ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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043.राजाबाजार कनॉट प्लेस-नई दिल्ली चातुर्मास-सन् १९९९

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राजाबाजार कनॉट प्लेस-नई दिल्ली चातुर्मास-सन् १९९९

समाहित विषयवस्तु

१. चातुर्मास की स्थापना।

२. सामयिक सभी पर्व मनाए गए।

३. कारगिल के शहीदों को श्रद्धांजलि।

४. ऋषभदेव निर्वाण महोत्सव कार्यालय का उद्घाटन।

५. पर्यूषण पर पं.बालमुकुंद शास्त्री के प्रवचन।

६. माताजी द्वारा ऋषभदेव के १० भवों का वर्णन।

७. अशोक विहार में इंंद्रध्वज विधान।

८. शरदपूर्णिमा-माताजी का जन्मदिवस।

९. ऋषभदेव चरितम् ग्रंथ जिनचरणों में समर्पित।

१०. श्री धनंजय जी वित्तमंत्री को जैनरत्न की उपाधि।

११. पं. शिवचरण लाल जी-मैनपुरी विद्वत् महासंघ के अध्यक्ष बने।

१२. डॉ. अनुपम जैन ने महामंत्री पद सुशोभित किया।

१३. चातुर्मास निष्ठापन।

१४. अहिंसा एवं शांति प्रयास सम्मेलन में माताजी ने आचार्य महाप्रज्ञ एवं युवाचार्य महाश्रमण को साहित्य भेंट किये।

१५. सतघरा जिनालय में पंचकल्याणक।

१६. माताजी के प्रवचन।

१७. माँस निर्यात बंद करो, अभियान में माताजी ने भाग लिया।

१८. बीसवीं सदी की विदाई एवं २१वीं की अगवानी पर माताजी ने धार्मिक कार्यक्रम कराये।

१९. ऋषभदेव निर्वाण महोत्सव सम्पन्न।

२०. महोत्सव में माताजी की रचनाओं का विमोचन।

२१. माताजी के प्रवचन।

२२. ऋषभदेव निर्वाण महोत्सव की स्मृति में कीर्तिस्तम्भ का निर्माण।

२३. माताजी का हस्तिनापुर आगमन-सहस्रकूट चैत्यालय का शिलान्यास।

२४. अनेक भक्ति उत्सवों का आयोजन।

२५. श्रुतपंचमी पर्व पर माता जिनवाणी को ऐरावत हाथी पर विराजमान कर शोभायात्रा निकाली।

२६. प्रत्येक दिन त्योहार-दिल्ली को विहार।

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काव्य पद

गणिनी प्रमुख आर्यिका शिरोमणि, माताजी श्री ज्ञानमती।

चातुर्मास स्वीकृति देकर, किया मात उपकार अती।।
आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशी को, पूर्ण हुई जन-जन की आस।
जब माताजी ज्ञानमती ने, किया स्थापित चातुर्मास।।११७३।।

दिल्ली के कोने-कोने में, दौड़ी धार्मिक हर्ष हिलोर।
लगे फुदकने पक्षी जैसे, लगे कुहुकने जैसे मोर।।
विनत हृदय सब दिल्लीवासी, माँ के चरणों किया नमन।
बैर-विरोध छोड़ कर सबने, नये शांतिपथ किया गमन।।११७४।।

जो-जो पर्व सामने आये, किया गया सबका सत्कार।
गुरूपूर्णिमा-रक्षाबंधन, गये मनाये श्रद्धाधार।।
शासन वीर जयंती आई, पार्श्र्वनाथ दिवस निर्वाण।
हुए शहीद करगिल में जो, सबको दिया गया सम्मान।।११७५।।

ऋषभदेव निर्वाण महोत्सव, कार्यालय केन्द्रीय खुला।
जैन मंदिर राजा बाजार में, उद्घाटन सम्पन्न हुआ।।
पर्वराज पर्यूषण आया, मनाया भर उत्साह अती।
हुए प्रभावक प्रवचन प्रतिदिन, पूज्य आर्यिका ज्ञानमती।।११७६।।

