले उपयोग का प्रतिबन्धक दर्शनावरण कर्म है और बहिरंग पदार्थ को विषय करने वाले उपयोग का प्रतिबन्धक ज्ञानावरण कर्म है ऐसा जानना चाहिए।

शंका —आत्मा को विषय करने वाले उपयोग को दर्शन स्वीकार कर लेने पर आत्मा में कोई विशेषता नहीं होने से चारों दर्शनों में भी कोई भेद नहीं रह जाएगा ?

समाधान —यह कोई दोष नहीं है क्योंकि जो जिस ज्ञान का उत्पन्न करने वाला स्वरूपसंवेदन है उसको उसी नामका दर्शन कहा जाता है। इसीलिए दर्शन के चार प्रकार के होने का कोई नियम नहीं है। चक्षु इंद्रियावरण कर्म के क्षयोपशम से उत्पन्न हुए ज्ञान के विषयभाव को प्राप्त जितने पदार्थ हैं उतने ही आत्मा में स्थित क्षयोपशम उन-उन संज्ञाओं को प्राप्त होते हैं और उनके निमित्त से आत्मा भी उतने ही प्रकार का हो जाता है अत: इस प्रकार की शक्तियों से युक्त आत्मा के संवदेन करने को दर्शन कहते हैं। यह सब कथन काल्पनिक भी नहीं हैं क्योंकि परोपदेश के बिना अनेक शक्तियों से युक्त आत्मा की परमार्थ से उपलब्धि होती है।

सभी दर्शनों की अक्रम से प्रवृत्ति होती हो सो भी बात नहीं है क्योेंकि ज्ञानों की एक साथ उत्पत्ति नहीं होती है अत: सम्पूर्ण दर्शनों की भी एक साथ उत्पत्ति नहीं होती है। इसी प्रकार शेष दर्शनों का भी कथन करना चाहिए। इसलिए दर्शनों में एकता अर्थात् अभेद सिद्ध नहीं हो सकता है। कहा भी है—

[सम्पादन]
गाथार्थ—

जो चक्षु इंद्रिय के द्वारा प्रकाशित होता है अथवा दिखाई देता है उसे चक्षुदर्शन कहते हैं तथा शेष इंद्रिय और मन से जो प्रतिभास होता है उसे अचक्षुदर्शन कहते हैं।

परमाणु से आदि लेकर अन्तिम स्कन्धपर्यन्त मूर्त पदार्थों को जो प्रत्यक्ष देखता है उसे अवधिदर्शन कहते हैं।

अपने-अपने अनेक प्रकार के भेदों से युक्त बहुत प्रकार के प्रकाश इस परिमित क्षेत्र में ही पाये जाते हैं। परन्तु जो केवलदर्शनरूपी उद्योत है वह लोक और अलोक को भी तिमिर रहित कर देता है।

दोनों नेत्रसंबंधी सामान्य ग्रहण को जो देखता है अथवा इस जीव के द्वारा देखा जाता है अथवा सामान्य मात्र का प्रकाशन दर्शन है, यह गणधर देव आदि कहते हैं। शेष इंद्रियों का जो प्रकाश है वह अचक्षुदर्शन है। परमाणु से लेकर महास्कंध पर्यन्त सब मूर्तिक द्रव्यों को जो प्रत्यक्ष देखता है वह अवधिदर्शन है। तीव्र, मंद, मध्यम आदि के भेद से अनेक प्रकार के चंद्र, सूर्य, रत्न आदि संबंधी उद्योत परिमित क्षेत्र को ही प्रकाशित करने वाले हैं। उन प्रकाशों की उपमा जिसे नहीं दी जा सकती ऐसा जो लोक-अलोक दोनों को प्रकाशित करने वाला है वह केवलदर्शनरूप उद्योत है।

अब चक्षुदर्शन में गुणस्थान व्यवस्था का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार किया जाता है—

[सम्पादन]
सूत्रार्थ—

चक्षुदर्शन उपयोगवाले जीव चतुरिन्द्रिय से लेकर क्षीणकषाय-छद्मस्थवीतराग गुणस्थान तक होते हैं।।१३२।।

सिद्धांतचिंतामणिटीका —चार इंद्रिय से लेकर क्षीणकषाय वीतरागछद्मस्थ गुणस्थान पर्यन्त सभी जीव चक्षुदर्शन वाले होते हैं।