पं.बालमुकुन्द जी शास्त्री, नगर मुरैना आये हैं।
तत्त्वार्थसूत्र की सुंदर व्याख्या, करके खूब सुनाये हैं।
दशावतार श्री ऋषभदेव के, उनका वर्णन प्रतिदिन एक।
माताजी ने किए भाव से, शिक्षा दी सबको इक-एक।।११७७।।

अशोक विहार फैस-एक में, हुआ इंद्रध्वज महाविधान।
माताजी ने प्रवचन देकर, फिर करवाया आतम ध्यान।।
शरदपूर्णिमा के आने पर, माताजी का जन्म दिवस।
गया मनाया हार्दिकता से, गाया सबने माँ का यश।।११७८।।

ऋषभदेव चरितम् संस्कृत में, हस्तलिखित माँ ग्रंथ नया।
अपने जन्म दिवस पर माता, जिनचरणों मेंं दिया चढ़ा।।
श्री धनंजय केन्द्रीयमंत्री, धर्मकार्य में रुचि को देख।
किया अलंकृत जैनरत्न से, माताजी आशीष विशेष।।११७९।।

ऋषभदेव तीर्थंकर विद्वत्, महासंघ के अधिवेशन।
शिवचरण लाल जी मैनपुरी का, अध्यक्ष रूप में हुआ चयन।।
शिवचरण लाल जी मैनपुरी हैं, जिनवाणी उद्भट विद्वान्।
धर्म सभा में शिव वचनों से, आ जाते हैं सचमुच प्राण।।११८०।।

सीधे-सादे, सरल हृदय हैं, दिखते दुर्बल हैं मजबूत।
स्वाध्याय में निरत निरंतर, जिनवाणी के श्रेष्ठ सपूत।।
जिनदर्शन-पूजन-प्रवचन हैं, जिनके जीवन की मुख्य धुरी।
सम्माननीय व्यक्तिव के धनी, श्री शिवचरण लाल जी मैनपुरी।।११८१।।

ऐसे शिव अध्यक्ष को पाकर, गौरवान्वित संघ हुआ।
प्रगति शिखर की ओर बढ़ेगा, मंगल प्राप्त प्रसंग हुआ।।
आरूढ़ महामंत्री पद, श्री डॉक्टर अनुपम जैन।
उनकी उपमा स्वयं आप हैं, कर्मठ-कुशल-सकलसुख चैन।।११८२।।

कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी को, हुआ समापन चातुर्मास।
माताजी सम्मेलन पहुँचीं, अहिंसा एवं शांति प्रयास।।
जैनधर्म के सिद्धांतों में, सिद्धांत अहिंसा प्रथम स्थान।
विश्वशांति इससे हो सकती, धर्म अहिंसा सुख की खान।।११८३।।

महाप्रज्ञ आचार्यश्री औ, युवाचार्य श्री महाश्रमण।
सन्निधान में था आयोजित, अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन।।
ऋषभदेव निर्वाण महोत्सव, पर संतों ने चर्चा की।
महाप्रज्ञजी भेंट में दिया, निज साहित्य श्री माताजी।।११८४।।

सतघरा दि. जैन जिनालय, हुए जिनबिम्ब पंचकल्याण।
परमपूज्य श्रीमाताजी का, संघ सहित मंगल सन्निधान।।
एक जनवरी २००० को, प्रवचन-सह आशीष दिया।
शासक-प्रजा-देश-सुखमय हो, भ्रातृभाव संदेश दिया।।११८५।।

आतंकवाद हो नष्ट सदा को, वातावरण बने निर्भय।
फैले प्रेम परस्पर जग में, धर्म अहिंसा की हो जय।।
एक जनवरी दो हजार सन्, शनिवार दिन के मध्यान्ह।
माँस निर्यात बंद देश से, करने किया महा अभियान।।११८६।।