[सम्पादन]
अचक्षुर्दर्शने गुणस्थानव्यवस्थानिरूपणार्थं सूत्रावतारो भवति-

अचक्खु-दंसणी एइंदिय-प्पहुडि जाव खीणकसाय-वीयराय-छदुमत्था त्ति।।१३३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका -अचक्षुर्दर्शनिनो जीवा: एकेन्द्रिय-प्रभृति यावत् क्षीणकषायवीतरागछद्मस्था: इति। स्वरूपसंवेदनं दर्शनमिति अंगीकर्तव्यं।
ज्ञानमेव द्विस्वभावं मन्तव्यं इति चेत् ?
न, स्वस्माद् भिन्नवस्तुपरिच्छेदकं ज्ञानम्, स्वतोऽभिन्नवस्तुपरिच्छेदकं दर्शनम् ततो नानयोरेकत्वमिति। केवलिभगवतो: ज्ञानदर्शनयोरक्रमेण प्रवृत्ति: भवति, क्षीणावरणे द्वयोरक्रमेण प्रवृत्त्युपलंभात्।
छद्मस्थावस्थायामपि अक्रमेण प्रवृत्ति: किन्न स्यात् ?
आवरणनिरुद्धाक्रमयोरक्रमवृत्तिविरोधात्।
श्रुतदर्शनं किमिति नोच्यते ?
न उच्यते, तस्य मतिपूर्वकस्य दर्शनपूर्वकत्वविरोधात्। यदि बहिरंगार्थसामान्यविषयं दर्शनमभविष्यत् तदा श्रुतदर्शनमपि समभविष्यत्।
एवं प्रथमस्थले सामान्यदर्शन-चक्षुरचक्षुर्निरूपणत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।

अवधिदर्शने गुणस्थाननिरूपणार्थं सूत्रावतारो भवति-

ओधिदंसणी असंजदसम्माइट्ठि-प्पहुडि जाव खीणकसायवीयराय-छदुमत्था त्ति।।१३४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका -अवधिदर्शनधारिणो जीवा: असंयतगुणस्थानादारभ्य क्षीणकषायवीतरागछद्मस्थ-नामद्वादशमगुणस्थानपर्यंता: भवन्तीति।
विभंगदर्शनं किमिति पृथग्नोपदिष्टं ?
न, तस्यावधिदर्शनेऽन्तर्भावात्।
मन:पर्ययदर्शनं तर्हि वक्तव्यम् ?
न, मतिपूर्वकत्वात्तस्य दर्शनाभावात्।

संप्रति केवलदर्शनस्वामिप्रतिपादनार्थं सूत्रावतार: क्रियते श्रीमत्पुष्पदंताचार्येण-

केवलदंसणी तिसु ट्ठाणेसु सजोगिकेवली अजोगिकेवली सिद्धा चेदि।।१३५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका -केवलदर्शनी त्रिषु गुणस्थानेषु सयोगिकेवली अयोगिकेवली सिद्धाश्चेति। अनन्तत्रिकालगोचरबाह्येऽर्थे प्रवृत्तं केवलज्ञानं, स्वात्मनि त्रिकालगोचरे प्रवृत्तं केवलदर्शनम्।
पुन: कथमनयो: समानता इति चेत् ?
कथ्यते, ज्ञानप्रमाणमात्मा, ज्ञानं च त्रिकालगोचरानन्तद्रव्यपर्यायपरिमाणं ततो ज्ञानदर्शनयो: समानत्वमिति।
स्वजीवस्थपर्यायैज्र्ञानाद् दर्शनमधिकं इति चेत् ?
न, इष्टत्वात् ?
कथं पुनस्तेन तस्य समानत्वं ?
न, अन्योन्यात्मकयोस्तदविरोधात्।
उक्तं च-
आदा णाणपमाणं णाणं णेयप्पमाणमुद्दिट्ठं।
णेयं लोआलोअं तम्हा णाणं तु सव्वगयं।।
एय दवियम्मि जे अत्थपज्जया वयणपज्जया वावि।
तीदाणागय-भूदा तावदियं तं हवइ दव्वं।।
ज्ञानेन सह हीनाधिकत्वाभावादात्मा ज्ञानप्रमाणो भवति। तथाहि-‘‘समगुणपर्यायं द्रव्यं भवतीति’’ वचनात् वर्तमानमनुष्यभवे वर्तमानमनुष्यपर्यायसमान:, तदेव मनुष्यपर्यायप्रदेशवर्तिज्ञानगुणप्रमाणश्च प्रत्यक्षेण दृश्यते यथायमात्मा, तथा निश्चयत: सर्वदैवाव्याबाधाक्षयसुखाद्यनन्तगुणाधारभूतो योऽसौ केवलज्ञान-गुणस्तत्प्रमाणोऽयमात्मा। बाह्यनिष्ठदहनवत् ज्ञानं ज्ञेयप्रमाणमुद्दिष्टं कथितंं। ज्ञेयं लोकालोकं भवति। तस्मात् व्यवहारनयेन तु ज्ञानं सर्वगतं भण्यते। तत: स्थितमेतदात्मा ज्ञानप्रमाणं ज्ञानं सर्वगतमिति।

एकस्मिन् द्रव्ये ये अर्थपर्याया: व्यञ्जनपर्यायाश्च अतीतानागता: ‘अपि’ शब्दात् वर्तमानाश्च सन्ति तावत् तद् द्रव्यं भवति।
तात्पर्यमेतत्-आत्मन: अनन्तगुणेषु ज्ञानगुण एक एव सर्वोत्कृष्ट:, एतज्ज्ञात्वा निजज्ञानगुणं पूर्णीकरणाय सर्वशक्त्या पुरुषार्थो विधेय: अस्माभिरिति।

एवं द्वितीयस्थले अवधिकेवलदर्शनकथनत्वेन सूत्रद्वयं गतम्।
इति षट्खण्डागमप्रथमखंडे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां दर्शनमार्गणानाम-नवमोऽधिकार: समाप्त:।

[सम्पादन]
अचक्षुदर्शन में गुणस्थानव्यवस्था का निरूपण करने हेतु सूत्र का अवतार होता है—

सूत्रार्थ—

अचक्षुदर्शन उपयोग वाले जीव एकेन्द्रिय से लेकर क्षीणकषाय-वीतराग-छद्मस्थ गुणस्थान तक होते हैं।।१३३।।

सिद्धांतचिंतामणिटीका—एक इंद्रिय से लेकर क्षीणकषायवीतरागछद्मस्थ गुणस्थान तक के जीव अचक्षुदर्शन वाले होते हैं। यहाँ दर्शन शब्द से स्वरूपसंवेदनरूप दर्शन को ग्रहण करना चाहिए।

शंकाज्ञान को ही दो स्वभाव वाला मान लेना चाहिए ?

समाधान—नहीं, क्योंकि अपने से भिन्न वस्तु का परिच्छेदक ज्ञान है और अपने से अभिन्न वस्तु का परिच्छेदक दर्शन है, इसलिए दोनों में एकपना नहीं बन सकता है। केवली भगवन्तों के ज्ञान-दर्शन की प्रवृत्ति अक्रम से-युगपत् होती है क्योंकि आवरण कर्म से रहित जीवों में दोनों की प्रवृत्ति अक्रम-एकसाथ ही देखी जाती है।

शंका—छद्मस्थ अवस्था में भी अक्रम से प्रवृत्ति क्यों नहीं होती है ?

समाधान—नहीं, क्योंकि आवरणकर्म के उदय से जिनकी युगपत् प्रवृत्ति करने की शक्ति रुक गई है ऐसे छद्मस्थ जीवों के ज्ञान और दर्शन में युगपत् प्रवृत्ति मानने में विरोध आता है।

शंका—यहाँ पर श्रुतदर्शन का कथन क्यों नहीं किया है ?

समाधान—नहीं किया है, क्योंकि मतिज्ञानपूर्वक होने वाले श्रुतज्ञान को दर्शनपूर्वक मानने में विरोध आता है। यदि बहिरंग पदार्थ को सामान्य रूप से विषय करने वाला दर्शन होता तो श्रुतदर्शन भी होता, परन्तु ऐसा नहीं है इसलिए श्रुतज्ञान के पहले दर्शन नहीं होता है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में सामान्य दर्शन एवं चक्षु - अचक्षु दर्शन का निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

अवधिदर्शन में गुणस्थानों का निरूपण करने हेतु सूत्र का अवतार होता है—

[सम्पादन]
सूत्रार्थ—

अवधिदर्शन वाले जीव असंयत से लेकर क्षीणकषाय-वीतरागछद्मस्थ गुणस्थान तक होते हैं।।१३४।।

सिद्धांतचिंतामणिटीका—असंयत गुणस्थान से लेकर क्षीणकषायवीतरागछद्मस्थ नामके बारहवें गुणस्थान तक अवधिदर्शन वाले जीव होते हैं।

शंका—विभंगदर्शन का पृथक् रूप से उपदेश क्यों नहीं किया ?

समाधान—नहीं, क्योंकि उसका अवधिदर्शन में अन्तर्भाव हो जाता है।

शंका—तो मन:पर्ययदर्शन को भिन्नरूप से कहना चाहिए ?