सूत्रधार अभियान के रहे, जैन संत तरुणसागर।
पूज्य आर्यिका ज्ञानमती भी, पहुँचीं संघ लिए गागर।।
भारत संस्कृति आद्य प्रणेता, ऋषभदेव भगवान रहे।
दयाधर्म का मूल आपने, दिव्यध्वनि में वचन कहे।।११८७।।

बूचड़खाने, फार्म पोल्ट्री, हिंसा के कारखाने हैं।
बंद करो ये, देश नाश के, निंदनीय कारनामे हैं।।
सर्दी इतनी दांत किटाकिट, करते रहे न लेते चैन।
उमड़े जनसैलाब ने कहा, धर्म अहिंसा भारत देश।।११८८।।

सदी बीसवीं हुई विदाई, इक्किस का आगमन हुआ।
माताजी से प्राप्त प्रेरणा, भक्ति का कार्यक्रम हुआ।।
भक्तामर-चंद्रप्रभ पूजन, पार्श्र्वनाथ नवग्रह विधान।
आयोजित कर करी प्रार्थना, सुख शांति हो देश महान्।।११८९।।

ऋषभदेव निर्वाण महोत्सव, जोर-शोर-चहुँओर मना।
माताजी के शुभाशीष से, सर्वांग पूर्ण प्रारूप बना।।
करें प्रथमत:ध्वज आरोहण, चयनित लालकिला मैदान।
गिरि कैलाश की रचना ऊपर, हों बहत्तर मूर्ति विराजमान।।११९०।।

प्रतिमाओं के पंचकल्याणक, हों आयोजित उसी समय।
सहस अठोत्तर निर्वाण लाडू, करें समर्पित उसी समय।।
ऋषभदेव नाम से मेला, उसी काल हो आयोजित।
केन्द्र सरकार विश्वास प्राप्त कर, हो प्रचार सम्पूर्ण जगत्।।११९१।।

माताजी ने जैसा सोचा, उससे बढ़कर कार्य हुआ।
पर्वत-प्रतिमा-पैंटिंग झाँकी, उत्तमोत्तम निर्माण हुआ।।
वाजपेयी पी.एम.आयेंगे, उत्साहित था जनगणमन।
लाल किले मैदान में होगा, अभूतपूर्व यह आयोजन।।११९२।।

चार फरवरी दो हजार सन्, उषा लालिमा बिखराई।
ऋषभदेव भगवान विराजित, श्रीपालकी भी आई।।
ध्वज आरोहण किया प्रेमचंद, माताजी सन्निधि पाई।
गणिनी ज्ञानमती माताजी, ससंघ मंच पर पधरार्इं।।११९३।।

गिरि विराजी सब प्रतिमाजी, वाजपेयी-धनंजय पड़े चरण।
मोतीसागर क्षुल्लक जी ने, शुरू किया मंगलाचरण।।
औपचारिकताएँ पूर्ण हुर्इं सब, दीप प्रज्वलन-उद्घाटन।
ब्रह्मचारी श्री रवीन्द्र ने, दिया महोत्सव परिचायन।।११९४।।

कहा आर्यिका श्री चंदना, उत्सव का उद्देश्य महान्।
भूल गए हम ऋषभदेव को, जो कि हमारी है पहचान।।
जन-जन को परिचित करवाना, याद दिलाना स्वर्ण अतीत।
भारतीय संस्कृति स्थापक, हो गये कोटिक वर्ष व्यतीत।।११९५।।

फैल रही है भ्रांति जनों में, उसको हमें मिटाना है।
जैन धर्म के संस्थापक हैं, ऋषभदेव समझाना है।।
पाठ्यपुस्तके महावीर को, संस्थापक बतलाती हैं।
गलत जानकारी देती हैं, सच्चाई झुठलाती हैं।।११९६।।

पूज्य आर्यिका ज्ञानमती जी, रहें सदा स्वाध्याय निरत।
उनकी रचना हुई विमोचित, सर्वोपयोगी ज्ञानामृत।।
षट्खंडागम ग्रंथराज पर, संस्कृत टीका लिखी गई।
सिद्धांतचिन्तामणि वाजपेयी से, माँ कृति विमोचित यहाँ हुई।।११९७।।