समाधान—नहीं, क्योंकि मन:पर्ययज्ञान मतिज्ञानपूर्वक होता है, इसलिए मन:पर्ययदर्शन नहीं होता है।

अब केवलदर्शन के स्वामी का प्रतिपादन करने हेतु श्रीमत्पुष्पदंत आचार्य सूत्र का अवतार करते हैं—

[सम्पादन]
सूत्रार्थ—

केवलदर्शन के धारक जीव सयोगिकेवली, अयोगिकेवली और सिद्ध इन तीन स्थानों में होते हैं।।१३५।।

सिद्धांतचिंतामणिटीका—तेरहवें, चौदहवें गुणस्थानों में तथा गुणस्थानातीत सिद्धों के केवलदर्शन होता है।

त्रिकालगोचर अनंत बाह्य पदार्थों में प्रवृत्ति करने वाला केवलज्ञान है और त्रिकालगोचर स्वात्मा में प्रवृत्ति करने वाला केवलदर्शन है।

शंका—पुन: दोनों में समानता कैसे हो सकती है ?

समाधान—उसके बारे में कहते हैं, आत्मा ज्ञानप्रमाण है और ज्ञान त्रिकाल के विषयभूत द्रव्यों की अनंत पर्यायों को जानने वाला होने से तत्परिणाम है इसलिए ज्ञान और दर्शन में समानता है।

शंका—जीव में रहने वाली स्वकीय पर्यायोें की अपेक्षा ज्ञान से दर्शन अधिक हैं ? समाधान—नहीं, क्योंकि यह बात इष्ट ही है।

शंका—फिर ज्ञान के साथ दर्शन की समानता कैसे हो सकती है ?

समाधान—समानता नहीं हो सकती यह बात नहीं है, क्योंकि एक दूसरे की अपेक्षा करने वाले उन दोनों में समानता मान लेने में कोई विरोध नहीं आता है। कहा भी है—

[सम्पादन]
गाथार्थ—

आत्मा ज्ञानप्रमाण है, ज्ञान ज्ञेयप्रमाण है, ज्ञेय लोकालोकप्रमाण है, इसलिए ज्ञान सर्वगत माना गया है।

एक द्रव्य में अतीत, अनागत और गाथा में आए हुए ‘‘अपि’’ शब्द से वर्तमान पर्यायरूप जितनी अर्थपर्याय और व्यंजनपर्याय हैं तत्प्रमाण वह द्रव्य होता है।

ज्ञान के साथ हीनाधिकपने का अभाव होने से आत्मा ज्ञानप्रमाण होता है। उसी को कहते हैं—

‘‘द्रव्य समान गुण और पर्याय वाला होता है’’ इस वचन से वर्तमान के मनुष्य भव में वर्तमान की मनुष्य पर्याय समानरूप से देखी जा रही है। जैसे यह आत्मा इस मनुष्य पर्याय में ज्ञानगुण के बराबर प्रत्यक्ष में दिखाई पड़ता है, वैसे ही निश्चय से सदा अव्याबाध और अविनाशी सुख आदि अनंतगुणों का आधारभूत जो यह केवलज्ञान गुण है उसी प्रमाण यह आत्मा है।

ज्ञान ज्ञेयप्रमाण कहा गया है, जैसे-र्इंधन में स्थित अग्नि र्इंधन के बराबर है, वैसे ही ज्ञान ज्ञेय के बराबर है। ज्ञेय लोक और अलोक हैं इसलिए व्यवहारनय से ज्ञान को सर्वगत कहा गया है। अत: यह सिद्ध हुआ कि आत्मा ज्ञानप्रमाण है और ज्ञान सर्वगत है।

एक द्रव्य में जो अर्थ पर्याय तथा व्यंजन पर्याय हैं एवं उसकी अतीत और अनागत पर्याय हैं एवं ‘‘अपि’’ शब्द से जो वर्तमान पर्यायें हैं उन समस्त पर्यायप्रमाण वह द्रव्य होता है।

तात्पर्य यह है कि आत्मा के अनंतगुणों में एक ज्ञानगुण ही सर्वोत्कृष्ट गुण है, ऐसा जानकर हम लोगों को अपने ज्ञानगुण की पूर्णता के लिए सर्वशक्तिपूर्वक पुरुषार्थ करना चाहिए।

इस प्रकार द्वितीयस्थल में अवधि और केवलदर्शन का कथन करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार षट्खंडागम ग्रंथ के प्रथम खंड में गणिनी ज्ञानमतीकृत ‘‘सिद्धांतचिंतामणि’’ टीका में दर्शनमार्गणा नाम का नवमाँ अधिकार समाप्त हुआ।