पूज्य आर्यिका ज्ञानमती जी, शुभाशीष के शब्द कहे।
ऋषभदेव की भक्ती द्वारा, सदा देश में शांति रहे।।
पर्यावरण विशुद्ध बनेगा, वातावरण रहेगा शुद्ध।
आतंकवाद से मुक्ति मिलेगी, होंगे नहीं परस्पर युद्ध।।११९८।।

अटल बिहारी वाजपेयी जी, भारत राष्ट्र प्रधानमंत्री।
भाग्यवान हूँ, मिला खूब है, शुभाशीष श्रीमाताजी।।
अटल-धनंजय द्वय मंत्रीगण, निर्वाण लाडू चढ़ाया है।
हिमगिरि शोभा निरख-निरखकर, निज सौभाग्य मनाया है।।११९९।।

आगे कदम बढ़ाया उत्सव, पूरण हुए पंचकल्याण।
शिविर-सम्मेलन-अधिवेशन का, चलता रहा दौर अविरल।।
ऋषभदेव जीवन आधारित, पृष्ठभूमि ले शाकाहार।
चत्वारिंशत्, बनीं झाँकियाँ, देश विदेश हुआ प्रचार।।१२००।।

ऋषभदेव निर्वाण महोत्सव, रहा प्रशंसित देश-विदेश।
मात चंदना-मोतीसागर, रवीन्द्र कुमार श्रम किया अशेष।।
पूज्य आर्यिका ज्ञानमती का, सबको शुभ आशीष मिला।
कार्यकर्ता-कर्मचारी-भक्तगण, सबका हृदय कमल खिला।।१२०१।।

ऋषभदेव निर्वाण महोत्सव, यादगार हो स्थाई।
कीर्तिस्तंभ निर्माण कराया, जैन जिनालय नई दिल्ली।।
राजा-बाजार-कनाट-प्लेस में, शोभित है यह कीर्तिस्तंभ।
माताजी के सन्निधान में, गया बनाया यह स्तंभ।।१२०२।।

ऋषभदेव निर्वाण महोत्सव, बिना विघ्न सम्पन्न हुआ।
संघ सहित श्रीमाताजी का, हस्तिनापुर आगमन हुआ।।
जम्बूद्वीप का तृतिय महोत्सव, तथा प्रतिष्ठा पंचकल्याण।
सहस्रकूट का शिलान्यास ये, हुए आपश्री के सन्निधान।।१२०३।।

तीनमूर्ति मंदिर के ऊपर, शिखर बना कलशारोहण।
पंचचत्वारिंशत् दीक्षादिन, किया गया शुभ आयोजन।।
ऋषभदेव जिन कीर्ति स्तंभ का, जम्बूद्वीप में हुआ निर्माण।
सात फुट तुंग प्रतिमाजी का, अभिषेक हुआ ऋषभ भगवान।।१२०४।।

इंद्रध्वज मंडल विधान का, हुआ महत्तम आयोजन।
ज्येष्ठ सुदी पंचमी आई, किया सरस्वती का पूजन।।
ऐरावत पर विराजमान हो, निकलीं माता जिनवाणी।
पूज्य आर्यिका ज्ञानमती ने, की प्रवचन से अगवानी।।१२०५।।

इतिहासज्ञों-पुराविदों-सह, विद्वानों का सम्मेलन।
माताजी के सन्निधान में, हुआ सुष्ठुतम आयोजन।।
जैन तीर्थंकर परम्परा का, ज्ञान कराया सही-सही।
पाठ्य पुस्तकों मुद्रित भ्रामक, सामग्री स्वीकार नहीं।।१२०६।।

एक दिवस भी नहीं बीतता, जिसमेें हो कुछ काम नहीं।
कर्मशील माँ के जीवन में, आलस या विश्राम नहीं।।
जैन समाज दिल्ली ने लगाई, माताजी प्रति भक्तिपुकार।
हस्तिनागपुर छोड़ के माता, दिल्ली को कर दिया विहार।।१२०७।।